शाहजहाँ (1628–1658 ई.)
मुगल स्थापत्य का स्वर्ण युग — ताजमहल, शाहजहाँनाबाद, मयूर सिंहासन और उत्तराधिकार युद्ध
शाहजहाँ का परिचय
शाहजहाँ मुगल साम्राज्य का पाँचवाँ सम्राट था। उसका मूल नाम खुर्रम था। जहाँगीर की मृत्यु 1627 ई. में हुई और उत्तराधिकार संघर्ष के बाद खुर्रम ने 1628 ई. में शाहजहाँ की उपाधि के साथ औपचारिक रूप से सिंहासन ग्रहण किया। उसका शासन विशेष रूप से भव्य स्थापत्य, ताजमहल, लाल किला, शाहजहाँनाबाद, जामा मस्जिद और मयूर सिंहासन के लिए प्रसिद्ध है।
जन्म और परिवार
Birth & Family
शाहजहाँ का जन्म 5 जनवरी 1592 ई. को लाहौर में हुआ। उसका बचपन का नाम खुर्रम था। वह जहाँगीर का पुत्र था।
उसकी माता जगत गोसाईं थीं, जो मारवाड़ के शासक मोटा राजा उदयसिंह की पुत्री थीं। जगत गोसाईं को विभिन्न स्रोतों में जोधाबाई या अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है, लेकिन जगत गोसाईं/मानमती नाम अधिक प्रचलित हैं।
राज्यारोहण
Accession — 1628 CE
जहाँगीर की मृत्यु 1627 ई. में हुई। इसके बाद उत्तराधिकार की राजनीति में आसफ खाँ ने खुर्रम का समर्थन किया। खुर्रम ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को हटाकर मुगल सत्ता पर अधिकार स्थापित किया।
उसका औपचारिक राज्याभिषेक फरवरी 1628 ई. में आगरा में हुआ और उसने शाहजहाँ की शाही उपाधि धारण की। इसलिए उसका शासनकाल सामान्यतः 1628–1658 ई. माना जाता है।
मुमताज महल
Arjumand Banu Begum
शाहजहाँ का विवाह अर्जुमंद बानो बेगम से हुआ, जो नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ की पुत्री थीं। विवाह के बाद वह मुमताज महल के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
मुमताज महल शाहजहाँ की अत्यंत प्रिय पत्नी थीं। 17 जून 1631 ई. को दक्कन अभियान के दौरान बुरहानपुर में अपने चौदहवें बच्चे को जन्म देते समय उनकी मृत्यु हो गई।
उनके पार्थिव शरीर को प्रारंभ में बुरहानपुर में अस्थायी रूप से दफनाया गया और बाद में आगरा लाकर यमुना तट पर अंतिम समाधि दी गई। इसी स्थान पर शाहजहाँ ने उनकी स्मृति में ताजमहल बनवाया।
ताजमहल
Taj Mahal — Agra
शाहजहाँ ने मुमताज महल की स्मृति में आगरा में यमुना नदी के किनारे ताजमहल का निर्माण कराया। इसका निर्माण लगभग 1632 ई. में शुरू हुआ और मुख्य मकबरा 1640 के दशक में काफी हद तक पूरा हो गया; पूरे परिसर के निर्माण में लगभग दो दशक लगे।
ताजमहल मुख्यतः सफेद संगमरमर से निर्मित है और मुगल स्थापत्य, फारसी उद्यान योजना, भारतीय शिल्प तथा इस्लामी स्थापत्य तत्वों का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करता है।
ताजमहल के निर्माण में बड़ी संख्या में वास्तुकार, सुलेखक, पत्थर तराशने वाले और अन्य कारीगर जुड़े थे। उस्ताद अहमद लाहौरी को इसकी वास्तु-योजना से जुड़े प्रमुख वास्तुकारों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
उस्ताद ईसा को ताजमहल की रूपरेखा का निर्माता बताने वाली कथा लोकप्रिय रही है, लेकिन इसके समर्थन में विश्वसनीय समकालीन प्रमाण नहीं मिलते।
🎯 Exam Point
ताजमहल — शाहजहाँ — मुमताज महल की स्मृति — आगरा — प्रमुख वास्तुकार: उस्ताद अहमद लाहौरी।
स्थापत्य कला का स्वर्ण युग
Golden Age of Mughal Architecture
शाहजहाँ के शासनकाल को सामान्यतः मुगल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहा जाता है। उसके काल में लाल बलुआ पत्थर के साथ सफेद संगमरमर, पच्चीकारी, सममिति, विशाल गुंबद, सुंदर मेहराब और बारीक सजावट का व्यापक प्रयोग हुआ।
ताजमहल, दिल्ली का लाल किला, जामा मस्जिद और शाहजहाँनाबाद इस स्थापत्य उत्कर्ष के प्रमुख प्रतीक हैं।
शाहजहाँनाबाद और दिल्ली का लाल किला
New Imperial Capital
शाहजहाँ ने दिल्ली में एक नई शाही राजधानी शाहजहाँनाबाद की स्थापना की। इसका निर्माण 1639 ई. के आसपास आरंभ हुआ। यही नगर आगे चलकर पुरानी दिल्ली के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
शाहजहाँनाबाद में यमुना के किनारे विशाल लाल किला बनवाया गया। इसका निर्माण 1638–39 के आसपास शुरू हुआ और 1648 ई. तक मुख्य कार्य पूरा हुआ। शाहजहाँ ने आगरा से अपनी राजधानी दिल्ली स्थानांतरित की।
दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास
Red Fort
दिल्ली के लाल किले में दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास शाहजहाँकालीन स्थापत्य के महत्वपूर्ण भाग हैं। दीवान-ए-आम में सम्राट सार्वजनिक दरबार लगाता था, जबकि दीवान-ए-खास विशेष दरबारियों और विदेशी प्रतिनिधियों से मिलने का स्थान था।
दीवान-ए-खास से प्रसिद्ध फारसी पंक्ति जुड़ी है—धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है। यह शाहजहाँ के शाही वैभव का प्रतीक था।
मयूर सिंहासन
Takht-i-Taus
शाहजहाँ ने प्रसिद्ध मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताऊस) बनवाया। इसे सोने और बहुमूल्य रत्नों से सजाया गया था और यह मुगल साम्राज्य की संपन्नता तथा शाही वैभव का प्रतीक था।
मयूर सिंहासन से कोहिनूर सहित बहुमूल्य रत्नों की परंपरागत कथाएँ जुड़ी हैं। 1739 ई. में फारसी शासक नादिर शाह दिल्ली पर आक्रमण के बाद मयूर सिंहासन सहित विशाल धन-संपत्ति फारस ले गया।
🎯 High Yield
मयूर सिंहासन — शाहजहाँ | 1739 में नादिर शाह इसे फारस ले गया।
जामा मस्जिद — दिल्ली
Masjid-i-Jahan-Numa
शाहजहाँ ने शाहजहाँनाबाद में विशाल जामा मस्जिद का निर्माण कराया। इसे मस्जिद-ए-जहाँनुमा भी कहा जाता है। इसका निर्माण 1650 के दशक में पूरा हुआ।
लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से निर्मित यह मस्जिद शाहजहाँकालीन धार्मिक स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है और भारत की प्रसिद्ध ऐतिहासिक मस्जिदों में गिनी जाती है।
आगरा की मोती मस्जिद
Moti Masjid
आगरा किले के भीतर स्थित मोती मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ के शासनकाल में हुआ। सफेद संगमरमर से बनी इस मस्जिद की सादगी और सुंदरता के कारण इसे “मोती मस्जिद” कहा गया।
यह शाहजहाँ की संगमरमर-प्रधान स्थापत्य शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
आगरा की जामा मस्जिद और जहाँआरा
Jahanara Begum
आगरा की प्रसिद्ध जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा बेगम के संरक्षण में कराया गया। इसका निर्माण 1640 के दशक में हुआ।
जहाँआरा शाहजहाँ की प्रभावशाली पुत्री थीं और मुमताज महल की मृत्यु के बाद उन्हें पादशाह बेगम का उच्च दर्जा मिला। वे सूफी विचारधारा, साहित्य, स्थापत्य और शहरी विकास में भी रुचि रखती थीं।
लाहौर किले का शीश महल
Sheesh Mahal
लाहौर किले में स्थित प्रसिद्ध शीश महल का निर्माण शाहजहाँ के शासनकाल में हुआ। इसकी दीवारों और छतों में दर्पण, काँच और सजावटी काम का सुंदर प्रयोग किया गया है।
लाहौर किले में शाहजहाँ के काल में अन्य शाही निर्माण और सजावटी कार्य भी किए गए, जिससे यह मुगल स्थापत्य का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
प्रमुख निर्माण
Major Architectural Works
| निर्माण | स्थान/विशेषता |
|---|---|
| ताजमहल | आगरा — मुमताज महल की स्मृति |
| लाल किला | दिल्ली — शाहजहाँनाबाद का शाही दुर्ग |
| दीवान-ए-आम | लाल किला — सार्वजनिक दरबार |
| दीवान-ए-खास | लाल किला — विशेष शाही दरबार |
| जामा मस्जिद | दिल्ली — मस्जिद-ए-जहाँनुमा |
| मोती मस्जिद | आगरा किला — सफेद संगमरमर |
| शीश महल | लाहौर किला |
| जामा मस्जिद, आगरा | जहाँआरा बेगम के संरक्षण में |
शाहजहाँकालीन चित्रकला
Painting
शाहजहाँ के समय मुगल चित्रकला में दरबारी वैभव, शाही समारोह, व्यक्तिचित्र और अत्यंत सजावटी शैली प्रमुख हुई। जहाँगीर के काल की प्राकृतिक चित्रकला की तुलना में शाहजहाँकालीन चित्रों में शाही औपचारिकता अधिक दिखाई देती है।
उसके दरबार से जुड़े चित्रकारों में मीर हाशिम और मुहम्मद फकीर जैसे कलाकारों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त बिचित्र, चित्रमन और अन्य कलाकार भी मुगल चित्रकला परंपरा में सक्रिय थे।
दक्कन नीति
Deccan Policy
शाहजहाँ के शासनकाल में दक्कन की राजनीति महत्वपूर्ण रही। अहमदनगर की निजामशाही शक्ति को अंततः समाप्त कर दिया गया और 1636 ई. में बीजापुर और गोलकुंडा के साथ समझौते किए गए।
इन समझौतों के बाद कुछ समय के लिए दक्कन में मुगल प्रभाव मजबूत हुआ। आगे चलकर औरंगजेब को भी दक्कन में मुगल सूबेदार के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ मिलीं।
कंधार और मध्य एशिया अभियान
Central Asian Policy
शाहजहाँ मध्य एशिया में अपने तैमूरी पूर्वजों के क्षेत्रों पर प्रभाव स्थापित करना चाहता था। मुगल सेनाओं ने बल्ख और बदख्शाँ की ओर अभियान किए, लेकिन इन अभियानों से स्थायी सफलता नहीं मिली और भारी खर्च हुआ।
कंधार मुगलों और सफवी फारस के बीच महत्वपूर्ण सामरिक केंद्र था। 1638 में यह मुगलों के अधिकार में आया, लेकिन 1649 ई. में फारस के शाह अब्बास द्वितीय ने इसे पुनः जीत लिया। शाहजहाँ ने कंधार वापस लेने के लिए कई अभियान भेजे, पर सफलता नहीं मिली।
उत्तराधिकार का संघर्ष
War of Succession — 1657–1658
1657 ई. में शाहजहाँ गंभीर रूप से बीमार पड़ा। उसके चार प्रमुख पुत्र—दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श—सिंहासन के लिए संघर्ष में उतर गए।
शाहजहाँ का सबसे प्रिय और घोषित रूप से प्रभावशाली पुत्र दारा शिकोह था। वह पिता के निकट रहकर केंद्रीय प्रशासन में प्रभाव रखता था। दूसरी ओर औरंगजेब ने मुराद बख्श के साथ अस्थायी गठबंधन बनाकर दारा के विरुद्ध अभियान चलाया।
धरमत और सामूगढ़ के युद्ध
1658 CE
धरमत का युद्ध अप्रैल 1658 ई. में औरंगजेब-मुराद की संयुक्त सेना और दारा की ओर से भेजी गई मुगल सेना के बीच हुआ। दारा की ओर से सेना का नेतृत्व मुख्यतः महाराजा जसवंत सिंह ने किया और औरंगजेब विजयी हुआ।
इसके बाद 29 मई 1658 ई. को आगरा के निकट सामूगढ़ का युद्ध दारा शिकोह और औरंगजेब-मुराद की सेना के बीच हुआ। दारा की पराजय ने औरंगजेब के लिए दिल्ली-आगरा और मुगल सिंहासन का मार्ग खोल दिया।
🎯 Exam Point
1658 — धरमत → सामूगढ़ → दारा की पराजय → औरंगजेब की सत्ता मजबूत।
शाहजहाँ की नजरबंदी
Agra Fort — 1658
सामूगढ़ की विजय के बाद औरंगजेब ने आगरा की ओर बढ़कर सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया। जून 1658 ई. में शाहजहाँ को आगरा किले में नजरबंद कर दिया गया। सामान्य GK में 8 जून 1658 की तिथि दी जाती है।
शाहजहाँ ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष आगरा किले में बिताए। उसकी पुत्री जहाँआरा बेगम ने इस अवधि में उसकी सेवा और देखभाल की।
शाहजहाँ की मृत्यु
22 January 1666
आगरा किले में लगभग साढ़े सात वर्ष की नजरबंदी के बाद शाहजहाँ की मृत्यु 22 जनवरी 1666 ई. को हुई। उस समय उसकी आयु लगभग 74 वर्ष थी।
उसके पार्थिव शरीर को ताजमहल में ले जाकर मुमताज महल की कब्र के पास दफनाया गया। आज ताजमहल के मुख्य मकबरे में शाहजहाँ और मुमताज महल दोनों की प्रतीकात्मक समाधियाँ दिखाई देती हैं, जबकि वास्तविक कब्रें निचले कक्ष में स्थित हैं।
प्रमुख तथ्य — एक नज़र में
Facts at a Glance
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1592 | लाहौर में खुर्रम का जन्म |
| 1628 | शाहजहाँ का औपचारिक राज्याभिषेक |
| 1631 | मुमताज महल की मृत्यु |
| 1632 | ताजमहल निर्माण का प्रारंभिक चरण |
| 1636 | दक्कन समझौते |
| 1639 | शाहजहाँनाबाद के निर्माण का आरंभिक चरण |
| 1649 | कंधार फारस के हाथ गया |
| 1657 | उत्तराधिकार संघर्ष शुरू |
| 1658 | धरमत और सामूगढ़; शाहजहाँ नजरबंद |
| 1666 | शाहजहाँ की मृत्यु |
Quick Revision
SSC / Railway Rapid Recall
⚡ त्वरित रिविजन
⚡ Final Revision Points
खुर्रम (शाहजहाँ) का जन्म 5 जनवरी 1592 को लाहौर में हुआ। उसकी माता जगत गोसाईं थीं, जो मारवाड़ के मोटा राजा उदयसिंह की पुत्री थीं।
जहाँगीर की मृत्यु 1627 में हुई और शाहजहाँ का औपचारिक राज्याभिषेक 1628 में हुआ।
शाहजहाँ ने आसफ खाँ की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम (मुमताज महल) से विवाह किया। मुमताज की मृत्यु 17 जून 1631 को बुरहानपुर में हुई।
मुमताज की स्मृति में आगरा में ताजमहल बनवाया गया। इसकी वास्तु-योजना से जुड़ा सबसे प्रमुख नाम उस्ताद अहमद लाहौरी है।
शाहजहाँ के शासनकाल को मुगल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।
उससे जुड़े प्रमुख निर्माणों में ताजमहल, दिल्ली का लाल किला, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, दिल्ली की जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद और लाहौर किले का शीश महल शामिल हैं।
आगरा की जामा मस्जिद शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा बेगम के संरक्षण में बनी।
शाहजहाँ ने दिल्ली में शाहजहाँनाबाद बसाया और वहाँ लाल किला बनवाया। बाद में उसने आगरा से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित की।
मयूर सिंहासन/तख्त-ए-ताऊस शाहजहाँ ने बनवाया। 1739 में नादिर शाह इसे फारस ले गया।
शाहजहाँकालीन चित्रकारों में मीर हाशिम और मुहम्मद फकीर का उल्लेख मिलता है।
1649 में कंधार फारस के हाथ चला गया और उसे वापस लेने के शाहजहाँ के प्रयास सफल नहीं हुए।
1657 में बीमारी के बाद उसके पुत्र दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श उत्तराधिकार संघर्ष में उतर गए।
1658 के धरमत और सामूगढ़ युद्धों में औरंगजेब की विजय हुई। सामूगढ़ की पराजय के बाद दारा की स्थिति कमजोर हो गई।
जून 1658 में औरंगजेब ने शाहजहाँ को आगरा किले में नजरबंद कर दिया। जहाँआरा बेगम उसके साथ रहीं।
शाहजहाँ की मृत्यु 22 जनवरी 1666 को लगभग 74 वर्ष की आयु में हुई और उसे ताजमहल में मुमताज महल के पास दफनाया गया।