लॉर्ड हेस्टिंग्स
1813–1823 — नेपाल युद्ध, तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध, पिंडारी दमन और ब्रिटिश विस्तार
लॉर्ड हेस्टिंग्स का कार्यकाल
लॉर्ड हेस्टिंग्स 1813 से 1823 ई. तक भारत का गवर्नर-जनरल रहा। उसके शासनकाल में अंग्रेजों ने अहस्तक्षेप की अपेक्षाकृत सीमित नीति से हटकर अधिक सक्रिय और विस्तारवादी नीति अपनाई। इसी काल में अंग्रेज–नेपाल युद्ध, तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध, पिंडारियों का दमन और मराठा शक्ति का निर्णायक पतन हुआ।
अंग्रेज–नेपाल युद्ध, 1814–1816
गोरखा शक्ति और कंपनी के बीच संघर्ष
अंग्रेज–नेपाल युद्ध 1814 से 1816 ई. के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा शासन के बीच लड़ा गया। युद्ध का प्रमुख कारण सीमावर्ती क्षेत्रों पर अधिकार को लेकर दोनों पक्षों के बीच बढ़ता विवाद था।
नेपाल की गोरखा शक्ति ने हिमालयी क्षेत्रों में अपना विस्तार किया था, जिससे कंपनी के अधीन या प्रभाव वाले सीमावर्ती क्षेत्रों से टकराव बढ़ा। प्रारंभिक चरण में अंग्रेजों को कठिन प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन बाद में कंपनी की सेना ने बढ़त बना ली।
इस युद्ध का अंत सुगौली की संधि से हुआ। परीक्षा में इसका सही नाम सुगौली की संधि ही लिखना चाहिए।
🎯 परीक्षा में याद रखें
अंग्रेज–नेपाल युद्ध — 1814–1816 ई. — सुगौली की संधि।
सुगौली की संधि, 1816
नेपाल और कंपनी के संबंधों में निर्णायक मोड़
सुगौली की संधि 1815 ई. के अंत में तय हुई और 1816 ई. में प्रभावी हुई। इसके बाद नेपाल को अपने नियंत्रण वाले कई क्षेत्रों को छोड़ना पड़ा और ब्रिटिश प्रभाव स्वीकार करना पड़ा।
नेपाल ने कुमाऊँ और गढ़वाल सहित कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार छोड़ा। कंपनी को हिमालयी क्षेत्र में अपनी राजनीतिक और सामरिक स्थिति मजबूत करने का अवसर मिला।
इस संधि के बाद ब्रिटिश और नेपाल के संबंध अपेक्षाकृत स्थिर हुए तथा आगे चलकर अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की युद्धक क्षमता को महत्व देना शुरू किया।
📗 महत्वपूर्ण तथ्य
सुगौली की संधि — अंग्रेज–नेपाल युद्ध का अंत — 1816 ई.
पिंडारियों का दमन
मध्य भारत में सैन्य अभियान
लॉर्ड हेस्टिंग्स के शासनकाल में पिंडारियों के विरुद्ध बड़े सैन्य अभियान चलाए गए। पिंडारी नियमित राज्य की सेना नहीं थे, बल्कि विभिन्न मराठा सरदारों से जुड़े घुड़सवार लुटेरे समूहों के रूप में सक्रिय थे।
वे मध्य भारत और आसपास के क्षेत्रों में छापामार लूटपाट के लिए प्रसिद्ध थे। हेस्टिंग्स ने उनके विरुद्ध व्यापक सैन्य घेराबंदी की और उनके प्रमुख ठिकानों तथा सहयोगियों को कमजोर किया।
पिंडारी दमन की कार्रवाई ने मराठा सरदारों और अंग्रेजों के बीच तनाव भी बढ़ाया और यही परिस्थितियाँ आगे तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध से जुड़ गईं।
सिंधिया के साथ संधि, 1817
ग्वालियर संधि और पिंडारी अभियान
1817 ई. में सिंधिया के साथ संधि की गई। इसे सामान्यतः ग्वालियर की संधि कहा जाता है। इस समझौते के माध्यम से कंपनी ने सिंधिया को पिंडारियों के विरुद्ध अंग्रेजी अभियान में तटस्थ या सहयोगी बनाए रखने का प्रयास किया।
इस संधि का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि पिंडारियों के विरुद्ध अभियान चलाते समय सिंधिया अंग्रेजों के विरोध में न आए। इससे कंपनी को मध्य भारत में अपनी सैन्य रणनीति लागू करने में सुविधा हुई।
🎯 महत्वपूर्ण युग्म
1817 ई. — सिंधिया के साथ ग्वालियर की संधि — पिंडारी अभियान से संबंधित।
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध
1817–1818/1819 — मराठा शक्ति का निर्णायक पतन
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध 1817 ई. में शुरू हुआ। इसका मुख्य संघर्ष 1818 ई. तक निर्णायक रूप से समाप्त हो गया, हालांकि कुछ स्रोत इसका व्यापक काल 1817–1819 भी लिखते हैं। परीक्षा में 1817–1818 या 1817–1819 दोनों रूप मिल सकते हैं।
इस युद्ध में पेशवा बाजीराव द्वितीय, भोंसले और होल्कर सहित मराठा शक्तियाँ अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में आईं। अंग्रेज पहले ही सिंधिया को संधि के माध्यम से अलग कर चुके थे, जिससे मराठा शक्ति की सामूहिक क्षमता कमजोर हुई।
युद्ध में अंग्रेजों की विजय हुई और मराठा संघ की राजनीतिक शक्ति का निर्णायक अंत हो गया। पेशवा बाजीराव द्वितीय को पराजित कर पदच्युत किया गया तथा पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
“पूरा मराठा परिसंघ कंपनी के साम्राज्य में मिला दिया गया” कहना पूरी तरह सही नहीं है। पेशवा के प्रदेशों का बड़ा भाग कंपनी के अधीन आया और मराठा संघ की केंद्रीय राजनीतिक शक्ति समाप्त हुई, लेकिन सिंधिया, होल्कर आदि कुछ रियासतें ब्रिटिश अधीनस्थ/संधिबद्ध रियासतों के रूप में बनी रहीं।
पेशवा पद का अंत और ब्रिटिश प्रभुत्व
मराठा परिसंघ के विघटन के बाद
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के बाद बाजीराव द्वितीय को पेशवा के पद से हटा दिया गया और पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया। उसे अंग्रेजों द्वारा पेंशन देकर कानपुर के निकट बिठूर भेज दिया गया।
पेशवा के अधिकांश क्षेत्रों पर कंपनी का प्रत्यक्ष अधिकार स्थापित हुआ। इससे पश्चिम और मध्य भारत में अंग्रेजी प्रभुत्व बहुत बढ़ गया और मराठा परिसंघ एक प्रभावी राजनीतिक शक्ति के रूप में समाप्त हो गया।
सतारा में शिवाजी के वंश से संबंधित एक शासक को सीमित राज्य दिया गया, लेकिन वास्तविक सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति अंग्रेजों के हाथ में रही।
मुंबई प्रेसिडेंसी का विस्तार
1818 के बाद पश्चिमी भारत में कंपनी का विस्तार
1818 ई. में पेशवा की पराजय के बाद उसके अधीन रहे अनेक क्षेत्र कंपनी के नियंत्रण में आए और उन्हें बंबई प्रेसिडेंसी के प्रशासन से जोड़ा गया।
बंबई प्रेसिडेंसी की स्थापना 1818 ई. में पहली बार नहीं हुई थी। बंबई इससे पहले ही अंग्रेजी प्रशासन का एक प्रमुख केंद्र बन चुकी थी। 1818 के बाद तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के परिणामस्वरूप उसका क्षेत्र और राजनीतिक महत्व बहुत बढ़ गया।
⚠️ भ्रम से बचें
1818 ई. = बंबई प्रेसिडेंसी की पहली स्थापना नहीं, बल्कि मराठा क्षेत्रों के जुड़ने से उसका बड़ा विस्तार।
रैयतवाड़ी बंदोबस्त और थॉमस मुनरो
मद्रास में कृषक से प्रत्यक्ष भू-राजस्व व्यवस्था
लॉर्ड हेस्टिंग्स के कार्यकाल में सर थॉमस मुनरो 1820 ई. में मद्रास का गवर्नर बना। उसके शासनकाल में रैयतवाड़ी व्यवस्था को मद्रास प्रेसीडेंसी में व्यापक रूप से व्यवस्थित और लागू किया गया।
रैयतवाड़ी व्यवस्था में सरकार का भू-राजस्व संबंध सीधे रैयत अर्थात किसान से स्थापित किया जाता था। इसमें जमींदार को स्थायी मध्यस्थ के रूप में आवश्यक नहीं माना गया।
इस व्यवस्था के विकास का श्रेय केवल मुनरो को नहीं दिया जाता। इसके प्रारंभिक प्रयोग कैप्टन अलेक्जेंडर रीड और थॉमस मुनरो ने दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में पहले ही किए थे। बाद में मुनरो के मद्रास का गवर्नर बनने पर इसे बड़े स्तर पर लागू किया गया।
🎯 परीक्षा में याद रखें
रैयतवाड़ी व्यवस्था — थॉमस मुनरो और अलेक्जेंडर रीड; मद्रास में व्यापक क्रियान्वयन — मुनरो के गवर्नर काल में।
स्थायी और रैयतवाड़ी व्यवस्था में अंतर
भू-राजस्व संबंध को समझें
| बिंदु | स्थायी बंदोबस्त | रैयतवाड़ी व्यवस्था |
|---|---|---|
| मुख्य संबंध | सरकार और जमींदार | सरकार और किसान |
| प्रमुख क्षेत्र | बंगाल, बिहार आदि | मद्रास और बाद में बंबई के अनेक क्षेत्र |
| प्रमुख नाम | लॉर्ड कार्नवालिस | थॉमस मुनरो, अलेक्जेंडर रीड |
| राजस्व | स्थायी रूप से निश्चित | समय-समय पर पुनर्निर्धारित किया जा सकता था |
लॉर्ड हेस्टिंग्स की नीति का परिणाम
ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना की दिशा में बड़ा कदम
लॉर्ड हेस्टिंग्स के शासनकाल के अंत तक भारत में कंपनी की राजनीतिक और सैन्य शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी। नेपाल युद्ध के बाद हिमालयी क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ा और तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के बाद मराठा शक्ति का प्रभावी राजनीतिक प्रतिरोध समाप्त हो गया।
पिंडारियों के दमन और मराठा संघ के विघटन के बाद अंग्रेजों ने मध्य और पश्चिम भारत में अपनी सर्वोच्चता मजबूत कर ली। इस प्रकार हेस्टिंग्स का शासनकाल भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता के विस्तार का महत्वपूर्ण चरण था।
एक नज़र में
त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| लॉर्ड हेस्टिंग्स | 1813–1823 ई. |
| अंग्रेज–नेपाल युद्ध | 1814–1816 ई. |
| युद्ध का अंत | सुगौली की संधि, 1816 ई. |
| सिंधिया से संधि | ग्वालियर की संधि, 1817 ई. |
| तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध | 1817–1818; कुछ पुस्तकों में 1817–1819 |
| प्रमुख परिणाम | पेशवा पद का अंत और मराठा संघ की राजनीतिक शक्ति का पतन |
| 1818 के बाद | बंबई प्रेसिडेंसी का क्षेत्रीय विस्तार |
| मद्रास के गवर्नर | सर थॉमस मुनरो, 1820 ई. |
| रैयतवाड़ी व्यवस्था | किसान से प्रत्यक्ष भू-राजस्व; मुनरो और अलेक्जेंडर रीड से संबंधित |
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
लॉर्ड हेस्टिंग्स — 1813–1823 ई.
अंग्रेज–नेपाल युद्ध — 1814–1816 ई. — सुगौली की संधि, 1816 ई.
1817 ई. — सिंधिया के साथ ग्वालियर की संधि।
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध — 1817–1818/1819 — मराठा शक्ति का निर्णायक पतन।
युद्ध के बाद पेशवा पद समाप्त हुआ और बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर बिठूर भेजा गया।
मराठा परिसंघ का प्रभावी राजनीतिक अंत हुआ, लेकिन सभी मराठा रियासतों का प्रत्यक्ष विलय नहीं हुआ।
1818 ई. के बाद बंबई प्रेसिडेंसी का बड़ा क्षेत्रीय विस्तार हुआ; उसकी पहली स्थापना 1818 में नहीं हुई थी।
1820 ई. — थॉमस मुनरो मद्रास का गवर्नर; उसके समय रैयतवाड़ी व्यवस्था को व्यापक रूप से लागू किया गया।
रैयतवाड़ी व्यवस्था — थॉमस मुनरो और अलेक्जेंडर रीड — सरकार और किसान के बीच प्रत्यक्ष भू-राजस्व संबंध।