साइमन कमीशन
1927–1930 — गठन, भारत में विरोध, लाला लाजपत राय और प्रमुख सिफारिशें
साइमन कमीशन क्या था?
साइमन कमीशन ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में संवैधानिक व्यवस्था के कामकाज की समीक्षा करने और भविष्य के संवैधानिक सुधारों के संबंध में सुझाव देने के लिए नियुक्त किया गया एक आयोग था। इसका आधिकारिक नाम भारतीय सांविधिक आयोग था, लेकिन इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन के नाम पर यह साइमन कमीशन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
साइमन कमीशन का गठन
1927 में नियुक्त सात सदस्यीय आयोग
साइमन कमीशन की नियुक्ति की घोषणा 8 नवंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध ब्रिटिश राजनीतिज्ञ सर जॉन साइमन ने की।
आयोग में कुल सात सदस्य थे और सभी सदस्य ब्रिटिश संसद से संबंधित थे। इसमें एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था।
सभी सदस्य ब्रिटिश होने के कारण इसे सामान्यतः सर्वश्वेत आयोग भी कहा जाता है।
इसका आधिकारिक नाम भारतीय सांविधिक आयोग था। अध्यक्ष जॉन साइमन के नाम पर यह भारतीय इतिहास में साइमन कमीशन के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुआ।
🎯 परीक्षा में याद रखें
1927 — साइमन कमीशन — अध्यक्ष सर जॉन साइमन — कुल 7 सदस्य — कोई भारतीय सदस्य नहीं।
कमीशन क्यों बनाया गया?
1919 की संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा
भारत शासन अधिनियम, 1919 में यह व्यवस्था की गई थी कि कुछ वर्षों बाद भारत में लागू संवैधानिक व्यवस्था के कामकाज की समीक्षा की जाएगी और आगे के सुधारों पर विचार किया जाएगा।
इसी उद्देश्य से साइमन कमीशन को भारत में शासन-व्यवस्था के संचालन की समीक्षा करने तथा यह सुझाव देने का कार्य दिया गया कि भविष्य में भारत की संवैधानिक व्यवस्था में किस प्रकार के परिवर्तन किए जाने चाहिए।
ब्रिटिश सरकार ने निर्धारित समय से पहले ही 1927 में आयोग नियुक्त कर दिया। भारतीय नेताओं के लिए सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि भारत के संवैधानिक भविष्य की समीक्षा करने वाले आयोग में किसी भारतीय को स्थान नहीं दिया गया था।
भारतीयों ने विरोध क्यों किया?
भारतीय प्रतिनिधित्व का पूर्ण अभाव
साइमन कमीशन के विरोध का सबसे महत्वपूर्ण कारण यह था कि इसके सातों सदस्य ब्रिटिश थे और एक भी भारतीय इसका सदस्य नहीं था।
भारतीय नेताओं का मानना था कि भारत की शासन-व्यवस्था और संवैधानिक भविष्य के बारे में निर्णय लेने वाली संस्था में भारतीयों का प्रतिनिधित्व न होना भारत के राजनीतिक अधिकारों का अपमान था।
इस कारण भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न वर्गों में आयोग के प्रति तीव्र असंतोष उत्पन्न हुआ और इसके बहिष्कार का निर्णय लिया गया।
कांग्रेस द्वारा बहिष्कार
राष्ट्रीय स्तर पर विरोध का निर्णय
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। कांग्रेस का स्पष्ट मत था कि भारतीय प्रतिनिधित्व के बिना गठित आयोग को भारत के संवैधानिक भविष्य का निर्धारण करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
कमीशन के विरोध को अनेक भारतीय राजनीतिक नेताओं और संगठनों का समर्थन मिला। परिणामस्वरूप साइमन कमीशन का विरोध एक व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन का रूप लेने लगा।
📗 महत्वपूर्ण तथ्य
साइमन कमीशन के विरोध ने विभिन्न विचारधाराओं वाले भारतीय नेताओं को ब्रिटिश संवैधानिक नीति के विरोध में एक साझा मंच पर आने का अवसर दिया।
साइमन कमीशन का भारत आगमन
3 फरवरी 1928
साइमन कमीशन 3 फरवरी 1928 को बंबई पहुँचा। आयोग के भारत पहुँचते ही विभिन्न स्थानों पर हड़तालें, जुलूस और विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए।
प्रदर्शनकारियों ने आयोग का स्वागत काले झंडों से किया और उसके विरोध में “साइमन वापस जाओ” का नारा लगाया।
इसके बाद साइमन कमीशन भारत के जिन-जिन प्रमुख स्थानों पर गया, अनेक स्थानों पर उसे इसी प्रकार विरोध और बहिष्कार का सामना करना पड़ा।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
भारत आगमन — 3 फरवरी 1928, बंबई।
विरोध का प्रमुख नारा — “साइमन वापस जाओ।”
“साइमन वापस जाओ” का नारा
विरोध आंदोलन का प्रसिद्ध नारा
साइमन कमीशन विरोधी आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध पहचान “साइमन वापस जाओ” का नारा बना। प्रदर्शनकारी काले झंडे लेकर इसी नारे के साथ आयोग का विरोध करते थे।
इस नारे को स्वतंत्रता सेनानी यूसुफ मेहरअली से जोड़ा जाता है। बाद में यही नारा पूरे देश में साइमन कमीशन के विरोध का प्रतीक बन गया।
लाला लाजपत राय और लाहौर का विरोध
30 अक्टूबर 1928
जब साइमन कमीशन 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर पहुँचा, तब उसके विरोध में एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व प्रमुख राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय ने किया।
प्रदर्शनकारी काले झंडे लेकर शांतिपूर्ण ढंग से साइमन कमीशन का विरोध कर रहे थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए।
इन चोटों के बाद 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आक्रोश को और अधिक बढ़ा दिया।
🎯 तिथि क्रम
भगत सिंह और सांडर्स की हत्या
लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध
लाला लाजपत राय की मृत्यु ने युवा क्रांतिकारियों को अत्यंत प्रभावित किया। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और उनके क्रांतिकारी साथियों ने उनकी मृत्यु का बदला लेने का निर्णय किया।
क्रांतिकारियों का वास्तविक लक्ष्य पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट था, जिसे लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार माना गया था। लेकिन पहचान में हुई भूल के कारण 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक जे. पी. सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
इस घटना का संबंध सीधे साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उसके बाद उनकी मृत्यु से जुड़ा था।
🔎 नामों में भ्रम न रखें
क्रांतिकारियों का मूल लक्ष्य स्कॉट था, लेकिन मारे गए अधिकारी सांडर्स थे।
नेहरू रिपोर्ट से संबंध
भारतीयों द्वारा संवैधानिक प्रस्ताव
साइमन कमीशन में किसी भारतीय को शामिल न किए जाने के बाद भारतीय नेताओं के सामने अपनी संवैधानिक क्षमता प्रदर्शित करने का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया।
1928 में भारतीय राजनीतिक दलों के प्रयासों से एक समिति बनाई गई, जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू ने की। इस समिति द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक प्रस्ताव को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है।
यहाँ मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू में भ्रम नहीं होना चाहिए। नेहरू रिपोर्ट तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे।
🎯 याद रखें
नेहरू रिपोर्ट — 1928 — मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता।
साइमन कमीशन की रिपोर्ट
1930 में प्रकाशित
भारत में विभिन्न पक्षों से जानकारी एकत्र करने और संवैधानिक व्यवस्था का अध्ययन करने के बाद साइमन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट तैयार की। इसकी रिपोर्ट 1930 में प्रकाशित हुई।
कमीशन ने प्रांतों में उत्तरदायी शासन को आगे बढ़ाने और प्रांतीय स्तर पर द्वैध शासन समाप्त करने की दिशा में सुझाव दिए।
उसने भारत के लिए तत्काल पूर्ण उत्तरदायी केंद्रीय शासन स्थापित करने का समर्थन नहीं किया। साथ ही संवैधानिक व्यवस्था में आगे परिवर्तन और प्रांतीय पुनर्गठन से संबंधित कई सुझाव दिए गए।
कमीशन की सिफारिशें आगे होने वाली संवैधानिक चर्चाओं की पृष्ठभूमि का हिस्सा बनीं और बाद के संवैधानिक विकास पर उनका प्रभाव पड़ा।
प्रमुख सिफारिशें
आयोग के मुख्य संवैधानिक सुझाव
| विषय | मुख्य सुझाव |
|---|---|
| प्रांतीय द्वैध शासन | प्रांतों में लागू द्वैध शासन को समाप्त कर अधिक उत्तरदायी प्रांतीय शासन की दिशा में आगे बढ़ने की सिफारिश। |
| प्रांतीय स्वायत्तता | प्रांतों को अधिक स्वायत्तता देने पर बल दिया गया। |
| केंद्र | केंद्र में तत्काल पूर्ण उत्तरदायी शासन देने का समर्थन नहीं किया गया। |
| संघीय व्यवस्था | भविष्य में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर संघीय व्यवस्था की दिशा में बढ़ने की संभावना पर विचार किया गया। |
| प्रतिनिधित्व | सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की तत्काल समाप्ति के बजाय तत्कालीन प्रतिनिधित्व व्यवस्था को जारी रखने की दिशा अपनाई गई। |
साइमन कमीशन का ऐतिहासिक महत्व
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव
साइमन कमीशन का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्व उसकी सिफारिशों से कहीं अधिक उसके व्यापक विरोध के कारण है। किसी भारतीय सदस्य को शामिल न करने से ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीयों का असंतोष और अधिक बढ़ गया।
इसके विरोध में देश के अनेक भागों में काले झंडों के साथ प्रदर्शन हुए और “साइमन वापस जाओ” राष्ट्रीय विरोध का प्रसिद्ध नारा बन गया।
लाहौर के विरोध प्रदर्शन में लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उसके बाद उनकी मृत्यु ने क्रांतिकारी आंदोलन को भी प्रभावित किया। इसके प्रतिशोध से जुड़ी सांडर्स हत्या भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की प्रमुख घटनाओं में से एक बनी।
साइमन कमीशन के प्रश्न ने भारतीय नेताओं को स्वयं भारत के लिए संवैधानिक योजना प्रस्तुत करने की दिशा में भी प्रेरित किया, जिसकी महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति 1928 की नेहरू रिपोर्ट थी।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
परीक्षा के लिए कालक्रम
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| 8 नवंबर 1927 | साइमन कमीशन की नियुक्ति की घोषणा |
| 3 फरवरी 1928 | साइमन कमीशन का बंबई आगमन |
| 1928 | मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा नेहरू रिपोर्ट |
| 30 अक्टूबर 1928 | लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध और लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज |
| 17 नवंबर 1928 | लाला लाजपत राय की मृत्यु |
| 17 दिसंबर 1928 | लाहौर में जे. पी. सांडर्स की हत्या |
| 1930 | साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित |
एक नज़र में पूरा क्रम
त्वरित पुनरावृत्ति
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⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
साइमन कमीशन — 1927; अध्यक्ष — सर जॉन साइमन।
कमीशन में कुल 7 सदस्य थे और एक भी भारतीय सदस्य नहीं था; इसी कारण इसे सर्वश्वेत आयोग कहा गया।
इसका उद्देश्य भारत की संवैधानिक व्यवस्था के कामकाज की समीक्षा करना और आगे के संवैधानिक सुधारों के संबंध में सुझाव देना था।
साइमन कमीशन 3 फरवरी 1928 को बंबई पहुँचा।
इसके विरोध का प्रसिद्ध नारा — “साइमन वापस जाओ”।
लाहौर में 30 अक्टूबर 1928 को विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व लाला लाजपत राय ने किया और पुलिस लाठीचार्ज में वे गंभीर रूप से घायल हुए।
17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय की मृत्यु हुई।
लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के प्रयास में क्रांतिकारियों का लक्ष्य स्कॉट था, लेकिन जे. पी. सांडर्स मारा गया।
नेहरू रिपोर्ट — 1928 — मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता।
साइमन कमीशन की रिपोर्ट 1930 में प्रकाशित हुई और इसकी प्रमुख सिफारिशों में प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर अधिक उत्तरदायी प्रांतीय शासन की दिशा में बढ़ना शामिल था।