1857 का विद्रोह
1857 के विद्रोह का परिचय
1857 का विद्रोह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उन्नीसवीं शताब्दी का सबसे व्यापक और शक्तिशाली भारतीय विद्रोह था। इसकी शुरुआत सैनिक असंतोष से हुई, लेकिन शीघ्र ही इसमें अनेक भारतीय शासक, जमींदार, किसान, कारीगर और सामान्य जनता के विभिन्न वर्ग भी शामिल हो गए।
इसके पीछे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक-धार्मिक और सैनिक कारणों का एक लंबा क्रम था। इन असंतोषों के बीच नए एनफील्ड राइफल के चर्बी लगे कारतूसों का विवाद विद्रोह का तात्कालिक कारण बना।
1857 के विद्रोह के राजनीतिक कारण
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीतियों ने अनेक भारतीय शासकों और राजघरानों में असंतोष उत्पन्न किया।
गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी की व्यपगत सिद्धांत की नीति के अंतर्गत ऐसे राज्यों को कंपनी के राज्य में मिला लिया जाता था जहाँ शासक का प्राकृतिक उत्तराधिकारी नहीं होता था और अंग्रेज दत्तक उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं देते थे।
इस नीति के अंतर्गत सतारा, झाँसी और नागपुर सहित कई राज्यों का विलय किया गया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी न मानने से झाँसी में अंग्रेजों के प्रति गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।
1856 ई. में अवध का विलय भी अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक कारण था। अंग्रेजों ने कुशासन का आरोप लगाकर अवध को अपने राज्य में मिला लिया। इससे अवध के सैनिकों, तालुकेदारों और सामान्य जनता में असंतोष बढ़ा।
पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब की पेंशन बंद कर दिए जाने से वे भी अंग्रेजों के विरोधी बन गए।
आर्थिक कारण
ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय किसानों, कारीगरों और पारंपरिक उद्योगों पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
भूमि-राजस्व की कठोर व्यवस्था और अधिक लगान के कारण किसानों तथा जमींदारों में असंतोष था।
ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं के भारत में बड़े पैमाने पर आने से भारतीय हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को नुकसान पहुँचा। अनेक कारीगरों और बुनकरों की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई।
अवध में अंग्रेजी भूमि-व्यवस्था के कारण अनेक तालुकेदार अपने परंपरागत अधिकारों और भूमि से वंचित हुए। यही कारण था कि 1857 में अवध विद्रोह का एक बहुत महत्वपूर्ण केंद्र बना।
सामाजिक और धार्मिक कारण
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज में यह आशंका बढ़ी कि सरकार भारतीयों की पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप कर रही है।
ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों और धर्म परिवर्तन की घटनाओं के कारण भी अनेक लोगों में यह भय पैदा हुआ कि अंग्रेज भारतीय धर्मों को कमजोर करना चाहते हैं।
सती प्रथा निषेध और विधवा पुनर्विवाह जैसे कानून सामाजिक सुधार की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे, लेकिन तत्कालीन रूढ़िवादी समाज के कुछ वर्गों ने इन्हें धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप के रूप में देखा।
रेल, डाक, तार और पाश्चात्य शिक्षा जैसी नई व्यवस्थाओं को लेकर भी समाज के कुछ हिस्सों में संदेह और भय था।
सैनिक कारण
ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी, लेकिन पद, वेतन, भत्ते और पदोन्नति के मामले में भारतीय और यूरोपीय सैनिकों के बीच स्पष्ट भेदभाव था।
भारतीय सैनिकों को उच्च सैनिक पद लगभग नहीं दिए जाते थे और कई अवसरों पर उनके धार्मिक तथा सामाजिक रीति-रिवाजों के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाती थी।
विदेशी क्षेत्रों में सेवा से जुड़े नियमों ने भी कई भारतीय सैनिकों में असंतोष उत्पन्न किया। विशेष रूप से समुद्र पार सेवा को लेकर उच्च जाति के कुछ सैनिकों में धार्मिक आशंकाएँ थीं।
तात्कालिक कारण — चर्बी वाले कारतूस
1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण नई एनफील्ड राइफल के कारतूसों का विवाद था।
कारतूस को बंदूक में भरने से पहले उसके ऊपरी भाग को दाँतों से काटना पड़ता था। सैनिकों में यह विश्वास फैल गया कि कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी लगी हुई है।
गाय हिंदू सैनिकों के लिए धार्मिक रूप से पवित्र थी, जबकि सूअर मुस्लिम सैनिकों के लिए निषिद्ध था। इसलिए इस अफवाह ने दोनों समुदायों के सैनिकों में गंभीर धार्मिक आक्रोश उत्पन्न किया।
परीक्षा के लिए
1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण — एनफील्ड राइफल के चर्बी लगे कारतूस।
मंगल पांडे और बैरकपुर की घटना
29 मार्च 1857 ई. को बैरकपुर छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिक मंगल पांडे ने अपने ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध विद्रोह किया।
उन्होंने सार्जेंट-मेजर जेम्स ह्यूसन और लेफ्टिनेंट हेनरी बाग पर हमला किया। दोनों अधिकारी घायल हुए, लेकिन उनकी हत्या नहीं हुई।
मंगल पांडे को गिरफ्तार कर सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया और 8 अप्रैल 1857 ई. को बैरकपुर में फाँसी दे दी गई।
मंगल पांडे को सामान्यतः वर्तमान उत्तर प्रदेश के बलिया क्षेत्र के नगवा गाँव से जोड़ा जाता है।
भ्रम से बचें
मंगल पांडे ने लेफ्टिनेंट बाग और ह्यूसन की हत्या नहीं की थी। उन पर हमला हुआ और वे घायल हुए थे।
मेरठ से विद्रोह की शुरुआत
बैरकपुर की घटना के बाद सैनिक असंतोष अन्य छावनियों में भी बढ़ता गया।
मेरठ में 85 भारतीय सैनिकों ने चर्बी लगे कारतूसों के प्रयोग से इनकार कर दिया। उन्हें कठोर दंड देकर जेल में डाल दिया गया।
10 मई 1857 ई. को मेरठ के भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जेल तोड़कर बंद सैनिकों को मुक्त कराया और अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध हथियार उठा लिए।
इसी कारण 10 मई 1857 को मेरठ से 1857 के व्यापक विद्रोह की शुरुआत मानी जाती है।
याद रखें
29 मार्च 1857 — बैरकपुर — मंगल पांडे।
10 मई 1857 — मेरठ — व्यापक सैनिक विद्रोह की शुरुआत।
दिल्ली और बहादुर शाह जफर
मेरठ के विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुँचे और मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय को विद्रोह का प्रतीकात्मक सम्राट और नेता स्वीकार किया।
बहादुर शाह द्वितीय को बहादुर शाह जफर के नाम से भी जाना जाता है। वे भारत के अंतिम मुगल बादशाह थे।
दिल्ली पर विद्रोहियों का अधिकार स्थापित होने के बाद 1857 का संघर्ष केवल सैनिक छावनी तक सीमित नहीं रहा बल्कि उत्तर और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में फैल गया।
सितंबर 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया। बाद में बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया और रंगून निर्वासित कर दिया गया।
विद्रोह के प्रमुख केंद्र और नेता
| केंद्र | प्रमुख नेता |
|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह जफर, बख्त खाँ |
| कानपुर | नाना साहब, तात्या टोपे, अजीमुल्ला खाँ |
| झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई |
| लखनऊ / अवध | बेगम हजरत महल, बिरजिस कद्र |
| बिहार | कुँवर सिंह |
| बरेली | खान बहादुर खाँ |
| फैजाबाद | मौलवी अहमदुल्लाह शाह |
| इलाहाबाद | लियाकत अली |
कानपुर और नाना साहब
कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहब ने किया। वे अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे।
अंग्रेजों द्वारा उनकी पेंशन स्वीकार न किए जाने के कारण उनमें ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष था।
उनके प्रमुख सहयोगियों में तात्या टोपे और अजीमुल्ला खाँ शामिल थे।
तात्या टोपे 1857 के बाद भी लंबे समय तक अंग्रेजों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध करते रहे।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई
झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई ने किया। अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव को झाँसी का उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया था।
लॉर्ड डलहौजी की व्यपगत सिद्धांत की नीति के आधार पर झाँसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था।
रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की रक्षा के लिए अंग्रेजों से संघर्ष किया और बाद में तात्या टोपे सहित अन्य विद्रोही नेताओं से मिलकर ग्वालियर क्षेत्र में युद्ध जारी रखा।
जून 1858 ई. में ग्वालियर के निकट अंग्रेजों से युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं।
अवध और बेगम हजरत महल
अवध 1857 के विद्रोह का सबसे व्यापक जनाधार वाला क्षेत्र था। 1856 में अवध के विलय से वहाँ के तालुकेदारों, सैनिकों और सामान्य जनता में अंग्रेजों के प्रति भारी असंतोष था।
लखनऊ में बेगम हजरत महल ने विद्रोह का नेतृत्व किया और अपने पुत्र बिरजिस कद्र को अवध का शासक घोषित किया।
अवध में मौलवी अहमदुल्लाह शाह जैसे नेताओं ने भी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बिहार में कुँवर सिंह
बिहार में 1857 के विद्रोह का सबसे प्रमुख नेता जगदीशपुर के कुँवर सिंह थे।
विद्रोह के समय वे लगभग अस्सी वर्ष के थे, फिर भी उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सक्रिय सैनिक नेतृत्व किया।
उन्होंने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया और 1857 के सबसे प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं में स्थान प्राप्त किया।
तात्या टोपे की गिरफ्तारी और मृत्यु
तात्या टोपे 1857 के विद्रोह के सबसे कुशल सैनिक नेताओं में से एक थे। कानपुर, मध्य भारत और राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
मुख्य विद्रोही केंद्रों के पतन के बाद भी तात्या टोपे ने गुरिल्ला पद्धति से अंग्रेजी सेना का सामना किया।
अंततः उनके सहयोगी नरवर के मानसिंह की सहायता से अंग्रेज उन्हें पकड़ने में सफल हुए।
तात्या टोपे पर सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया और 18 अप्रैल 1859 ई. को शिवपुरी में उन्हें फाँसी दे दी गई।
परीक्षा के लिए
तात्या टोपे → मानसिंह के विश्वासघात से गिरफ्तारी → 18 अप्रैल 1859 → शिवपुरी में फाँसी।
विद्रोह के समय प्रमुख पदाधिकारी
| पद | व्यक्ति |
|---|---|
| भारत का गवर्नर-जनरल | लॉर्ड कैनिंग |
| ब्रिटेन की महारानी | महारानी विक्टोरिया |
| ब्रिटेन का प्रधानमंत्री | लॉर्ड पामर्स्टन |
| अंतिम मुगल सम्राट | बहादुर शाह द्वितीय |
याद रखें
1857 → लॉर्ड कैनिंग + लॉर्ड पामर्स्टन + महारानी विक्टोरिया।
विद्रोह की असफलता के कारण
1857 का विद्रोह अत्यंत व्यापक होने के बावजूद पूरे भारत में नहीं फैल सका। दक्षिण भारत, पंजाब के बड़े हिस्से और अनेक अन्य क्षेत्र इससे अपेक्षाकृत दूर रहे।
विद्रोहियों के पास कोई एकीकृत केंद्रीय नेतृत्व और पूरे भारत के लिए स्पष्ट संयुक्त राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।
अनेक भारतीय रियासतों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया और कुछ ने अंग्रेजों का समर्थन किया।
अंग्रेजों के पास बेहतर संचार व्यवस्था, आधुनिक हथियार, संगठित सेना और आर्थिक संसाधन थे। रेल और तार जैसी सुविधाओं ने भी उनकी सैनिक कार्रवाई को प्रभावी बनाया।
विद्रोही नेताओं के बीच क्षेत्रीय उद्देश्यों में अंतर था और उनके पास लंबे युद्ध के लिए पर्याप्त हथियार, धन तथा रसद की व्यवस्था नहीं थी।
1857 के विद्रोह का स्वरूप
1857 के विद्रोह के स्वरूप को लेकर इतिहासकारों में लंबे समय से मतभेद रहा है।
औपनिवेशिक ब्रिटिश लेखकों ने इसे सामान्यतः सिपाही विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया।
भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासलेखन में इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक स्वतंत्रता संघर्ष के रूप में देखा गया।
आधुनिक इतिहासलेखन में यह स्वीकार किया जाता है कि इसकी शुरुआत सैनिक विद्रोह के रूप में हुई, लेकिन कई क्षेत्रों में इसमें किसान, तालुकेदार, पुराने शासक और सामान्य जनता भी शामिल हुई। इसलिए इसका स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग था।
वी. डी. सावरकर का मत
विनायक दामोदर सावरकर ने 1857 के विद्रोह की राष्ट्रवादी व्याख्या प्रस्तुत की।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 पहली बार 1909 ई. में प्रकाशित हुई।
इस पुस्तक में सावरकर ने 1857 को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया।
इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं में सावरकर को 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में लोकप्रिय बनाने वाले प्रमुख राष्ट्रवादी लेखकों से जोड़ा जाता है।
भ्रम से बचें
1908 को पुस्तक का प्रकाशन-वर्ष न लिखें। द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 का प्रथम प्रकाशन 1909 ई. में हुआ।
अशोक मेहता और 1857
भारतीय इतिहासकार और राजनीतिक विचारक अशोक मेहता ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 1857 : द ग्रेट रिबेलियन में 1857 के विद्रोह का विस्तृत अध्ययन किया।
उन्होंने इसे केवल सैनिक असंतोष तक सीमित घटना नहीं माना और इसके व्यापक सामाजिक तथा राष्ट्रीय तत्वों पर बल दिया।
इसलिए प्रतियोगी परीक्षा सामग्री में अशोक मेहता को 1857 को राष्ट्रीय विद्रोह मानने वाले इतिहासकारों से जोड़ा जाता है।
डब्ल्यू. एच. रसल
1857 के विद्रोह के दौरान प्रसिद्ध ब्रिटिश पत्रकार विलियम हॉवर्ड रसल भारत आए थे।
वे लंदन के प्रसिद्ध समाचार-पत्र द टाइम्स के संवाददाता थे और उन्होंने भारत में विद्रोह तथा ब्रिटिश सैनिक कार्रवाइयों से संबंधित विवरण भेजे।
प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें सामान्यतः 1857 के विद्रोह के समय भारत आने वाले द टाइम्स के संवाददाता के रूप में पूछा जाता है।
कंपनी शासन का अंत
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन किया।
भारत शासन अधिनियम, 1858 द्वारा भारत के शासन से संबंधित ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक शक्तियाँ समाप्त कर दी गईं और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।
ब्रिटेन में भारत के शासन की देखरेख के लिए भारत सचिव का पद बनाया गया और उसकी सहायता के लिए भारत परिषद की व्यवस्था की गई।
लॉर्ड कैनिंग कंपनी शासन के अंतिम गवर्नर-जनरल रहे और क्राउन शासन की नई व्यवस्था में भारत के प्रथम वायसराय बने।
सबसे महत्वपूर्ण परिणाम
1857 का विद्रोह → भारत शासन अधिनियम 1858 → ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत → ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन।
महारानी की घोषणा, 1858
ब्रिटिश क्राउन द्वारा भारत का शासन संभालने के बाद 1 नवंबर 1858 ई. को महारानी विक्टोरिया की घोषणा जारी की गई।
इस घोषणा में भारतीय रियासतों के साथ किए गए समझौतों का सम्मान करने, अनावश्यक क्षेत्रीय विस्तार से बचने और भारतीयों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया गया।
भारतीय प्रजा को कानून के समक्ष निष्पक्ष व्यवहार का आश्वासन भी दिया गया, यद्यपि व्यवहार में औपनिवेशिक शासन में अनेक प्रकार के भेदभाव जारी रहे।
सेना में परिवर्तन
1857 के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सेना के संगठन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।
भारतीय सैनिकों की तुलना में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ाया गया और तोपखाने के महत्वपूर्ण भागों पर अंग्रेज सैनिकों का नियंत्रण मजबूत किया गया।
सेना की भर्ती नीति में भी परिवर्तन किए गए और अंग्रेजों ने विभिन्न जातीय तथा क्षेत्रीय समूहों के बीच विभाजन बनाए रखने की नीति अपनाई।
इसका उद्देश्य भविष्य में भारतीय सैनिकों को एक साथ संगठित होकर विद्रोह करने से रोकना था।
1857 के विद्रोह के प्रमुख परिणाम
ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आया।
भारतीय रियासतों के प्रति अंग्रेजों की नीति में परिवर्तन हुआ और व्यपगत सिद्धांत जैसी विलयकारी नीति को छोड़ दिया गया।
भारतीय सेना का पुनर्गठन किया गया और अंग्रेज सैनिकों की संख्या तथा रणनीतिक नियंत्रण बढ़ाया गया।
ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज के विभिन्न धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय समूहों के बीच अंतर को अधिक सावधानी से राजनीतिक रूप में प्रयोग करना शुरू किया।
1857 के अनुभव ने भारतीयों और ब्रिटिश शासन के संबंधों को स्थायी रूप से बदल दिया और आगे विकसित होने वाले भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| 29 मार्च 1857 | बैरकपुर में मंगल पांडे की घटना |
| 8 अप्रैल 1857 | मंगल पांडे को फाँसी |
| 10 मई 1857 | मेरठ में व्यापक विद्रोह की शुरुआत |
| 11 मई 1857 | मेरठ के विद्रोही दिल्ली पहुँचे |
| सितंबर 1857 | अंग्रेजों का दिल्ली पर पुनः अधिकार |
| जून 1858 | रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु |
| 1858 | भारत शासन अधिनियम; कंपनी शासन का अंत |
| 1 नवंबर 1858 | महारानी विक्टोरिया की घोषणा |
| 18 अप्रैल 1859 | तात्या टोपे को शिवपुरी में फाँसी |
| 1909 | सावरकर की द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 का प्रथम प्रकाशन |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
तात्कालिक कारण — चर्बी लगे एनफील्ड राइफल के कारतूस।
29 मार्च 1857 — मंगल पांडे — बैरकपुर।
मंगल पांडे 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री से संबंधित थे।
मंगल पांडे ने लेफ्टिनेंट बाग और सार्जेंट-मेजर ह्यूसन पर हमला किया था; उन दोनों की हत्या नहीं की थी।
8 अप्रैल 1857 — मंगल पांडे को फाँसी।
10 मई 1857 — मेरठ से व्यापक विद्रोह की शुरुआत।
दिल्ली — बहादुर शाह जफर; कानपुर — नाना साहब; झाँसी — रानी लक्ष्मीबाई; लखनऊ — बेगम हजरत महल; बिहार — कुँवर सिंह।
1857 के समय भारत का गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग, ब्रिटेन का प्रधानमंत्री लॉर्ड पामर्स्टन और ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया थीं।
तात्या टोपे — मानसिंह की सहायता से गिरफ्तारी — 18 अप्रैल 1859 — शिवपुरी में फाँसी।
वी. डी. सावरकर की द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 का प्रथम प्रकाशन 1909 में हुआ।
अशोक मेहता — 1857 : द ग्रेट रिबेलियन से संबंधित महत्वपूर्ण नाम है।
डब्ल्यू. एच. रसल — द टाइम्स, लंदन के संवाददाता — 1857 के दौरान भारत आए।
भारत शासन अधिनियम, 1858 → कंपनी शासन समाप्त → ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन।
लॉर्ड कैनिंग → अंतिम कंपनीकालीन गवर्नर-जनरल और क्राउन शासन के प्रथम वायसराय।
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
1857 के विद्रोह के पीछे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक-धार्मिक और सैनिक कारण थे।
इसका तात्कालिक कारण चर्बी लगे एनफील्ड राइफल के कारतूस थे।
29 मार्च 1857 को बैरकपुर में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के मंगल पांडे ने अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध विद्रोह किया।
मंगल पांडे ने लेफ्टिनेंट हेनरी बाग और सार्जेंट-मेजर जेम्स ह्यूसन पर हमला किया; दोनों घायल हुए।
8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फाँसी दी गई।
10 मई 1857 को मेरठ से व्यापक विद्रोह शुरू हुआ।
मेरठ के विद्रोही दिल्ली पहुँचे और बहादुर शाह जफर को अपना प्रतीकात्मक सम्राट स्वीकार किया।
कानपुर — नाना साहब और तात्या टोपे।
झाँसी — रानी लक्ष्मीबाई।
लखनऊ — बेगम हजरत महल।
बिहार — कुँवर सिंह।
बरेली — खान बहादुर खाँ।
फैजाबाद — मौलवी अहमदुल्लाह शाह।
विद्रोह के समय भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग थे।
उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉर्ड पामर्स्टन और महारानी विक्टोरिया थीं।
18 अप्रैल 1859 को तात्या टोपे को शिवपुरी में फाँसी दी गई।
वी. डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 में विद्रोह की राष्ट्रवादी व्याख्या की; इसका प्रथम प्रकाशन 1909 ई. में हुआ।
अशोक मेहता ने अपनी पुस्तक 1857 : द ग्रेट रिबेलियन में इसके व्यापक और राष्ट्रीय तत्वों पर बल दिया।
डब्ल्यू. एच. रसल 1857 के दौरान भारत आए द टाइम्स, लंदन के प्रसिद्ध संवाददाता थे।
भारत शासन अधिनियम, 1858 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक सत्ता समाप्त कर भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया।
1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा जारी हुई।
1857 के बाद सेना का पुनर्गठन किया गया, भारतीय रियासतों के प्रति ब्रिटिश नीति बदली और भारत में ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन स्थापित हुआ।