वायदा कारोबार एवं शेयर बाजार
कमोडिटी बाजार, लघु-मध्यम उद्यम मंच, सेबी और शेयर बाजार की महत्वपूर्ण शब्दावलियाँ
वायदा कारोबार का अर्थ
वायदा कारोबार में किसी वस्तु या वित्तीय परिसंपत्ति को भविष्य की निर्धारित तिथि पर पूर्व-निर्धारित मूल्य पर खरीदने या बेचने का अनुबंध किया जाता है। कमोडिटी वायदा बाजार में कृषि उपज, धातु, ऊर्जा और अन्य अधिसूचित वस्तुओं से जुड़े वायदा एवं विकल्प अनुबंधों का व्यापार किया जाता है।
इस बाजार का प्रमुख उद्देश्य केवल भविष्य के भाव पर सट्टा लगाना नहीं है। यह मूल्य खोज और मूल्य जोखिम से बचाव की सुविधा भी देता है। उत्पादक, व्यापारी और औद्योगिक उपभोक्ता कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने के लिए वायदा अनुबंधों का उपयोग कर सकते हैं।
कमोडिटी बाजार
वस्तुओं पर आधारित वायदा एवं विकल्प कारोबार
कमोडिटी बाजार में खाद्य तेल, अनाज, मसाले, धातु, ऊर्जा तथा अन्य अनुमत वस्तुओं से संबंधित अनुबंधों के भाव इलेक्ट्रॉनिक रूप से उद्धृत और व्यापार किए जाते हैं।
वायदा बाजार में वास्तविक वस्तु को उसी समय खरीदना आवश्यक नहीं होता। व्यापारी भविष्य की तारीख के लिए मानकीकृत अनुबंध का व्यापार करते हैं। अनुबंध की शर्तें संबंधित एक्सचेंज द्वारा निर्धारित होती हैं।
कमोडिटी डेरिवेटिव बाजार का प्रमुख आर्थिक उपयोग मूल्य खोज, जोखिम प्रबंधन और हेजिंग है।
कमोडिटी वायदा कारोबार का उदाहरण
मूल्य जोखिम को सरल तरीके से समझें
मान लीजिए किसी किसान को आशंका है कि फसल तैयार होने तक उसकी उपज की बाजार कीमत घट सकती है। वह पात्र कमोडिटी वायदा अनुबंध के माध्यम से भविष्य की कीमत से संबंधित जोखिम को कम करने का प्रयास कर सकता है।
इसी प्रकार किसी उद्योग को भविष्य में किसी कच्चे माल की कीमत बढ़ने का डर हो तो वह डेरिवेटिव बाजार के माध्यम से उस मूल्य जोखिम का प्रबंधन कर सकता है।
इस प्रकार वायदा कारोबार का मूल आर्थिक उद्देश्य भविष्य की कीमतों के जोखिम को एक पक्ष से दूसरे पक्ष में स्थानांतरित करने की सुविधा देना है।
भारत के प्रमुख कमोडिटी डेरिवेटिव एक्सचेंज
वर्तमान और ऐतिहासिक स्थिति
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज का मुख्यालय मुंबई में है। यह धातु, ऊर्जा, बुलियन तथा अन्य कमोडिटी डेरिवेटिव में कारोबार का प्रमुख मंच है।
नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज का मुख्यालय भी मुंबई में है और कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव में इसकी विशेष भूमिका है।
नेशनल मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज का मुख्यालय अहमदाबाद में था। इसे पुरानी पुस्तकों में अलग कमोडिटी एक्सचेंज के रूप में पढ़ाया जाता है, लेकिन सितंबर 2018 में इसका इंडियन कमोडिटी एक्सचेंज में विलय हो गया। इसलिए वर्तमान सूची में इसे अलग सक्रिय एक्सचेंज नहीं माना जाता।
इंडियन कमोडिटी एक्सचेंज भी कमोडिटी डेरिवेटिव एक्सचेंज के रूप में कार्य करता था, लेकिन इसकी मान्यता दिसंबर 2024 में वापस ले ली गई। इसलिए इसे वर्तमान सक्रिय एक्सचेंज के रूप में याद नहीं करना चाहिए।
मार्च 2026 तक भारत में सक्रिय कमोडिटी डेरिवेटिव कारोबार बीएसई, एमसीएक्स, एनसीडीईएक्स और एनएसई पर दर्ज था।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण वर्तमान सुधार
एनएमसीई → 2018 में आईसीईएक्स में विलय।
आईसीईएक्स → दिसंबर 2024 में मान्यता वापस।
मार्च 2026 तक सक्रिय मंच → बीएसई, एमसीएक्स, एनसीडीईएक्स और एनएसई।
पुरानी और वर्तमान सूची
परीक्षा में वर्ष देखकर उत्तर दें
| एक्सचेंज | पुरानी स्थिति | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| एमसीएक्स | मुंबई का प्रमुख कमोडिटी एक्सचेंज | सक्रिय |
| एनसीडीईएक्स | मुंबई; कृषि कमोडिटी में प्रमुख | सक्रिय |
| एनएमसीई | अहमदाबाद का अलग एक्सचेंज | 2018 में आईसीईएक्स में विलय |
| आईसीईएक्स | मुंबई क्षेत्र से संचालित कमोडिटी एक्सचेंज | 2024 में मान्यता वापस |
| बीएसई | मुख्यतः प्रतिभूति एक्सचेंज | कमोडिटी डेरिवेटिव खंड भी |
| एनएसई | मुख्यतः प्रतिभूति एक्सचेंज | कमोडिटी डेरिवेटिव खंड भी |
कमोडिटी बाजार का नियमन
सेबी की नियामकीय भूमिका
भारत में कमोडिटी डेरिवेटिव बाजार वर्तमान में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के नियामकीय ढाँचे के अंतर्गत आता है।
पहले कमोडिटी वायदा बाजार का प्रमुख नियामक वायदा बाजार आयोग था। सितंबर 2015 में इसका सेबी में विलय हो गया, जिसके बाद कमोडिटी डेरिवेटिव बाजार का नियमन सेबी के अधीन आ गया।
🎯 परीक्षा बिंदु
वायदा बाजार आयोग → 28 सितंबर 2015 को सेबी में विलय
लघु एवं मध्यम उद्यम एक्सचेंज
छोटी और मध्यम कंपनियों को पूंजी बाजार से जोड़ना
लघु एवं मध्यम उद्यम मंच विशेष रूप से पात्र छोटी और मध्यम कंपनियों को पूंजी बाजार के माध्यम से धन जुटाने और अपने शेयर सूचीबद्ध कराने की सुविधा देने के लिए विकसित किया गया है।
यह कंपनियों को सार्वजनिक निर्गम के माध्यम से निवेशकों से पूंजी जुटाने का अवसर देता है। इसके लिए कंपनियों को संबंधित सेबी नियमों और स्टॉक एक्सचेंज की पात्रता शर्तों को पूरा करना होता है।
भारत में बीएसई का अपना लघु-मध्यम उद्यम मंच है और एनएसई का ऐसा मंच एनएसई इमर्ज के नाम से जाना जाता है।
लघु-मध्यम उद्यम मंच पर सूचीबद्ध कंपनी बाद में निर्धारित पात्रता और नियमों को पूरा करके मुख्य बोर्ड पर स्थानांतरित हो सकती है।
सेबी
भारतीय प्रतिभूति बाजार का प्रमुख नियामक
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड भारतीय प्रतिभूति बाजार का प्रमुख नियामक है।
इसकी स्थापना 12 अप्रैल 1988 को भारत सरकार द्वारा एक गैर-सांविधिक निकाय के रूप में की गई थी।
सेबी अधिनियम, 1992 लागू होने के बाद इसे वैधानिक दर्जा और विधिक शक्तियाँ प्राप्त हुईं।
इसका मुख्यालय मुंबई में स्थित है।
सेबी के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं—निवेशकों के हितों की रक्षा करना, प्रतिभूति बाजार का विकास करना और प्रतिभूति बाजार का विनियमन करना।
🎯 याद रखें
सेबी के प्रमुख कार्य
निवेशक संरक्षण से बाजार निगरानी तक
निवेशक संरक्षण: निवेशकों के हितों की रक्षा तथा निष्पक्ष बाजार व्यवस्था को बढ़ावा देना।
स्टॉक एक्सचेंज का विनियमन: मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज और बाजार आधारभूत संस्थाओं के लिए नियामकीय ढाँचा निर्धारित करना।
बाजार मध्यस्थों का विनियमन: स्टॉक ब्रोकर, मर्चेंट बैंकर, रजिस्ट्रार, अंडरराइटर और अन्य पंजीकृत मध्यस्थों पर लागू नियमों का संचालन करना।
म्यूचुअल फंड का विनियमन: म्यूचुअल फंड उद्योग के लिए नियम और निवेशक संरक्षण मानदंड निर्धारित करना।
धोखाधड़ी और बाजार हेरफेर पर नियंत्रण: अनुचित व्यापार व्यवहार और बाजार में कृत्रिम गतिविधियों के विरुद्ध कार्रवाई करना।
अंदरूनी व्यापार पर रोक: अप्रकाशित मूल्य-संवेदनशील सूचना का अनुचित लाभ उठाकर किए जाने वाले व्यापार को नियंत्रित करना।
पूंजी निर्गम: सार्वजनिक निर्गम, सूचीबद्धता, प्रकटीकरण, प्रवर्तक तथा कॉरपोरेट प्रशासन से संबंधित नियम बनाना।
निवेशक शिक्षा: निवेशकों में जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न शिक्षा और संरक्षण कार्यक्रम चलाना।
सेबी और निवेशक शिकायत
ऑनलाइन शिकायत निवारण व्यवस्था
सेबी निवेशकों की प्रतिभूति बाजार से संबंधित शिकायतों के निवारण की सुविधा के लिए स्कोर्स नामक ऑनलाइन मंच संचालित करता है।
इसके माध्यम से निवेशक सूचीबद्ध कंपनियों, सेबी-पंजीकृत मध्यस्थों और बाजार आधारभूत संस्थाओं से संबंधित पात्र शिकायत दर्ज कर सकता है और उसकी स्थिति देख सकता है।
निवेशक को सामान्यतः पहले संबंधित संस्था के समक्ष शिकायत उठानी चाहिए और उसके बाद आवश्यक होने पर स्कोर्स व्यवस्था का उपयोग किया जा सकता है।
अंदरूनी व्यापार पर दंड
₹25 करोड़ वाला तथ्य कैसे याद करें?
पुरानी अध्ययन सामग्री में यह लिखा मिलता है कि सेबी अंदरूनी व्यापार पर 25 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है। यह बात अकेले लिखने पर अधूरी है।
वर्तमान सेबी अधिनियम की धारा 15G के अनुसार अंदरूनी व्यापार के लिए मौद्रिक दंड कम-से-कम 10 लाख रुपये हो सकता है और अधिकतम 25 करोड़ रुपये अथवा अंदरूनी व्यापार से अर्जित लाभ की तीन गुना राशि, जो भी अधिक हो, तक हो सकता है।
इसलिए इसे केवल “अधिकतम 25 करोड़ रुपये” के रूप में याद करना सही नहीं है, क्योंकि यदि अवैध लाभ की तीन गुना राशि 25 करोड़ रुपये से अधिक है तो वह सीमा लागू हो सकती है।
⚠️ सही तथ्य
अंदरूनी व्यापार → न्यूनतम ₹10 लाख → अधिकतम ₹25 करोड़ या अर्जित लाभ का 3 गुना, जो अधिक हो।
स्वेट इक्विटी शेयर
ज्ञान, बौद्धिक संपदा या मूल्यवर्धन के बदले शेयर
स्वेट इक्विटी शेयर के संबंध में यह कहना कि कंपनी उन्हें उच्च स्तर के कर्मचारियों को हमेशा “बिना शुल्क” देती है, सही नहीं है।
ये ऐसे इक्विटी शेयर होते हैं जिन्हें कंपनी पात्र कर्मचारियों या निदेशकों को छूट पर अथवा नकद के अलावा अन्य प्रतिफल के बदले जारी कर सकती है।
इनका संबंध सामान्यतः कर्मचारी या निदेशक द्वारा उपलब्ध कराए गए तकनीकी ज्ञान, बौद्धिक संपदा अधिकार या कंपनी के लिए किए गए मूल्यवर्धन से होता है।
इसलिए स्वेट इक्विटी का उद्देश्य केवल कर्मचारी को पुरस्कार देना नहीं, बल्कि उसके विशेष ज्ञान, अधिकार या मूल्यवर्धन को इक्विटी के माध्यम से मान्यता देना भी है।
⚠️ भ्रम से बचें
स्वेट इक्विटी = हमेशा मुफ्त शेयर नहीं।
बोनस शेयर
मौजूदा शेयरधारकों को बिना प्रतिफल अतिरिक्त शेयर
बोनस शेयर वे अतिरिक्त शेयर होते हैं जिन्हें कंपनी अपने मौजूदा शेयरधारकों को उनके पास पहले से मौजूद शेयरों के अनुपात में बिना किसी अतिरिक्त प्रतिफल के जारी करती है।
उदाहरण के लिए यदि कंपनी 1:1 बोनस घोषित करती है तो पात्र शेयरधारक को प्रत्येक एक मौजूदा शेयर पर एक अतिरिक्त शेयर मिलता है।
बोनस शेयरों को पुराने वित्तीय साहित्य में स्क्रिप शेयर भी कहा जाता है।
इन्हें केवल “नकद लाभांश के स्थान पर दिया गया लाभांश” कहना पूरी तरह सही नहीं है। बोनस निर्गम कंपनी के पात्र भंडारों के पूंजीकरण के माध्यम से किया जाता है और यह नकद लाभांश से अलग कॉरपोरेट कार्रवाई है।
आरंभिक सार्वजनिक निर्गम
पहली बार जनता के लिए प्रतिभूतियों का सार्वजनिक प्रस्ताव
आरंभिक सार्वजनिक निर्गम वह प्रक्रिया है जिसमें कोई असूचीबद्ध कंपनी पहली बार आम जनता के समक्ष अपने शेयर या पात्र परिवर्तनीय प्रतिभूतियों का सार्वजनिक प्रस्ताव करती है।
इसे केवल “निजी कंपनी पहली बार शेयर बेचती है” कहना तकनीकी रूप से अधूरा है। मुख्य बात यह है कि जारीकर्ता कंपनी उस समय असूचीबद्ध होती है और पहली बार सार्वजनिक प्रस्ताव करती है।
आरंभिक सार्वजनिक निर्गम के बाद पात्रता और प्रक्रिया पूरी होने पर कंपनी की प्रतिभूतियाँ स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होकर व्यापार के लिए उपलब्ध हो सकती हैं।
इस माध्यम से कंपनी नई पूंजी जुटा सकती है। किसी निर्गम में मौजूदा शेयरधारकों द्वारा शेयरों की बिक्री का हिस्सा भी हो सकता है, जिसमें उस हिस्से की राशि कंपनी के बजाय बेचने वाले शेयरधारकों को जाती है।
तेजड़िया
बाजार में कीमत बढ़ने की अपेक्षा
तेजड़िया उस बाजार सहभागी को कहा जाता है जो किसी शेयर, प्रतिभूति या बाजार की कीमत बढ़ने की अपेक्षा रखता है।
वह सामान्यतः इस उम्मीद से खरीदारी कर सकता है कि भविष्य में कीमत बढ़ने पर लाभ प्राप्त होगा।
तेजी वाला बाजार ऐसी व्यापक बाजार स्थिति को दर्शाता है जिसमें कीमतों में लगातार या व्यापक बढ़त की प्रवृत्ति हो।
यह कहना कि केवल तेजड़ियों की सक्रियता से पूरा शेयर बाजार बढ़ता है, अत्यधिक सरल व्याख्या है। बाजार की चाल मांग-आपूर्ति, कंपनी के परिणाम, ब्याज दर, आर्थिक स्थिति और अनेक अन्य कारकों से प्रभावित होती है।
मंदड़िया
बाजार में कीमत गिरने की अपेक्षा
मंदड़िया वह बाजार सहभागी है जो किसी शेयर या बाजार की कीमत में गिरावट की अपेक्षा रखता है।
कुछ परिस्थितियों में बाजार सहभागी पहले प्रतिभूति बेचने और बाद में कम कीमत पर खरीदने की रणनीति अपना सकता है, जिसे सामान्य रूप से शॉर्ट सेलिंग से जोड़ा जाता है।
मंदी वाला बाजार ऐसी स्थिति है जिसमें कीमतों में व्यापक या निरंतर गिरावट की प्रवृत्ति होती है।
बाजार की गिरावट को केवल मंदड़ियों की सक्रियता का परिणाम नहीं मानना चाहिए। आर्थिक परिस्थितियाँ, कंपनी प्रदर्शन, वैश्विक घटनाएँ और निवेशक भावना भी महत्वपूर्ण होती हैं।
🎯 सरल अंतर
तेजड़िया → भाव बढ़ने की उम्मीद
मंदड़िया → भाव गिरने की उम्मीद
बदला प्रणाली
पुरानी कैरी-फॉरवर्ड व्यवस्था
बदला भारतीय शेयर बाजार में प्रचलित एक पुरानी कैरी-फॉरवर्ड व्यवस्था थी। इसके माध्यम से कुछ शेयर सौदों के निपटान को अगले निपटान चक्र तक आगे बढ़ाया जा सकता था।
इसे केवल “खरीदार भुगतान टालकर भविष्य में शेयर लेना चाहता है” कहना अधूरा है। यह मूलतः निपटान को आगे ले जाने और उस स्थिति के वित्तपोषण से संबंधित प्रणाली थी।
बदला व्यवस्था पर समय-समय पर प्रतिबंध और संशोधन हुए। अंततः 2001 में अनिवार्य रोलिंग सेटलमेंट व्यवस्था लागू होने के बाद बदला प्रणाली समाप्त हो गई।
इसलिए बदला वर्तमान भारतीय शेयर बाजार की सक्रिय निपटान प्रणाली नहीं है।
⚠️ परीक्षा में वर्ष
बदला प्रणाली → वर्तमान में प्रचलित नहीं → 2001 से अनिवार्य रोलिंग सेटलमेंट के साथ समाप्त।
रोलिंग सेटलमेंट
प्रत्येक कारोबारी दिन का अलग निपटान
रोलिंग सेटलमेंट ऐसी प्रणाली है जिसमें प्रत्येक कारोबारी दिन किए गए सौदों का निपटान उस व्यापार तिथि से निर्धारित कार्यदिवसों के बाद किया जाता है।
यदि व्यापार की तारीख को टी माना जाए तो टी+1 का अर्थ है कि सामान्य निपटान अगले कार्यदिवस में पूरा होता है।
पुरानी पुस्तकों में टी+2 उदाहरण मिलता है क्योंकि भारत में लंबे समय तक टी+2 प्रणाली लागू थी। वर्तमान भारतीय इक्विटी नकद बाजार का सामान्य निपटान चक्र टी+1 है।
इसके अतिरिक्त सेबी ने मार्च 2024 से कुछ पात्र शेयरों के लिए मौजूदा टी+1 व्यवस्था के साथ वैकल्पिक टी+0 निपटान का परीक्षणात्मक ढाँचा भी शुरू किया।
🎯 वर्तमान तथ्य
पुराना — टी+2
सामान्य वर्तमान चक्र — टी+1
कुछ परिस्थितियों में वैकल्पिक — टी+0 व्यवस्था
रोलिंग सेटलमेंट का विकास
निपटान अवधि लगातार कम हुई
| व्यवस्था | महत्व |
|---|---|
| खाता अवधि निपटान | पुरानी व्यवस्था; निश्चित अवधि के सभी सौदों का सामूहिक निपटान |
| टी+5 | रोलिंग सेटलमेंट का प्रारंभिक चरण |
| टी+3 | निपटान अवधि और कम हुई |
| टी+2 | 2003 से लंबे समय तक महत्वपूर्ण मानक |
| टी+1 | वर्तमान सामान्य इक्विटी नकद बाजार निपटान |
| टी+0 | कुछ पात्र प्रतिभूतियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था का विकास |
महत्वपूर्ण शब्दावलियों का सार
एक नज़र में
| शब्द | सही अर्थ |
|---|---|
| स्वेट इक्विटी | पात्र कर्मचारी/निदेशक को ज्ञान, बौद्धिक संपदा या मूल्यवर्धन के लिए छूट पर अथवा गैर-नकद प्रतिफल के बदले शेयर |
| बोनस शेयर | मौजूदा शेयरधारकों को अनुपात में बिना अतिरिक्त प्रतिफल दिए अतिरिक्त शेयर |
| आरंभिक सार्वजनिक निर्गम | असूचीबद्ध कंपनी का पहली बार जनता के लिए सार्वजनिक निर्गम/प्रस्ताव |
| तेजड़िया | कीमत बढ़ने की अपेक्षा रखने वाला बाजार सहभागी |
| मंदड़िया | कीमत गिरने की अपेक्षा रखने वाला बाजार सहभागी |
| बदला | पुरानी कैरी-फॉरवर्ड निपटान व्यवस्था; अब समाप्त |
| रोलिंग सेटलमेंट | प्रत्येक दिन के सौदों का निर्धारित टी+ अवधि में अलग निपटान |
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
एक बार में साफ समझें
एनएमसीई: वर्तमान स्वतंत्र कमोडिटी एक्सचेंज नहीं; 2018 में आईसीईएक्स में विलय हो चुका है।
आईसीईएक्स: इसकी एक्सचेंज मान्यता दिसंबर 2024 में वापस ली जा चुकी है।
वर्तमान कमोडिटी बाजार: मार्च 2026 तक सक्रिय कमोडिटी डेरिवेटिव कारोबार बीएसई, एमसीएक्स, एनसीडीईएक्स और एनएसई पर था।
स्वेट इक्विटी: हमेशा मुफ्त शेयर नहीं होते।
बोनस शेयर: मुफ्त अतिरिक्त शेयर होते हैं, लेकिन इन्हें केवल नकद लाभांश का विकल्प कहना उचित नहीं है।
आरंभिक सार्वजनिक निर्गम: केवल निजी कंपनी तक सीमित नहीं; मुख्य तथ्य कंपनी का असूचीबद्ध होना और पहली बार सार्वजनिक प्रस्ताव करना है।
बदला: वर्तमान निपटान व्यवस्था नहीं है।
रोलिंग सेटलमेंट: टी+2 पुराना सामान्य तथ्य है; वर्तमान सामान्य इक्विटी नकद निपटान टी+1 है।
सेबी जुर्माना: अंदरूनी व्यापार पर केवल “25 करोड़ तक” कहना अधूरा है; 25 करोड़ रुपये या लाभ की तीन गुना राशि, जो अधिक हो, तक दंड का प्रावधान हो सकता है।
त्वरित पुनरावृत्ति
परीक्षा से पहले एक नज़र
⚡ याद रखने का क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
वायदा कारोबार भविष्य की निर्धारित तारीख और मूल्य से संबंधित मानकीकृत अनुबंधों का कारोबार है।
कमोडिटी डेरिवेटिव बाजार के प्रमुख उद्देश्य मूल्य खोज और जोखिम से बचाव हैं।
एमसीएक्स और एनसीडीईएक्स भारत के प्रमुख विशेष कमोडिटी डेरिवेटिव एक्सचेंज हैं।
एनएमसीई का 2018 में आईसीईएक्स में विलय हो गया था।
आईसीईएक्स की मान्यता दिसंबर 2024 में वापस ली जा चुकी है।
मार्च 2026 तक कमोडिटी डेरिवेटिव कारोबार बीएसई, एमसीएक्स, एनसीडीईएक्स और एनएसई पर सक्रिय था।
लघु-मध्यम उद्यम मंच पात्र छोटी और मध्यम कंपनियों को पूंजी बाजार से धन जुटाने और शेयर सूचीबद्ध कराने की सुविधा देता है।
बीएसई और एनएसई दोनों के लघु-मध्यम उद्यम मंच हैं; एनएसई का मंच एनएसई इमर्ज कहलाता है।
सेबी — 12 अप्रैल 1988 में गैर-सांविधिक निकाय के रूप में गठित हुआ।
1992 में सेबी को वैधानिक दर्जा मिला।
सेबी का मुख्यालय मुंबई में है।
सेबी के मुख्य उद्देश्य — निवेशक संरक्षण, प्रतिभूति बाजार का विकास और बाजार का विनियमन।
स्कोर्स सेबी की निवेशक शिकायत निवारण सुविधा है।
स्वेट इक्विटी शेयर हमेशा मुफ्त नहीं होते; इन्हें छूट पर या गैर-नकद प्रतिफल के बदले जारी किया जा सकता है।
बोनस शेयर मौजूदा शेयरधारकों को उनके शेयरों के अनुपात में बिना अतिरिक्त प्रतिफल के दिए जाते हैं।
आरंभिक सार्वजनिक निर्गम असूचीबद्ध कंपनी का पहला सार्वजनिक निर्गम/प्रस्ताव है।
तेजड़िया भाव बढ़ने और मंदड़िया भाव गिरने की अपेक्षा रखता है।
बदला पुरानी कैरी-फॉरवर्ड प्रणाली थी और 2001 से अनिवार्य रोलिंग सेटलमेंट आने के बाद समाप्त हो गई।
वर्तमान सामान्य इक्विटी नकद निपटान चक्र टी+1 है; कुछ पात्र परिस्थितियों में वैकल्पिक टी+0 व्यवस्था भी विकसित की गई है।
अंदरूनी व्यापार पर मौद्रिक दंड कम-से-कम 10 लाख रुपये तथा अधिकतम 25 करोड़ रुपये या अर्जित लाभ की तीन गुना राशि, जो अधिक हो, तक हो सकता है।