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क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरुत्थान
REVOLUTIONARY MOVEMENT

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरुत्थान

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरुत्थान

असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में क्रांतिकारी गतिविधियों का एक नया चरण प्रारंभ हुआ। युवा क्रांतिकारियों का एक वर्ग ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए संगठित क्रांतिकारी गतिविधियों को आवश्यक मानता था।

इस दौर में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन तथा चटगांव के क्रांतिकारी संगठन विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे।

01

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन

1924 में क्रांतिकारियों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक संगठन को संगठित किया।

इसके प्रमुख संस्थापकों और नेताओं में सचिंद्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल और योगेशचंद्र चटर्जी प्रमुख थे। संगठन के विकास में अन्य क्रांतिकारियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इस संगठन का उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को समाप्त करके भारत में एक संघीय गणराज्य की स्थापना करना था।

संगठन को अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से सरकारी धन को निशाना बनाने की योजना बनाई गई, जिसका परिणाम आगे चलकर काकोरी कांड के रूप में सामने आया।

परीक्षा के लिए

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन → 1924 → सचिंद्रनाथ सान्याल + रामप्रसाद बिस्मिल + योगेशचंद्र चटर्जी।

02

काकोरी कांड — 1925

9 अगस्त 1925 को हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने लखनऊ के निकट काकोरी में रेलगाड़ी में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को अपने कब्जे में लेने की कार्रवाई की। यह घटना इतिहास में काकोरी कांड के नाम से प्रसिद्ध हुई।

क्रांतिकारियों का मुख्य उद्देश्य निजी यात्रियों की संपत्ति लूटना नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार के खजाने को निशाना बनाकर क्रांतिकारी संगठन के लिए धन प्राप्त करना था।

काकोरी कांड से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारियों में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सचिंद्रनाथ बख्शी और मन्मथनाथ गुप्त आदि शामिल थे।

ब्रिटिश सरकार ने इसके बाद व्यापक गिरफ्तारियाँ कीं। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को मृत्युदंड दिया गया।

चंद्रशेखर आजाद पुलिस की गिरफ्त से बचने में सफल रहे।

बहुत महत्वपूर्ण

9 अगस्त 1925 → काकोरी कांड → सरकारी खजाना → हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन।

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हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

क्रांतिकारी आंदोलन में समाजवादी विचारों का प्रभाव बढ़ने के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को नए वैचारिक आधार पर पुनर्गठित किया गया।

सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में क्रांतिकारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई और संगठन को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में पुनर्गठित किया गया।

इसके प्रमुख नेताओं में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, भगवती चरण वोहरा तथा उनके अन्य क्रांतिकारी साथी शामिल थे।

चंद्रशेखर आजाद संगठन के प्रमुख सैन्य नेतृत्व से जुड़े थे, जबकि भगत सिंह ने संगठन की क्रांतिकारी विचारधारा को समाजवादी दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्रम याद रखें

1924 → हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन
1928 → पुनर्गठन → हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

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लाला लाजपत राय और साइमन कमीशन

1928 में भारत आए साइमन कमीशन का पूरे देश में व्यापक विरोध हुआ क्योंकि आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था।

30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन का नेतृत्व पंजाब केसरी लाला लाजपत राय कर रहे थे।

प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

लाला लाजपत राय से जुड़ा प्रसिद्ध कथन है कि उनके शरीर पर पड़ी प्रत्येक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की कील सिद्ध होगी।

याद रखें

साइमन कमीशन का विरोध → लाहौर → लाठीचार्ज → लाला लाजपत राय घायल → 17 नवंबर 1928 को मृत्यु।

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सॉन्डर्स की हत्या

लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए क्रांतिकारियों ने पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई, जिसे लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार माना गया था।

लेकिन पहचान में गलती के कारण 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक जे. पी. सॉन्डर्स को गोली मार दी गई।

इस कार्रवाई में भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद सहित हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों की भूमिका थी।

राजगुरु ने सॉन्डर्स पर पहली गोली चलाई और भगत सिंह ने भी गोली चलाई। पीछा कर रहे पुलिसकर्मी चन्नन सिंह को चंद्रशेखर आजाद ने गोली मारी।

महत्वपूर्ण अंतर

क्रांतिकारियों का वास्तविक लक्ष्य स्कॉट था, लेकिन पहचान की गलती के कारण सॉन्डर्स मारा गया।

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केंद्रीय विधान सभा बम कांड

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली स्थित केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके।

इस कार्रवाई का उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सरकार के दमनकारी कानूनों के विरोध में अपनी आवाज को व्यापक स्तर पर पहुँचाना था।

बम फेंकने के बाद दोनों क्रांतिकारियों ने “इंकलाब जिंदाबाद” जैसे नारे लगाए, पर्चे फेंके और भागने के बजाय स्वयं को गिरफ्तार होने दिया।

इसके बाद भगत सिंह के विरुद्ध पुराने मामलों की भी जाँच हुई और सॉन्डर्स हत्या प्रकरण से संबंधित लाहौर षड्यंत्र केस उनके जीवन का निर्णायक मुकदमा बना।

परीक्षा के लिए

8 अप्रैल 1929 → केंद्रीय विधान सभा बम कांड → भगत सिंह + बटुकेश्वर दत्त।

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भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु

सॉन्डर्स हत्या और उससे संबंधित क्रांतिकारी गतिविधियों के मामले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चला।

तीनों क्रांतिकारियों को मृत्युदंड सुनाया गया और 23 मार्च 1931 को लाहौर केंद्रीय जेल में फाँसी दे दी गई।

23 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान की स्मृति में शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।

अति महत्वपूर्ण

23 मार्च 1931 → भगत सिंह + सुखदेव + राजगुरु → लाहौर में फाँसी।

08

चंद्रशेखर आजाद का बलिदान

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद को पुलिस ने घेर लिया।

आजाद ने पुलिस के साथ मुठभेड़ की और गिरफ्तारी से बचने के लिए अंत में स्वयं को गोली मार ली।

उन्होंने अपने नाम के अनुरूप जीवित रहते हुए अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार न होने की प्रतिज्ञा निभाई।

इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क को बाद में उनके सम्मान में चंद्रशेखर आजाद पार्क नाम दिया गया।

याद रखें

27 फरवरी 1931 → चंद्रशेखर आजाद → अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद।

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चटगांव शस्त्रागार छापा

बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेताओं में सूर्य सेन का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उन्हें लोकप्रिय रूप से मास्टर दा कहा जाता था।

सूर्य सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगांव शाखा के नाम से संगठन बनाया।

18 अप्रैल 1930 को सूर्य सेन और उनके साथियों ने चटगांव शस्त्रागार छापा आयोजित किया। उनका उद्देश्य अंग्रेजों के शस्त्रागारों पर कब्जा करना तथा संचार व्यवस्था को बाधित करके चटगांव में ब्रिटिश शासन को चुनौती देना था।

इस क्रांतिकारी अभियान में अनेक युवा पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त चटगांव के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ी प्रमुख महिला क्रांतिकारियों में थीं।

सूर्य सेन बाद में गिरफ्तार कर लिए गए और 1934 में उन्हें फाँसी दे दी गई।

एक नजर में

सूर्य सेन → मास्टर दा → चटगांव → 18 अप्रैल 1930 → शस्त्रागार छापा।

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क्रांतिकारी साहित्य

क्रांतिकारी आंदोलन केवल सशस्त्र कार्रवाइयों तक सीमित नहीं था। क्रांतिकारियों ने अपने राजनीतिक और वैचारिक विचारों को पुस्तकों, घोषणापत्रों और लेखों के माध्यम से भी व्यक्त किया।

सचिंद्रनाथ सान्याल ने प्रसिद्ध पुस्तक “बंदी जीवन” की रचना की। यह भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।

भगवती चरण वोहरा से जुड़ी प्रसिद्ध क्रांतिकारी रचना “द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब” थी। यह “फिलोसोफी ऑफ बॉम्बे” नहीं है।

भगवती चरण वोहरा हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रमुख विचारकों और क्रांतिकारियों में थे।

रचना और लेखक

बंदी जीवन → सचिंद्रनाथ सान्याल
द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब → भगवती चरण वोहरा से संबंधित प्रमुख क्रांतिकारी लेख

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महत्वपूर्ण घटनाक्रम

वर्ष / तिथि घटना
1924 हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संगठन
9 अगस्त 1925 काकोरी कांड
सितंबर 1928 फिरोजशाह कोटला में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का पुनर्गठन
30 अक्टूबर 1928 लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाठीचार्ज
17 नवंबर 1928 लाला लाजपत राय की मृत्यु
17 दिसंबर 1928 सॉन्डर्स की हत्या
8 अप्रैल 1929 केंद्रीय विधान सभा बम कांड
18 अप्रैल 1930 चटगांव शस्त्रागार छापा
27 फरवरी 1931 चंद्रशेखर आजाद का बलिदान
23 मार्च 1931 भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी
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परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन → 1924 तथा इसका समाजवादी विचारधारा के साथ पुनर्गठन 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में हुआ।

काकोरी कांड → 9 अगस्त 1925 को हुआ था।

काकोरी में क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य सरकारी खजाना था।

साइमन कमीशन विरोध के दौरान लाठीचार्ज → 30 अक्टूबर 1928 तथा लाला लाजपत राय की मृत्यु → 17 नवंबर 1928।

लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए क्रांतिकारियों का लक्ष्य स्कॉट था, लेकिन सॉन्डर्स मारा गया।

सॉन्डर्स की हत्या → 17 दिसंबर 1928।

केंद्रीय विधान सभा बम कांड → भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त → 8 अप्रैल 1929।

चटगांव शस्त्रागार छापा → सूर्य सेन → 18 अप्रैल 1930।

चंद्रशेखर आजाद → 27 फरवरी 1931 → अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद।

भगत सिंह + सुखदेव + राजगुरु → 23 मार्च 1931 → फाँसी।

बंदी जीवन → सचिंद्रनाथ सान्याल, जबकि द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब → भगवती चरण वोहरा से संबंधित प्रसिद्ध क्रांतिकारी लेख।

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संगठन सचिंद्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल और योगेशचंद्र चटर्जी जैसे क्रांतिकारियों के नेतृत्व में हुआ।

9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड में क्रांतिकारियों ने रेल द्वारा ले जाए जा रहे ब्रिटिश सरकार के खजाने को निशाना बनाया।

सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में संगठन को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में पुनर्गठित किया गया।

साइमन कमीशन के विरोध के दौरान हुए लाठीचार्ज में घायल लाला लाजपत राय की 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हुई।

उनकी मृत्यु का बदला लेने के उद्देश्य से 17 दिसंबर 1928 को सॉन्डर्स की हत्या की गई।

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके और गिरफ्तारी दी।

18 अप्रैल 1930 को मास्टर दा सूर्य सेन के नेतृत्व में चटगांव शस्त्रागार छापा हुआ।

27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में चंद्रशेखर आजाद पुलिस से मुठभेड़ करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर में फाँसी दी गई।

मुख्य क्रम याद रखें — हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन 1924 → काकोरी 1925 → हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन 1928 → सॉन्डर्स 1928 → विधान सभा बम कांड 1929 → चटगांव 1930 → चंद्रशेखर आजाद 1931 → भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु 1931।

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