सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं कृषि ऋण
खाद्य सुरक्षा, राशन व्यवस्था, कृषि वित्त और किसान क्रेडिट कार्ड
सार्वजनिक वितरण प्रणाली
सार्वजनिक वितरण प्रणाली भारत की महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा व्यवस्था है, जिसके माध्यम से पात्र परिवारों को सरकार द्वारा निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है।
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य गरीब, कमजोर और जरूरतमंद परिवारों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा उन्हें बाजार की ऊँची कीमतों से आंशिक सुरक्षा प्रदान करना है।
वर्तमान सार्वजनिक वितरण व्यवस्था राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अंतर्गत मुख्य रूप से अंत्योदय अन्न योजना परिवारों और प्राथमिकता वाले परिवारों को खाद्यान्न उपलब्ध कराती है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरुआत
भारत में राशन और नियंत्रित खाद्यान्न वितरण की व्यवस्था का विकास द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1940 के दशक में खाद्यान्न की कमी और युद्धकालीन परिस्थितियों के कारण हुआ।
प्रारंभ में यह व्यवस्था मुख्यतः शहरों और खाद्यान्न की कमी वाले क्षेत्रों में राशन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित हुई।
स्वतंत्रता के बाद भी खाद्यान्न की कमी और बढ़ती जनसंख्या के कारण राशन व्यवस्था जारी रही और धीरे-धीरे इसका विस्तार किया गया।
1960 के दशक में खाद्य नीति को अधिक संस्थागत रूप दिया गया। भारतीय खाद्य निगम की स्थापना 1965 में हुई, जिसने खाद्यान्न की खरीद, भंडारण और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसलिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को केवल “1965 में पहली बार लागू” कहना बहुत सरल है। अधिक सही तथ्य यह है कि इसकी जड़ें 1940 के दशक की राशन व्यवस्था में हैं और 1960 के दशक में इसका संस्थागत ढाँचा अधिक मजबूत हुआ।
⚠️ तिथि में भ्रम न करें
1940 का दशक — राशन व्यवस्था की शुरुआत
1960 का दशक — सार्वजनिक खाद्य वितरण व्यवस्था का संस्थागत विस्तार
लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली
जून 1997 में सरकार ने सामान्य सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को अधिक गरीब-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली शुरू की।
इसका उद्देश्य सब्सिडी वाले खाद्यान्न का अधिक लाभ गरीब परिवारों तक पहुँचाना था।
इसके अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे और गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों के लिए अलग-अलग व्यवस्था बनाई गई थी।
इसलिए यह कहना कि 1997 से केवल गरीबी रेखा से नीचे और अंत्योदय परिवारों को ही राशन मिलता था, सही नहीं है।
अंत्योदय अन्न योजना स्वयं बाद में वर्ष 2000 में शुरू की गई, जिसका उद्देश्य सबसे गरीब परिवारों को विशेष खाद्य सुरक्षा प्रदान करना था।
🎯 परीक्षा तथ्य
लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली — जून 1997
अंत्योदय अन्न योजना — 2000
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 ने खाद्य सुरक्षा को अधिकार-आधारित व्यवस्था प्रदान की।
इसके अंतर्गत ग्रामीण आबादी के अधिकतम 75 प्रतिशत और शहरी आबादी के अधिकतम 50 प्रतिशत हिस्से को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत शामिल करने का प्रावधान किया गया।
राष्ट्रीय स्तर पर इसकी अधिकतम कवरेज लगभग 81.35 करोड़ व्यक्तियों के लिए निर्धारित की गई।
वर्तमान व्यवस्था में लगभग 80 करोड़ से अधिक लोग इसके अंतर्गत खाद्यान्न प्राप्त कर रहे हैं।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में मुख्य रूप से दो श्रेणियाँ हैं—प्राथमिकता वाले परिवार और अंत्योदय अन्न योजना परिवार।
खाद्यान्न की मात्रा
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत प्राथमिकता वाले परिवारों के प्रत्येक पात्र सदस्य को प्रति माह 5 किलोग्राम खाद्यान्न प्राप्त करने का अधिकार है।
इसलिए 5 किलोग्राम को “औसतन” मिलने वाली मात्रा कहना उचित नहीं है; यह पात्र प्राथमिकता परिवारों के लिए निर्धारित प्रति व्यक्ति मासिक अधिकार है।
अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत प्रत्येक पात्र परिवार को परिवार के सदस्यों की संख्या से अलग 35 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति परिवार प्रति माह दिया जाता है।
📗 सबसे महत्वपूर्ण
प्राथमिकता परिवार = 5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति माह
अंत्योदय परिवार = 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह
वर्तमान खाद्यान्न मूल्य व्यवस्था
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में प्रारंभिक केंद्रीय निर्गम मूल्य के रूप में गेहूँ के लिए ₹2 प्रति किलोग्राम और चावल के लिए ₹3 प्रति किलोग्राम की दर निर्धारित थी।
इस कारण पुरानी पुस्तकों और नोट्स में गेहूँ ₹2 और चावल ₹3 प्रति किलोग्राम का उल्लेख मिलता है।
लेकिन वर्तमान व्यवस्था में यह लाभार्थी से ली जाने वाली कीमत नहीं है।
केंद्र सरकार ने 1 जनवरी 2023 से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के पात्र लाभार्थियों को निर्धारित खाद्यान्न निःशुल्क उपलब्ध कराना शुरू किया।
इसके बाद सरकार ने 1 जनवरी 2024 से अगले पाँच वर्षों तक लगभग 81.35 करोड़ पात्र लाभार्थियों को निर्धारित खाद्यान्न निःशुल्क देने का निर्णय लिया।
⚠️ वर्तमान तथ्य
गेहूँ ₹2 और चावल ₹3 वाली दर ऐतिहासिक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम दर है। वर्तमान केंद्रीय व्यवस्था में पात्र लाभार्थियों को निर्धारित खाद्यान्न निःशुल्क दिया जा रहा है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की शुरुआत कोविड-19 महामारी के दौरान गरीब और जरूरतमंद परिवारों को अतिरिक्त खाद्य सहायता उपलब्ध कराने के लिए की गई थी।
महामारी के समय इस योजना के अंतर्गत नियमित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा राशन के अतिरिक्त निःशुल्क खाद्यान्न दिया गया।
बाद में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत मिलने वाले नियमित खाद्यान्न को निःशुल्क उपलब्ध कराने की व्यवस्था को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के नाम से जारी रखा गया।
1 जनवरी 2024 से लगभग 81.35 करोड़ पात्र लाभार्थियों को पाँच वर्षों तक उनके निर्धारित अधिकार के अनुसार निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने का निर्णय लागू है।
केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिका
सार्वजनिक वितरण प्रणाली केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त जिम्मेदारी पर आधारित है।
केंद्र सरकार खाद्यान्न की खरीद, केंद्रीय भंडारण, राज्यों को खाद्यान्न का आवंटन तथा राज्यों तक निर्धारित स्थानों पर इसकी आपूर्ति से संबंधित प्रमुख जिम्मेदारियाँ निभाती है।
भारतीय खाद्य निगम खाद्यान्न की खरीद, भंडारण और परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
राज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन पात्र लाभार्थियों की पहचान, राशन कार्ड जारी करने, उचित मूल्य की दुकानों के संचालन और लाभार्थियों तक खाद्यान्न वितरण की व्यवस्था करते हैं।
उचित मूल्य की दुकानें
देशभर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत लगभग 5.43 लाख उचित मूल्य की दुकानें कार्यरत हैं।
इन दुकानों को सामान्य भाषा में राशन दुकान कहा जाता है।
लाभार्थी अपने राशन कार्ड और निर्धारित पहचान प्रक्रिया के माध्यम से इन दुकानों से खाद्यान्न प्राप्त करते हैं।
अधिकांश उचित मूल्य की दुकानों में इलेक्ट्रॉनिक बिक्री उपकरण लगाए जा चुके हैं, जिससे वितरण का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होता है।
डिजिटलीकरण एवं आधार प्रमाणीकरण
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और फर्जी या दोहरे राशन कार्ड कम करने के लिए व्यापक डिजिटलीकरण किया गया है।
राशन कार्डों का डिजिटलीकरण, आधार से जोड़ना और इलेक्ट्रॉनिक बिक्री उपकरणों का उपयोग इस सुधार प्रक्रिया के प्रमुख भाग हैं।
आधार आधारित पहचान से लाभार्थियों की पहचान और राशन लेन-देन का इलेक्ट्रॉनिक सत्यापन किया जा सकता है।
हालांकि पात्रता का निर्धारण और राशन कार्ड जारी करने का कार्य संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन द्वारा किया जाता है।
एक राष्ट्र एक राशन कार्ड
एक राष्ट्र एक राशन कार्ड व्यवस्था का उद्देश्य राशन कार्ड की देशव्यापी पोर्टेबिलिटी उपलब्ध कराना है।
इसके माध्यम से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का पात्र लाभार्थी अपने मूल राज्य या जिले से बाहर रहने पर भी देश के अन्य स्थान पर उचित मूल्य की दुकान से अपने हिस्से का खाद्यान्न प्राप्त कर सकता है।
यह सुविधा विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों और ऐसे परिवारों के लिए उपयोगी है जो रोजगार के कारण एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं।
यह व्यवस्था देश के सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू की जा चुकी है।
🎯 सरल अर्थ
एक राष्ट्र एक राशन कार्ड = राशन कार्ड की देशव्यापी पोर्टेबिलिटी।
कृषि ऋण
कृषि ऋण का अर्थ
कृषि ऋण वह वित्तीय सहायता है जो किसानों को खेती और कृषि से संबंधित गतिविधियों को पूरा करने के लिए बैंकों, सहकारी संस्थाओं और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण के रूप में दी जाती है।
इसका उद्देश्य किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, कृषि मशीनरी, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, बागवानी और अन्य कृषि कार्यों के लिए समय पर पूंजी उपलब्ध कराना है।
पर्याप्त कृषि ऋण उपलब्ध होने से किसान साहूकारों और अत्यधिक ब्याज वाले गैर-संस्थागत ऋण पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
अल्पकालिक कृषि ऋण
अल्पकालिक कृषि ऋण सामान्यतः एक वर्ष तक की अवधि के लिए लिया जाने वाला ऋण है।
इसका उपयोग मुख्य रूप से एक फसल मौसम की उत्पादन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है।
बीज, खाद, उर्वरक, कीटनाशक, मजदूरी, डीजल, सिंचाई तथा अन्य मौसमी कृषि खर्चों के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
फसली ऋण अल्पकालिक कृषि ऋण का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यम अवधि कृषि ऋण
मध्यम अवधि कृषि ऋण सामान्यतः एक वर्ष से पाँच वर्ष तक की अवधि वाले कृषि निवेशों से जोड़ा जाता है।
इसका उपयोग पंपसेट, छोटे सिंचाई उपकरण, पशुओं की खरीद, बागवानी, छोटे कृषि उपकरण और खेत से संबंधित अन्य अपेक्षाकृत टिकाऊ निवेशों के लिए किया जा सकता है।
ऋण की वास्तविक अवधि बैंक, ऋण के उद्देश्य और संबंधित परिसंपत्ति से होने वाली आय के अनुसार अलग हो सकती है।
दीर्घकालिक कृषि ऋण
दीर्घकालिक कृषि ऋण सामान्यतः पाँच वर्ष से अधिक अवधि वाले बड़े कृषि निवेशों के लिए लिया जाता है।
इसका उपयोग ट्रैक्टर, बड़े कृषि उपकरण, बोरवेल, भूमि सुधार, कृषि भवन, गोदाम तथा दीर्घकालिक कृषि परियोजनाओं के लिए किया जा सकता है।
दीर्घकालिक ऋण की भुगतान अवधि निवेश की प्रकृति और उससे होने वाली संभावित आय के अनुसार तय की जाती है।
कृषि ऋण का वर्गीकरण
| ऋण | सामान्य अवधि | प्रमुख उपयोग |
|---|---|---|
| अल्पकालिक | लगभग 1 वर्ष तक | बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, डीजल और फसली खर्च |
| मध्यम अवधि | लगभग 1 से 5 वर्ष | पंपसेट, पशु, छोटे उपकरण और बागवानी |
| दीर्घकालिक | सामान्यतः 5 वर्ष से अधिक | ट्रैक्टर, बोरवेल, भूमि सुधार और कृषि भवन |
किसान क्रेडिट कार्ड योजना
किसान क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत वर्ष 1998 में की गई।
इस योजना का उद्देश्य किसानों को कृषि उत्पादन और संबंधित आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त, सरल और समय पर बैंक ऋण उपलब्ध कराना है।
किसान क्रेडिट कार्ड एक ऐसी ऋण सुविधा है जिसके अंतर्गत किसान निर्धारित सीमा के भीतर आवश्यकता के अनुसार धन निकाल सकता है और भुगतान के बाद दोबारा उपयोग कर सकता है।
इससे किसान को हर बार छोटे कृषि खर्च के लिए नया ऋण आवेदन करने की आवश्यकता कम होती है।
🎯 परीक्षा तथ्य
किसान क्रेडिट कार्ड योजना — 1998
किसान क्रेडिट कार्ड का उपयोग
किसान क्रेडिट कार्ड का उपयोग मुख्य रूप से फसल उत्पादन की कार्यशील पूंजी की आवश्यकताओं के लिए किया जाता है।
इसके माध्यम से किसान बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, सिंचाई और अन्य कृषि आदानों के लिए धन प्राप्त कर सकता है।
इसके अंतर्गत फसल कटाई के बाद के कुछ खर्च, कृषि परिसंपत्तियों की मरम्मत और किसान परिवार की कुछ आवश्यकताओं को भी निर्धारित नियमों के अनुसार शामिल किया जा सकता है।
वर्ष 2019 में किसान क्रेडिट कार्ड व्यवस्था का विस्तार पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन से संबंधित कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं तक भी किया गया।
ऋण सीमा का निर्धारण
किसान क्रेडिट कार्ड की ऋण सीमा सभी किसानों के लिए एक समान निश्चित राशि नहीं होती।
इसका निर्धारण किसान की भूमि की जोत, बोई जाने वाली फसल, खेती की लागत, फसल प्रतिरूप और अन्य कृषि आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है।
इसके अतिरिक्त कृषि परिसंपत्तियों की मरम्मत, परिवार की कुछ उपभोग आवश्यकताएँ तथा दीर्घकालिक कृषि निवेश भी निर्धारित नियमों के अनुसार सीमा निर्धारण में शामिल हो सकते हैं।
किसान क्रेडिट कार्ड की अधिकतम अनुमत सीमा में अल्पकालिक फसली ऋण के साथ आवश्यक कृषि सावधि ऋण भी शामिल किया जा सकता है।
ब्याज सहायता
सरकार संशोधित ब्याज सहायता योजना के माध्यम से पात्र किसानों को अल्पकालिक कृषि ऋण कम ब्याज दर पर उपलब्ध कराने में सहायता करती है।
प्रचलित सरकारी ब्याज सहायता व्यवस्था के अंतर्गत किसान क्रेडिट कार्ड से लिए गए ₹3 लाख तक के पात्र अल्पकालिक कृषि ऋण पर किसान को 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है।
यदि किसान निर्धारित समय पर ऋण चुकाता है तो उसे अतिरिक्त 3 प्रतिशत त्वरित भुगतान प्रोत्साहन मिलता है।
इस प्रकार समय पर भुगतान करने वाले पात्र किसान के लिए प्रभावी ब्याज दर लगभग 4 प्रतिशत वार्षिक रह जाती है।
📗 ब्याज का सूत्र
7% सामान्य रियायती दर − 3% समय पर भुगतान प्रोत्साहन = 4% प्रभावी ब्याज दर
₹3 लाख और ₹5 लाख में अंतर
किसान क्रेडिट कार्ड से संबंधित वर्तमान जानकारी में ₹3 लाख और ₹5 लाख दोनों राशियाँ दिखाई दे सकती हैं, इसलिए इनके बीच अंतर समझना आवश्यक है।
केंद्र सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड के अंतर्गत संशोधित ब्याज सहायता योजना की ऋण सीमा को ₹3 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख करने की घोषणा की है।
इसके बावजूद हाल की सरकारी ब्याज सहायता संबंधी प्रकाशित जानकारी में 7 प्रतिशत और समय पर भुगतान पर 4 प्रतिशत प्रभावी ब्याज की व्यवस्था ₹3 लाख तक के अल्पकालिक कृषि ऋण के संदर्भ में बताई गई है।
इसलिए परीक्षा में यदि प्रश्न केवल किसान क्रेडिट कार्ड की बढ़ी हुई ऋण सीमा से संबंधित हो तो ₹5 लाख का तथ्य महत्वपूर्ण है, जबकि ब्याज सहायता की प्रभावी 4 प्रतिशत दर पूछी जाए तो लागू सरकारी अधिसूचना या संबंधित वर्ष की सीमा देखना आवश्यक है।
⚠️ भ्रम से बचें
₹5 लाख = बढ़ाई गई किसान क्रेडिट कार्ड/ब्याज सहायता योजना ऋण सीमा से संबंधित नवीन नीति
₹3 लाख = हाल की प्रकाशित व्यवस्था में 7% तथा समय पर भुगतान पर 4% वाली ब्याज सहायता का स्पष्ट संदर्भ
किसान क्रेडिट कार्ड की अवधि
किसान क्रेडिट कार्ड को सामान्यतः एक परिवर्ती ऋण सुविधा के रूप में संरचित किया जाता है।
अल्पकालिक नकद ऋण सीमा को फसल प्रतिरूप और कृषि लागत के अनुसार निर्धारित किया जाता है तथा भविष्य के वर्षों के लिए इसमें वृद्धि का प्रावधान हो सकता है।
किसान क्रेडिट कार्ड की समग्र सीमा सामान्यतः पाँच वर्षों की कृषि आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निर्धारित की जा सकती है।
लेकिन यह कहना कि किसान क्रेडिट कार्ड का प्रत्येक ऋण अनिवार्य रूप से 1 से 5 वर्ष के लिए होता है, सही नहीं है। फसली ऋण और सावधि ऋण की भुगतान अवधि अलग-अलग हो सकती है।
फसली ऋण सामान्यतः फसल चक्र के अनुसार चुकाया जाता है, जबकि ट्रैक्टर, सिंचाई उपकरण या अन्य निवेश वाले सावधि ऋण की अवधि अधिक हो सकती है।
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
भारत में राशन व्यवस्था की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1940 के दशक में विकसित हुईं।
लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली — जून 1997 में शुरू हुई।
अंत्योदय अन्न योजना — 2000 में शुरू हुई।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम — 2013।
प्राथमिकता वाले परिवार के प्रत्येक पात्र व्यक्ति को 5 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति माह मिलता है।
अंत्योदय परिवार को 35 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति परिवार प्रति माह मिलता है।
वर्तमान केंद्रीय व्यवस्था में निर्धारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा खाद्यान्न निःशुल्क दिया जा रहा है।
लगभग 81.35 करोड़ व्यक्तियों तक अधिकतम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कवरेज निर्धारित है।
देश में लगभग 5.43 लाख उचित मूल्य की दुकानें हैं।
एक राष्ट्र एक राशन कार्ड का मुख्य उद्देश्य देशभर में राशन की पोर्टेबिलिटी प्रदान करना है।
कृषि ऋण का उपयोग बीज, खाद, सिंचाई, कृषि उपकरण, पशुपालन, बागवानी तथा अन्य कृषि गतिविधियों के लिए किया जाता है।
अल्पकालिक ऋण — लगभग 1 वर्ष तक।
मध्यम अवधि ऋण — लगभग 1 से 5 वर्ष।
दीर्घकालिक ऋण — सामान्यतः 5 वर्ष से अधिक।
किसान क्रेडिट कार्ड योजना — 1998।
किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा भूमि, फसल, खेती की लागत और कृषि आवश्यकताओं के आधार पर निर्धारित होती है।
किसान क्रेडिट कार्ड का विस्तार पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन की कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं तक भी किया गया है।
प्रचलित ब्याज सहायता व्यवस्था में पात्र अल्पकालिक कृषि ऋण पर 7 प्रतिशत रियायती दर और समय पर भुगतान करने पर लगभग 4 प्रतिशत प्रभावी ब्याज का लाभ मिलता है।
किसान क्रेडिट कार्ड की बढ़ी हुई ऋण सीमा और ब्याज सहायता की पात्र राशि को एक ही तथ्य न समझें।