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महाजनपद एवं प्रमुख धर्म
प्राचीन भारतीय इतिहास

महाजनपद एवं प्रमुख धर्म

महाजनपदों के उदय से प्रमुख भारतीय एवं विश्व धर्मों तक

महाजनपदों का उदय

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का विस्तार गंगा-यमुना के मैदान तथा पूर्वी भारत की ओर हुआ। स्थायी कृषि-बस्तियों के विकास के साथ छोटे जन और जनपद बड़े क्षेत्रीय राज्यों में बदलने लगे।

लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक उत्तर भारत में अनेक स्वतंत्र राज्य विकसित हो चुके थे। इनमें से 16 प्रमुख और शक्तिशाली राज्यों को महाजनपद कहा गया।

सोलह महाजनपदों की प्रसिद्ध सूची बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में मिलती है।

01

जन से जनपद और महाजनपद

राजनीतिक विकास

जन का अर्थ किसी कबीले या लोगों के समूह से था। जब कोई जन किसी निश्चित भू-भाग पर स्थायी रूप से बस गया, तो उस क्षेत्र को जनपद कहा जाने लगा।

समय के साथ कुछ जनपद अधिक शक्तिशाली हुए और उन्होंने पड़ोसी क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया। ऐसे बड़े राज्यों को महाजनपद कहा गया।

महाजनपदों के विकास में कृषि का विस्तार, लोहे के औजारों का प्रयोग, व्यापार में वृद्धि तथा नगरों का विकास महत्वपूर्ण कारण थे।

02

सोलह महाजनपदों की जानकारी

अंगुत्तर निकाय

सोलह महाजनपदों की प्रसिद्ध सूची बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में मिलती है।

ये महाजनपद थे — अंग, मगध, काशी, कोशल, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति, गांधार और कम्बोज।

जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी सोलह बड़े राज्यों की सूची मिलती है, लेकिन वह अंगुत्तर निकाय की सूची से पूरी तरह समान नहीं है।

परीक्षा बिंदु

सोलह महाजनपदों की प्रसिद्ध बौद्ध सूची — अंगुत्तर निकाय।

03

सोलह महाजनपद और उनकी राजधानियाँ

एक नज़र में

महाजनपद प्रमुख राजधानी प्रमुख क्षेत्र
अंग चम्पा पूर्वी बिहार
मगध राजगृह; बाद में पाटलिपुत्र दक्षिण बिहार
काशी वाराणसी वाराणसी क्षेत्र
कोशल श्रावस्ती अवध क्षेत्र
वज्जि वैशाली उत्तर बिहार
मल्ल कुशीनारा और पावा पूर्वी उत्तर प्रदेश
चेदि शुक्तिमती बुंदेलखंड क्षेत्र
वत्स कौशांबी प्रयागराज के आसपास
कुरु इन्द्रप्रस्थ दिल्ली एवं आसपास
पांचाल अहिच्छत्र और काम्पिल्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश
मत्स्य विराटनगर राजस्थान
शूरसेन मथुरा मथुरा क्षेत्र
अश्मक पोतन / पोतली गोदावरी घाटी
अवन्ति उज्जयिनी और माहिष्मती मालवा एवं मध्य भारत
गांधार तक्षशिला उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र
कम्बोज राजपुर उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र
04

राजतंत्र और गण-संघ

शासन के दो प्रमुख रूप

अधिकांश महाजनपदों में राजतंत्र था, जहाँ शासन राजा के हाथ में होता था।

कुछ राज्यों में शासन किसी एक राजा के हाथ में न होकर कुलीन क्षत्रिय परिवारों या समूहों के हाथ में था। ऐसे राज्यों को गण या संघ कहा जाता था।

वज्जि और मल्ल गण-संघ शासन के प्रमुख उदाहरण थे।

वज्जि एक संघ था जिसमें लिच्छवि सहित कई गण सम्मिलित थे। वैशाली इसका प्रमुख केंद्र था।

05

चार प्रमुख शक्तिशाली महाजनपद

राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

सोलह महाजनपदों में मगध, कोशल, वत्स और अवन्ति विशेष रूप से शक्तिशाली बने।

इन राज्यों के बीच क्षेत्रीय विस्तार, राजनीतिक प्रभुत्व और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के लिए संघर्ष चलता रहा।

अंततः मगध ने अन्य राज्यों पर बढ़त प्राप्त की और उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता बन गया।

बहुत महत्वपूर्ण

चार प्रमुख महाजनपद — मगध, कोशल, वत्स और अवन्ति।

06

अंग महाजनपद

राजधानी — चम्पा

अंग वर्तमान बिहार के पूर्वी क्षेत्र में स्थित था। इसकी राजधानी चम्पा थी।

चम्पा एक महत्वपूर्ण व्यापारिक नगर था।

मगध के शासक बिम्बिसार ने अंग को जीतकर मगध में मिला लिया।

07

मगध महाजनपद

सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य का उदय

मगध वर्तमान दक्षिण बिहार में स्थित था। इसकी प्रारंभिक राजधानी राजगृह थी।

बाद में राजधानी पाटलिपुत्र बनी।

बिम्बिसार, अजातशत्रु और उदायिन जैसे शासकों ने मगध की शक्ति और सीमा का विस्तार किया।

मगध ने अंग, कोशल तथा वज्जि जैसी शक्तियों पर क्रमशः प्रभुत्व स्थापित किया।

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काशी महाजनपद

राजधानी — वाराणसी

काशी की राजधानी वाराणसी थी। यह गंगा घाटी का समृद्ध और महत्वपूर्ण राज्य था।

काशी पर नियंत्रण को लेकर काशी और कोशल के बीच संघर्ष हुआ।

अंततः काशी कोशल के प्रभाव में आ गया।

09

कोशल महाजनपद

राजधानी — श्रावस्ती

कोशल वर्तमान अवध क्षेत्र में स्थित था। इसकी प्रमुख राजधानी श्रावस्ती थी।

बुद्ध के समय प्रसेनजित कोशल का प्रसिद्ध शासक था।

कोशल और मगध के बीच राजनीतिक तथा वैवाहिक संबंध भी थे।

10

वज्जि महाजनपद

वैशाली का गण-संघ

वज्जि उत्तर बिहार में स्थित एक प्रमुख गण-संघ था। इसका राजनीतिक केंद्र वैशाली था।

लिच्छवि वज्जि संघ का सबसे प्रसिद्ध गण था।

मगध के राजा अजातशत्रु ने लंबे संघर्ष के बाद वज्जि संघ को पराजित किया।

11

मल्ल महाजनपद

कुशीनारा और पावा

मल्ल भी गण-संघ शासन वाला महाजनपद था। इसके दो प्रमुख केंद्र कुशीनारा और पावा थे।

गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण कुशीनारा में हुआ।

जैन परंपरा में पावा का महावीर के निर्वाण से विशेष संबंध है।

12

वत्स महाजनपद

राजधानी — कौशांबी

वत्स महाजनपद यमुना नदी के क्षेत्र में स्थित था। इसकी राजधानी कौशांबी थी।

कौशांबी उस समय का महत्वपूर्ण नगर और व्यापारिक केंद्र था।

वत्स का प्रसिद्ध शासक उदयन था।

13

अवन्ति महाजनपद

उज्जयिनी और माहिष्मती

अवन्ति मध्य भारत का शक्तिशाली महाजनपद था।

इसके उत्तरी भाग की राजधानी उज्जयिनी और दक्षिणी भाग की राजधानी माहिष्मती थी।

बुद्ध के समय प्रद्योत अवन्ति का प्रसिद्ध शासक था।

अवन्ति मगध का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था और बाद में मगध साम्राज्य में शामिल हो गया।

14

अश्मक महाजनपद

गोदावरी घाटी

अश्मक गोदावरी घाटी में स्थित था।

सोलह महाजनपदों में यह विन्ध्य पर्वत के दक्षिण की ओर स्थित एकमात्र महाजनपद के रूप में प्रसिद्ध है।

इसकी राजधानी पोतन या पोतली बताई जाती है।

15

गांधार और कम्बोज

उत्तर-पश्चिमी महाजनपद

गांधार उत्तर-पश्चिम का महत्वपूर्ण महाजनपद था। इसकी प्रसिद्ध राजधानी तक्षशिला थी।

तक्षशिला शिक्षा और व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था।

कम्बोज भी उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित था। इसकी राजधानी के रूप में राजपुर का उल्लेख मिलता है।

16

मगध के उत्कर्ष के कारण

मगध सबसे शक्तिशाली क्यों बना?

सोलह महाजनपदों में अंततः मगध सबसे शक्तिशाली राज्य बनकर उभरा।

मगध के आसपास लौह-अयस्क के स्रोत उपलब्ध थे, जिससे कृषि उपकरण और हथियार बनाने में सहायता मिली।

गंगा तथा उसकी सहायक नदियों ने सिंचाई, जल-परिवहन और व्यापार को बढ़ावा दिया।

उपजाऊ भूमि ने कृषि उत्पादन बढ़ाया और राज्य को अधिक संसाधन दिए।

मगध के जंगलों में उपलब्ध हाथियों का युद्ध में विशेष उपयोग हुआ।

राजगृह पहाड़ियों से घिरा था और प्राकृतिक रूप से सुरक्षित था।

बाद में पाटलिपुत्र की भौगोलिक स्थिति ने मगध को सामरिक तथा व्यापारिक लाभ दिया।

बिम्बिसार, अजातशत्रु और उदायिन जैसे शासकों की विस्तारवादी नीतियों ने भी मगध के उत्कर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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महाजनपद काल की प्रमुख विशेषताएँ

द्वितीय नगरीकरण

महाजनपद काल में छोटे जनजातीय संगठनों के स्थान पर क्षेत्रीय राज्यों का विकास हुआ।

कृषि उत्पादन के बढ़ने के साथ नगर और व्यापारिक केंद्र विकसित हुए।

गंगा घाटी में नगरों के इस नए विकास को द्वितीय नगरीकरण कहा जाता है। भारत का प्रथम विकसित नगरीकरण हड़प्पा सभ्यता में हुआ था।

लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से आहत सिक्कों के प्रयोग के प्रमाण मिलने लगते हैं।

इसी सामाजिक और आर्थिक वातावरण में जैन और बौद्ध धर्म जैसे श्रमण आंदोलनों का विकास हुआ।

श्रमण परंपरा

जैन धर्म

तीर्थंकर, महावीर, सिद्धांत एवं प्रमुख केंद्र

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जैन तीर्थंकर

ऋषभदेव से महावीर तक

जैन परंपरा में कुल 24 तीर्थंकर माने जाते हैं।

ऋषभदेव या आदिनाथ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं।

पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे। जैन परंपरा के अनुसार वे काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे।

पार्श्वनाथ ने लगभग 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह के चार व्रतों पर बल दिया।

19

महावीर स्वामी

24वें तीर्थंकर

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। उनके बचपन का नाम वर्धमान था।

उनका जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ ज्ञात्रिक कुल के प्रमुख थे।

उनकी माता त्रिशला थीं, जिनका संबंध लिच्छवि प्रमुख चेटक के परिवार से था।

महावीर की तिथियों के विषय में दो प्रमुख परंपराएँ हैं। एक कालक्रम उन्हें लगभग 540–468 ईसा पूर्व और श्वेतांबर परंपरा 599–527 ईसा पूर्व मानती है।

जैन परंपरा में उनकी पत्नी का नाम यशोदा और पुत्री का नाम प्रियदर्शना या अनोज्जा मिलता है।

20

महावीर का गृहत्याग और केवलज्ञान

वर्धमान से जिन तक

महावीर ने लगभग 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया।

जैन परंपरा के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई नंदिवर्धन की अनुमति से संन्यास ग्रहण किया।

लगभग 12 वर्ष की कठोर साधना के बाद उन्हें ऋजुपालिका नदी के तट पर जृम्भिकग्राम के निकट केवलज्ञान प्राप्त हुआ।

इसके बाद वे जिन अर्थात विजेता, अर्हत अर्थात पूज्य और निर्ग्रंथ अर्थात बंधनों से मुक्त कहलाए।

उनके अनुयायी भी प्रारंभिक साहित्य में निर्ग्रंथ नाम से जाने जाते थे।

21

महावीर का संघ

गणधर और भिक्षुणियाँ

महावीर ने अपनी शिक्षाएँ जनसामान्य की प्राकृत भाषा-परंपरा में दीं। जैन आगमों की प्रमुख भाषा अर्धमागधी प्राकृत रही।

महावीर के 11 प्रमुख गणधर माने जाते हैं। इनमें इंद्रभूति गौतम सबसे प्रसिद्ध गणधर थे।

जमाली महावीर का दामाद और प्रारंभिक शिष्य था। बाद में उसके मतभेद से जैन संघ में प्रारंभिक विवाद उत्पन्न हुआ।

महावीर के बाद उनकी शिक्षाओं की परंपरा में सुधर्मन का विशेष महत्व रहा।

चंदना या चंदनबाला को महावीर के भिक्षुणी संघ की प्रथम प्रमुख भिक्षुणी माना जाता है। जैन परंपरा में उन्हें चम्पा के राजा दधिवाहन की पुत्री बताया गया है।

नामों में अंतर

इंद्रभूति गौतम — प्रमुख गणधर।

जमाली — महावीर का दामाद और प्रारंभिक शिष्य।

चंदनबाला — प्रथम प्रमुख जैन भिक्षुणी।

22

जैन धर्म के सिद्धांत

मोक्ष का मार्ग

जैन धर्म किसी एक सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को स्वीकार नहीं करता।

जैन दर्शन में जीव या आत्मा की मान्यता है। कर्म के कारण जीव जन्म-मरण के बंधन में रहता है।

जैन धर्म के तीन रत्न हैं — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।

महावीर ने पाँच महाव्रत बताए — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

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जैन धर्म के प्रमुख संरक्षक

राजा और राजवंश

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में अनेक शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण दिया।

इनमें चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष तथा वनराज चावड़ा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं।

मौर्योत्तर काल में मथुरा जैन धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बना। कंकाली टीला से अनेक जैन पुरावशेष मिले हैं।

खजुराहो में चंदेल शासकों के समय अनेक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ।

24

श्रवणबेलगोला और गोम्मटेश्वर

बाहुबली की विशाल प्रतिमा

कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में गंग वंश के मंत्री और सेनापति चामुंडराय ने लगभग 981 ईस्वी में विशाल गोम्मटेश्वर बाहुबली प्रतिमा स्थापित कराई।

यह एकाश्म प्रतिमा लगभग 17.4 मीटर ऊँची है।

बाहुबली को कायोत्सर्ग मुद्रा में दिखाया गया है।

25

कल्पसूत्र और महावीर का निर्वाण

जैन साहित्य

कल्पसूत्र जैन धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। परंपरागत रूप से इसे भद्रबाहु से जोड़ा जाता है।

इसमें महावीर, पार्श्वनाथ और ऋषभदेव सहित जैन तीर्थंकरों के जीवन से संबंधित विवरण मिलते हैं।

महावीर ने लगभग 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावा या पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया।

उनकी निर्वाण तिथि के विषय में भी 468 ईसा पूर्व तथा 527 ईसा पूर्व की दो प्रमुख परंपराएँ मिलती हैं।

जैन परंपरा महावीर के अंतिम निवास को पावा के राजा हस्तिपाल से संबंधित स्थान से जोड़ती है।

श्रमण परंपरा

बौद्ध धर्म

गौतम बुद्ध, त्रिपिटक, संघ और निर्वाण

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गौतम बुद्ध

सिद्धार्थ से बुद्ध तक

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध थे। उन्हें आधुनिक साहित्य में एशिया का प्रकाश भी कहा गया है।

उनका जन्म लुम्बिनी में शाक्य कुल में हुआ। यह स्थान वर्तमान नेपाल में है।

उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के प्रमुख थे।

उनकी माता मायादेवी की मृत्यु उनके जन्म के कुछ समय बाद हो गई। उनका पालन-पोषण महाप्रजापति गौतमी ने किया।

उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

उनकी पत्नी का नाम यशोधरा और पुत्र का नाम राहुल था।

प्रतियोगी परीक्षाओं में बुद्ध की पारंपरिक तिथियाँ 563–483 ईसा पूर्व प्रचलित हैं। उनकी सटीक ऐतिहासिक तिथियों के विषय में विद्वानों में मतभेद है।

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महाभिनिष्क्रमण

गृहत्याग और प्रारंभिक गुरु

लगभग 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने गृहत्याग किया। इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है।

गृहत्याग के बाद उन्होंने आलार कालाम से ध्यान की उच्च अवस्थाओं की शिक्षा प्राप्त की।

इसके बाद उन्होंने उद्दक रामपुत्त से भी साधना की शिक्षा ली।

इन साधनाओं से अंतिम मुक्ति का मार्ग न मिलने पर सिद्धार्थ ने कठोर तपस्या की। बाद में उन्होंने अत्यधिक तपस्या छोड़कर मध्यम मार्ग अपनाया।

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ज्ञान प्राप्ति

बोधगया

लगभग छह वर्षों की साधना के बाद सिद्धार्थ ने उरुवेला में निरंजना नदी के निकट पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान किया।

लगभग 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात उन्हें सम्बोधि या ज्ञान प्राप्त हुआ।

इसके बाद वे बुद्ध अर्थात जाग्रत कहलाए और वह स्थान बोधगया के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने बोधगया के आसपास लगभग सात सप्ताह अर्थात 49 दिन बिताए।

29

धर्मचक्रप्रवर्तन

सारनाथ का प्रथम उपदेश

ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के निकट सारनाथ में दिया।

यह स्थान प्राचीन साहित्य में ऋषिपत्तन या इसिपतन कहलाता है।

इस प्रथम उपदेश को धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है।

बुद्ध ने अपनी शिक्षाएँ जनसामान्य द्वारा समझी जाने वाली मध्य भारतीय बोलियों में दीं। बाद में उनकी शिक्षाएँ पाली सहित कई भाषाओं में सुरक्षित हुईं।

श्रावस्ती बुद्ध के सबसे महत्वपूर्ण प्रवास और उपदेश-स्थलों में था।

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बुद्ध के राजकीय संरक्षक

मगध और कोशल

मगध के बिम्बिसार और अजातशत्रु तथा कोशल के प्रसेनजित बुद्ध के समय के प्रमुख शासक थे जिनका बौद्ध परंपरा से निकट संबंध था।

व्यापारी अनाथपिण्डिक ने श्रावस्ती में प्रसिद्ध जेतवन विहार बुद्ध और संघ के लिए प्रदान किया।

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महापरिनिर्वाण

कुशीनारा

बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध ने लगभग 80 वर्ष की आयु में मल्ल गणराज्य के कुशीनारा में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।

महापरिनिर्वाण से पहले चुंद द्वारा उन्हें अंतिम भोजन अर्पित किया गया था।

बुद्ध की मृत्यु को महापरिनिर्वाण कहा जाता है।

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त्रिपिटक

बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ

बौद्ध धर्म की प्रारंभिक शिक्षाओं और संघ-व्यवस्था की विस्तृत जानकारी त्रिपिटक से मिलती है।

थेरवाद परंपरा का पाली त्रिपिटक तीन भागों में विभाजित है — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक।

विनय पिटक में संघ के नियम, सुत्त पिटक में उपदेश और अभिधम्म पिटक में दार्शनिक विश्लेषण मिलता है।

श्रीलंकाई परंपरा के अनुसार पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा वट्टगामणि अभय के समय पाली त्रिपिटक को लिखित रूप दिया गया।

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थेरगाथा और थेरीगाथा

भिक्षु एवं भिक्षुणियों के पद्य

थेरगाथा में प्रारंभिक बौद्ध भिक्षुओं के पद्य सुरक्षित हैं।

थेरीगाथा में प्रारंभिक बौद्ध भिक्षुणियों के अनुभव और आध्यात्मिक पद्य मिलते हैं।

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बौद्ध दर्शन

दुःख, तृष्णा और निर्वाण

बौद्ध धर्म किसी सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को मोक्ष का आवश्यक आधार नहीं मानता।

बौद्ध दर्शन का महत्वपूर्ण सिद्धांत अनात्मवाद है। इसके अनुसार कोई स्थायी और अपरिवर्तनीय आत्मा नहीं है।

बौद्ध धर्म कर्म और पुनर्जन्म को स्वीकार करता है।

बुद्ध ने दुःख का कारण तृष्णा बताया। तृष्णा के क्षय से निर्वाण प्राप्त होता है।

बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य हैं — दुःख, दुःख-समुदय, दुःख-निरोध और दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा।

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बौद्ध संघ

भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक और उपासिका

संन्यास ग्रहण कर संघ में रहने वाले पुरुष भिक्षु और स्त्रियाँ भिक्षुणी कहलाती थीं।

गृहस्थ पुरुष अनुयायी उपासक और गृहस्थ स्त्री अनुयायी उपासिका कहलाती थी।

संघ में प्रारंभिक प्रवेश को प्रव्रज्या और पूर्ण भिक्षु-दीक्षा को उपसम्पदा कहा जाता था।

पूर्ण उपसम्पदा के लिए सामान्य न्यूनतम आयु 20 वर्ष मानी गई।

बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं — बुद्ध, धम्म और संघ।

36

चार प्रमुख बौद्ध संगीतियाँ

परंपरागत विवरण

संगीति स्थान प्रमुख भिक्षु शासक मुख्य महत्व
प्रथम राजगृह महाकश्यप अजातशत्रु बुद्ध की शिक्षाओं और विनय का मौखिक संकलन
द्वितीय वैशाली सब्बकामी / रेवत परंपरा कालाशोक विनय संबंधी विवादों पर चर्चा
तृतीय पाटलिपुत्र मोग्गलिपुत्त तिस्स अशोक संघ का पुनर्गठन और धर्म-प्रचार
चतुर्थ कश्मीर क्षेत्र / कुंडलवन वसुमित्र कनिष्क सर्वास्तिवाद परंपरा की महत्वपूर्ण संगीति
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महायान और प्रारंभिक बौद्ध परंपराएँ

बोधिसत्त्व और अर्हत

समय के साथ बौद्ध धर्म में अनेक निकाय और दार्शनिक परंपराएँ विकसित हुईं।

महायान परंपरा में बोधिसत्त्व आदर्श को विशेष महत्व मिला।

प्रारंभिक बौद्ध निकायों और थेरवाद परंपरा में अर्हत आदर्श का विशेष महत्व है।

महायान का विकास कई शताब्दियों में धीरे-धीरे हुआ। इसे कनिष्क की चतुर्थ संगीति के तुरंत बाद हुए एक ही विभाजन का परिणाम नहीं माना जाता।

38

बुद्ध पूर्णिमा और निर्वाण

वैशाख पूर्णिमा

वैशाख पूर्णिमा बौद्ध धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है।

थेरवाद परंपरा में बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण तीनों वैशाख पूर्णिमा से संबंधित माने जाते हैं।

निर्वाण का अर्थ तृष्णा, द्वेष और मोह की अग्नि का शांत होना और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति है।

जैन धर्म स्थायी जीव या आत्मा को स्वीकार करता है, जबकि बौद्ध धर्म अनात्मवाद मानता है।

39

मैत्रेय और पद्मसंभव

बौद्ध धर्म का विस्तार

बौद्ध परंपरा में मैत्रेय को भविष्य का बुद्ध माना जाता है।

गौतम बुद्ध को शाक्य कुल में जन्म लेने के कारण शाक्यमुनि भी कहा जाता है।

आठवीं शताब्दी में पद्मसंभव ने तिब्बत में तांत्रिक बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका संबंध वज्रयान परंपरा से था।

हिमाचल प्रदेश की रेवालसर झील के निकट उनकी विशाल प्रतिमा स्थित है।

40

बुद्ध प्रतिमाओं का विकास

गांधार और मथुरा

प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, पदचिह्न और खाली सिंहासन जैसे प्रतीकों से दिखाया जाता था।

बुद्ध की मानव-रूप प्रतिमाएँ लगभग पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास गांधार और मथुरा कला-केंद्रों में प्रमुख रूप से विकसित हुईं।

भारत में बुद्ध की प्रतिमा से पहले भी यक्ष-यक्षिणी तथा अन्य धार्मिक प्रतिमाओं की परंपरा मौजूद थी।

41

भारत के प्रमुख बौद्ध मठ

महत्वपूर्ण स्थान

मठ स्थान राज्य / केंद्रशासित प्रदेश
ताबो मठ ताबो, स्पीति हिमाचल प्रदेश
नामग्याल मठ धर्मशाला हिमाचल प्रदेश
हेमिस मठ हेमिस लद्दाख
थिकसे मठ थिकसे लद्दाख
शाशुर मठ लाहौल क्षेत्र हिमाचल प्रदेश
माइंड्रोलिंग मठ देहरादून उत्तराखंड
रुमटेक मठ गंगटोक के निकट सिक्किम
तवांग मठ तवांग अरुणाचल प्रदेश
नामद्रोलिंग मठ बायलाकुप्पे कर्नाटक
बोधिमंड विहार बोधगया बिहार
भारतीय धार्मिक परंपरा

शैव धर्म

रुद्र, शिव, पाशुपत, नाथ और लिंगायत परंपराएँ

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रुद्र से शिव तक

वैदिक परंपरा

ऋग्वेद में रुद्र एक महत्वपूर्ण देवता हैं। बाद की धार्मिक परंपरा में रुद्र का स्वरूप शिव से जुड़ गया।

अथर्ववेद और बाद के वैदिक साहित्य में रुद्र-शिव से संबंधित भव, शर्व और पशुपति जैसे नाम मिलते हैं।

हड़प्पा सभ्यता की कुछ मुहरों और वस्तुओं को कुछ विद्वानों ने शिव या लिंग-पूजा के प्रारंभिक रूप से जोड़ा है। इस विषय में विद्वानों में मतभेद है।

शिव-लिंग की स्पष्ट और विकसित उपासना उत्तरवैदिक, महाकाव्य और पुराणिक परंपराओं में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

43

शैव संप्रदाय

पाशुपत से लिंगायत तक

पाशुपत शैव धर्म की सबसे प्राचीन संगठित परंपराओं में से एक है।

इसके व्यवस्थित विकास का संबंध लकुलीश से जोड़ा जाता है।

पाशुपत दर्शन में पाँच प्रमुख विषयों के कारण इसे पंचार्थ परंपरा भी कहा गया।

प्राचीन और मध्यकाल में पाशुपत, कापालिक और कालामुख जैसी शैव परंपराएँ विकसित हुईं।

लिंगायत या वीरशैव परंपरा का व्यापक संगठन 12वीं शताब्दी के कर्नाटक में बसव और अन्य शिवशरणों से जुड़ा है।

लिंगायत धार्मिक गुरुओं और संन्यासियों को जंगम कहा जाता है।

शून्य संपादने लिंगायत साहित्य की महत्वपूर्ण कन्नड़ रचना है।

44

नाथ संप्रदाय

मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ

नाथ परंपरा के प्रारंभिक महान गुरुओं में मत्स्येंद्रनाथ का प्रमुख स्थान है।

उन्हें सामान्यतः 9वीं–10वीं शताब्दी के आसपास रखा जाता है।

गोरखनाथ ने नाथ संप्रदाय को व्यापक संगठन और लोकप्रियता प्रदान की।

नाथ परंपरा में योग, हठयोग और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व रहा।

45

दक्षिण भारत में शैव धर्म

चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोल

दक्षिण भारत में चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोल काल में शैव धर्म अत्यंत प्रभावशाली रहा।

एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम के काल में निर्मित हुआ।

चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजावुर में प्रसिद्ध राजराजेश्वर या बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया।

46

पशुपतिनाथ मंदिर

काठमांडू

प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू में बागमती नदी के किनारे स्थित है।

मुख्य मंदिर नेपाली पैगोडा स्थापत्य का प्रसिद्ध उदाहरण है।

पशुपतिनाथ मंदिर क्षेत्र काठमांडू घाटी विश्व धरोहर स्थल के स्मारक-समूहों में शामिल है। काठमांडू घाटी को 1979 में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।

भारतीय धार्मिक परंपरा

वैष्णव धर्म

विष्णु, नारायण और वासुदेव-कृष्ण परंपरा

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वैष्णव धर्म का विकास

भागवत एवं पांचरात्र परंपरा

वैष्णव धर्म का विकास विष्णु, नारायण और वासुदेव-कृष्ण से संबंधित विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सम्मिलन से हुआ।

प्रारंभिक भागवत धर्म में वासुदेव-कृष्ण की उपासना महत्वपूर्ण थी।

पांचरात्र परंपरा का संबंध नारायण-वासुदेव की उपासना से था।

वासुदेव-कृष्ण का संबंध वृष्णि समूह से था और मथुरा उनकी उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

48

छांदोग्य उपनिषद में कृष्ण

देवकीपुत्र कृष्ण

छांदोग्य उपनिषद में देवकीपुत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है।

उन्हें घोर आंगिरस से शिक्षा प्राप्त करने वाला बताया गया है।

यह कृष्ण-परंपरा के प्रारंभिक महत्वपूर्ण साहित्यिक उल्लेखों में गिना जाता है।

49

विष्णु के अवतार

दशावतार परंपरा

पुराणिक काल में विष्णु के अवतारों की धारणा का व्यापक विकास हुआ।

बाद की वैष्णव परंपरा में दशावतार की प्रसिद्ध सूची विकसित हुई। अलग-अलग ग्रंथों में सूची में कुछ अंतर मिलता है।

मत्स्य पुराण सहित अनेक पुराणों में विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलता है।

गुप्तकालीन कला में वराह अवतार अत्यंत प्रसिद्ध था। उदयगिरि की विशाल वराह प्रतिमा इसका प्रमुख उदाहरण है।

सुदर्शन चक्र विष्णु का प्रमुख आयुध है। कला में इसकी तीलियों की संख्या अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।

विश्व धर्म

इस्लाम धर्म

पैगंबर मुहम्मद, कुरान, हिजरत और इस्लामी परंपराएँ

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पैगंबर मुहम्मद

जन्म एवं परिवार

इस्लाम धर्म के ऐतिहासिक प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद थे।

उनका जन्म लगभग 570 ईस्वी में मक्का नगर में कुरैश कबीले में हुआ।

उनके पिता का नाम अब्दुल्लाह और माता का नाम आमिना था।

माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी देखभाल पहले दादा अब्दुल मुत्तलिब और बाद में चाचा अबू तालिब ने की।

लगभग 25 वर्ष की आयु में उन्होंने खदीजा से विवाह किया।

उनकी पुत्री फातिमा और दामाद अली इस्लामी इतिहास में महत्वपूर्ण हैं।

51

प्रथम वह्य और हिजरत

610 एवं 622 ईस्वी

इस्लामी परंपरा के अनुसार 610 ईस्वी में मक्का के निकट हिरा की गुफा में पैगंबर मुहम्मद को प्रथम वह्य प्राप्त हुई।

मक्का में विरोध बढ़ने के बाद 622 ईस्वी में उन्होंने मक्का से मदीना की ओर प्रस्थान किया।

इस घटना को हिजरत कहा जाता है।

हिजरी संवत का प्रारंभ इसी हिजरत से माना जाता है।

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कुरान

इस्लाम का पवित्र ग्रंथ

कुरान इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रंथ है। इसका मूल पाठ अरबी भाषा में है।

कुरान में कुल 114 सूरह हैं।

आयतों की संख्या गणना-पद्धति के अनुसार कुछ भिन्न मिलती है। प्रचलित एक प्रमुख गणना में 6236 आयतें मानी जाती हैं।

इस्लाम में ईमान, नमाज, जकात, रोजा और हज को अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्यों में गिना जाता है।

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पैगंबर की मृत्यु और खलीफा

632 ईस्वी

पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु 632 ईस्वी में मदीना में हुई। उन्हें वहीं दफनाया गया।

उनके बाद मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व से जुड़ा पद खलीफा कहलाया।

54

सुन्नी और शिया परंपराएँ

उत्तराधिकार और नेतृत्व

पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के बाद मुस्लिम समुदाय में नेतृत्व के प्रश्न पर मतभेद विकसित हुए। आगे चलकर इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से सुन्नी और शिया परंपराएँ विकसित हुईं।

सुन्नी परंपरा कुरान के साथ पैगंबर की सुन्नत अर्थात कथनों और आचरण को विशेष महत्व देती है।

शिया परंपरा में अली और पैगंबर के परिवार से आने वाले इमामों को विशेष धार्मिक नेतृत्व प्रदान किया जाता है।

अली की हत्या 661 ईस्वी में हुई।

उनके पुत्र हुसैन 680 ईस्वी में इराक के कर्बला में मारे गए।

55

खिलाफत और पैगंबर की जीवनी

1924 तक की परंपरा

इस्लामी इतिहास में विभिन्न राजवंशों के शासकों ने खलीफा की उपाधि धारण की।

ओटोमन खिलाफत का औपचारिक अंत 1924 ईस्वी में तुर्की की राष्ट्रीय सभा द्वारा किया गया।

मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व वाले तुर्की गणराज्य के सुधारों के दौरान यह परिवर्तन हुआ।

इब्न इसहाक ने पैगंबर मुहम्मद की सबसे प्रारंभिक प्रसिद्ध जीवनी तैयार की।

उसका मूल पाठ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं है। उसकी सामग्री मुख्यतः इब्न हिशाम के संपादित रूप से ज्ञात होती है।

पैगंबर मुहम्मद के जन्म की स्मृति में कई मुस्लिम समुदाय मिलाद-उन-नबी मनाते हैं।

56

भारत में इस्लाम का आगमन

व्यापार और सिंध विजय

भारत के पश्चिमी समुद्रतट पर अरब व्यापारी इस्लाम के प्रारंभिक काल से ही आते रहे। इस प्रकार भारत में इस्लाम का प्रारंभिक संपर्क समुद्री व्यापार के माध्यम से हुआ।

712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरब सेना ने सिंध पर विजय प्राप्त की।

इसके बाद सिंध के कुछ क्षेत्रों में अरब शासन स्थापित हुआ।

57

किबला

नमाज की दिशा

मुसलमान नमाज के समय मक्का स्थित काबा की दिशा की ओर मुख करते हैं।

इस दिशा को किबला कहा जाता है।

भारत से मक्का सामान्यतः पश्चिम की ओर स्थित है।

विश्व धर्म

ईसाई धर्म

ईसा मसीह, बाइबल और ईसाई परंपरा

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ईसा मसीह

जन्म और परिवार

ईसाई धर्म का केंद्र ईसा मसीह या यीशु का जीवन और उनकी शिक्षाएँ हैं।

ईसाई धर्म का प्रमुख धर्मग्रंथ बाइबल है।

ईसाई परंपरा के अनुसार यीशु का जन्म बेथलेहम में हुआ।

उनकी माता का नाम मरियम और सांसारिक अभिभावक का नाम यूसुफ था।

यीशु के जन्म की स्मृति में क्रिसमस मनाया जाता है। 25 दिसंबर पारंपरिक धार्मिक तिथि है।

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यीशु का प्रारंभिक जीवन और शिष्य

धार्मिक सेवा

ईसाई ग्रंथों में यीशु और उनके परिवार का संबंध बढ़ई के कार्य से मिलता है।

उनकी सार्वजनिक धार्मिक सेवा लगभग 30 वर्ष की आयु के आसपास आरंभ होने की परंपरा है।

प्रारंभिक प्रमुख शिष्यों में अन्द्रियास और शमौन पतरस के नाम मिलते हैं।

यीशु के बारह प्रमुख शिष्य प्रेरित कहलाए।

60

यीशु का क्रूस पर चढ़ाया जाना

पोंतियुस पिलातुस का काल

यीशु को रोमन शासन के समय यहूदिया के रोमन राज्यपाल पोंतियुस पिलातुस के शासनकाल में क्रूस पर चढ़ाया गया।

इस घटना की तिथि सामान्यतः लगभग 30 या 33 ईस्वी के आसपास मानी जाती है।

क्रॉस या क्रूस ईसाई धर्म का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक प्रतीक है।

61

ईसाई त्रित्व

पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा

मुख्यधारा ईसाई धर्म में त्रित्व की धारणा महत्वपूर्ण है।

इसमें ईश्वर पिता, ईश्वर पुत्र और पवित्र आत्मा को एक ईश्वर के तीन व्यक्तित्वों के रूप में समझा जाता है।

बाइबल मुख्य रूप से पुराना नियम और नया नियम दो भागों में विभाजित है।

62

गोथिक स्थापत्य

12वीं शताब्दी का यूरोप

गोथिक स्थापत्य शैली का विकास 12वीं शताब्दी में फ्रांस में हुआ।

इस शैली की प्रमुख विशेषताएँ ऊँचे भवन, नुकीले मेहराब, रिब-वॉल्ट, उड़ते हुए आधार-स्तंभ और बड़े रंगीन काँच के झरोखे थे।

सेंट-डेनिस प्रारंभिक गोथिक स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

नोट्रे-डाम दे पेरिस गोथिक गिरजाघर स्थापत्य के सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में है।

प्राचीन ईरानी धर्म

पारसी धर्म

जरथुस्त्र, अहुर मज्दा और अवेस्ता

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जरथुस्त्र

पारसी धर्म के पैगंबर

पारसी या जरथुस्त्र धर्म के प्रवर्तक जरथुस्त्र या ज़रथुष्ट्र थे।

वे प्राचीन ईरानी धार्मिक परंपरा से संबंधित थे।

उनकी सटीक तिथि निश्चित नहीं है।

पारसी धर्म में सर्वोच्च दिव्य सत्ता अहुर मज्दा है।

64

अवेस्ता

पारसी धर्म का पवित्र ग्रंथ

पारसी धर्म का पवित्र ग्रंथ-संग्रह अवेस्ता कहलाता है।

इसके सबसे प्राचीन और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भागों में गाथाएँ शामिल हैं।

गाथाओं को जरथुस्त्र की शिक्षाओं से जोड़ा जाता है।

जेंद शब्द अवेस्ता के भाष्य और व्याख्या से संबंधित है। इसी कारण ऐतिहासिक रूप से जेंद-अवेस्ता नाम भी प्रचलित हुआ।

65

अग्नि का महत्व

पवित्रता और प्रकाश

पारसी धर्म में अग्नि का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है।

अग्नि पवित्रता, सत्य और प्रकाश का प्रतीक है।

पारसी धर्म में सर्वोच्च उपास्य अहुर मज्दा हैं।

इसलिए पारसी धर्म को केवल अग्नि की पूजा तक सीमित करना सही नहीं है। अग्नि-मंदिरों में पवित्र अग्नि के सामने प्रार्थना की जाती है।

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पारसी धर्म की नैतिक शिक्षा

अच्छे विचार, अच्छे शब्द, अच्छे कर्म

पारसी धर्म की नैतिक शिक्षा तीन प्रमुख सिद्धांतों में व्यक्त की जाती है — अच्छे विचार, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म।

जरथुस्त्र धर्म में सत्य और असत्य, अच्छाई और बुराई के बीच नैतिक संघर्ष की धारणा महत्वपूर्ण है।

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प्रमुख धर्म — एक नज़र में

त्वरित तुलना

धर्म प्रमुख व्यक्तित्व प्रमुख ग्रंथ मुख्य विचार
जैन धर्म ऋषभदेव, पार्श्वनाथ, महावीर आगम, कल्पसूत्र अहिंसा, आत्मा, कर्म और मोक्ष
बौद्ध धर्म गौतम बुद्ध त्रिपिटक चार आर्य सत्य, अनात्मा, निर्वाण
शैव धर्म रुद्र-शिव वैदिक, आगमिक एवं पुराणिक साहित्य शिव-उपासना और अनेक शैव परंपराएँ
वैष्णव धर्म विष्णु, नारायण, वासुदेव-कृष्ण वैदिक, उपनिषदिक एवं पुराणिक साहित्य भक्ति और अवतारवाद
इस्लाम पैगंबर मुहम्मद कुरान एकेश्वरवाद, नमाज, रोजा, जकात, हज
ईसाई धर्म ईसा मसीह बाइबल यीशु की शिक्षाएँ और त्रित्व
पारसी धर्म जरथुस्त्र अवेस्ता अहुर मज्दा, सत्य और पवित्र अग्नि

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

16 महाजनपदों की प्रसिद्ध सूची — अंगुत्तर निकाय।

चार शक्तिशाली महाजनपद — मगध, कोशल, वत्स और अवन्ति।

मगध — राजगृह; बाद में पाटलिपुत्र।

अंग — चम्पा — बिम्बिसार ने मगध में मिलाया।

कोशल — श्रावस्ती — प्रसेनजित।

वत्स — कौशांबी — उदयन।

अवन्ति — उज्जयिनी और माहिष्मती — प्रद्योत।

वज्जि — वैशाली — गण-संघ।

मल्ल — कुशीनारा और पावा — गण-संघ।

अश्मक — गोदावरी क्षेत्र।

गांधार — तक्षशिला।

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर — ऋषभदेव।

23वें तीर्थंकर — पार्श्वनाथ।

24वें तीर्थंकर — महावीर।

महावीर — कुंडग्राम — सिद्धार्थ और त्रिशला।

महावीर — 30 वर्ष में गृहत्याग — लगभग 12 वर्ष बाद केवलज्ञान।

इंद्रभूति गौतम — प्रमुख गणधर।

चंदनबाला — प्रथम प्रमुख जैन भिक्षुणी।

जैन त्रिरत्न — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र।

महाव्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

श्रवणबेलगोला — गोम्मटेश्वर बाहुबली — चामुंडराय।

कल्पसूत्र — भद्रबाहु परंपरा।

महावीर का निर्वाण — पावापुरी।

गौतम बुद्ध — लुम्बिनी — शुद्धोधन और मायादेवी।

29 वर्ष — महाभिनिष्क्रमण।

आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त — प्रारंभिक गुरु।

ज्ञान प्राप्ति — बोधगया — लगभग 35 वर्ष।

प्रथम उपदेश — सारनाथ — धर्मचक्रप्रवर्तन।

महापरिनिर्वाण — कुशीनारा — लगभग 80 वर्ष।

त्रिपिटक — विनय, सुत्त और अभिधम्म पिटक।

थेरगाथा — भिक्षु; थेरीगाथा — भिक्षुणियाँ।

बौद्ध त्रिरत्न — बुद्ध, धम्म और संघ।

पूर्ण उपसम्पदा की सामान्य न्यूनतम आयु — 20 वर्ष।

प्रथम बौद्ध संगीति — राजगृह — महाकश्यप — अजातशत्रु।

द्वितीय — वैशाली — कालाशोक।

तृतीय — पाटलिपुत्र — मोग्गलिपुत्त तिस्स — अशोक।

चतुर्थ — कश्मीर — वसुमित्र — कनिष्क।

महायान — बोधिसत्त्व आदर्श।

प्रारंभिक बौद्ध परंपरा — अर्हत आदर्श।

भविष्य का बुद्ध — मैत्रेय।

पद्मसंभव — तिब्बत में वज्रयान के प्रसार से संबंधित।

बुद्ध की मानव-रूप प्रतिमाएँ — गांधार और मथुरा।

ऋग्वेद का रुद्र — बाद की शिव परंपरा से जुड़ा।

पाशुपत — प्राचीन शैव संप्रदाय।

लकुलीश — पाशुपत परंपरा।

मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ — नाथ परंपरा।

लिंगायत आंदोलन — बसव और शिवशरण।

कैलाश मंदिर, एलोरा — राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम।

बृहदीश्वर मंदिर — राजराज प्रथम — तंजावुर।

पशुपतिनाथ — काठमांडू — बागमती नदी।

वैष्णव धर्म — विष्णु, नारायण और वासुदेव-कृष्ण परंपराएँ।

छांदोग्य उपनिषद — देवकीपुत्र कृष्ण — घोर आंगिरस।

गुप्तकाल में वराह रूप अत्यंत प्रसिद्ध।

पैगंबर मुहम्मद — लगभग 570 ईस्वी — मक्का।

610 ईस्वी — हिरा की गुफा में प्रथम वह्य।

622 ईस्वी — हिजरत — मक्का से मदीना।

कुरान — अरबी — 114 सूरह।

अली — 661 ईस्वी।

हुसैन — कर्बला — 680 ईस्वी।

ओटोमन खिलाफत का अंत — 1924।

भारत में इस्लाम का प्रारंभिक संपर्क — अरब समुद्री व्यापारी।

सिंध विजय — 712 ईस्वी — मुहम्मद बिन कासिम।

किबला — मक्का में काबा की दिशा।

ईसा मसीह — बेथलेहम — माता मरियम।

ईसाई धर्म का प्रमुख ग्रंथ — बाइबल।

यीशु को पोंतियुस पिलातुस के शासनकाल में क्रूस पर चढ़ाया गया।

ईसाई त्रित्व — पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।

गोथिक स्थापत्य — 12वीं शताब्दी में फ्रांस में विकास।

पारसी धर्म — जरथुस्त्र — अवेस्ता — अहुर मज्दा।

पारसी धर्म में अग्नि — पवित्रता और प्रकाश का प्रतीक।

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