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मौर्योत्तर काल

VidyaGlobe
भारतीय एवं विदेशी राजवंश
प्राचीन भारतीय इतिहास

भारतीय एवं विदेशी राजवंश

मौर्योत्तर भारत में राजनीतिक परिवर्तन और विदेशी शक्तियों का उदय

भाग 1

भारतीय राजवंश

शुंग, कण्व, सातवाहन और चेदी राजवंश

मौर्य साम्राज्य के बाद

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में एक ही केंद्रीय सत्ता के स्थान पर अनेक क्षेत्रीय राजवंश उभरे। उत्तर भारत में शुंग और कण्व, दक्कन में सातवाहन तथा कलिंग में खारवेल जैसे शासकों का महत्व बढ़ा।

01

शुंग वंश की स्थापना

पुष्यमित्र शुंग

मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ईसा पूर्व में की।

इसके बाद पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की।

पुष्यमित्र मौर्य सेना का सेनापति था।

02

शुंगों की राजधानी

पाटलिपुत्र और विदिशा

शुंग सत्ता का प्रमुख केंद्र पाटलिपुत्र रहा, जबकि विदिशा भी शुंग शासन का अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र था।

शुंग युवराज अग्निमित्र विदिशा से शासन करता था।

इसलिए विदिशा को शुंगों की महत्वपूर्ण राजधानी या द्वितीय राजनीतिक केंद्र के रूप में याद किया जाता है।

03

पुष्यमित्र के अश्वमेध यज्ञ

राजकीय शक्ति का प्रदर्शन

पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ किए।

पतंजलि और अन्य साहित्यिक परंपराएँ पुष्यमित्र के अश्वमेध यज्ञों से संबंधित जानकारी देती हैं।

अश्वमेध यज्ञ राजकीय प्रभुत्व और राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन से जुड़ा था।

04

भरहुत स्तूप और शुंग काल

बौद्ध कला का विकास

मध्य प्रदेश का भरहुत स्तूप मौर्योत्तर बौद्ध कला का महत्वपूर्ण स्मारक है।

इस स्तूप का प्रारंभिक निर्माण अशोककालीन परंपरा से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके विशाल पत्थर के रेलिंग और सजावटी भागों का विकास शुंग काल में हुआ।

इसलिए भरहुत स्तूप का पूरा निर्माण केवल पुष्यमित्र शुंग द्वारा कराया गया था, ऐसा नहीं माना जाता।

शुंगकालीन कला में बौद्ध जातक कथाएँ, वृक्ष, यक्ष-यक्षिणियाँ और प्रतीकात्मक बुद्ध-चित्रण प्रमुख हैं।

05

शुंग वंश का अंतिम शासक

देवभूति

शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था।

लगभग 73 ईसा पूर्व में उसके मंत्री वासुदेव कण्व ने देवभूति की हत्या कर दी।

इसके बाद कण्व वंश की स्थापना हुई।

06

कण्व वंश

वासुदेव कण्व

कण्व वंश का संस्थापक वासुदेव कण्व था।

कण्व राजवंश ने लगभग 73 ईसा पूर्व से 28 ईसा पूर्व तक मगध क्षेत्र में शासन किया।

इस वंश के प्रमुख शासकों में वासुदेव, भूमिमित्र, नारायण और सुशर्मन के नाम मिलते हैं।

कण्व वंश का अंतिम शासक सुशर्मन या सुशर्मा था।

दक्कन का प्रमुख राजवंश

सातवाहन राजवंश

सिमुक से गौतमीपुत्र शातकर्णि तक

07

सातवाहन वंश की स्थापना

सिमुक

सातवाहन वंश का संस्थापक सिमुक माना जाता है।

सातवाहन वंश की स्थापना की सटीक तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है। इसे सामान्यतः पहली शताब्दी ईसा पूर्व से पहले या उसके प्रारंभिक चरण से जोड़ा जाता है।

सिमुक द्वारा कण्व वंश के अंतिम शासक सुशर्मन की 60 ईसा पूर्व में निश्चित हत्या का विवरण स्थापित ऐतिहासिक तथ्य नहीं है।

पुराणिक परंपरा सातवाहनों को आंध्र या आंध्रभृत्य नाम से भी उल्लेखित करती है।

08

सातवाहनों की राजधानी

प्रतिष्ठान

सातवाहनों की प्रमुख राजधानी प्रतिष्ठान थी।

प्रतिष्ठान की पहचान वर्तमान पैठण से की जाती है, जो महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के तट पर स्थित है।

पैठण वर्तमान छत्रपति संभाजीनगर जिले में स्थित है।

सातवाहनों का एक अन्य महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र अमरावती क्षेत्र भी था।

09

सातवाहनों की भाषा और लिपि

प्राकृत और ब्राह्मी

सातवाहन अभिलेखों में मुख्यतः प्राकृत भाषा का प्रयोग हुआ।

इन अभिलेखों की प्रमुख लिपि ब्राह्मी थी।

सातवाहन शासकों के अभिलेख नासिक, नाणेघाट और अन्य स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

10

सातवाहन समाज में मातृनाम

गौतमीपुत्र और वाशिष्ठीपुत्र

सातवाहन शासकों में मातृनाम के प्रयोग की महत्वपूर्ण परंपरा दिखाई देती है।

उदाहरण के लिए — गौतमीपुत्र शातकर्णि और वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी

इससे माता की वंशीय पहचान का विशेष महत्व दिखाई देता है, लेकिन इससे पूरे सातवाहन समाज को मातृसत्तात्मक कहना सही नहीं है।

सातवाहन राजसत्ता मूलतः राजवंशीय और पितृवंशीय उत्तराधिकार पर आधारित थी।

11

गौतमीपुत्र शातकर्णि

सातवाहनों का महान शासक

गौतमीपुत्र शातकर्णि सातवाहन वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में था।

उसने पश्चिमी भारत के शक शासक नहपान को पराजित किया।

उसकी माता गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख से उसकी उपलब्धियों की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

नासिक प्रशस्ति में उसे शक, यवन और पहलवों का विनाशक बताया गया है।

12

सातवाहन अर्थव्यवस्था और व्यापार

दक्कन और रोमन जगत

सातवाहन काल में दक्कन का आंतरिक और समुद्री व्यापार बहुत विकसित हुआ।

पश्चिमी तट के बंदरगाहों और दक्कन के नगरों का रोमन साम्राज्य से व्यापारिक संपर्क था।

सातवाहनों ने सीसा, तांबा, कांसा तथा अन्य धातुओं के सिक्के जारी किए।

कुछ सातवाहन सिक्कों पर जहाज की आकृति भी मिलती है, जो समुद्री व्यापार से उनके संबंध को दर्शाती है।

कलिंग

चेदी / महामेघवाहन राजवंश

खारवेल और हाथीगुम्फा अभिलेख

13

कलिंग का चेदी राजवंश

महामेघवाहन परंपरा

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद कलिंग क्षेत्र में एक स्वतंत्र राजवंश का उदय हुआ।

इस वंश को सामान्यतः महामेघवाहन या कलिंग का चेदी राजवंश कहा जाता है।

इस वंश की सबसे महत्वपूर्ण जानकारी ओडिशा के उदयगिरि की हाथीगुम्फा अभिलेख से मिलती है।

इस राजवंश का काल सामान्यतः पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास रखा जाता है।

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खारवेल

कलिंग का शक्तिशाली शासक

खारवेल कलिंग के महामेघवाहन-चेदी वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था।

उसके शासन और सैन्य अभियानों की जानकारी हाथीगुम्फा अभिलेख से मिलती है।

इस अभिलेख में उसके शासन के विभिन्न वर्षों की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, नगर निर्माण और धार्मिक कार्यों का वर्णन है।

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खारवेल और जैन धर्म

धार्मिक संरक्षण

खारवेल का जैन धर्म से निकट संबंध था और उसने जैन साधुओं तथा संस्थाओं को संरक्षण दिया।

इसके साथ ही उसका शासन अन्य धार्मिक परंपराओं के प्रति भी सहिष्णु दिखाई देता है।

हाथीगुम्फा अभिलेख प्राचीन कलिंग के राजनीतिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है।

16

उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएँ

जैन साधुओं के लिए शैलाश्रय

ओडिशा की उदयगिरि और खंडगिरि पहाड़ियों पर अनेक शैल-कट गुफाएँ स्थित हैं।

इनमें से कई गुफाओं का निर्माण खारवेल और उसके राजपरिवार के समय जैन साधुओं के निवास के लिए कराया गया।

रानीगुम्फा इन गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध और विशाल गुफाओं में है।

हाथीगुम्फा अभिलेख भी उदयगिरि पहाड़ी पर ही स्थित है।

भाग 2

भारत में विदेशी राजवंश

हिंद-यूनानी → शक → पहलव → कुषाण

उत्तर-पश्चिम भारत में विदेशी शक्तियाँ

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर-पश्चिम भारत में मध्य एशिया और ईरान से आने वाली कई विदेशी शक्तियों ने शासन स्थापित किया।

परीक्षा में इनका सामान्य क्रम याद रखा जाता है — हिंद-यूनानी → शक → पहलव → कुषाण।

विदेशी राजवंश

हिंद-यूनानी

बैक्ट्रिया से उत्तर-पश्चिम भारत तक

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हिंद-यूनानियों का आगमन

बैक्ट्रियन यूनानी

भारत में मौर्योत्तर काल के विदेशी शासकों में हिंद-यूनानी सबसे पहले प्रमुख रूप से उभरे।

इनका मूल राजनीतिक केंद्र बैक्ट्रिया था, जो वर्तमान अफगानिस्तान और मध्य एशिया के क्षेत्रों से संबंधित था।

सामान्य क्रम है — हिंद-यूनानी → शक → पहलव → कुषाण।

18

डेमेट्रियस

भारत की ओर यूनानी विस्तार

बैक्ट्रियन यूनानी शासक डेमेट्रियस प्रथम का भारतीय क्षेत्रों की ओर विस्तार में महत्वपूर्ण स्थान है।

लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभ में उसने उत्तर-पश्चिमी भारतीय क्षेत्रों में अपनी शक्ति का विस्तार किया।

उसे भारतीय भूभाग में प्रवेश करने वाले प्रारंभिक महत्वपूर्ण हिंद-यूनानी शासकों में गिना जाता है।

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मिनांडर

मिलिंद

हिंद-यूनानी शासकों में मिनांडर सबसे प्रसिद्ध था। भारतीय बौद्ध साहित्य में उसे मिलिंद कहा गया है।

उसकी राजधानी शाकल, वर्तमान सियालकोट क्षेत्र में थी।

बौद्ध ग्रंथ मिलिंदपन्हो में राजा मिलिंद और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद मिलता है।

20

हिंद-यूनानी सिक्के

चित्र और लेख वाले सिक्के

हिंद-यूनानी शासकों ने भारत में उच्च गुणवत्ता वाले सिक्के जारी किए।

इन सिक्कों पर शासकों के चित्र, नाम और उपाधियाँ अंकित होती थीं।

कई सिक्के द्विभाषी थे, जिन पर यूनानी और भारतीय भाषाओं-लिपियों का प्रयोग मिलता है।

भारत में बड़े पैमाने पर सोने के सिक्कों का प्रचलन मुख्यतः कुषाण काल में विकसित हुआ। इसलिए हिंद-यूनानियों को भारत में सोने के सिक्के जारी करने वाला पहला राजवंश कहना निश्चित तथ्य नहीं है।

21

यवनिका शब्द

पर्दे से संबंध

संस्कृत साहित्य में यवनिका शब्द का प्रयोग पर्दे या रंगमंच के परदे के अर्थ में मिलता है।

इस शब्द का संबंध यवन शब्द से जोड़ा जाता है।

भारतीय रंगमंच पर पर्दे की परंपरा को सीधे केवल यूनानियों की देन मानना निश्चित ऐतिहासिक तथ्य नहीं है, लेकिन “यवनिका” शब्द के कारण यह संबंध सामान्य ज्ञान पुस्तकों में उल्लेखित होता है।

विदेशी राजवंश

शक

मध्य एशिया से पश्चिमी भारत तक

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शकों का आगमन

मध्य एशियाई समुदाय

हिंद-यूनानियों के बाद शक उत्तर-पश्चिमी भारत में आए।

शक मूलतः मध्य एशिया के घुमंतू समुदायों से संबंधित थे।

मध्य एशिया में राजनीतिक दबाव और जनसमूहों के स्थानांतरण के कारण वे दक्षिण और पश्चिम की ओर बढ़े।

भारत में शकों की विभिन्न शाखाओं ने उत्तर-पश्चिम, मथुरा, पश्चिमी भारत और दक्कन से जुड़े क्षेत्रों में शासन किया।

23

मौएस

प्रारंभिक शक शासक

भारत में प्रारंभिक प्रसिद्ध शक शासकों में मौएस या मोग का नाम मिलता है।

उसका शासन उत्तर-पश्चिमी भारत से संबंधित था।

उसके बाद विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग शक शासक और क्षत्रप वंश विकसित हुए।

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विक्रम संवत

57–58 ईसा पूर्व

विक्रम संवत का प्रारंभ 57–58 ईसा पूर्व से माना जाता है।

बाद की भारतीय परंपरा ने इस संवत को राजा विक्रमादित्य और शकों पर विजय से जोड़ा।

लेकिन 58 ईसा पूर्व में उज्जैन के किसी निश्चित ऐतिहासिक राजा द्वारा शकों को पराजित कर उसी समय विक्रम संवत शुरू करने का समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

यह संवत प्रारंभ में मालव संवत के नाम से भी जाना गया और बाद में विक्रम संवत से जुड़ गया।

विक्रमादित्य आगे चलकर अनेक भारतीय शासकों द्वारा धारण की जाने वाली प्रतिष्ठित उपाधि बन गई।

25

क्षत्रप और महाक्षत्रप

शक प्रशासन

भारत में अनेक शक शासकों ने क्षत्रप और महाक्षत्रप की उपाधियाँ धारण कीं।

क्षत्रप शब्द मूलतः प्रांतीय शासक या गवर्नर से संबंधित ईरानी परंपरा का शब्द था।

26

रुद्रदामन प्रथम

पश्चिमी क्षत्रपों का महान शासक

रुद्रदामन प्रथम पश्चिमी क्षत्रपों का सबसे प्रसिद्ध शासक था।

उसका जूनागढ़ अभिलेख लगभग 150 ईस्वी का है।

यह भारतीय इतिहास के प्रारंभिक लंबे संस्कृत अभिलेखों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि रुद्रदामन ने गुजरात के गिरनार क्षेत्र की सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया।

सुदर्शन झील का मूल निर्माण मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त के समय उसके प्रांतीय अधिकारी पुष्यगुप्त ने कराया था।

अशोक के समय तुषास्फ नामक अधिकारी ने इससे संबंधित जल-व्यवस्था में कार्य कराया था।

विदेशी राजवंश

पहलव

भारत-पार्थियन शासक

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पहलव कौन थे?

पार्थियन मूल

शकों के बाद उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ क्षेत्रों में पहलव या भारत-पार्थियन शासकों का प्रभाव स्थापित हुआ।

पहलवों का मूल संबंध ईरानी-पार्थियन क्षेत्रों से था।

भारतीय साहित्य में इन्हें पहलव कहा गया।

28

गोंडोफर्नीस

प्रसिद्ध पहलव शासक

भारत-पार्थियन शासकों में गोंडोफर्नीस सबसे प्रसिद्ध था।

उसका शासन पहली शताब्दी ईस्वी में उत्तर-पश्चिम भारत और अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्रों तक फैला था।

ईसाई परंपरा में संत थॉमस की भारत यात्रा को भी गोंडोफर्नीस से जुड़े एक राजा के दरबार से जोड़ा गया है।

विदेशी राजवंश

कुषाण साम्राज्य

युएझी से कनिष्क तक

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कुषाणों का मूल

युएझी समुदाय

पहलवों के बाद उत्तर-पश्चिम भारत में कुषाण शक्ति का उदय हुआ।

कुषाण मूलतः युएझी नामक मध्य एशियाई समुदाय की एक शाखा थे।

प्राचीन स्रोतों में युएझी तथा तोखर जैसे नामों का संबंध मध्य एशियाई समूहों से मिलता है, लेकिन दोनों शब्द पूरी तरह समान अर्थ वाले नहीं थे।

30

कुषाण वंश की स्थापना

कुजुल कडफिसेस

कुषाण सत्ता के संस्थापक के रूप में कुजुल कडफिसेस का नाम प्रमुख है।

उसने विभिन्न युएझी समूहों को संगठित किया और अफगानिस्तान तथा उत्तर-पश्चिमी भारतीय क्षेत्रों में कुषाण सत्ता की नींव मजबूत की।

31

कनिष्क

कुषाणों का महान शासक

कनिष्क प्रथम कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली शासक था।

उसकी प्रमुख राजधानी पुरुषपुर, वर्तमान पेशावर थी।

मथुरा भी कुषाण साम्राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र था।

कनिष्क के साम्राज्य का विस्तार मध्य एशिया, अफगानिस्तान, उत्तर-पश्चिम भारत और गंगा-यमुना क्षेत्र के कुछ भागों तक था।

32

कनिष्क और शक संवत

78 ईस्वी का प्रश्न

शक संवत का प्रारंभ 78 ईस्वी से होता है।

पुरानी सामान्य ज्ञान परंपरा में इसका आरंभ कनिष्क से जोड़ा जाता रहा है।

आधुनिक इतिहास में कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि को लेकर मतभेद है और उसे सीधे 78 ईस्वी के शक संवत का संस्थापक मानना निश्चित नहीं है।

भारत सरकार द्वारा प्रयोग किया जाने वाला राष्ट्रीय पंचांग शक संवत पर आधारित है।

33

कनिष्क और चीन

पान चाओ और मध्य एशिया

कुषाणों और चीन की हान सत्ता के बीच मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों को लेकर संघर्ष हुए।

चीनी सेनापति पान चाओ ने मध्य एशिया में चीनी प्रभाव मजबूत किया।

चीनी स्रोतों में कुषाण शासक द्वारा भेजी गई सेना के पान चाओ की सेना से पराजित होने का उल्लेख मिलता है।

इस घटना को सीधे “पान चाओ ने स्वयं कनिष्क को युद्ध में हरा दिया” के रूप में लिखना ऐतिहासिक स्रोतों की तुलना में अधिक निश्चित कथन होगा।

34

कुषाणों के सोने के सिक्के

भारतीय मुद्राशास्त्र

कुषाण शासकों ने भारत में सोने के सिक्कों का बड़े पैमाने पर प्रचलन किया।

कुषाण स्वर्ण मुद्राएँ उच्च गुणवत्ता और कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं।

कनिष्क तथा अन्य कुषाण शासकों के सिक्कों पर यूनानी, ईरानी, भारतीय और बौद्ध देवताओं की आकृतियाँ मिलती हैं।

कुषाणों ने तांबे के सिक्के भी बहुत बड़ी मात्रा में जारी किए।

“सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्के” जैसी निरपेक्ष तुलना अलग-अलग राजवंशों की धातु-शुद्धता पर निर्भर करती है; कुषाण स्वर्ण मुद्राएँ भारतीय इतिहास की प्रारंभिक प्रमुख स्वर्ण मुद्रा-परंपराओं में थीं।

35

कनिष्क और बौद्ध धर्म

महायान का संरक्षण

कनिष्क बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण संरक्षक था।

उसके काल में महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा।

बौद्ध परंपरा में कनिष्क से संबंधित चतुर्थ बौद्ध संगीति कश्मीर क्षेत्र में आयोजित मानी जाती है।

इस संगीति से वसुमित्र का नाम प्रमुख रूप से जुड़ा है।

36

चरक और कनिष्क

चरक संहिता

चरक प्राचीन भारत के महान आयुर्वेदाचार्य थे।

उनका प्रसिद्ध ग्रंथ चरक संहिता आयुर्वेद का प्रमुख ग्रंथ है।

बाद की परंपरा चरक को कनिष्क का राजवैद्य बताती है, लेकिन इस संबंध का स्पष्ट समकालीन प्रमाण नहीं है।

चरक संहिता का वर्तमान रूप भी लंबे साहित्यिक विकास का परिणाम है।

37

नागार्जुन

माध्यमक दर्शन

नागार्जुन महायान बौद्ध दर्शन के महान दार्शनिक थे।

उनका संबंध माध्यमक दर्शन से है।

उनकी प्रमुख कृति मूलमध्यमककारिका है।

नागार्जुन ने शून्यता और प्रतीत्यसमुत्पाद की गहन दार्शनिक व्याख्या की।

उन्हें लोकप्रिय साहित्य में कभी-कभी “भारत का आइंस्टीन” कहा जाता है, लेकिन यह कोई ऐतिहासिक या शैक्षणिक उपाधि नहीं है।

नागार्जुन ने आधुनिक भौतिकी का सापेक्षता सिद्धांत प्रस्तुत नहीं किया था। सापेक्षता का आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांत अल्बर्ट आइंस्टीन से संबंधित है।

38

देवपुत्र उपाधि

कुषाण राजसत्ता

कुषाण शासकों ने देवपुत्र जैसी राजकीय उपाधि का प्रयोग किया।

इस उपाधि पर मध्य एशियाई और चीनी राजकीय विचारों का प्रभाव माना जाता है।

चीनी सम्राट की स्वर्गपुत्र संबंधी अवधारणा से इसकी तुलना की जाती है।

39

रेशम मार्ग और कुषाण

अंतरराष्ट्रीय व्यापार

रेशम मार्ग कनिष्क द्वारा शुरू नहीं कराया गया था। यह व्यापारिक मार्गों का एक पुराना जाल था, जो चीन, मध्य एशिया, ईरान और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों को जोड़ता था।

कुषाण साम्राज्य की भौगोलिक स्थिति रेशम मार्ग के महत्वपूर्ण हिस्सों पर थी।

कनिष्क और अन्य कुषाण शासकों के समय इस मार्ग पर व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क बहुत बढ़ा।

भारत, चीन, मध्य एशिया और रोमन जगत के बीच वस्तुओं, विचारों और धर्मों के आदान-प्रदान में कुषाणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

40

कुषाण वंश के उत्तराधिकारी

वासुदेव प्रथम

कनिष्क के बाद हुविष्क और वासुदेव प्रथम जैसे महत्वपूर्ण कुषाण शासक हुए।

वासुदेव प्रथम को अक्सर महान कुषाण साम्राज्य का अंतिम प्रमुख शासक माना जाता है।

उसके बाद भी छोटे कुषाण शासक रहे, इसलिए उसे पूरे कुषाण वंश का बिल्कुल अंतिम शासक कहना सही नहीं है।

वासुदेव के बाद कुषाण साम्राज्य धीरे-धीरे छोटे क्षेत्रों में विभाजित होने लगा।

41

राजवंशों का क्रम

एक साथ याद करें

राजवंश प्रमुख शासक मुख्य तथ्य
शुंग पुष्यमित्र शुंग मौर्य सत्ता का अंत; अश्वमेध यज्ञ
कण्व वासुदेव कण्व देवभूति के बाद सत्ता
सातवाहन सिमुक, गौतमीपुत्र शातकर्णि दक्कन की प्रमुख शक्ति
चेदी / महामेघवाहन खारवेल हाथीगुम्फा अभिलेख
हिंद-यूनानी डेमेट्रियस, मिनांडर उत्तर-पश्चिम भारत
शक मौएस, रुद्रदामन क्षत्रप शासन
पहलव गोंडोफर्नीस भारत-पार्थियन सत्ता
कुषाण कुजुल कडफिसेस, कनिष्क मध्य एशिया से गंगा क्षेत्र तक विस्तार

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

पुष्यमित्र शुंग — लगभग 185 ईसा पूर्व — शुंग वंश की स्थापना।

शुंगों का प्रमुख केंद्र — पाटलिपुत्र; विदिशा भी महत्वपूर्ण।

पुष्यमित्र शुंग — दो अश्वमेध यज्ञ।

भरहुत स्तूप — शुंग काल में व्यापक विस्तार और सजावट।

शुंग वंश का अंतिम शासक — देवभूति।

कण्व वंश का संस्थापक — वासुदेव कण्व।

कण्व वंश का अंतिम शासक — सुशर्मन।

सातवाहन वंश का संस्थापक — सिमुक।

सातवाहनों की राजधानी — प्रतिष्ठान / पैठण — गोदावरी नदी।

सातवाहनों की भाषा — प्राकृत; लिपि — ब्राह्मी।

सातवाहनों में मातृनाम प्रचलित थे; समाज को मातृसत्तात्मक नहीं माना जाता।

गौतमीपुत्र शातकर्णि — प्रमुख सातवाहन शासक।

गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख — गौतमीपुत्र की उपलब्धियाँ।

कलिंग का चेदी / महामेघवाहन वंश — प्रमुख शासक खारवेल।

खारवेल — हाथीगुम्फा अभिलेख।

उदयगिरि-खंडगिरि की गुफाएँ — जैन साधुओं से संबंधित।

विदेशी शक्तियों का सामान्य क्रम — हिंद-यूनानी → शक → पहलव → कुषाण।

डेमेट्रियस — भारत की ओर विस्तार करने वाला प्रारंभिक हिंद-यूनानी शासक।

मिनांडर = मिलिंद — मिलिंदपन्हो — नागसेन।

हिंद-यूनानी सिक्के — शासक के चित्र और द्विभाषी लेख।

शक मूलतः मध्य एशिया से आए।

प्रारंभिक शक शासक — मौएस / मोग।

विक्रम संवत — 57–58 ईसा पूर्व; बाद की परंपरा में विक्रमादित्य से संबंधित।

शक शासकों की उपाधि — क्षत्रप / महाक्षत्रप।

रुद्रदामन प्रथम — जूनागढ़ अभिलेख — सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार।

पहलव = भारत-पार्थियन — मूल क्षेत्र ईरानी-पार्थियन संसार।

प्रमुख पहलव शासक — गोंडोफर्नीस।

कुषाण — युएझी की एक शाखा।

कुषाण सत्ता का संस्थापक — कुजुल कडफिसेस।

सबसे प्रसिद्ध कुषाण शासक — कनिष्क।

कनिष्क की प्रमुख राजधानी — पुरुषपुर / पेशावर; मथुरा भी महत्वपूर्ण केंद्र।

शक संवत — 78 ईस्वी; कनिष्क को इसका निश्चित संस्थापक मानना विवादित।

कुषाण काल — बड़े पैमाने पर स्वर्ण मुद्राओं के लिए प्रसिद्ध।

चरक — चरक संहिता; कनिष्क का राजवैद्य होने की परंपरा बाद की है।

नागार्जुन — माध्यमक दर्शन — मूलमध्यमककारिका।

नागार्जुन का सिद्धांत — शून्यता; आधुनिक सापेक्षता सिद्धांत नहीं।

कुषाण उपाधि — देवपुत्र।

रेशम मार्ग कनिष्क ने शुरू नहीं किया; कुषाणों ने उसके व्यापार को बहुत बढ़ाया।

वासुदेव प्रथम — महान कुषाण साम्राज्य के अंतिम प्रमुख शासकों में।

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