राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रथम चरण
(1885–1905)
प्रारंभिक राष्ट्रवादी आंदोलन
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में 1885 से 1905 ई. के काल को सामान्यतः प्रारंभिक राष्ट्रवादी अथवा उदारवादी चरण कहा जाता है। इस काल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख मंच बनी।
इस चरण के नेताओं का विश्वास संवैधानिक और शांतिपूर्ण राजनीतिक साधनों में था। वे प्रार्थना-पत्र, प्रस्ताव, सार्वजनिक सभाएँ, प्रतिनिधिमंडल और ब्रिटिश संसद के समक्ष भारतीय समस्याओं को प्रस्तुत करके प्रशासनिक सुधार प्राप्त करना चाहते थे।
दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले, एम. जी. रानाडे, डब्ल्यू. सी. बनर्जी और रोमेशचंद्र दत्त जैसे नेताओं ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की आलोचना करते हुए भारतीय राष्ट्रवाद को संगठित आधार प्रदान किया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में हुई। इसकी स्थापना की प्रक्रिया में सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम ने प्रमुख संगठनात्मक भूमिका निभाई।
ह्यूम ने भारतीय राजनीतिक नेताओं को एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच पर संगठित करने का प्रयास किया। प्रारंभिक योजना में संगठन के लिए इंडियन नेशनल यूनियन नाम का प्रयोग मिलता है, लेकिन इसे 1884 में विधिवत स्थापित होकर बाद में केवल नाम बदलकर कांग्रेस बना संगठन मानना सही नहीं है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन में दादाभाई नौरोजी, डब्ल्यू. सी. बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, न्यायमूर्ति रानाडे, दिनशॉ वाचा तथा विभिन्न प्रांतों के अन्य राजनीतिक नेताओं का भी महत्वपूर्ण योगदान था।
परीक्षा के लिए
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस — स्थापना 1885 ई. — प्रमुख संगठनकर्ता ए. ओ. ह्यूम।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 से 30 दिसंबर 1885 ई. तक बंबई में आयोजित हुआ।
यह अधिवेशन बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में आयोजित किया गया और इसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आए 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इस अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी ने की। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष बने।
प्रथम अधिवेशन ने विभिन्न प्रांतों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पहली बार नियमित अखिल भारतीय राजनीतिक मंच पर एकत्र करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।
याद रखें
28 दिसंबर 1885 — बंबई — गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज — 72 प्रतिनिधि — अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी।
कांग्रेस की स्थापना के समय प्रमुख पदाधिकारी
1885 ई. में कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के समय भारत के वायसराय लॉर्ड डफरिन थे।
उस समय ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया थीं।
दिसंबर 1885 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी थे। इसलिए कांग्रेस स्थापना के समय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री विलियम ग्लैडस्टोन लिखना सही नहीं है।
1886 में ग्लैडस्टोन कुछ महीनों के लिए फिर प्रधानमंत्री बने, लेकिन दिसंबर 1886 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के समय भी प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी ही थे।
भ्रम से बचें
1885 में कांग्रेस स्थापना → वायसराय लॉर्ड डफरिन → ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी।
भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन और कांग्रेस
कांग्रेस की स्थापना से पहले बंगाल में सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंदमोहन बोस जैसे नेताओं ने अखिल भारतीय राजनीतिक एकता स्थापित करने की दिशा में प्रयास किए थे।
उनसे संबंधित इंडियन नेशनल कॉन्फ्रेंस कांग्रेस के गठन से पहले विकसित महत्वपूर्ण राजनीतिक मंचों में से एक था।
1886 में कलकत्ता में कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन आयोजित होने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस की राजनीतिक धारा कांग्रेस के साथ मिल गई और कांग्रेस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि संस्था के रूप में स्थिति अधिक मजबूत हुई।
कांग्रेस का द्वितीय अधिवेशन
कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन 1886 ई. में कलकत्ता में आयोजित हुआ और इसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की।
पहले अधिवेशन में 72 प्रतिनिधि थे, जबकि दूसरे अधिवेशन में प्रतिनिधियों की संख्या कई गुना बढ़ गई। इससे संगठन की अखिल भारतीय स्वीकृति तेजी से बढ़ती दिखाई दी।
इसी अधिवेशन में देश के विभिन्न हिस्सों में कांग्रेस समितियों के संगठन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
प्रारंभिक राष्ट्रवादियों की प्रमुख विचारधारा
1885 से 1905 के प्रारंभिक कांग्रेस नेताओं को सामान्यतः उदारवादी नेता कहा जाता है।
इन नेताओं का विश्वास था कि ब्रिटिश शासन में मौजूद उदारवादी और लोकतांत्रिक विचारों का उपयोग करके भारत के लिए धीरे-धीरे राजनीतिक अधिकार प्राप्त किए जा सकते हैं।
उन्होंने संवैधानिक सुधार, विधान परिषदों का विस्तार, प्रशासन में भारतीयों की अधिक भागीदारी, नागरिक स्वतंत्रता और आर्थिक सुधारों की माँग की।
उनकी राजनीतिक पद्धति को सामान्यतः प्रार्थना, निवेदन और विरोध की संवैधानिक पद्धति के रूप में वर्णित किया जाता है।
उदारवादी नेताओं की प्रमुख माँगें
उदारवादी नेताओं ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के विस्तार तथा उनमें अधिक भारतीय प्रतिनिधित्व की माँग की।
उन्होंने भारतीय सिविल सेवा में भारतीयों को अधिक अवसर देने और इसकी प्रतियोगी परीक्षा भारत तथा इंग्लैंड में एक साथ आयोजित करने की माँग की।
उन्होंने प्रशासन और न्यायपालिका के कार्यों को अलग करने, प्रेस की स्वतंत्रता बढ़ाने और दमनकारी कानूनों में सुधार की माँग की।
भारतीय जनता पर पड़ने वाले अत्यधिक सैनिक व्यय और करों के बोझ को कम करने की माँग भी प्रारंभिक कांग्रेस की प्रमुख माँगों में थी।
तकनीकी और आधुनिक शिक्षा का विस्तार तथा भारतीय उद्योगों को संरक्षण देना भी उनके कार्यक्रम का हिस्सा था।
दादाभाई नौरोजी
दादाभाई नौरोजी प्रारंभिक भारतीय राष्ट्रवाद के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में थे। उन्हें प्रसिद्ध रूप से “भारत का वृद्ध पुरुष” कहा जाता है।
उन्होंने ब्रिटिश शासन के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण करते हुए धन-निष्कासन सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसके अनुसार भारत में उत्पन्न आय का एक बड़ा भाग विभिन्न माध्यमों से ब्रिटेन चला जाता था और इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तक पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया में भारत की गरीबी और ब्रिटिश आर्थिक शोषण का विस्तृत विश्लेषण किया गया।
1892 में दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए निर्वाचित होने वाले प्रथम भारतीय बने।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष तीन बार बने—1886, 1893 और 1906 में।
परीक्षा के लिए
दादाभाई नौरोजी → भारत का वृद्ध पुरुष → धन-निष्कासन सिद्धांत → ब्रिटिश संसद के लिए निर्वाचित प्रथम भारतीय।
प्रारंभिक राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रमुख नेता
| नेता | प्रमुख योगदान |
|---|---|
| दादाभाई नौरोजी | धन-निष्कासन सिद्धांत और आर्थिक राष्ट्रवाद |
| सुरेंद्रनाथ बनर्जी | राजनीतिक संगठन, सार्वजनिक सभाएँ और राष्ट्रीय चेतना |
| फिरोजशाह मेहता | संवैधानिक सुधार और प्रारंभिक कांग्रेस नेतृत्व |
| गोपालकृष्ण गोखले | संवैधानिक राजनीति और प्रशासनिक सुधार |
| महादेव गोविंद रानाडे | सामाजिक-आर्थिक सुधार और आधुनिक राष्ट्रवादी चिंतन |
| रोमेशचंद्र दत्त | ब्रिटिश आर्थिक और भू-राजस्व नीतियों की आलोचना |
| डब्ल्यू. सी. बनर्जी | कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष |
कांग्रेस से जुड़े प्रमुख प्रथम
| विशेष तथ्य | व्यक्ति / अधिवेशन |
|---|---|
| कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष | डब्ल्यू. सी. बनर्जी — बंबई, 1885 |
| कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष | बदरुद्दीन तैयबजी — मद्रास, 1887 |
| कांग्रेस के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष | जॉर्ज यूल — इलाहाबाद, 1888 |
| कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित करने वाली प्रारंभिक महिला | कादंबिनी गांगुली — कलकत्ता, 1890 |
| कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष | एनी बेसेंट — कलकत्ता, 1917 |
| स्वतंत्रता के समय कांग्रेस अध्यक्ष | जे. बी. कृपलानी |
महत्वपूर्ण
1887 — बदरुद्दीन तैयबजी प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष।
1888 — जॉर्ज यूल प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष।
1917 — एनी बेसेंट प्रथम महिला अध्यक्ष।
अबुल कलाम आजाद और लंबा अध्यक्षीय कार्यकाल
मौलाना अबुल कलाम आजाद 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष बने।
द्वितीय विश्व युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लंबे समय तक नियमित कांग्रेस अधिवेशन आयोजित नहीं हो सके। इस कारण आजाद 1940 से 1946 तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहे।
इसी आधार पर उन्हें कांग्रेस के सबसे लंबे लगातार अध्यक्षीय कार्यकाल वाले प्रमुख नेताओं में गिना जाता है। इसलिए इसे केवल 1940–45 लिखना अधूरा है।
ए. ओ. ह्यूम और “कांग्रेस के जनक”
ए. ओ. ह्यूम की कांग्रेस की स्थापना और शुरुआती संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका के कारण उन्हें सामान्यतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जनक कहा जाता है।
1912 में उनकी मृत्यु के बाद कांग्रेस के बांकीपुर अधिवेशन में उनके योगदान को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें कांग्रेस का “जनक और संस्थापक” कहा गया।
इसलिए परीक्षा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जनक — ए. ओ. ह्यूम महत्वपूर्ण तथ्य है।
प्रारंभिक कांग्रेस की आलोचना
प्रारंभिक कांग्रेस की उदारवादी और सीमित संवैधानिक कार्यप्रणाली की आलोचना ब्रिटिश अधिकारियों के साथ बाद के उग्र राष्ट्रवादी नेताओं ने भी की।
लॉर्ड कर्जन से यह कथन जुड़ा है कि कांग्रेस गिरने की ओर बढ़ रही है और भारत में रहते हुए उसकी शांतिपूर्ण समाप्ति में सहायता करना उनकी महत्वाकांक्षाओं में से एक था।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय से कांग्रेस के नेताओं को पद और प्रतिष्ठा की आकांक्षा रखने वाले लोगों के रूप में आलोचना करने वाला कथन प्रतियोगी परीक्षा सामग्री में जोड़ा जाता है।
बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस की वर्ष में केवल एक बार बैठक करके सीमित राजनीतिक गतिविधि करने की नीति की आलोचना करते हुए उसे वर्ष में एक बार मेंढक की तरह टर्राने से तुलना की।
अश्विनी कुमार दत्त से कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों को “तीन दिन का तमाशा” कहने वाला कथन जोड़ा जाता है।
बिपिनचंद्र पाल जैसे उग्र राष्ट्रवादी नेताओं ने कांग्रेस की याचिका-प्रधान राजनीति की आलोचना की और अधिकारों के लिए अधिक सक्रिय संघर्ष की आवश्यकता पर बल दिया।
इन प्रसिद्ध कथनों का शब्दांकन अलग-अलग पुस्तकों में थोड़ा भिन्न मिलता है, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में इनके साथ जुड़े व्यक्ति महत्वपूर्ण हैं।
लाला लाजपत राय और सेफ्टी वाल्व सिद्धांत
कांग्रेस की उत्पत्ति को लेकर एक प्रसिद्ध व्याख्या सेफ्टी वाल्व सिद्धांत के नाम से जानी जाती है।
लाला लाजपत राय ने अपनी रचना यंग इंडिया में इस सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कांग्रेस को लॉर्ड डफरिन की राजनीतिक योजना से जोड़कर देखा और इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध बढ़ते असंतोष को नियंत्रित करने का साधन बताया।
आधुनिक इतिहासकार इस सिद्धांत को कांग्रेस की स्थापना की पूर्ण और प्रमाणित व्याख्या नहीं मानते। कांग्रेस का विकास भारतीय राजनीतिक जागरण, विभिन्न प्रांतीय संगठनों और भारतीय नेताओं की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता से भी गहराई से जुड़ा था।
प्रारंभिक कांग्रेस की उपलब्धियाँ
प्रारंभिक कांग्रेस की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत के विभिन्न प्रांतों के शिक्षित राजनीतिक नेताओं को एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच पर लाना था।
इसने जाति, धर्म, भाषा और प्रांत से ऊपर उठकर भारतीयों में एक साझा राजनीतिक पहचान और राष्ट्रीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उदारवादी नेताओं ने ब्रिटिश शासन के आर्थिक शोषण को व्यवस्थित रूप से उजागर किया और भारत की गरीबी को औपनिवेशिक नीतियों से जोड़कर समझाया।
कांग्रेस ने प्रशासनिक जवाबदेही, प्रतिनिधित्व, बजट, सैनिक व्यय, भारतीय सिविल सेवा और नागरिक स्वतंत्रता जैसे विषयों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाया।
इस चरण ने आगे स्वदेशी आंदोलन, उग्र राष्ट्रवाद और जन-आधारित राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के लिए राजनीतिक आधार तैयार किया।
प्रारंभिक राष्ट्रवादी आंदोलन की सीमाएँ
प्रारंभिक कांग्रेस का सामाजिक आधार मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग और शहरी राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित था।
किसान, मजदूर और ग्रामीण जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी इस चरण में अपेक्षाकृत कम थी।
उदारवादी नेताओं को ब्रिटिश न्याय और उदारवाद से सुधार मिलने की अपेक्षा थी, लेकिन समय के साथ नई पीढ़ी के राष्ट्रवादियों को यह नीति बहुत धीमी और सीमित लगने लगी।
इसी असंतोष से आगे बाल गंगाधर तिलक, बिपिनचंद्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे उग्र राष्ट्रवादी नेताओं का प्रभाव बढ़ा।
1905 और प्रथम चरण का अंत
1905 ई. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन के निर्णय ने व्यापक जन-विरोध को जन्म दिया और स्वदेशी तथा बहिष्कार आंदोलन तेजी से विकसित हुआ।
अब राष्ट्रीय आंदोलन केवल प्रार्थना-पत्र और संवैधानिक निवेदनों तक सीमित नहीं रहा। स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और जन-आंदोलन जैसे नए राजनीतिक साधन सामने आए।
इसी कारण 1905 को प्रारंभिक उदारवादी राष्ट्रवादी चरण से अधिक सक्रिय राष्ट्रवादी चरण की ओर परिवर्तन का महत्वपूर्ण वर्ष माना जाता है।
बनारस अधिवेशन — 1905
कांग्रेस का 1905 का बनारस अधिवेशन गोपालकृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित हुआ।
यह अधिवेशन बंगाल विभाजन के बाद उत्पन्न राजनीतिक वातावरण में हुआ। इसमें स्वदेशी आंदोलन को समर्थन मिला और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के प्रश्न पर उदारवादियों तथा उग्र राष्ट्रवादियों के बीच मतभेद अधिक स्पष्ट होने लगे।
यह अधिवेशन राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रथम और द्वितीय चरण के बीच महत्वपूर्ण संक्रमण बिंदु था।
कांग्रेस के प्रमुख अधिवेशन
| वर्ष | स्थान | अध्यक्ष | प्रमुख महत्व |
|---|---|---|---|
| 1885 | बंबई | डब्ल्यू. सी. बनर्जी | कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन |
| 1886 | कलकत्ता | दादाभाई नौरोजी | द्वितीय अधिवेशन; संगठन का विस्तार |
| 1887 | मद्रास | बदरुद्दीन तैयबजी | प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष |
| 1888 | इलाहाबाद | जॉर्ज यूल | प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष |
| 1905 | बनारस | गोपालकृष्ण गोखले | बंगाल विभाजन एवं स्वदेशी का प्रश्न |
| 1906 | कलकत्ता | दादाभाई नौरोजी | स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा |
| 1907 | सूरत | रासबिहारी घोष | उदारवादी और उग्रवादी विभाजन |
| 1916 | लखनऊ | अंबिका चरण मजूमदार | उदारवादी-उग्रवादी पुनर्मिलन और लखनऊ समझौता |
| 1917 | कलकत्ता | एनी बेसेंट | कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष |
| 1929 | लाहौर | जवाहरलाल नेहरू | पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य; सविनय अवज्ञा की दिशा |
| 1931 | कराची | वल्लभभाई पटेल | गांधी-इरविन समझौते की पुष्टि और मौलिक अधिकार प्रस्ताव |
| 1939 | त्रिपुरी | सुभाषचंद्र बोस | कांग्रेस नेतृत्व में गंभीर राजनीतिक संकट |
| 1940 | रामगढ़ | मौलाना अबुल कलाम आजाद | आजाद का लंबा अध्यक्षीय कार्यकाल प्रारंभ |
| 1946 | मेरठ | जे. बी. कृपलानी | स्वतंत्रता से पूर्व अंतिम नियमित कांग्रेस अधिवेशनों में महत्वपूर्ण |
कलकत्ता अधिवेशन — 1906
1906 के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की।
यह अधिवेशन राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण था। इसमें स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वशासन से संबंधित प्रस्तावों को महत्वपूर्ण स्थान मिला।
दादाभाई नौरोजी ने अध्यक्षीय भाषण में स्वराज को राष्ट्रीय राजनीतिक लक्ष्य के रूप में प्रमुखता से प्रस्तुत किया।
सूरत अधिवेशन — 1907
1907 का सूरत अधिवेशन कांग्रेस के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी।
इस अधिवेशन में उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच अध्यक्ष, कार्यक्रम और राजनीतिक पद्धति को लेकर तीव्र मतभेद उत्पन्न हुए।
अध्यक्ष पद के लिए उदारवादी नेता रासबिहारी घोष को चुना गया। बैठक में विवाद इतना बढ़ गया कि अधिवेशन पूरा नहीं हो सका।
इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस में उदारवादी और उग्रवादी धाराओं का औपचारिक विभाजन हो गया।
लखनऊ अधिवेशन — 1916
1916 के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की।
इस अधिवेशन में लंबे समय बाद कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेता फिर एक मंच पर आए।
इसी समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच प्रसिद्ध लखनऊ समझौता हुआ।
लाहौर अधिवेशन — 1929
1929 के लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की।
इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता को अपना प्रमुख राजनीतिक लक्ष्य बनाया और सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व को अधिकार दिया।
इसके बाद 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।
कराची अधिवेशन — 1931
1931 के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की।
इस अधिवेशन में गांधी-इरविन समझौते से संबंधित कांग्रेस की स्थिति को स्वीकृति दी गई।
इस अधिवेशन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से संबंधित प्रस्ताव शामिल थे।
इसी अधिवेशन ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान के प्रति सम्मान व्यक्त किया, यद्यपि कांग्रेस ने राजनीतिक हिंसा को अपनी पद्धति के रूप में स्वीकार नहीं किया।
त्रिपुरी अधिवेशन — 1939
1939 का त्रिपुरी अधिवेशन सुभाषचंद्र बोस की अध्यक्षता में हुआ।
सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में पट्टाभि सीतारमैया को पराजित किया, लेकिन गांधीजी और कांग्रेस कार्यसमिति के अधिकांश पुराने नेताओं से उनके गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए।
अंततः सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस अध्यक्ष बने।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में सुभाषचंद्र बोस ने 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना — 1885 ई.
प्रथम अधिवेशन — 28 दिसंबर 1885 — बंबई — गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज।
प्रथम अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
प्रथम अध्यक्ष — डब्ल्यू. सी. बनर्जी।
ए. ओ. ह्यूम से संबंधित इंडियन नेशनल यूनियन को 1884 में विधिवत स्थापित और बाद में सीधे कांग्रेस में नामांतरित संस्था लिखना सुरक्षित नहीं है।
1885 में भारत के वायसराय — लॉर्ड डफरिन।
दिसंबर 1885 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री — लॉर्ड सैलिसबरी, ग्लैडस्टोन नहीं।
प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष — बदरुद्दीन तैयबजी, 1887।
प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष — जॉर्ज यूल, 1888।
प्रथम महिला अध्यक्ष — एनी बेसेंट, 1917।
दादाभाई नौरोजी — भारत का वृद्ध पुरुष — धन-निष्कासन सिद्धांत।
अबुल कलाम आजाद का लगातार अध्यक्षीय कार्यकाल — 1940 से 1946।
स्वतंत्रता के समय कांग्रेस अध्यक्ष — जे. बी. कृपलानी।
1905 बनारस — गोपालकृष्ण गोखले।
1906 कलकत्ता — दादाभाई नौरोजी।
1907 सूरत — रासबिहारी घोष — कांग्रेस विभाजन।
1916 लखनऊ — अंबिका चरण मजूमदार।
1929 लाहौर — जवाहरलाल नेहरू — पूर्ण स्वतंत्रता।
1931 कराची — वल्लभभाई पटेल — मौलिक अधिकार एवं गांधी-इरविन समझौते से संबंधित प्रस्ताव।
1939 त्रिपुरी — सुभाषचंद्र बोस; बाद में इस्तीफा, राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष बने।
एक नजर में — 1885 से 1905
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और प्रथम बंबई अधिवेशन |
| 1886 | कलकत्ता अधिवेशन — दादाभाई नौरोजी |
| 1887 | मद्रास — बदरुद्दीन तैयबजी प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष |
| 1888 | इलाहाबाद — जॉर्ज यूल प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष |
| 1890 | कलकत्ता अधिवेशन — कादंबिनी गांगुली ने कांग्रेस मंच को संबोधित किया |
| 1892 | दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद के लिए निर्वाचित हुए |
| 1892 | भारतीय परिषद अधिनियम के प्रावधानों पर कांग्रेस की आलोचना |
| 1904 | कांग्रेस ने प्रस्तावित बंगाल विभाजन का विरोध किया |
| 1905 | बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन का विस्तार |
| 1905 | बनारस अधिवेशन — गोपालकृष्ण गोखले |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
1885–1905 को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रारंभिक अथवा उदारवादी चरण माना जाता है।
1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई और ए. ओ. ह्यूम ने इसके संगठन में प्रमुख भूमिका निभाई।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 से बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में आयोजित हुआ।
प्रथम अधिवेशन में 72 प्रतिनिधि शामिल हुए और डब्ल्यू. सी. बनर्जी प्रथम अध्यक्ष बने।
कांग्रेस स्थापना के समय भारत के वायसराय लॉर्ड डफरिन और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी थे।
1886 — कलकत्ता — दादाभाई नौरोजी।
1887 — मद्रास — बदरुद्दीन तैयबजी — प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष।
1888 — इलाहाबाद — जॉर्ज यूल — प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष।
दादाभाई नौरोजी को भारत का वृद्ध पुरुष कहा जाता है और वे धन-निष्कासन सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादक थे।
प्रारंभिक राष्ट्रवादियों की राजनीतिक पद्धति संवैधानिक आंदोलन, प्रार्थना-पत्र, प्रस्ताव और प्रतिनिधिमंडल पर आधारित थी।
उन्होंने विधान परिषदों के विस्तार, प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी, भारतीय सिविल सेवा में समान अवसर और सैनिक खर्च कम करने की माँग की।
प्रारंभिक कांग्रेस ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों के राजनीतिक नेताओं को एक साझा राष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
इसने ब्रिटिश शासन के आर्थिक शोषण और भारत की गरीबी के बीच संबंध को राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बनाया।
1905 के बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक सक्रिय जन-आंदोलन की दिशा में आगे बढ़ाया।
1905 बनारस — गोपालकृष्ण गोखले।
1906 कलकत्ता — दादाभाई नौरोजी — स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा।
1907 सूरत — रासबिहारी घोष — उदारवादी और उग्रवादी विभाजन।
1916 लखनऊ — अंबिका चरण मजूमदार — कांग्रेस-लीग समझौता और कांग्रेस का पुनर्मिलन।
1917 — एनी बेसेंट कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं।
1929 लाहौर — जवाहरलाल नेहरू — पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य।
1931 कराची — वल्लभभाई पटेल — मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम।
1939 त्रिपुरी — सुभाषचंद्र बोस; बाद में अध्यक्ष पद से इस्तीफा और फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना।
1940 से 1946 — मौलाना अबुल कलाम आजाद का लंबा लगातार अध्यक्षीय कार्यकाल।
भारत की स्वतंत्रता के समय कांग्रेस अध्यक्ष — जे. बी. कृपलानी।