नेहरू रिपोर्ट
1928 — भारतीयों द्वारा तैयार महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रस्ताव
नेहरू रिपोर्ट क्या थी?
नेहरू रिपोर्ट, 1928 भारतीय नेताओं द्वारा भारत के लिए तैयार की गई एक महत्वपूर्ण संवैधानिक योजना थी। इसकी तैयारी मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने की थी। इसमें भारत की भावी शासन-व्यवस्था, मौलिक अधिकार, केंद्र और प्रांतों के संबंध तथा अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रस्ताव दिए गए।
लॉर्ड बिरकेनहेड की चुनौती
भारतीयों को संविधान तैयार करने की चुनौती
ब्रिटिश सरकार के भारत सचिव लॉर्ड बिरकेनहेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती दी कि वे भारत के लिए ऐसा संविधान तैयार करके दिखाएँ जो भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों और समुदायों को स्वीकार्य हो।
इस चुनौती के पीछे यह धारणा भी थी कि विभिन्न राजनीतिक और सांप्रदायिक मतभेदों के कारण भारतीय नेता आपस में सहमत होकर कोई सर्वमान्य संवैधानिक योजना तैयार नहीं कर पाएँगे।
भारतीय नेताओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया और स्वयं भारत के लिए एक संवैधानिक प्रारूप तैयार करने की दिशा में प्रयास प्रारंभ किए।
🎯 परीक्षा में नाम सही याद रखें
भारत सचिव — लॉर्ड बिरकेनहेड।
इसी चुनौती की पृष्ठभूमि में भारतीय नेताओं ने अपनी संवैधानिक योजना तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
सर्वदलीय सम्मेलन
भारतीय राजनीतिक संगठनों का साझा प्रयास
लॉर्ड बिरकेनहेड की चुनौती तथा साइमन कमीशन में किसी भारतीय सदस्य को शामिल न किए जाने की पृष्ठभूमि में भारतीय नेताओं ने स्वयं एक संविधान का प्रारूप तैयार करने का प्रयास किया।
28 फरवरी 1928 को दिल्ली में एक सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें अनेक राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इन सम्मेलनों और विचार-विमर्श का उद्देश्य भारत के भविष्य के संविधान के संबंध में भारतीयों के बीच अधिकतम सहमति स्थापित करना था।
मोतीलाल नेहरू समिति
संवैधानिक प्रारूप तैयार करने का दायित्व
इसी परिप्रेक्ष्य में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई, जिसे भारत के लिए संविधान का प्रारूप तैयार करने का दायित्व दिया गया।
परीक्षा-साहित्य में इसे सामान्यतः नौ सदस्यीय नेहरू समिति के रूप में पढ़ाया जाता है। समिति के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे और जवाहरलाल नेहरू इसके सचिव के रूप में कार्य कर रहे थे।
समिति में विभिन्न राजनीतिक एवं सामुदायिक पृष्ठभूमियों से संबंधित प्रमुख नेताओं को शामिल करने का प्रयास किया गया, ताकि तैयार होने वाली संवैधानिक योजना को व्यापक स्वीकृति मिल सके।
🔎 दोनों नेहरू में भ्रम न रखें
मोतीलाल नेहरू — समिति के अध्यक्ष
जवाहरलाल नेहरू — समिति के सचिव
नेहरू रिपोर्ट का प्रस्तुतिकरण
1928 की संवैधानिक योजना
मोतीलाल नेहरू समिति ने विचार-विमर्श के बाद भारत के लिए एक विस्तृत संवैधानिक योजना तैयार की। यही योजना नेहरू रिपोर्ट के नाम से प्रसिद्ध हुई।
1928 में तैयार इस रिपोर्ट पर सर्वदलीय सम्मेलन में विचार किया गया और अगस्त 1928 के लखनऊ सर्वदलीय सम्मेलन में इसे स्वीकार किया गया।
यह भारतीय नेताओं द्वारा स्वयं भारत के भविष्य के संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत करने के शुरुआती और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रयासों में से एक था।
औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग
भारत के लिए डोमिनियन स्तर का दर्जा
नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्जा दिए जाने की माँग की।
इसका अर्थ था कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे स्वशासी अधिराज्यों के समान संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो और भारत में उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए।
यही प्रश्न आगे कांग्रेस के भीतर एक महत्वपूर्ण वैचारिक मतभेद का कारण बना, क्योंकि युवा नेताओं का एक वर्ग अब पूर्ण स्वतंत्रता की माँग की ओर बढ़ रहा था।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण तथ्य
नेहरू रिपोर्ट की माँग — औपनिवेशिक स्वराज्य।
इसे पूर्ण स्वतंत्रता की माँग न समझें।
उत्तरदायी शासन
केंद्र और प्रांतों में जिम्मेदार सरकार
नेहरू रिपोर्ट ने भारत में संसदीय और उत्तरदायी शासन व्यवस्था स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।
केंद्र में कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाने की कल्पना की गई। इसी प्रकार प्रांतों में भी उत्तरदायी शासन की व्यवस्था का समर्थन किया गया।
इस प्रकार रिपोर्ट का उद्देश्य ऐसी शासन-व्यवस्था स्थापित करना था जिसमें सरकार निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति जिम्मेदार हो।
मौलिक अधिकार
नागरिक स्वतंत्रताओं की संवैधानिक सुरक्षा
नेहरू रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव शामिल था। इसका उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना था।
इन अधिकारों में कानून के समक्ष समानता, धर्म और अंतःकरण की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सभा और संगठन बनाने जैसी नागरिक स्वतंत्रताओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
धर्म के आधार पर राज्य द्वारा भेदभाव न किए जाने और विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रताओं की रक्षा पर भी बल दिया गया।
📗 ऐतिहासिक महत्व
नेहरू रिपोर्ट में प्रस्तुत मौलिक अधिकारों की अवधारणा स्वतंत्र भारत में मौलिक अधिकारों के संवैधानिक विकास की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बनी।
मताधिकार
21 वर्ष की आयु का महत्वपूर्ण प्रस्ताव
नेहरू रिपोर्ट में 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुके स्त्री और पुरुष को, कानूनी अयोग्यता न होने की स्थिति में, मतदान का अधिकार देने का प्रस्ताव किया गया।
यह उस समय महत्वपूर्ण प्रस्ताव था क्योंकि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत मताधिकार सीमित था और सभी वयस्क नागरिकों को समान रूप से मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं था।
🎯 संख्या याद रखें
नेहरू रिपोर्ट — मतदान की प्रस्तावित आयु 21 वर्ष।
संयुक्त निर्वाचन
पृथक निर्वाचन के स्थान पर साझा निर्वाचन व्यवस्था
नेहरू रिपोर्ट ने सांप्रदायिक आधार पर चल रही पृथक निर्वाचन व्यवस्था के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन का समर्थन किया।
इसका उद्देश्य राजनीतिक प्रतिनिधित्व को धार्मिक समुदायों के आधार पर स्थायी रूप से विभाजित करने के बजाय साझा निर्वाचन व्यवस्था की ओर बढ़ाना था।
हालाँकि कुछ परिस्थितियों में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए जनसंख्या के अनुपात में सीटों के आरक्षण की व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी।
🔎 अंतर याद रखें
संयुक्त निर्वाचन का अर्थ सभी समुदायों के मतदाताओं का साझा निर्वाचन है। नेहरू रिपोर्ट ने पृथक सांप्रदायिक निर्वाचन के स्थान पर इसी व्यवस्था को प्राथमिकता दी।
केंद्र और प्रांतों की व्यवस्था
संघीय शासन की रूपरेखा
नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए संघीय स्वरूप वाली शासन-व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की, जिसमें केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का विभाजन होना था।
रिपोर्ट में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को दिए जाने का प्रस्ताव था। यह विषय आगे मुस्लिम लीग के कुछ नेताओं की आपत्तियों का महत्वपूर्ण कारण बना।
केंद्रीय विधायिका को द्विसदनीय स्वरूप देने की योजना प्रस्तुत की गई थी, जिसमें एक सीनेट और एक प्रतिनिधि सभा की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
भाषा संबंधी प्रस्ताव
भारतीय भाषाओं और संपर्क भाषा का प्रश्न
नेहरू रिपोर्ट में भारत की सामान्य भाषा के रूप में हिंदुस्तानी को महत्व दिया गया और इसे देवनागरी या फारसी लिपि में लिखे जाने की व्यवस्था की बात की गई।
इसके साथ ही आवश्यकता के अनुसार अंग्रेजी के प्रयोग की भी अनुमति प्रस्तावित थी। प्रांतीय भाषाओं के प्रयोग को भी मान्यता दी गई।
मुस्लिम लीग और नेहरू रिपोर्ट
सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर मतभेद
नेहरू रिपोर्ट सभी राजनीतिक समूहों की पूर्ण सहमति प्राप्त नहीं कर सकी। विशेष रूप से मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के एक महत्वपूर्ण वर्ग ने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और केंद्र-प्रांत शक्तियों से संबंधित कुछ प्रस्तावों पर आपत्ति व्यक्त की।
मुहम्मद अली जिन्ना ने समझौते के लिए कुछ संशोधन प्रस्तावित किए, लेकिन उन पर सहमति नहीं बन सकी।
बाद में 1929 में जिन्ना ने अपने प्रसिद्ध चौदह सूत्र प्रस्तुत किए। इन्हें नेहरू रिपोर्ट से उत्पन्न संवैधानिक मतभेदों की पृष्ठभूमि में समझना महत्वपूर्ण है।
🎯 क्रम याद रखें
युवा नेताओं की प्रतिक्रिया
पूर्ण स्वतंत्रता की बढ़ती माँग
नेहरू रिपोर्ट द्वारा औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग किए जाने से कांग्रेस के युवा और अधिक उग्र राष्ट्रवादी नेता पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे।
जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता पूर्ण स्वतंत्रता की दिशा में आगे बढ़ने के समर्थक थे।
इस मतभेद ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में औपनिवेशिक स्वराज्य और पूर्ण स्वतंत्रता के बीच चल रही बहस को और स्पष्ट कर दिया।
ब्रिटिश सरकार को समय-सीमा
औपनिवेशिक स्वराज्य से पूर्ण स्वराज की ओर
कांग्रेस ने अंततः ब्रिटिश सरकार से भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान करने की माँग की और इसके लिए एक समय-सीमा निर्धारित की।
जब ब्रिटिश सरकार ने अपेक्षित संवैधानिक परिवर्तन स्वीकार नहीं किए, तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का रुख पूर्ण स्वतंत्रता की ओर तेजी से बढ़ा।
इसके बाद दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया।
इसके क्रम में 26 जनवरी 1930 को देशभर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
नेहरू रिपोर्ट का ऐतिहासिक महत्व
भारतीय संवैधानिक इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज
नेहरू रिपोर्ट का सबसे बड़ा महत्व यह था कि भारतीय नेताओं ने स्वयं भारत के लिए एक विस्तृत संवैधानिक योजना प्रस्तुत की और इस धारणा को चुनौती दी कि भारतीय अपने देश के लिए संविधान तैयार करने में सक्षम नहीं हैं।
इसमें उत्तरदायी शासन, मौलिक अधिकार, नागरिक समानता, संयुक्त निर्वाचन और संसदीय व्यवस्था जैसे सिद्धांत शामिल थे, जिनमें से कई विचार आगे भारत के संवैधानिक विकास में भी महत्वपूर्ण बने।
हालाँकि यह रिपोर्ट सभी राजनीतिक दलों और समुदायों की सर्वसम्मति प्राप्त नहीं कर सकी और ब्रिटिश सरकार ने भी इसे भारत के संविधान के रूप में स्वीकार नहीं किया।
इसके बावजूद भारतीय संवैधानिक इतिहास में नेहरू रिपोर्ट, 1928 का स्थान एक महत्वपूर्ण भारतीय-निर्मित संवैधानिक दस्तावेज के रूप में है।
एक नज़र में प्रमुख प्रावधान
परीक्षा के लिए त्वरित सार
| विषय | नेहरू रिपोर्ट का प्रस्ताव |
|---|---|
| वर्ष | 1928 |
| समिति के अध्यक्ष | मोतीलाल नेहरू |
| समिति के सचिव | जवाहरलाल नेहरू |
| भारत की स्थिति | औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्जा |
| शासन | संसदीय एवं उत्तरदायी शासन |
| नागरिक अधिकार | मौलिक अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा |
| मताधिकार | 21 वर्ष की आयु प्राप्त स्त्री-पुरुषों को मताधिकार |
| निर्वाचन | पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन |
| अवशिष्ट शक्तियाँ | केंद्र के पास |
| केंद्रीय विधायिका | द्विसदनीय व्यवस्था |
घटनाक्रम
कालक्रम से याद करें
🧠 पूरा क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
नेहरू रिपोर्ट — 1928 भारतीय नेताओं द्वारा भारत के लिए तैयार महत्वपूर्ण संवैधानिक योजना थी।
भारत सचिव लॉर्ड बिरकेनहेड ने भारतीयों को ऐसा संविधान तैयार करने की चुनौती दी जो विभिन्न दलों और समुदायों को स्वीकार्य हो।
इसी परिप्रेक्ष्य में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में समिति बनाई गई; परीक्षा-साहित्य में इसे सामान्यतः नौ सदस्यीय समिति कहा जाता है।
मोतीलाल नेहरू — अध्यक्ष; जवाहरलाल नेहरू — सचिव।
नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग की, तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता की नहीं।
रिपोर्ट ने मौलिक अधिकार, उत्तरदायी शासन और संयुक्त निर्वाचन का समर्थन किया।
21 वर्ष की आयु प्राप्त स्त्री-पुरुषों को मताधिकार देने का प्रस्ताव किया गया।
संघीय व्यवस्था में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को देने का प्रस्ताव था।
सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधानों पर सहमति नहीं बन सकी और मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के एक महत्वपूर्ण वर्ग ने रिपोर्ट का विरोध किया।
नेहरू रिपोर्ट से जुड़े मतभेदों की पृष्ठभूमि में मुहम्मद अली जिन्ना ने 1929 में चौदह सूत्र प्रस्तुत किए।
इसके बाद राष्ट्रीय आंदोलन औपनिवेशिक स्वराज्य से आगे बढ़ा और 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया।