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वैष्णव धर्म
भारतीय धार्मिक परंपरा

वैष्णव धर्म

विष्णु, नारायण, वासुदेव-कृष्ण, अवतार एवं भक्ति परंपरा

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वैष्णव धर्म का विकास

विष्णु, नारायण और वासुदेव-कृष्ण

वैष्णव धर्म का विकास विष्णु, नारायण और वासुदेव-कृष्ण से संबंधित विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सम्मिलन से हुआ।

प्रारंभिक भागवत धर्म में वासुदेव-कृष्ण की उपासना महत्वपूर्ण थी।

पांचरात्र परंपरा का संबंध नारायण-वासुदेव की उपासना से था।

वासुदेव-कृष्ण का संबंध वृष्णि समूह से था और मथुरा उनकी उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

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छांदोग्य उपनिषद में कृष्ण

देवकीपुत्र कृष्ण

छांदोग्य उपनिषद में देवकीपुत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है।

उन्हें घोर आंगिरस से शिक्षा प्राप्त करने वाला बताया गया है।

यह कृष्ण-परंपरा के प्रारंभिक महत्वपूर्ण साहित्यिक उल्लेखों में गिना जाता है।

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विष्णु के अवतार

दशावतार परंपरा

पुराणिक काल में विष्णु के अवतारों की धारणा का व्यापक विकास हुआ।

बाद की वैष्णव परंपरा में दशावतार की प्रसिद्ध सूची विकसित हुई। अलग-अलग ग्रंथों में सूची में कुछ अंतर मिलता है।

मत्स्य पुराण सहित अनेक पुराणों में विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलता है।

गुप्तकालीन कला में वराह अवतार अत्यंत प्रसिद्ध था। उदयगिरि की विशाल वराह प्रतिमा इसका प्रमुख उदाहरण है।

सुदर्शन चक्र विष्णु का प्रमुख आयुध है। कला में इसकी तीलियों की संख्या अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।

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दशावतार

विष्णु के दस प्रसिद्ध अवतार

वैष्णव परंपरा में विष्णु के दशावतार अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

प्रचलित सूची में सामान्यतः — मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि को शामिल किया जाता है।

कुछ वैष्णव परंपराओं और ग्रंथों में बलराम को भी अवतार-सूची में स्थान मिलता है, इसलिए दशावतार की सूची सभी ग्रंथों में बिल्कुल समान नहीं है।

कल्कि को भविष्य का अवतार माना जाता है।

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भागवत धर्म

वासुदेव-कृष्ण की उपासना

प्राचीन भारत में भागवत धर्म वासुदेव-कृष्ण की उपासना से जुड़ी महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा थी।

वासुदेव की उपासना विशेष रूप से वृष्णि-सात्वत समूहों से संबंधित रही।

समय के साथ वासुदेव-कृष्ण, नारायण और विष्णु से संबंधित परंपराओं का समन्वय बढ़ा और विकसित वैष्णव धर्म का स्वरूप सामने आया।

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हेलियोडोरस स्तंभ

भागवत धर्म का महत्वपूर्ण प्रमाण

मध्य प्रदेश के बेसनगर या विदिशा के निकट स्थित हेलियोडोरस स्तंभ प्रारंभिक भागवत धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण है।

हेलियोडोरस एक यूनानी राजदूत था, जो इंडो-ग्रीक शासक एंटियाल्किडस की ओर से शुंग शासक भागभद्र के दरबार में आया था।

स्तंभ के अभिलेख में हेलियोडोरस ने स्वयं को भगवत या भागवत बताया है।

यह स्तंभ गरुड़-ध्वज के रूप में वासुदेव को समर्पित था।

बहुत महत्वपूर्ण

हेलियोडोरस स्तंभ — बेसनगर/विदिशा।

समर्पित — वासुदेव।

हेलियोडोरस — यूनानी राजदूत।

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घोसुंडी अभिलेख

संकर्षण और वासुदेव

राजस्थान का घोसुंडी अभिलेख प्रारंभिक वैष्णव-भागवत परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

इसमें संकर्षण और वासुदेव की उपासना का उल्लेख मिलता है।

यह अभिलेख इस बात का प्रमाण है कि ईसा पूर्व की अंतिम शताब्दियों में वासुदेव-कृष्ण से जुड़ी भागवत परंपरा विकसित हो चुकी थी।

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भगवद्गीता और वैष्णव भक्ति

कृष्ण और अर्जुन का संवाद

भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का एक महत्वपूर्ण भाग है।

इसमें कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद के माध्यम से कर्म, ज्ञान और भक्ति के विभिन्न मार्गों का वर्णन मिलता है।

भगवद्गीता में भक्ति को ईश्वर की प्राप्ति का महत्वपूर्ण मार्ग बताया गया है।

वैष्णव धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं पर भगवद्गीता का अत्यंत गहरा प्रभाव रहा है।

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वैष्णव धर्म में भक्ति

ईश्वर के प्रति समर्पण

वैष्णव धर्म में भक्ति अर्थात ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।

भक्त विष्णु या उनके अवतारों — विशेषकर राम और कृष्ण की व्यक्तिगत आराधना करते हैं।

मध्यकाल में वैष्णव भक्ति आंदोलन ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं, साहित्य और धार्मिक परंपराओं को व्यापक रूप से प्रभावित किया।

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आलवार संत

तमिल वैष्णव भक्ति

दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति के प्रसार में आलवार संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

तमिल वैष्णव परंपरा में 12 आलवार विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

इन संतों ने विष्णु और उनके विभिन्न रूपों के प्रति गहन भक्ति व्यक्त करने वाले तमिल पदों की रचना की।

प्रमुख आलवारों में नम्मालवार, पेरियालवार और आंडाल विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

आंडाल आलवार परंपरा की प्रसिद्ध महिला संत थीं।

याद रखें

शैव भक्ति संत — नयनार।

वैष्णव भक्ति संत — आलवार।

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नालायिर दिव्य प्रबंधम्

तमिल वैष्णव भक्ति साहित्य

आलवार संतों की तमिल भक्ति रचनाओं का प्रसिद्ध संग्रह नालायिर दिव्य प्रबंधम् कहलाता है।

इसका अर्थ लगभग चार हजार दिव्य पदों का संग्रह है।

श्रीवैष्णव परंपरा में इस साहित्य को अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान प्राप्त है।

इसके संकलन और संरक्षण की परंपरा नाथमुनि से जोड़ी जाती है।

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रामानुजाचार्य

विशिष्टाद्वैत दर्शन

रामानुजाचार्य मध्यकालीन भारत के महान वैष्णव दार्शनिक और आचार्य थे।

उनका संबंध श्रीवैष्णव परंपरा से था।

रामानुज ने विशिष्टाद्वैत वेदांत का व्यवस्थित प्रतिपादन किया।

उनके दर्शन में ईश्वर को सर्वोच्च वास्तविकता माना गया, जबकि जीव और जगत वास्तविक होते हुए भी ईश्वर पर आश्रित माने गए।

उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में श्रीभाष्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

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श्रीवैष्णव परंपरा

विष्णु-लक्ष्मी उपासना

श्रीवैष्णव परंपरा दक्षिण भारत की प्रमुख वैष्णव धार्मिक परंपराओं में से एक है।

इसमें विष्णु और लक्ष्मी की उपासना को विशेष महत्व दिया जाता है।

आलवार संतों की भक्ति परंपरा और रामानुजाचार्य के दर्शन ने श्रीवैष्णव धर्म के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

तमिलनाडु का श्रीरंगम इस परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र है।

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मध्वाचार्य

द्वैत वेदांत

मध्वाचार्य वैष्णव वेदांत के महत्वपूर्ण आचार्य थे।

उन्होंने द्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया।

मध्व दर्शन में ईश्वर और जीव को मूलतः भिन्न माना गया।

उनकी परंपरा में विष्णु को सर्वोच्च ईश्वर माना जाता है।

मध्वाचार्य का प्रमुख धार्मिक केंद्र उडुपी से संबंधित है।

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निंबार्क और वल्लभाचार्य

कृष्ण भक्ति की परंपराएँ

निंबार्काचार्य से संबंधित वैष्णव परंपरा में राधा-कृष्ण भक्ति को विशेष महत्व प्राप्त हुआ।

निंबार्क दर्शन को सामान्यतः द्वैताद्वैत से संबंधित माना जाता है।

वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया।

वल्लभाचार्य से संबंधित धार्मिक परंपरा पुष्टिमार्ग के नाम से प्रसिद्ध हुई।

पुष्टिमार्ग में श्रीनाथजी की उपासना का विशेष महत्व है।

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चैतन्य महाप्रभु

गौड़ीय वैष्णव परंपरा

चैतन्य महाप्रभु बंगाल और पूर्वी भारत की कृष्ण-भक्ति परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण संतों में थे।

उन्होंने राधा-कृष्ण भक्ति और प्रेम-भक्ति पर विशेष बल दिया।

उनकी भक्ति परंपरा में नाम-संकीर्तन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

चैतन्य से संबंधित परंपरा बाद में गौड़ीय वैष्णव धर्म के रूप में व्यापक हुई।

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राम भक्ति परंपरा

रामानंद और तुलसीदास

उत्तर भारत में राम भक्ति वैष्णव भक्ति की अत्यंत महत्वपूर्ण धारा बनी।

रामानंद को उत्तर भारतीय राम-भक्ति परंपरा के महत्वपूर्ण संतों में गिना जाता है।

तुलसीदास ने अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना की, जिससे राम-भक्ति को व्यापक लोकप्रियता मिली।

राम को विष्णु के प्रमुख अवतारों में माना जाता है।

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विष्णु के प्रमुख प्रतीक

एक नजर में

प्रतीक / आयुध संबंध
सुदर्शन चक्र विष्णु का प्रमुख चक्र आयुध
शंख पांचजन्य शंख से संबंधित परंपरा
गदा कौमोदकी गदा
पद्म कमल, विष्णु का प्रमुख प्रतीक
गरुड़ विष्णु का वाहन
शेषनाग अनंत-शेष पर विष्णु के शयन का पुराणिक रूप
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लक्ष्मी और विष्णु

वैष्णव पुराणिक परंपरा

पुराणिक वैष्णव परंपरा में लक्ष्मी विष्णु की पत्नी और शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

लक्ष्मी को समृद्धि, सौभाग्य और ऐश्वर्य से संबंधित देवी माना जाता है।

अनेक वैष्णव मंदिरों में विष्णु और लक्ष्मी की संयुक्त उपासना की जाती है।

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प्रमुख वैष्णव मंदिर

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण

मंदिर / केंद्र स्थान विशेषता
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम, तमिलनाडु श्रीवैष्णव परंपरा का प्रमुख केंद्र
वेंकटेश्वर मंदिर तिरुमला-तिरुपति, आंध्र प्रदेश भगवान वेंकटेश्वर/विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर
जगन्नाथ मंदिर पुरी, ओडिशा जगन्नाथ उपासना का प्रमुख केंद्र
द्वारकाधीश मंदिर द्वारका, गुजरात कृष्ण उपासना का प्रमुख केंद्र
बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखंड नारायण/बद्रीविशाल की उपासना
कृष्ण जन्मभूमि मथुरा, उत्तर प्रदेश कृष्ण जन्म परंपरा से संबंधित
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विष्णु पुराण और भागवत पुराण

प्रमुख वैष्णव ग्रंथ

वैष्णव परंपरा के प्रमुख पुराणों में विष्णु पुराण और भागवत पुराण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

भागवत पुराण में कृष्ण के जीवन और भक्ति को विशेष महत्व दिया गया है।

भागवत पुराण ने मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति साहित्य और धार्मिक परंपराओं को व्यापक रूप से प्रभावित किया।

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वैष्णव धर्म के प्रमुख केंद्र

भारत में विस्तार

प्राचीन काल में मथुरा वासुदेव-कृष्ण उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र था।

बाद में द्वारका, पुरी, श्रीरंगम, तिरुपति, बद्रीनाथ और वृंदावन जैसे स्थल वैष्णव धर्म के महत्वपूर्ण केंद्र बने।

दक्षिण भारत में आलवार और श्रीवैष्णव परंपरा, उत्तर भारत में राम और कृष्ण भक्ति, तथा पूर्वी भारत में गौड़ीय वैष्णव परंपरा ने वैष्णव धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वैष्णव धर्म — अंतिम परीक्षा पुनरावृत्ति

वैष्णव धर्म का प्रमुख उपास्य — विष्णु।

प्रारंभिक वैष्णव विकास — विष्णु, नारायण और वासुदेव-कृष्ण परंपराओं का समन्वय।

भागवत धर्म — वासुदेव-कृष्ण की उपासना से संबंधित।

पांचरात्र — नारायण-वासुदेव उपासना से संबंधित।

वासुदेव-कृष्ण — वृष्णि समूह से संबंधित।

प्रारंभिक महत्वपूर्ण केंद्र — मथुरा।

छांदोग्य उपनिषद — देवकीपुत्र कृष्ण का उल्लेख।

देवकीपुत्र कृष्ण के गुरु — घोर आंगिरस।

हेलियोडोरस स्तंभ — बेसनगर/विदिशा।

हेलियोडोरस स्तंभ — वासुदेव को समर्पित गरुड़-ध्वज।

घोसुंडी अभिलेख — संकर्षण और वासुदेव।

विष्णु का प्रमुख वाहन — गरुड़।

विष्णु का प्रमुख आयुध — सुदर्शन चक्र।

अन्य प्रतीक — शंख, गदा और पद्म।

प्रमुख अवतार — राम और कृष्ण।

भविष्य का अवतार — कल्कि।

तमिल वैष्णव संत — आलवार।

आलवारों की प्रसिद्ध संख्या — 12।

प्रसिद्ध महिला आलवार — आंडाल।

आलवार साहित्य — नालायिर दिव्य प्रबंधम्।

रामानुजाचार्य — विशिष्टाद्वैत।

मध्वाचार्य — द्वैत वेदांत।

वल्लभाचार्य — शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग।

चैतन्य महाप्रभु — गौड़ीय वैष्णव तथा कृष्ण प्रेम-भक्ति।

तुलसीदास — रामचरितमानस।

प्रमुख वैष्णव ग्रंथ — भगवद्गीता, विष्णु पुराण और भागवत पुराण।

प्रमुख केंद्र — मथुरा, वृंदावन, द्वारका, पुरी, श्रीरंगम, तिरुपति और बद्रीनाथ।

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