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भारत की जलवायु एवं मानसून
CLIMATE & MONSOON OF INDIA

भारत की जलवायु एवं मानसून

जलवायु की प्रकृति, ऋतु चक्र, मानसून, वर्षा वितरण, स्थानीय पवनें और महत्वपूर्ण तथ्य

भारत की जलवायु

भारत की जलवायु में अत्यधिक विविधता पाई जाती है। कहीं अत्यधिक वर्षा होती है, कहीं मरुस्थलीय शुष्कता, कहीं हिमालयी शीत जलवायु और कहीं वर्षभर गर्म तथा आर्द्र समुद्री परिस्थितियाँ मिलती हैं।

इसके बावजूद भारत की जलवायु की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मानसूनी प्रकृति है। देश के वर्षा चक्र, कृषि, जल संसाधन और मौसमी दशाओं पर मानसून का गहरा प्रभाव पड़ता है।

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भारत की जलवायु की प्रकृति

मानसूनी एवं विविधतापूर्ण जलवायु

भारत की जलवायु बहुरूपता और क्षेत्रीय विविधता से परिपूर्ण है।

इसकी सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि भारत में मानसूनी प्रकार की जलवायु पाई जाती है। वर्ष भर की अनेक मौसमी दशाएँ मानसून के आगमन, सक्रियता, विराम और वापसी से प्रभावित होती हैं।

भारत लगभग 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक फैला हुआ है और कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य भाग से होकर गुजरती है।

इस कारण कर्क रेखा के दक्षिण का बड़ा भाग उष्णकटिबंधीय प्रभाव में और इसके उत्तर का क्षेत्र उपोष्णकटिबंधीय प्रभाव में आता है।

इसी व्यापक अक्षांशीय विस्तार, स्थलरूप, समुद्र से दूरी और पर्वतीय प्रभाव के कारण देश के विभिन्न भागों में तापमान, वर्षा और मौसमी दशाओं में बहुत अधिक अंतर पाया जाता है।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

भारत को “विषुवत रेखा और कर्क रेखा के बीच स्थित देश” कहना सही नहीं है। भारत पूरी तरह भूमध्य रेखा के उत्तर में है और कर्क रेखा देश के लगभग मध्य से गुजरती है।

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हिमालय का जलवायु पर प्रभाव

प्राकृतिक जलवायु अवरोध

हिमालय पर्वत भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण भौगोलिक कारक है।

यह मध्य एशिया और तिब्बती क्षेत्र से आने वाली अत्यंत ठंडी महाद्वीपीय हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर सीधे प्रवेश करने से काफी हद तक रोकता है।

यदि हिमालय न होता तो उत्तरी भारत की शीत ऋतु वर्तमान की अपेक्षा कहीं अधिक कठोर हो सकती थी।

हिमालय मानसूनी हवाओं के लिए भी विशाल अवरोध का कार्य करता है। बंगाल की खाड़ी से आने वाली आर्द्र मानसूनी पवनें हिमालय एवं पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से टकराकर भारी वर्षा करती हैं।

इसी कारण हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की तापीय और वर्षा व्यवस्था दोनों को प्रभावित करता है।

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जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

भौगोलिक एवं वायुमंडलीय नियंत्रण

कारक प्रभाव
अक्षांश सौर ऊर्जा और तापमान पर प्रभाव
ऊँचाई ऊँचाई बढ़ने के साथ सामान्यतः तापमान घटता है
समुद्र से दूरी तटीय क्षेत्रों में सम जलवायु; आंतरिक भागों में अधिक तापांतर
पर्वतीय अवरोध पवनों की दिशा, वर्षा और वर्षाछाया क्षेत्र को प्रभावित करते हैं
वायुदाब एवं पवन प्रणाली मानसून की दिशा और मौसमी परिवर्तन नियंत्रित
समुद्री धाराएँ समुद्री क्षेत्रों के तापमान और आर्द्रता पर प्रभाव
वनस्पति एवं स्थलावरण स्थानीय तापमान, आर्द्रता और वाष्पोत्सर्जन पर प्रभाव
स्थलाकृति पर्वतीय वर्षा, वर्षाछाया और स्थानीय तापमान में अंतर
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अक्षांशीय स्थिति

उत्तर-दक्षिण जलवायु अंतर

किसी बड़े क्षेत्र की जलवायु निर्धारित करने वाले मूल कारकों में अक्षांशीय स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कर्क रेखा भारत को लगभग दो अक्षांशीय भागों में विभाजित करती है।

दक्षिणी भारत भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत निकट होने के कारण सामान्यतः अधिक गर्म रहता है और समुद्री प्रभाव वाले क्षेत्रों में आर्द्रता भी अधिक होती है।

उत्तरी भारत में अक्षांशीय स्थिति के साथ महाद्वीपीय प्रभाव अधिक होने से ग्रीष्म और शीत ऋतु के तापमान में अंतर अधिक पाया जाता है।

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ऊँचाई का प्रभाव

ऊँचाई बढ़ने पर तापमान में कमी

सामान्यतः ऊँचाई बढ़ने के साथ वायुमंडलीय तापमान कम होता जाता है।

इसी कारण समान अक्षांश पर स्थित मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान में बड़ा अंतर हो सकता है।

हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में अत्यधिक ठंड और हिमपात पाया जाता है, जबकि उसी अक्षांश के निकट मैदानी भाग अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं।

पश्चिमी घाट और दक्षिण भारत की ऊँची पहाड़ियों में भी आसपास के निचले तटीय और पठारी क्षेत्रों की तुलना में तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।

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समुद्र से दूरी

सम और विषम जलवायु

समुद्र जल और स्थल की तुलना में धीरे गर्म और धीरे ठंडा होता है। इस कारण तटीय क्षेत्रों में तापमान में अचानक बड़े परिवर्तन कम होते हैं।

मुंबई, चेन्नई और कोच्चि जैसे तटीय नगरों में समुद्री अथवा सम जलवायु का प्रभाव पाया जाता है।

इसके विपरीत दिल्ली, राजस्थान और मध्य भारत के अनेक आंतरिक क्षेत्रों में समुद्र का प्रभाव कम होने के कारण ग्रीष्म और शीत ऋतु के तापमान में बड़ा अंतर मिलता है।

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भारत का ऋतु चक्र

चार प्रमुख मौसम

ऋतु सामान्य अवधि मुख्य विशेषता
शीत ऋतु दिसंबर से फरवरी उत्तर भारत में ठंड, कोहरा, पश्चिमी विक्षोभ
ग्रीष्म ऋतु मार्च से मई उच्च तापमान, लू, स्थानीय आँधियाँ
दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु जून से सितंबर देश की अधिकांश मानसूनी वर्षा
मानसून वापसी काल अक्टूबर से नवंबर दक्षिण-पूर्वी तट पर वर्षा का विशेष महत्व
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शीत ऋतु

दिसंबर से फरवरी

भारत की शीत ऋतु सामान्यतः दिसंबर से फरवरी तक मानी जाती है।

उत्तर भारत में इस समय तापमान काफी कम हो जाता है। हिमालय में हिमपात तथा मैदानी क्षेत्रों में पाला और कोहरा देखने को मिलता है।

दक्षिण भारत में अक्षांशीय और समुद्री प्रभाव के कारण सर्दी अपेक्षाकृत कम होती है।

उत्तर-पश्चिम भारत में इस ऋतु की वर्षा का प्रमुख स्रोत पश्चिमी विक्षोभ है।

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ग्रीष्म ऋतु

मार्च से मई

भारत में ग्रीष्म ऋतु सामान्यतः मार्च से मई तक रहती है।

अप्रैल और मई में विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम तथा उत्तर-मध्य भारत में तापमान बहुत अधिक हो जाता है।

थार मरुस्थल और आसपास के मैदानों में तीव्र तापमान के कारण निम्न वायुदाब विकसित होता है, जो आगे मानसून के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उत्तर-पश्चिम तथा उत्तरी मैदानों में इस समय लू नामक गर्म और शुष्क हवाएँ चलती हैं।

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वर्षा ऋतु

जून से सितंबर

भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की मुख्य वर्षा ऋतु सामान्यतः जून से सितंबर तक रहती है।

इस अवधि में समुद्र से स्थल की ओर आने वाली आर्द्र मानसूनी हवाएँ देश के विशाल भाग में वर्षा कराती हैं।

भारत की वार्षिक वर्षा का लगभग तीन-चौथाई भाग इसी दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु में प्राप्त होता है।

🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण

जून–सितंबर = दक्षिण-पश्चिम मानसून = भारत की लगभग 75% वार्षिक वर्षा

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मानसून वापसी काल

अक्टूबर और नवंबर

दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी उत्तर-पश्चिम भारत से क्रमशः आरंभ होती है और धीरे-धीरे दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ती है।

अक्टूबर और नवंबर का समय सामान्यतः मानसून वापसी काल कहलाता है।

इस समय उत्तर भारत में आकाश साफ होने लगता है, लेकिन दक्षिण-पूर्वी भारत में बंगाल की खाड़ी से नमी लेने वाली उत्तर-पूर्वी हवाएँ महत्वपूर्ण वर्षा कराती हैं।

विशेष रूप से तमिलनाडु तथा पुडुचेरी के लिए इस ऋतु की वर्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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मानसून का अर्थ

ऋतु के साथ दिशा बदलने वाली पवनें

मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी के “मौसिम” शब्द से मानी जाती है, जिसका अर्थ ऋतु अथवा मौसम होता है।

मानसूनी पवनों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे ऋतु के अनुसार अपनी सामान्य दिशा बदलती हैं।

भारत के संदर्भ में दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्व मानसून विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

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दक्षिण-पश्चिम मानसून

भारत की मुख्य वर्षा प्रणाली

दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की जलवायु और वर्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण मौसमी प्रणाली है।

सामान्य परिस्थितियों में इसका पहला प्रमुख प्रवेश केरल तट पर जून के आरंभ के आसपास होता है।

इसके बाद मानसून धीरे-धीरे उत्तर और उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ता है और देश के अधिकांश भाग को प्रभावित करता है।

ग्रीष्मकालीन मानसूनी प्रवाह की सामान्य दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर होती है।

🎯 मानसून का प्रथम प्रवेश

भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का पहला प्रमुख प्रवेश — केरल

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दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ

अरब सागर और बंगाल की खाड़ी

🧠 मुख्य शाखाएँ

अरब सागर शाखा + बंगाल की खाड़ी शाखा

भारतीय उपमहाद्वीप पर पहुँचने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून को सामान्यतः दो प्रमुख शाखाओं में समझा जाता है — अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा

दोनों शाखाएँ अलग-अलग भू-भागों और पर्वतीय अवरोधों से प्रभावित होकर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा कराती हैं।

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अरब सागर शाखा

पश्चिमी घाट पर भारी वर्षा

अरब सागर शाखा अत्यधिक नमी लेकर भारत के पश्चिमी तट की ओर बढ़ती है।

पश्चिमी घाट से टकराने पर हवाएँ ऊपर उठती हैं और केरल, तटीय कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र के पश्चिमी भागों में भारी पर्वतीय वर्षा कराती हैं।

पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित दक्कन पठार के कई क्षेत्रों में वर्षाछाया प्रभाव के कारण अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है।

अरब सागर शाखा आगे गुजरात और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ क्षेत्रों को भी प्रभावित करती है।

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बंगाल की खाड़ी शाखा

पूर्वोत्तर भारत और गंगा मैदान

बंगाल की खाड़ी शाखा बंगाल की खाड़ी से अत्यधिक नमी ग्रहण करके उत्तर-पूर्व भारत की ओर बढ़ती है।

पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों से टकराकर यह शाखा मेघालय, असम और आसपास के क्षेत्रों में भारी वर्षा कराती है।

इसके बाद इसका एक बड़ा भाग हिमालय के समानांतर पश्चिम की ओर गंगा के मैदानों में बढ़ता है और पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा उत्तर-पश्चिम भारत तक वर्षा पहुँचाता है।

मानसूनी नमी आगे पंजाब और हरियाणा तक भी पहुँचती है, हालाँकि पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा सामान्यतः घटती जाती है।

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मौसिनराम और चेरापूंजी

अत्यधिक वर्षा वाला मेघालय

मेघालय की खासी पहाड़ियों के दक्षिणी ढाल बंगाल की खाड़ी से आने वाली आर्द्र मानसूनी हवाओं के सामने स्थित हैं।

इसी भौगोलिक स्थिति के कारण मौसिनराम और चेरापूंजी में अत्यधिक वर्षा होती है।

मौसिनराम विश्व के सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा प्राप्त करने वाले स्थानों में सबसे प्रसिद्ध है और इसकी औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1,100 सेमी से अधिक के स्तर तक पहुँचती है।

चेरापूंजी भी विश्व के सर्वाधिक वर्षायुक्त क्षेत्रों में से एक है।

🎯 भारत में अत्यधिक वर्षा

मौसिनराम — मेघालय — खासी पहाड़ियाँ

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उत्तर-पूर्व मानसून

तमिलनाडु की महत्वपूर्ण वर्षा

दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के बाद उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा से बहने वाली हवाएँ भारत के अधिकांश भाग में अपेक्षाकृत शुष्क होती हैं।

लेकिन जब ये हवाएँ बंगाल की खाड़ी से होकर गुजरती हैं तो नमी ग्रहण कर लेती हैं और दक्षिण-पूर्वी तट पर वर्षा करती हैं।

इस वर्षा का सबसे अधिक महत्व तमिलनाडु और पुडुचेरी के लिए है। आंध्र प्रदेश के दक्षिणी तटीय भाग भी इससे प्रभावित होते हैं।

इस कारण प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तर-पूर्व मानसून से सर्वाधिक लाभान्वित प्रमुख राज्य — तमिलनाडु याद किया जाता है।

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भारत में वर्षा के प्रमुख स्रोत

चार मुख्य मौसमी प्रणालियाँ

स्रोत समय प्रमुख क्षेत्र
दक्षिण-पश्चिम मानसून जून–सितंबर भारत का अधिकांश भाग
उत्तर-पूर्व मानसूनी वर्षा मुख्यतः अक्टूबर–दिसंबर तमिलनाडु एवं दक्षिण-पूर्वी तट
पश्चिमी विक्षोभ मुख्यतः शीत ऋतु उत्तर-पश्चिम भारत एवं पश्चिमी हिमालय
स्थानीय आँधियाँ एवं चक्रवात ऋतु के अनुसार पूर्वी, उत्तर-पूर्वी एवं तटीय भारत
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पश्चिमी विक्षोभ

उत्तर-पश्चिम भारत की शीतकालीन वर्षा

पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागरीय और पश्चिम एशियाई क्षेत्र से जुड़ी पश्चिमी पवनों के साथ पूर्व की ओर बढ़ने वाली बहिर्उष्णकटिबंधीय मौसम प्रणालियाँ हैं।

ये ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के ऊपर से गुजरते हुए उत्तर-पश्चिम भारत तथा पश्चिमी हिमालय की ओर पहुँच सकती हैं।

इनके कारण जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में शीतकालीन वर्षा तथा हिमपात होता है।

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में भी हल्की से मध्यम शीतकालीन वर्षा हो सकती है।

यह वर्षा विशेष रूप से गेहूँ जैसी रबी फसलों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

⚠️ स्रोत को सही समझें

पश्चिमी विक्षोभ को केवल “अफगानिस्तान-ईरान में उत्पन्न होने वाली वर्षा प्रणाली” कहना अधूरा है। इसका मूल संबंध भूमध्यसागर-पश्चिम एशिया से आने वाली पश्चिमी मौसम प्रणालियों से है।

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कालबैसाखी

बंगाल और पूर्वोत्तर की प्री-मानसून आँधियाँ

अप्रैल और मई के महीनों में पश्चिम बंगाल तथा पूर्वोत्तर भारत में तेज गरज-चमक, आँधी और वर्षा वाली स्थानीय घटनाएँ होती हैं।

पश्चिम बंगाल में इन्हें कालबैसाखी कहा जाता है। इन्हें अंग्रेजी में प्रायः नॉरवेस्टर्स कहा जाता है।

असम में इसी प्रकार की प्री-मानसून आँधी-वर्षा चाय की फसल के लिए उपयोगी हो सकती है।

असम में ऐसी तूफानी मौसमी घटनाओं के लिए बोरदोइचिला नाम भी स्थानीय रूप से प्रसिद्ध है।

⚠️ “चाय वर्षा” वाला भ्रम

पश्चिम बंगाल की कालबैसाखी को सीधे “चाय वर्षा” का समानार्थी मानना ठीक नहीं है। असम की प्री-मानसून गरज-चमक चाय के लिए लाभकारी हो सकती है, लेकिन दोनों नामों को एक ही औपचारिक स्थानीय नाम की तरह न पढ़ें।

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लू

उत्तरी मैदान की गर्म और शुष्क हवा

लू ग्रीष्म ऋतु में उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में चलने वाली अत्यंत गर्म और शुष्क हवा है।

इसका प्रभाव पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार तक देखा जा सकता है।

दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार के कई मैदानी क्षेत्रों में मई और जून के आरंभ में इसका प्रभाव बहुत तीव्र हो सकता है।

लू मानव स्वास्थ्य, फसलों और जल उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

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आम्र वर्षा

केरल और तटीय कर्नाटक की प्री-मानसून बौछारें

ग्रीष्म ऋतु के अंत में केरल और तटीय कर्नाटक में गरज-चमक के साथ स्थानीय वर्षा होती है।

इन पूर्व-मानसूनी बौछारों को आम्र वर्षा कहा जाता है, क्योंकि ये आम के फलों को जल्दी पकने में सहायता करती हैं।

इनका संबंध मुख्य दक्षिण-पश्चिम मानसून के औपचारिक आगमन से पहले होने वाली स्थानीय संवहनीय वर्षा से है।

🎯 याद रखें

आम्र वर्षा — केरल और तटीय कर्नाटक — प्री-मानसून

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कॉफी ब्लॉसम वर्षा

कॉफी के फूलों के लिए महत्वपूर्ण बौछारें

दक्षिण भारत के कॉफी उत्पादक क्षेत्रों में गर्मी के अंत की कुछ प्री-मानसून बौछारें कॉफी के पौधों में फूल आने के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।

इन्हें सामान्यतः ब्लॉसम वर्षा अथवा कॉफी ब्लॉसम वर्षा कहा जाता है।

इनका संबंध विशेष रूप से कर्नाटक, केरल और आसपास के कॉफी उत्पादक क्षेत्रों से है।

⚠️ चेरी ब्लॉसम और तमिलनाडु

“चेरी पिकिंग रेन” तमिलनाडु की उत्तर-पूर्व मानसूनी वर्षा का नाम है — यह सही नहीं है।

कॉफी से संबंधित ब्लॉसम बौछारें दक्षिण भारत के कॉफी क्षेत्रों की प्री-मानसून वर्षा से जुड़ी हैं।

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भारत में वर्षा का वितरण

अत्यधिक असमान वितरण

भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है।

पश्चिमी घाट की पवनाभिमुख ढाल, पूर्वी हिमालय और मेघालय की खासी पहाड़ियों में अत्यधिक वर्षा होती है।

इसके विपरीत पश्चिमी राजस्थान, कच्छ और लद्दाख के कुछ क्षेत्रों में बहुत कम वर्षा होती है।

गंगा के मैदानों में सामान्यतः पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है, क्योंकि बंगाल की खाड़ी शाखा पश्चिम की ओर बढ़ते हुए अपनी नमी खोती जाती है।

वर्षा वितरण मानसूनी हवाओं की दिशा, पर्वतीय अवरोध, समुद्र से दूरी तथा स्थलाकृति पर निर्भर करता है।

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भारत के अत्यधिक शुष्क क्षेत्र

राजस्थान और लद्दाख

भारत में पश्चिमी राजस्थान और लद्दाख के कुछ भाग अत्यधिक कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गिने जाते हैं।

लद्दाख हिमालय की वर्षाछाया में स्थित एक शीत मरुस्थलीय क्षेत्र है।

लेह भारत के अत्यंत कम वर्षा वाले प्रसिद्ध स्थानों में से एक है और प्रतियोगी परीक्षाओं में इसे अक्सर न्यून वर्षा वाले स्थान के रूप में पूछा जाता है।

राजस्थान का जैसलमेर तथा आसपास का थार क्षेत्र भी बहुत कम वर्षा प्राप्त करता है।

⚠️ “भारत में सबसे कम वर्षा”

पुरानी GK पुस्तकों में लेह को भारत का सबसे कम वर्षा वाला स्थान लिखा मिलता है। अलग-अलग स्टेशन, अवधि और आँकड़ा-पद्धति के अनुसार न्यूनतम वर्षा की तुलना बदल सकती है; इसलिए लेह = अत्यंत कम वर्षा वाला प्रमुख परीक्षा-स्थल याद करना सुरक्षित है।

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राजस्थान का दैनिक तापांतर

दिन और रात के तापमान में बड़ा अंतर

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में वायुमंडल अपेक्षाकृत शुष्क, आकाश अधिक साफ और वनस्पति कम होती है।

रेतीली सतह दिन में तेजी से गर्म होती है और रात में तेजी से ठंडी हो जाती है।

इस कारण थार मरुस्थल के कई क्षेत्रों में दैनिक तापांतर बहुत अधिक पाया जाता है।

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पंजाब और तमिलनाडु की वर्षा में अंतर

दो अलग मौसमी प्रणालियाँ

पंजाब और तमिलनाडु दोनों को मुख्य मानसूनी ऋतु के बाहर भी वर्षा प्राप्त हो सकती है, लेकिन दोनों का प्रमुख कारण अलग है।

पंजाब में महत्वपूर्ण गैर-मानसूनी वर्षा मुख्यतः शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभ से होती है।

तमिलनाडु को अक्टूबर से दिसंबर के दौरान उत्तर-पूर्वी मानसूनी प्रवाह और बंगाल की खाड़ी के मौसम तंत्रों से महत्वपूर्ण वर्षा मिलती है।

⚠️ सुधार

“पंजाब और तमिलनाडु दोनों में शरद ऋतु में वर्षा होती है” को एक समान तथ्य की तरह न पढ़ें।

पंजाब — मुख्यतः शीतकालीन पश्चिमी विक्षोभ
तमिलनाडु — मानसून वापसी/उत्तर-पूर्व मानसून काल

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मानसून और भारतीय कृषि

कृषि एवं अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा

मानसून भारत की कृषि व्यवस्था पर अत्यंत गहरा प्रभाव डालता है।

विशेष रूप से वर्षा पर निर्भर कृषि क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिम मानसून का समय पर आगमन और पर्याप्त वर्षा खरीफ फसलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

धान, मक्का, कपास, सोयाबीन तथा कई अन्य खरीफ फसलें मानसूनी वर्षा से सीधे प्रभावित होती हैं।

कम वर्षा से सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जबकि अत्यधिक वर्षा बाढ़, जलभराव और फसल क्षति का कारण बन सकती है।

इसलिए मानसून केवल मौसम संबंधी घटना नहीं बल्कि कृषि, जल संसाधन, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रणाली है।

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जेट स्ट्रीम

ऊपरी वायुमंडल की तीव्र पवन पट्टियाँ

जेट स्ट्रीम क्षोभमंडल के ऊपरी भाग और क्षोभसीमा के निकट चलने वाली अत्यंत तेज, संकरी वायु धाराएँ हैं।

इनकी ऊँचाई स्थिर 12 किमी नहीं होती। क्षेत्र, ऋतु और अक्षांश के अनुसार ये सामान्यतः लगभग 9 से 16 किमी के आसपास ऊपरी क्षोभमंडल में पाई जा सकती हैं।

मध्य अक्षांशों में पश्चिमी जेट धाराएँ सामान्यतः पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं।

भारत के मौसम के संदर्भ में उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट और ग्रीष्म ऋतु की उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट विशेष महत्व रखती हैं।

जेट धाराओं की स्थिति में मौसमी परिवर्तन भारतीय मानसून और पश्चिमी विक्षोभ जैसी प्रणालियों से संबंधित है।

⚠️ जेट स्ट्रीम का सुधार

इसे केवल “धरातल से ठीक 12 किमी ऊपर मध्य अक्षांशों में पश्चिम से पूर्व चलने वाली हवा” के रूप में याद करना अधूरा है।

जेट स्ट्रीम ऊपरी क्षोभमंडल की तीव्र पवन पट्टी है और इसकी ऊँचाई तथा दिशा जेट के प्रकार और ऋतु के अनुसार बदल सकती है।

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कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

विश्व की जलवायु के पाँच मुख्य समूह

जर्मन-रूसी जलवायुविज्ञानी व्लादिमीर कोपेन ने तापमान और वर्षा के आधार पर विश्व की जलवायु का प्रसिद्ध वर्गीकरण विकसित किया।

1918 में प्रकाशित उसके विकसित वर्गीकरण में जलवायु को पाँच प्रमुख समूहों में व्यवस्थित किया गया।

इन मुख्य समूहों को सामान्यतः ए, बी, सी, डी और ई अक्षरों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

समूह मुख्य जलवायु
उष्णकटिबंधीय वर्षायुक्त जलवायु
बी शुष्क जलवायु
सी उष्ण समशीतोष्ण जलवायु
डी शीत/हिमयुक्त महाद्वीपीय जलवायु
ध्रुवीय जलवायु
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जलवायु कारक याद रखने की युक्ति

LANDFORMS — केवल स्मरण-सहायक सूत्र

अक्षर स्मरण हेतु अर्थ
L अक्षांश
A ऊँचाई
N समुद्र से निकटता
D पवन की दिशा
F वनस्पति
O समुद्री धाराएँ
R वर्षा
M पर्वत एवं स्थलरूप
S मिट्टी एवं भूमि-सतह

⚠️ इसे औपचारिक सिद्धांत न समझें

LANDFORMS जलवायु विज्ञान का कोई सार्वभौमिक आधिकारिक एक-शब्दीय वर्गीकरण नहीं है। इसे केवल विभिन्न जलवायु कारकों को याद रखने की स्मरण-सहायक युक्ति के रूप में उपयोग करें।

वर्षा स्वयं जलवायु का एक तत्व भी है, इसलिए इसे अक्षांश, ऊँचाई और समुद्र से दूरी जैसे मूल नियंत्रणों के बिल्कुल समान स्तर का कारण मानना हमेशा उचित नहीं है।

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भारत में अधिक वर्षा वाले क्षेत्र

पर्वतीय अवरोध और मानसून

भारत में अत्यधिक वर्षा प्राप्त करने वाले प्रमुख क्षेत्रों में पश्चिमी घाट की पवनाभिमुख ढाल, पूर्वोत्तर हिमालय और मेघालय की पहाड़ियाँ शामिल हैं।

इन क्षेत्रों में आर्द्र मानसूनी हवाओं को पर्वतीय अवरोध के कारण ऊपर उठना पड़ता है, जिससे तीव्र संघनन और पर्वतीय वर्षा होती है।

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चक्रवात और भारतीय वर्षा

बंगाल की खाड़ी और अरब सागर

भारत के तटीय क्षेत्रों की वर्षा और मौसम पर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों में चक्रवात विकसित होते हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से बंगाल की खाड़ी के चक्रवात भारतीय पूर्वी तट पर विशेष प्रभाव डालते रहे हैं।

मानसून वापसी काल में बंगाल की खाड़ी में विकसित चक्रवाती तंत्र तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा सहित पूर्वी तटीय क्षेत्रों में भारी वर्षा करा सकते हैं।

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परीक्षा में होने वाले प्रमुख भ्रम

एक बार में सही याद करें

भारत विषुवत रेखा और कर्क रेखा के बीच स्थित है — गलत। भारत पूरी तरह भूमध्य रेखा के उत्तर में है और कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य से गुजरती है।

पंजाब और तमिलनाडु दोनों की मुख्य शरदकालीन वर्षा समान कारण से होती है — गलत। पंजाब में मुख्य गैर-मानसूनी वर्षा शीत ऋतु के पश्चिमी विक्षोभ से, जबकि तमिलनाडु में अक्टूबर-दिसंबर की उत्तर-पूर्व मानसूनी प्रणाली से होती है।

पश्चिमी विक्षोभ अफगानिस्तान और ईरान में ही पैदा होते हैं — अधूरा। इनका मूल संबंध भूमध्यसागर-पश्चिम एशिया की पश्चिमी बहिर्उष्णकटिबंधीय प्रणालियों से है।

कालबैसाखी और चाय वर्षा एक ही आधिकारिक स्थानीय नाम हैं — इसे ऐसे न पढ़ें। कालबैसाखी पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध प्री-मानसून आँधियाँ हैं; असम की समान आँधियाँ चाय के लिए उपयोगी हो सकती हैं।

तमिलनाडु की उत्तर-पूर्व मानसूनी वर्षा को चेरी पिकिंग रेन कहते हैं — गलत। कॉफी ब्लॉसम वर्षा दक्षिण भारत की प्री-मानसून बौछारों से संबंधित है।

भारत का निर्विवाद सबसे कम वर्षा वाला स्थान लेह है — इसे स्रोत-निर्भर तथ्य समझें। लेह भारत के अत्यंत कम वर्षा वाले प्रमुख परीक्षा-स्थानों में है।

जेट स्ट्रीम ठीक 12 किमी की ऊँचाई पर ही चलती है — गलत। इसकी ऊँचाई क्षेत्र और ऋतु के अनुसार बदलती है।

LANDFORMS जलवायु नियंत्रणों का औपचारिक वैज्ञानिक नाम है — नहीं। यह केवल स्मरण-सहायक सूत्र के रूप में उपयोगी है।

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अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति

प्रश्न उत्तर
भारत की जलवायु का प्रमुख प्रकार मानसूनी जलवायु
कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य से गुजरती है
दक्षिण-पश्चिम मानसून का सामान्य समय जून से सितंबर
भारत की लगभग कितनी वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से? लगभग 75%
मानसून का पहला प्रमुख प्रवेश केरल
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ अरब सागर और बंगाल की खाड़ी
सर्वाधिक वर्षा के लिए प्रसिद्ध स्थान मौसिनराम, मेघालय
उत्तर-पश्चिम भारत की शीतकालीन वर्षा पश्चिमी विक्षोभ
तमिलनाडु की महत्वपूर्ण मानसूनी वर्षा उत्तर-पूर्व मानसून / मानसून वापसी काल
पश्चिम बंगाल की प्री-मानसून आँधी कालबैसाखी
उत्तर भारत की गर्म शुष्क हवा लू
केरल-कर्नाटक की प्री-मानसून बौछार आम्र वर्षा
कॉफी फूलों से संबंधित वर्षा ब्लॉसम वर्षा
अत्यधिक दैनिक तापांतर राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र
जेट स्ट्रीम ऊपरी क्षोभमंडल की तीव्र संकरी पवन पट्टी
कोपेन के मुख्य जलवायु समूह 5 — ए, बी, सी, डी, ई

⚡ अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

भारत की जलवायु की प्रमुख विशेषता — मानसूनी प्रकृति

भारत में उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय दोनों प्रभाव पाए जाते हैं; कर्क रेखा देश के लगभग मध्य से गुजरती है।

जलवायु के प्रमुख नियंत्रण — अक्षांश, ऊँचाई, समुद्र से दूरी, स्थलरूप, पवन प्रणाली और समुद्री प्रभाव

भारत का ऋतु क्रम — शीत ऋतु → ग्रीष्म ऋतु → दक्षिण-पश्चिम मानसून → मानसून वापसी काल

शीत ऋतु — दिसंबर से फरवरी

ग्रीष्म ऋतु — मार्च से मई

दक्षिण-पश्चिम मानसून — जून से सितंबर

मानसून वापसी — अक्टूबर से नवंबर

भारत की वार्षिक वर्षा का लगभग 75% भाग दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु में प्राप्त होता है।

भारत में मानसून का पहला प्रमुख प्रवेश — केरल

दक्षिण-पश्चिम मानसून — अरब सागर शाखा + बंगाल की खाड़ी शाखा

अरब सागर शाखा — पश्चिमी घाट पर भारी वर्षा

बंगाल की खाड़ी शाखा — पूर्वोत्तर भारत → गंगा का मैदान → उत्तर-पश्चिम भारत

मौसिनराम — मेघालय — अत्यधिक औसत वार्षिक वर्षा

उत्तर-पूर्व मानसून — तमिलनाडु और दक्षिण-पूर्वी तट के लिए महत्वपूर्ण

पश्चिमी विक्षोभ — उत्तर-पश्चिम भारत की शीतकालीन वर्षा और पश्चिमी हिमालय का हिमपात

लू — उत्तर एवं उत्तर-पश्चिम भारत की गर्म शुष्क हवा

कालबैसाखी — पश्चिम बंगाल की प्री-मानसून गरज-चमक वाली आँधी

आम्र वर्षा — केरल और तटीय कर्नाटक की प्री-मानसून बौछार

ब्लॉसम वर्षा — कॉफी के फूलों के लिए महत्वपूर्ण प्री-मानसून वर्षा

अत्यधिक वर्षा — पश्चिमी घाट + पूर्वोत्तर हिमालय + मेघालय

अत्यंत कम वर्षा — पश्चिमी राजस्थान और लद्दाख के कुछ भाग

लेह — भारत के अत्यंत कम वर्षा वाले प्रसिद्ध परीक्षा-स्थानों में से एक

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र — उच्च दैनिक तापांतर

जेट स्ट्रीम — ऊपरी क्षोभमंडल की अत्यंत तीव्र संकरी पवन धाराएँ

कोपेन — 1918 के विकसित वर्गीकरण में पाँच मुख्य समूह — ए, बी, सी, डी और ई

LANDFORMS को केवल जलवायु कारकों की स्मरण-सहायक युक्ति के रूप में याद करें, औपचारिक वैज्ञानिक वर्गीकरण के रूप में नहीं।

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