सविनय अवज्ञा आंदोलन
1930 — पूर्ण स्वराज, दांडी यात्रा, नमक सत्याग्रह और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनआंदोलन
सविनय अवज्ञा आंदोलन
सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण था। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानूनों का खुले रूप से, अहिंसात्मक ढंग से उल्लंघन करके औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देना था। महात्मा गांधी ने नमक कानून को इस आंदोलन का प्रारंभिक आधार बनाया, क्योंकि नमक जैसी आवश्यक वस्तु पर ब्रिटिश नियंत्रण और कर का प्रभाव गरीब से लेकर अमीर तक प्रत्येक भारतीय पर पड़ता था।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
पूर्ण स्वराज से सविनय अवज्ञा तक
दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
इसके बाद 26 जनवरी 1930 को देशभर में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया और लोगों ने पूर्ण स्वराज प्राप्त करने की प्रतिज्ञा ली।
अब कांग्रेस के सामने केवल स्वतंत्रता की घोषणा करना पर्याप्त नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक जनआंदोलन शुरू करना भी आवश्यक हो गया था।
गांधीजी को आंदोलन की बागडोर
साबरमती आश्रम की बैठक — फरवरी 1930
14 से 16 फरवरी 1930 के बीच साबरमती आश्रम में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। इस बैठक में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया और आंदोलन को आरंभ करने तथा उसकी रणनीति तय करने की पूरी जिम्मेदारी महात्मा गांधी को सौंप दी गई।
इस प्रकार फरवरी 1930 में साबरमती आश्रम में हुई कांग्रेस की बैठक के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की बागडोर गांधीजी के हाथ में आ गई।
🎯 परीक्षा में याद रखें
फरवरी 1930 — साबरमती आश्रम — कांग्रेस कार्यसमिति — गांधीजी को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का अधिकार।
गांधीजी की 11 माँगें
वायसराय इरविन के सामने अंतिम प्रयास
आंदोलन शुरू करने से पहले गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन के सामने कई आर्थिक और राजनीतिक माँगें रखीं। इन माँगों की संख्या सामान्यतः 11 मानी जाती है।
इनमें नमक कर समाप्त करना, भू-राजस्व में कमी, शराब के व्यापार पर रोक, सैन्य व्यय तथा उच्च अधिकारियों के वेतन में कमी, भारतीय कपड़ा उद्योग को संरक्षण और राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसी माँगें शामिल थीं।
ब्रिटिश सरकार द्वारा इन माँगों को स्वीकार न किए जाने पर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया और नमक कानून को तोड़ने को आंदोलन का पहला प्रमुख कदम बनाया।
नमक को आंदोलन का आधार क्यों बनाया?
हर भारतीय से जुड़ा प्रश्न
गांधीजी ने नमक को आंदोलन का प्रतीक इसलिए बनाया क्योंकि नमक प्रत्येक व्यक्ति की दैनिक आवश्यकता थी। गरीब से गरीब व्यक्ति को भी इसकी आवश्यकता होती थी, लेकिन ब्रिटिश शासन ने नमक के उत्पादन और बिक्री पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रखा था।
नमक कानून का उल्लंघन करना एक ऐसा सरल कार्य था जिसमें किसान, मजदूर, महिलाएँ और सामान्य नागरिक बड़ी संख्या में भाग ले सकते थे। इसी कारण नमक सत्याग्रह आंदोलन को जनसाधारण से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बना।
दांडी यात्रा का प्रारंभ
12 मार्च 1930
महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी के लिए अपनी ऐतिहासिक पदयात्रा प्रारंभ की। यात्रा प्रारंभ करते समय उनके साथ 78 चुने हुए सत्याग्रही थे।
साबरमती आश्रम से दांडी तक की यात्रा लगभग 390 किलोमीटर, अर्थात लगभग 240–241 मील की थी। इसलिए परीक्षा पुस्तकों में इसे प्रायः 241 मील की दांडी यात्रा कहा जाता है।
यात्रा लगभग 24 दिनों तक चली। गांधीजी और सत्याग्रही अनेक गाँवों से होकर गुजरे और रास्ते में लोगों को सत्य, अहिंसा, स्वदेशी तथा ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध संघर्ष का संदेश देते रहे।
यात्रा शुरू होने के समय गांधीजी के साथ 78 सत्याग्रही थे, लेकिन मार्ग में हजारों लोग आंदोलन से जुड़ते गए।
🔎 संख्या में भ्रम न रखें
गांधीजी + 78 सत्याग्रही यात्रा पर निकले थे। इसलिए कहीं-कहीं कुल संख्या 79 लिखी मिल सकती है। परीक्षा में प्रचलित उत्तर — गांधीजी अपने 78 अनुयायियों के साथ दांडी यात्रा पर निकले।
दांडी में नमक कानून का उल्लंघन
6 अप्रैल 1930
गांधीजी 5 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचे और अगले दिन 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर नमक उठाकर अथवा नमक बनाकर ब्रिटिश नमक कानून का प्रतीकात्मक उल्लंघन किया।
इसी घटना के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन ने व्यापक जनआंदोलन का रूप धारण कर लिया। इसके बाद देशभर में लोगों ने नमक कानून तोड़ना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना और कई स्थानों पर औपनिवेशिक कानूनों का अहिंसात्मक उल्लंघन करना शुरू किया।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण क्रम
सुभाषचंद्र बोस की प्रसिद्ध तुलना
दांडी यात्रा का ऐतिहासिक प्रभाव
सुभाषचंद्र बोस ने दांडी यात्रा की तुलना विश्व इतिहास की दो प्रसिद्ध राजनीतिक यात्राओं से की। उन्होंने इसकी तुलना नेपोलियन की एल्बा द्वीप से पेरिस की ओर वापसी यात्रा तथा मुसोलिनी के रोम मार्च से की।
इस तुलना का आशय दांडी यात्रा के राजनीतिक प्रभाव और जनमानस पर पड़े व्यापक असर को रेखांकित करना था। दांडी यात्रा ने एक साधारण प्रतीत होने वाले नमक कानून को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध का शक्तिशाली प्रतीक बना दिया।
🎯 जोड़ी याद रखें
सुभाषचंद्र बोस — दांडी यात्रा की तुलना — नेपोलियन की एल्बा से पेरिस यात्रा + मुसोलिनी का रोम मार्च।
आंदोलन का देशव्यापी विस्तार
नमक से आगे व्यापक सविनय अवज्ञा
दांडी में नमक कानून तोड़े जाने के बाद आंदोलन केवल गुजरात तक सीमित नहीं रहा। देश के विभिन्न भागों में लोगों ने नमक बनाया, विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों का बहिष्कार किया तथा औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध धरने और प्रदर्शन किए।
कई क्षेत्रों में किसानों ने लगान और कुछ अन्य करों का भुगतान रोकने का प्रयास किया। जंगल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने ब्रिटिश वन कानूनों का उल्लंघन किया और अपने परंपरागत अधिकारों के लिए आंदोलन किया।
इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। बड़ी संख्या में महिलाओं ने नमक बनाया, विदेशी वस्तुओं और शराब की दुकानों के सामने धरने दिए तथा गिरफ्तारियाँ दीं।
अन्य प्रमुख नमक सत्याग्रह
दांडी के बाद देश के अलग-अलग भागों में आंदोलन
| स्थान | प्रमुख नेता / घटना |
|---|---|
| दांडी, गुजरात | महात्मा गांधी द्वारा नमक कानून का उल्लंघन |
| धरसाना, गुजरात | गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद अब्बास तैयबजी और बाद में सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में सत्याग्रह |
| वेदारण्यम, तमिलनाडु | सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह |
| मालाबार क्षेत्र | के. केलप्पन के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह से जुड़ी गतिविधियाँ |
गांधीजी की गिरफ्तारी
4–5 मई 1930 की मध्यरात्रि
दांडी में नमक कानून तोड़ने के बाद गांधीजी ने आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए धरसाना के सरकारी नमक कारखाने के विरुद्ध सत्याग्रह की योजना बनाई।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें यह अभियान शुरू करने से पहले ही 4 और 5 मई 1930 की मध्यरात्रि में गिरफ्तार कर लिया। गांधीजी की आधिकारिक घटनाक्रम सूची में गिरफ्तारी की तिथि 5 मई 1930 दर्ज है।
गिरफ्तारी के बाद गांधीजी को यरवदा जेल भेज दिया गया।
🎯 तिथि का सही तरीका
गांधीजी को 4 मई की रात और 5 मई 1930 की शुरुआत के बीच गिरफ्तार किया गया। इसलिए कुछ पुस्तकों में 4 मई की रात और कुछ में 5 मई 1930 लिखा मिलता है।
धरसाना नमक सत्याग्रह
गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन
गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद धरसाना नमक कारखाने के सत्याग्रह की जिम्मेदारी पहले वृद्ध राष्ट्रवादी नेता और पूर्व न्यायाधीश अब्बास तैयबजी ने संभाली।
अब्बास तैयबजी को भी ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद आंदोलन का नेतृत्व सरोजिनी नायडू ने संभाला।
21 मई 1930 को हजारों अहिंसक सत्याग्रही धरसाना के सरकारी नमक कारखाने की ओर बढ़े। पुलिस ने उन पर अत्यंत क्रूर लाठीचार्ज किया, लेकिन सत्याग्रहियों ने हिंसक प्रतिरोध नहीं किया।
इमाम साहब अब्दुल कादिर बावाज़ीर भी नमक सत्याग्रह से जुड़े प्रमुख गांधीवादी कार्यकर्ताओं में थे और धरसाना आंदोलन के बाद के चरणों में नेतृत्व से जुड़े रहे।
🔎 नेतृत्व का क्रम याद रखें
वेब मिलर और धरसाना का लाठीचार्ज
ब्रिटिश दमन की खबर दुनिया तक पहुँची
धरसाना नमक सत्याग्रह के समय अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर घटनास्थल पर उपस्थित थे। उन्होंने पुलिस द्वारा निहत्थे और अहिंसक सत्याग्रहियों पर किए गए क्रूर लाठीचार्ज का विस्तृत वर्णन दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
पुलिस के अत्याचार को देखकर वेब मिलर ने जिस पीड़ा और क्रूरता का वर्णन किया, उसका आशय यह था कि उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन में इतना कष्टदायक और निर्मम दृश्य बहुत कम देखा था।
उनकी रिपोर्ट में बताया गया कि सत्याग्रही पुलिस की लाठियाँ खाते हुए भी प्रतिरोध नहीं कर रहे थे। वेब मिलर की रिपोर्ट विदेशों के अनेक समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई और इससे ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीति की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आलोचना हुई।
📗 महत्वपूर्ण तथ्य
वेब मिलर — अमेरिकी पत्रकार — धरसाना सत्याग्रह में पुलिस अत्याचार का प्रत्यक्षदर्शी विवरण।
उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में आंदोलन
खान अब्दुल गफ्फार खान की भूमिका
सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रभाव उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में भी व्यापक रूप से दिखाई दिया। यहाँ खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन मजबूत हुआ।
खान अब्दुल गफ्फार खान को सीमांत गांधी के नाम से भी जाना जाता है। उनके संगठन खुदाई खिदमतगार के कार्यकर्ताओं को उनकी लाल रंग की पोशाक के कारण लाल कुर्ती भी कहा जाता था।
पेशावर में आंदोलन के दौरान किस्सा ख्वानी बाजार की घटना विशेष रूप से प्रसिद्ध हुई, जहाँ ब्रिटिश शासन ने प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कठोर दमन किया।
आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
राष्ट्रीय आंदोलन में व्यापक भागीदारी
सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता महिलाओं की बड़ी भागीदारी थी। महिलाओं ने घरों से बाहर निकलकर नमक बनाया, विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों के सामने धरना दिया तथा ब्रिटिश कानूनों का उल्लंघन करते हुए गिरफ्तारियाँ दीं।
सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय और कस्तूरबा गांधी जैसी महिलाओं ने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महिलाओं की इस भागीदारी ने राष्ट्रीय आंदोलन को सामाजिक स्तर पर और अधिक व्यापक बनाया।
सविनय अवज्ञा और असहयोग में अंतर
दोनों आंदोलनों को अलग-अलग समझें
| असहयोग आंदोलन | सविनय अवज्ञा आंदोलन |
|---|---|
| ब्रिटिश संस्थाओं और शासन से सहयोग वापस लेना मुख्य साधन था। | ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानूनों का खुले रूप से उल्लंघन भी किया गया। |
| प्रारंभ — 1920 | प्रारंभ — 1930 |
| विदेशी वस्तुओं, शिक्षण संस्थानों, उपाधियों आदि का बहिष्कार प्रमुख था। | नमक कानून तोड़ना, कर न देना और कुछ सरकारी कानूनों का उल्लंघन प्रमुख रूप बने। |
गांधी-इरविन समझौता
5 मार्च 1931
सरकार के दमन और आंदोलन के व्यापक प्रभाव के बीच गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच वार्ता हुई। इसका परिणाम 5 मार्च 1931 के गांधी-इरविन समझौते के रूप में सामने आया।
समझौते के बाद कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी।
सरकार ने अहिंसक आंदोलन से संबंधित अनेक राजनीतिक बंदियों की रिहाई तथा कुछ अन्य रियायतों पर सहमति व्यक्त की। तटीय क्षेत्रों में लोगों को कुछ शर्तों के अंतर्गत अपने उपयोग के लिए नमक बनाने की अनुमति भी दी गई।
🎯 याद रखें
गांधी-इरविन समझौता — 5 मार्च 1931 — सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित — गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए।
कराची अधिवेशन
मार्च 1931
मार्च 1931 में कांग्रेस का कराची अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की।
इस अधिवेशन में गांधी-इरविन समझौते को स्वीकृति प्रदान की गई। साथ ही मौलिक अधिकारों और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए।
कराची अधिवेशन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के भावी सामाजिक और आर्थिक स्वरूप की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
आंदोलन का दूसरा चरण
1932 में पुनः शुरुआत
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से कोई संतोषजनक राजनीतिक समाधान न निकलने के बाद गांधीजी भारत लौटे। इसके बाद जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर से शुरू किया गया।
ब्रिटिश सरकार ने इस बार आंदोलन पर और अधिक कठोर दमन किया। गांधीजी और कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया तथा कांग्रेस संगठन की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए।
लगातार दमन और बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों के कारण आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ा और अंततः 1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया गया।
प्रमुख तिथियाँ
कालक्रम से याद करें
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| दिसंबर 1929 | लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य |
| 26 जनवरी 1930 | स्वतंत्रता दिवस मनाया गया |
| 14–16 फरवरी 1930 | साबरमती में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक; गांधीजी को आंदोलन प्रारंभ करने का अधिकार |
| 12 मार्च 1930 | साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा शुरू |
| 5 अप्रैल 1930 | गांधीजी दांडी पहुँचे |
| 6 अप्रैल 1930 | गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा |
| 4–5 मई 1930 | गांधीजी गिरफ्तार; यरवदा जेल भेजे गए |
| 21 मई 1930 | धरसाना नमक सत्याग्रह में पुलिस का क्रूर लाठीचार्ज |
| 5 मार्च 1931 | गांधी-इरविन समझौता |
| 1932 | सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ |
| 1934 | सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त |
त्वरित पुनरावृत्ति
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⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
फरवरी 1930 में साबरमती आश्रम में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की जिम्मेदारी महात्मा गांधी को दी गई।
गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को अपने 78 अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी की लगभग 241 मील की यात्रा शुरू की।
गांधीजी 5 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचे और 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का उल्लंघन किया। इसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन देशभर में फैल गया।
सुभाषचंद्र बोस ने दांडी यात्रा की तुलना नेपोलियन की एल्बा से पेरिस वापसी यात्रा और मुसोलिनी के रोम मार्च से की।
गांधीजी को 4–5 मई 1930 की मध्यरात्रि में गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेज दिया गया।
गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद धरसाना सत्याग्रह का नेतृत्व पहले अब्बास तैयबजी ने संभाला। उनकी गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू प्रमुख नेतृत्व में आईं। इमाम साहब अब्दुल कादिर बावाज़ीर भी इस सत्याग्रह के बाद के चरणों से जुड़े रहे।
21 मई 1930 को धरसाना नमक कारखाने के पास अहिंसक सत्याग्रहियों पर पुलिस ने क्रूर लाठीचार्ज किया।
अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने धरसाना में हुए पुलिस अत्याचार का प्रत्यक्षदर्शी विवरण दुनिया तक पहुँचाया, जिससे ब्रिटिश शासन की व्यापक अंतरराष्ट्रीय आलोचना हुई।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान नमक कानून तोड़ने के साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शराब की दुकानों पर धरना, कुछ क्षेत्रों में कर न देना और वन कानूनों का उल्लंघन भी आंदोलन के प्रमुख रूप बने।
5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौते के बाद आंदोलन स्थगित किया गया। 1932 में इसे पुनः शुरू किया गया और अंततः 1934 में समाप्त कर दिया गया।