मुगल साम्राज्य — बाबर (1526–1530 ई.)
फरगना से भारत विजय तक — पानीपत, खानवा, चंदेरी, घाघरा और बाबरनामा
मुगल साम्राज्य और बाबर
ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर भारत में मुगल साम्राज्य का संस्थापक था। 21 अप्रैल 1526 ई. के प्रथम पानीपत युद्ध में इब्राहिम लोदी को पराजित करने के बाद उसने दिल्ली और आगरा पर अधिकार किया और उत्तर भारत में नई तैमूरी-मुगल सत्ता की नींव रखी। बाबर ने अपने शासन के लिए पादशाह/बादशाह की सार्वभौम राजकीय उपाधि का प्रयोग किया। इसे किसी अलग “पद-पादशाही व्यवस्था” की औपचारिक स्थापना समझने के बजाय तैमूरी शासक के रूप में उसकी स्वतंत्र सार्वभौम सत्ता की घोषणा के रूप में समझना अधिक सही है।
जन्म और वंश
Birth & Lineage
बाबर का जन्म 14 फरवरी 1483 ई. को फरगना घाटी के अंदिजान में हुआ। उसके पिता उमर शेख मिर्जा द्वितीय फरगना के तैमूरी शासक थे।
बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का वंशज था और उसकी माता कुतलुग निगार खानम चगताई मंगोल वंश से थीं। इसी कारण बाबर की राजनीतिक परंपरा में तैमूरी और चगताई दोनों विरासतों का प्रभाव दिखाई देता है।
फरगना की गद्दी
Accession — 1494 CE
पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु के बाद बाबर बहुत कम आयु में 1494 ई. में फरगना की गद्दी पर बैठा। सामान्य परीक्षा पुस्तकों में 8 जून 1494 ई. की तिथि दी जाती है। उस समय उसकी आयु लगभग 11–12 वर्ष थी।
युवा अवस्था में ही बाबर ने समरकंद पर अधिकार करने के कई प्रयास किए। कुछ समय के लिए वह सफल भी हुआ, लेकिन उज़बेक शासक मुहम्मद शैबानी खाँ के उदय के कारण मध्य एशिया में उसकी स्थिति कमजोर होती गई।
काबुल और ‘पादशाह’ की उपाधि
Kabul & Title of Padshah
1504 ई. में बाबर ने काबुल पर अधिकार कर लिया और उसे अपनी शक्ति का प्रमुख आधार बनाया। मध्य एशिया में तैमूरी सत्ता के कमजोर पड़ने के बाद काबुल उसके लिए नया राजनीतिक केंद्र बना।
लगभग 1507 ई. में बाबर ने ‘पादशाह/बादशाह’ की उपाधि अपनाई। यह उसकी स्वतंत्र और सार्वभौम राजकीय स्थिति का प्रतीक थी। सामान्य SSC परीक्षा में बाबर से “पादशाह” उपाधि का तथ्य विशेष रूप से पूछा गया है।
“किसी तैमूरी शासक ने इससे पहले कभी यह उपाधि नहीं धारण की थी” वाला कथन अत्यधिक निश्चित रूप में नहीं लिखना चाहिए; सुरक्षित तथ्य है कि बाबर ने 1507 के आसपास अपने लिए Padshah का राजकीय शीर्षक अपनाया।
भारत की ओर अभियान
Expeditions towards India
बाबर ने भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा और पंजाब की ओर कई अभियान किए। सामान्य भारतीय परीक्षा-परंपरा में कहा जाता है कि उसने भारत पर पाँच बार आक्रमण किया। अभियानों की गणना अलग पुस्तकों में कुछ भिन्न हो सकती है, लेकिन 1519 से 1525 के बीच उसके बार-बार के अभियानों ने पंजाब पर उसके नियंत्रण का मार्ग तैयार किया।
उसने भेरा, सियालकोट और लाहौर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर क्रमशः प्रभाव स्थापित किया। अंतिम निर्णायक अभियान 1525–1526 में हुआ, जिसने उसे इब्राहिम लोदी के साथ पानीपत के युद्ध तक पहुँचाया।
प्रथम पानीपत युद्ध
21 April 1526
21 अप्रैल 1526 ई. को बाबर और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच प्रथम पानीपत युद्ध हुआ। इब्राहिम की सेना संख्या में बड़ी थी, लेकिन बाबर ने बेहतर युद्ध-व्यवस्था, घुड़सवार सेना और आधुनिक तोपखाने का प्रभावी उपयोग किया।
इस युद्ध में बाबर ने तुलुगमा/तुलगमा रणनीति और तोपखाने का प्रभावी प्रयोग किया। सेना के केंद्र को रक्षात्मक गाड़ियों और रस्सों से सुरक्षित किया गया, जबकि दोनों पंखों की घुड़सवार टुकड़ियाँ शत्रु को घेरने का प्रयास करती थीं।
बाबर के तोपखाने से उस्ताद अली कुली और मुस्तफा रूमी जैसे तोपची जुड़े थे। युद्ध में इब्राहिम लोदी मारा गया और दिल्ली सल्तनत के लोदी शासन का अंत हुआ।
🎯 Exam Point
पानीपत I — 1526 — बाबर बनाम इब्राहिम लोदी — तुलुगमा + तोपखाना — बाबर की विजय।
खानवा का युद्ध
Battle of Khanwa — 1527 CE
1527 ई. में बाबर और मेवाड़ के शक्तिशाली राजपूत शासक राणा सांगा के नेतृत्व वाली राजपूत शक्ति के बीच खानवा का युद्ध हुआ। यह युद्ध बाबर की भारत में सत्ता को स्थायी बनाने के लिए पानीपत से भी अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
बाबर ने इस युद्ध में भी तोपखाने, घुड़सवार सेना और संगठित युद्ध-रणनीति का उपयोग किया। उसकी विजय के बाद राजपूत महासंघ की तत्काल चुनौती कमजोर हुई।
खानवा की विजय के बाद बाबर ने ‘गाजी’ की उपाधि धारण की।
चंदेरी का युद्ध
Battle of Chanderi — 1528 CE
1528 ई. में बाबर ने चंदेरी के शासक मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान चलाया। मेदिनी राय राणा सांगा के सहयोगियों में था और मध्य भारत में राजपूत शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था।
बाबर ने चंदेरी पर अधिकार कर लिया। इस विजय से मध्य भारत में उसके विरोध का एक महत्वपूर्ण केंद्र समाप्त हुआ और खानवा की विजय के बाद उसकी स्थिति और मजबूत हुई।
घाघरा का युद्ध
Battle of Ghaghra — 1529 CE
1529 ई. का घाघरा युद्ध बाबर की भारत में अंतिम बड़ी सैन्य विजय थी। इसमें उसने पूर्वी भारत की अफगान शक्तियों को चुनौती दी। महमूद लोदी सहित अनेक अफगान सरदार बाबर के विरोध में सक्रिय थे।
बंगाल के सुल्तान नुसरत शाह की स्थिति भी इस संघर्ष में महत्वपूर्ण थी। अंततः समझौते के बाद बाबर की पूर्वी सीमा और राजनीतिक स्थिति अधिक सुरक्षित हुई।
बाबर के चार प्रमुख युद्ध
Major Battles at a Glance
| वर्ष | युद्ध | मुख्य प्रतिद्वंद्वी | परिणाम |
|---|---|---|---|
| 1526 | प्रथम पानीपत | इब्राहिम लोदी | लोदी सत्ता का अंत; मुगल सत्ता की नींव |
| 1527 | खानवा | राणा सांगा | राजपूत चुनौती कमजोर |
| 1528 | चंदेरी | मेदिनी राय | मध्य भारत में स्थिति मजबूत |
| 1529 | घाघरा | अफगान शक्तियाँ | पूर्वी क्षेत्र में स्थिति मजबूत |
‘कलंदर’ की उपाधि
Babur’s Generosity
बाबर अपनी उदारता और दानशीलता के लिए प्रसिद्ध था। सामान्य परीक्षा-GK में उसे उसकी उदारता के कारण ‘कलंदर’ कहा गया है। इस नाम से उसकी दानशील और उदार छवि को याद किया जाता है।
इसे किसी औपचारिक शाही पदवी की तरह नहीं, बल्कि बाबर के व्यक्तित्व से जुड़ी प्रसिद्ध उपाधि/विशेषण के रूप में समझना चाहिए।
बाबरनामा
Baburnama / Tuzuk-i-Baburi
बाबर ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘बाबरनामा’ की रचना की, जिसे तुजुक-ए-बाबरी भी कहा जाता है। इसका मूल लेखन चगताई तुर्की भाषा में था।
बाबरनामा में मध्य एशिया, अफगानिस्तान और भारत की राजनीति के साथ-साथ जलवायु, वनस्पति, पशु-पक्षी, नगर, समाज और बाबर के व्यक्तिगत अनुभवों का भी जीवंत वर्णन मिलता है।
अकबर के शासनकाल में अब्दुर्रहीम खानखाना ने बाबरनामा का फारसी भाषा में अनुवाद किया। यह अनुवाद लगभग 1589–1590 ई. से जोड़ा जाता है।
📗 याद रखें
बाबरनामा — मूल भाषा: चगताई तुर्की | फारसी अनुवाद: अब्दुर्रहीम खानखाना।
मुबय्यिन और साहित्य
Babur as a Writer
बाबर केवल सैनिक विजेता नहीं, बल्कि एक प्रतिभाशाली लेखक और कवि भी था। उसने तुर्की और फारसी दोनों में साहित्यिक रचनाएँ कीं।
आपके नोट में “मुबईयान नामक पद शैली का जन्मदाता” लिखा था। सही संदर्भ यह है कि बाबर की रचनाओं में ‘मुबय्यिन’ (Mubayyin) नामक एक पद्यात्मक ग्रंथ/रचना मिलती है, जो इस्लामी विधि और धार्मिक विषयों से संबंधित है। इसे किसी स्वतंत्र “मुबय्यन काव्य-शैली का जन्मदाता” कहना उचित नहीं है।
इसके अलावा बाबर ने काव्यशास्त्र, छंद और सुलेख में भी रुचि दिखाई तथा खत्त-ए-बाबरी नामक लिपि/सुलेख शैली से भी उसका नाम जोड़ा जाता है।
नक्शबंदी सूफी परंपरा
Khwaja Ubaidullah Ahrar
बाबर पर प्रसिद्ध नक्शबंदी सूफी ख्वाजा उबैदुल्लाह अहरार की आध्यात्मिक परंपरा का प्रभाव था। बाबर ने अहरार के प्रति श्रद्धा व्यक्त की और उनकी रचनाओं से भी परिचित था।
उबैदुल्लाह अहरार की मृत्यु बाबर के जन्म के कुछ वर्षों बाद हुई थी, इसलिए बाबर को उनके प्रत्यक्ष व्यक्तिगत शिष्य के रूप में लिखना सावधानी मांगता है। अधिक सही रूप में बाबर को उनकी नक्शबंदी आध्यात्मिक परंपरा का अनुयायी और प्रशंसक कहा जा सकता है।
बाबर की मृत्यु
26 December 1530
26 दिसंबर 1530 ई. को बाबर की मृत्यु आगरा में हुई। उसका जन्म फरवरी 1483 में हुआ था, इसलिए मृत्यु के समय उसकी आयु लगभग 47 वर्ष थी; वह जीवन के 48वें वर्ष में था।
प्रारंभ में उसके शव को आगरा के आराम बाग में दफनाया गया। बाद में उसकी इच्छा के अनुसार उसके अवशेष काबुल ले जाए गए और वहाँ बाग-ए-बाबर में पुनः दफन किए गए।
बाबर का उत्तराधिकारी
Humayun
बाबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ उसका उत्तराधिकारी बना। हुमायूँ ने 1530 ई. में मुगल सिंहासन संभाला।
बाबर ने भारत में जिस साम्राज्य की नींव रखी थी, उसे हुमायूँ को अफगान प्रतिरोध, भाइयों की महत्वाकांक्षा और शेर खाँ सूरी जैसी चुनौतियों के बीच संभालना पड़ा।
Quick Revision
SSC / Railway Rapid Recall
⚡ त्वरित रिविजन
⚡ Final Revision Points
भारत में मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर था। उसने सार्वभौम शासक के अर्थ में पादशाह/बादशाह की उपाधि अपनाई।
बाबर का जन्म 1483 ई. में हुआ। उसके पिता उमर शेख मिर्जा फरगना के शासक थे और बाबर 1494 ई. में कम आयु में फरगना की गद्दी पर बैठा।
1504 ई. में उसने काबुल पर अधिकार किया और लगभग 1507 ई. में पादशाह की उपाधि अपनाई।
सामान्य परीक्षा-परंपरा में बाबर द्वारा भारत पर पाँच आक्रमण किए जाने का उल्लेख मिलता है।
1526 पानीपत में इब्राहिम लोदी, 1527 खानवा में राणा सांगा, 1528 चंदेरी में मेदिनी राय और 1529 घाघरा में अफगान शक्तियाँ उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे।
पानीपत में बाबर ने तुलुगमा युद्ध-रणनीति और तोपखाने का प्रभावी उपयोग किया।
बाबर को उदारता के कारण कलंदर कहा जाता है और खानवा विजय के बाद उसने गाजी की उपाधि धारण की।
बाबरनामा उसकी आत्मकथा है, जो मूलतः चगताई तुर्की में लिखी गई। अकबर के समय अब्दुर्रहीम खानखाना ने इसका फारसी अनुवाद किया।
मुबय्यिन बाबर की पद्यात्मक धार्मिक/कानूनी रचना थी; इसे किसी अलग काव्य-शैली का नाम मानना सही नहीं है।
बाबर नक्शबंदी सूफी ख्वाजा उबैदुल्लाह अहरार की आध्यात्मिक परंपरा से प्रभावित था।
26 दिसंबर 1530 ई. को आगरा में उसकी मृत्यु हुई। पहले आराम बाग में दफनाया गया, बाद में काबुल में पुनः दफन किया गया। उसका उत्तराधिकारी हुमायूँ हुआ।