सत्रिया
असम की वैष्णव सत्र परंपरा, श्रीमंत शंकरदेव, प्रमुख गुरु और परीक्षा-उपयोगी कलाकार
सत्रिया नृत्य
सत्रिया असम की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली है। इसका विकास असम की वैष्णव सत्र परंपरा के भीतर हुआ। सत्र धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाएँ थीं जहाँ भक्ति, संगीत, नृत्य और नाट्य का प्रशिक्षण तथा प्रदर्शन किया जाता था।
सत्रिया का विकास मुख्य रूप से महान वैष्णव संत और समाज-सुधारक श्रीमंत शंकरदेव तथा उनके शिष्य माधवदेव की भक्ति परंपरा से जुड़ा है। कृष्ण-भक्ति, भागवत परंपरा, अंकिया नाट और भाओना ने इस नृत्य शैली को विशेष स्वरूप प्रदान किया।
प्रारंभ में सत्रिया मुख्यतः सत्रों के भीतर पुरुष भिक्षु-कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। बाद में यह सत्रों से बाहर सार्वजनिक मंचों पर भी व्यापक रूप से प्रस्तुत होने लगा और महिला कलाकारों की भागीदारी भी बढ़ी।
सबसे नया शास्त्रीय नृत्य सत्रिया है। इसके फाउंडर श्रीमंता शंकरदेव हैं इसको शास्त्रीय नृत्य में वर्ष 2000 में शामिल किया गया।
श्रीमंत शंकरदेव
सत्रिया परंपरा के मूल प्रवर्तक
श्रीमंत शंकरदेव 15वीं-16वीं शताब्दी के महान असमिया संत, कवि, नाटककार, संगीतकार और समाज-सुधारक थे। सत्रिया नृत्य तथा असम की नव-वैष्णव सांस्कृतिक परंपरा के विकास में उनका केंद्रीय स्थान है।
उन्होंने एकशरण नामधर्म के माध्यम से भक्ति परंपरा का प्रचार किया और धर्मोपदेश को संगीत, नृत्य तथा नाटक के माध्यम से जनता तक पहुँचाया।
शंकरदेव से जुड़ी अंकिया नाट परंपरा एकांकी धार्मिक नाटकों की शैली है। इन्हीं नाटकों की प्रस्तुतियों से जुड़ी नृत्य-नाट्य परंपरा ने सत्रिया के विकास को मजबूत आधार दिया।
भाओना अंकिया नाट की मंचीय प्रस्तुति से संबंधित प्रसिद्ध असमिया धार्मिक-नाट्य परंपरा है।
शंकरदेव द्वारा रचित बोरगीत भी असम की वैष्णव संगीत परंपरा का महत्वपूर्ण अंग हैं और सत्रिया संगीत से उनका गहरा संबंध है।
🎯 परीक्षा में याद रखें
सत्रिया — असम — श्रीमंत शंकरदेव — वैष्णव सत्र परंपरा
माधवदेव और वैष्णव परंपरा
सत्रिया के विकास में महत्वपूर्ण योगदान
माधवदेव श्रीमंत शंकरदेव के प्रमुख शिष्य और असम की नव-वैष्णव परंपरा के महान संत थे। उन्होंने गुरु की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
माधवदेव द्वारा रचित अनेक धार्मिक गीत और नाट्य रचनाएँ सत्रिया संगीत तथा नृत्य-नाट्य परंपरा से जुड़ी हैं।
इसलिए सत्रिया के विकास को केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं समझना चाहिए; इसकी मूल संरचना में शंकरदेव और माधवदेव दोनों की वैष्णव सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
सत्र और सत्रिया
नाम का मूल संबंध
सत्र असम की वैष्णव धार्मिक-सांस्कृतिक संस्था है। सत्रों में धर्मोपदेश, संगीत, नृत्य, नाट्य, साहित्य और सामुदायिक गतिविधियों की परंपरा विकसित हुई।
इन्हीं सत्रों में विकसित और संरक्षित नृत्य शैली को आगे चलकर सत्रिया कहा गया।
सत्रिया केवल मनोरंजन के लिए विकसित नृत्य नहीं था; इसका मूल उद्देश्य भक्ति और धार्मिक कथाओं की प्रस्तुति था।
🎯 सरल संबंध
सत्र → वैष्णव संस्था
सत्रिया → सत्रों में विकसित नृत्य परंपरा
सत्रिया की प्रमुख विशेषताएँ
नृत्य, अभिनय और भक्ति
सत्रिया में शुद्ध नृत्य, अभिनय और नृत्य-नाट्य तीनों तत्वों का सुंदर समन्वय मिलता है।
नृत्य की विषयवस्तु मुख्यतः भगवान कृष्ण, विष्णु और वैष्णव भक्ति से संबंधित कथाओं पर आधारित होती है।
सत्रिया की शारीरिक तकनीक में शरीर की नियंत्रित गतियाँ, हस्त-मुद्राएँ, पद-संचालन और ताल का महत्वपूर्ण स्थान है।
माटी अखाड़ा सत्रिया प्रशिक्षण की मूल शारीरिक अभ्यास-पद्धति है। इसके माध्यम से शरीर को विभिन्न नृत्य मुद्राओं, संतुलन और जटिल गतियों के लिए तैयार किया जाता है।
सत्रिया की प्रस्तुतियों में खोल, ताल या झांझ और अन्य पारंपरिक वाद्यों का विशेष महत्व है।
🎯 High Yield
माटी अखाड़ा — सत्रिया की मूल प्रशिक्षण पद्धति
खोल — प्रमुख वाद्य
गायन-बायन
संगीत और वाद्य की सामूहिक परंपरा
गायन-बायन असम की सत्र परंपरा का महत्वपूर्ण संगीतात्मक अंग है। इसमें गायन और ताल-वाद्यों की सामूहिक प्रस्तुति होती है।
गायन मुख्यतः गायकों से और बायन ताल-वाद्य बजाने वाले कलाकारों से संबंधित है। खोल और ताल इसके प्रमुख वाद्य हैं।
सत्रिया से जुड़े अनेक कलाकारों के नाम के साथ बायन या बरबायन उपाधि मिलती है। यह केवल उनका उपनाम नहीं, बल्कि सत्र परंपरा में उनकी विशेष कलात्मक भूमिका और पद से संबंधित हो सकता है।
⚠️ नामों में भ्रम से बचें
बरबायन को अलग व्यक्ति का उपनाम मानकर न पढ़ें। सत्र परंपरा में यह प्रतिष्ठित वादक/कलाकार की उपाधि के रूप में प्रयुक्त होती रही है।
गुरु जतिन गोस्वामी
सत्रिया के प्रमुख आधुनिक गुरु
गुरु जतिन गोस्वामी सत्रिया के सबसे प्रसिद्ध आधुनिक गुरुओं और नृत्याचार्यों में गिने जाते हैं। उन्होंने सत्रिया को सत्रों की परंपरागत सीमाओं से बाहर व्यापक मंचीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने सत्रिया नृत्य के प्रशिक्षण, प्रस्तुति और संरक्षण के लिए अनेक कलाकारों को प्रशिक्षित किया तथा इसकी पारंपरिक संरचना को आधुनिक मंच के अनुरूप प्रस्तुत किया।
उन्हें 2004 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
वे पद्म श्री से भी सम्मानित हैं और सत्रिया के प्रमुख राष्ट्रीय स्तर के गुरुओं में गिने जाते हैं।
🎯 परीक्षा तथ्य
जतिन गोस्वामी — सत्रिया — संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2004
शारदी सैकिया
सत्रिया की प्रमुख नृत्यांगना
शारदी सैकिया, जिन्हें अंग्रेजी स्रोतों में सरोदी या शारोदी सैकिया भी लिखा जाता है, असम की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना हैं और सत्रिया के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं।
उन्होंने सत्रिया की शिक्षा प्रसिद्ध गुरु रासेश्वर सैकिया बरबायन से प्राप्त की। बाद में उन्होंने सत्रिया को सार्वजनिक मंचों पर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्हें 2015 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
उन्हें 2022 में असम सरकार का विष्णु राभा पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
⚠️ नाम सुधार
शारोदी सौकिया के स्थान पर शारदी/सरोदी सैकिया पढ़ें।
प्रभात शर्मा
सत्रिया संगीत से संबंधित महत्वपूर्ण नाम
प्रभात शर्मा असम के प्रसिद्ध संगीतकार और बाँसुरी वादक थे। उनका नाम सत्रिया के साथ मुख्यतः सत्रिया संगीत और इससे जुड़े सांस्कृतिक संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
उन्होंने सत्रिया नृत्य और नाट्य परंपरा से संबंधित संगीत के संरक्षण तथा प्रशिक्षण में मार्गदर्शन दिया। संगीत नाटक अकादमी के सत्रिया केंद्र से संबंधित सत्रिया संगीत परियोजनाओं में भी उनकी भूमिका रही।
इसलिए उन्हें केवल “सत्रिया नर्तक” के रूप में पढ़ना सही नहीं है। उन्हें सत्रिया संगीत से जुड़े प्रमुख संगीतकार के रूप में याद रखना अधिक सुरक्षित है।
🎯 याद रखें
प्रभात शर्मा — सत्रिया संगीत से संबंधित प्रसिद्ध संगीतकार एवं बाँसुरी वादक
परमानंद बरबायन
सत्रिया के प्रमुख पारंपरिक कलाकार
परमानंद बरबायन सत्रिया की पारंपरिक सत्र परंपरा से जुड़े प्रमुख कलाकारों और गुरुओं में गिने जाते हैं।
आपके पुराने नोट में नाम “परमान्दा बाखयान” लिखा गया है, लेकिन सही प्रचलित रूप परमानंद बरबायन है।
उन्हें 1999-2000 के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सत्रिया के क्षेत्र में प्रदान किया गया।
⚠️ नाम सुधार
परमान्दा बाखयान → परमानंद बरबायन
घनकांत बोरा बरबायन
सत्रिया के महान गुरु और बायनाचार्य
घनकांत बोरा बरबायन असम के प्रसिद्ध सत्रिया गुरु, नर्तक, वादक और नृत्य-निर्देशक हैं। उनका संबंध माजुली की सत्र परंपरा से है।
उन्होंने बचपन से ही सत्रिया नृत्य, खोल वादन और सत्र की अन्य प्रदर्शन परंपराओं का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
उन्हें 2001 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
सत्रिया के संरक्षण, शिक्षण और प्रचार में उनके योगदान के लिए उन्हें 2013 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
उन्हें बायनाचार्य की प्रतिष्ठित उपाधि से भी जाना जाता है।
⚠️ नाम सुधार
गहन चंद्रा के स्थान पर प्रमुख सत्रिया कलाकार घनकांत बोरा बरबायन पढ़ें।
🎯 परीक्षा तथ्य
घनकांत बोरा — सत्रिया — संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2001 — पद्म श्री 2013
माणिक बरबायन
सत्रिया के प्रमुख गुरु
माणिक बरबायन सत्रिया की पारंपरिक गुरु-परंपरा से जुड़े प्रसिद्ध कलाकार हैं।
आपके पुराने नोट में “गोस्वामी मणिक बाखयान” जैसा नाम लिखा गया है, लेकिन मानक पुरस्कार-सूची में प्रमुख सत्रिया कलाकार का नाम माणिक बरबायन मिलता है।
उन्हें 2010 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
सत्रिया नृत्य तथा पारंपरिक सत्र प्रशिक्षण की तकनीकों को आगे बढ़ाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
⚠️ नाम सुधार
गोस्वामी मणिक बाखयान → माणिक बरबायन
सत्रिया के अन्य प्रमुख कलाकार
परीक्षा के लिए अतिरिक्त महत्वपूर्ण नाम
मणिराम दत्ता मुक्तियार सत्रिया परंपरा के प्रमुख कलाकार थे और उन्हें 1963 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
बापुराम बायन अटाई को 1978 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
रासेश्वर सैकिया बायन मुक्तियार सत्रिया के महान गुरु थे और उन्हें 1980 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। शारदी सैकिया ने उनसे सत्रिया की शिक्षा प्राप्त की।
इंदिरा पी. पी. बोरा सत्रिया को सत्रों से बाहर मंचीय दुनिया में लोकप्रिय बनाने वाली प्रमुख महिला कलाकारों में गिनी जाती हैं। उन्हें 1996 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
प्रदीप चालिहा को 1998 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
गणकांत दत्ता बरबायन को 2007 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।
जोगेन दत्ता बायन को 2013 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया।
अनिता शर्मा को 2014 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सत्रिया के लिए प्रदान किया गया।
हरिचरण भुइयाँ बरबायन को 2016 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
रामकृष्ण तालुकदार को 2017 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।
टंकेश्वर हजारिका बरबायन को 2018 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया।
रंजुमोनी सैकिया को 2019 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।
प्रमुख कलाकार — एक नज़र में
त्वरित परीक्षा तालिका
| कलाकार | प्रमुख पहचान | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| श्रीमंत शंकरदेव | सत्रिया की मूल वैष्णव परंपरा | अंकिया नाट, भाओना, बोरगीत |
| जतिन गोस्वामी | प्रमुख आधुनिक गुरु | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2004 |
| शारदी सैकिया | प्रमुख सत्रिया नृत्यांगना | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015 |
| प्रभात शर्मा | सत्रिया संगीत | संगीतकार एवं बाँसुरी वादक |
| परमानंद बरबायन | पारंपरिक सत्रिया गुरु | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1999-2000 |
| घनकांत बोरा बरबायन | सत्रिया गुरु और बायनाचार्य | अकादमी पुरस्कार 2001, पद्म श्री 2013 |
| माणिक बरबायन | सत्रिया गुरु | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2010 |
| अनिता शर्मा | सत्रिया नृत्यांगना | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2014 |
| टंकेश्वर हजारिका बरबायन | सत्रिया | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2018 |
| रंजुमोनी सैकिया | सत्रिया | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2019 |
नामों में होने वाली सामान्य गलतियाँ
सही नाम एक साथ याद करें
शारोदी सौकिया को शारदी/सरोदी सैकिया के रूप में पढ़ें।
परमान्दा बाखयान से अभिप्राय परमानंद बरबायन है।
गहन चंद्रा से अभिप्राय प्रमुख सत्रिया गुरु घनकांत बोरा बरबायन है।
गोस्वामी मणिक बाखयान से अभिप्राय मानक पुरस्कार-सूची में दर्ज माणिक बरबायन है।
प्रभात शर्मा को प्रमुख सत्रिया नर्तक की बजाय सत्रिया संगीत से जुड़े प्रसिद्ध संगीतकार के रूप में याद करें।
बरबायन, बायन और बायनाचार्य जैसे शब्द सत्र की संगीत और वाद्य परंपरा से संबंधित उपाधियाँ हैं; इन्हें नाम का सामान्य हिस्सा समझकर अर्थहीन न छोड़ें।
त्वरित पुनरावृत्ति
एक लाइन में महत्वपूर्ण तथ्य
🧠 एक साथ याद करें
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
सत्रिया असम की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली है।
इसका विकास असम की वैष्णव सत्र परंपरा में हुआ।
श्रीमंत शंकरदेव सत्रिया नृत्य-नाट्य परंपरा के मूल प्रवर्तक माने जाते हैं।
माधवदेव ने शंकरदेव की वैष्णव सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
अंकिया नाट शंकरदेव से संबंधित धार्मिक नाट्य परंपरा और भाओना उसकी मंचीय प्रस्तुति से जुड़ी है।
बोरगीत शंकरदेव और माधवदेव की वैष्णव संगीत परंपरा से संबंधित हैं।
माटी अखाड़ा सत्रिया प्रशिक्षण की मूल शारीरिक अभ्यास-पद्धति है।
गायन-बायन सत्र की महत्वपूर्ण संगीत और वाद्य परंपरा है।
जतिन गोस्वामी — प्रमुख सत्रिया गुरु — संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2004।
शारदी सैकिया — प्रमुख सत्रिया नृत्यांगना — संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015।
प्रभात शर्मा — सत्रिया संगीत से जुड़े प्रसिद्ध संगीतकार और बाँसुरी वादक।
परमानंद बरबायन — संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1999-2000।
घनकांत बोरा बरबायन — संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2001 — पद्म श्री 2013।
माणिक बरबायन — संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2010।
शारोदी सौकिया → शारदी/सरोदी सैकिया, परमान्दा बाखयान → परमानंद बरबायन, गहन चंद्रा → घनकांत बोरा बरबायन और गोस्वामी मणिक बाखयान → माणिक बरबायन के रूप में याद करें।