तृतीय गोलमेज सम्मेलन
1932 — संवैधानिक वार्ता, कांग्रेस की अनुपस्थिति और हरिजन कल्याण आंदोलन
तृतीय एवं अंतिम गोलमेज सम्मेलन
भारत के संवैधानिक भविष्य पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों की श्रृंखला का तीसरा और अंतिम चरण 1932 में आयोजित हुआ। उस समय भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के कारण राजनीतिक तनाव बना हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया। इसी दौर में अस्पृश्यता के विरुद्ध गांधीजी का सामाजिक अभियान भी तेजी से आगे बढ़ा।
तृतीय गोलमेज सम्मेलन — 1932
गोलमेज सम्मेलनों का अंतिम चरण
तृतीय गोलमेज सम्मेलन 17 नवंबर 1932 से 24 दिसंबर 1932 तक लंदन में आयोजित हुआ। यह ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था पर विचार करने के लिए आयोजित गोलमेज सम्मेलनों की श्रृंखला का तीसरा और अंतिम सम्मेलन था।
इस सम्मेलन में पहले दोनों सम्मेलनों की तुलना में भागीदारी काफी कम रही। सामान्यतः 46 प्रतिनिधियों के इसमें भाग लेने का उल्लेख मिलता है। इसलिए इसके लिए प्रचलित 86 प्रतिनिधियों की संख्या को सही नहीं माना जाता।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया। कांग्रेस उस समय ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध संघर्षरत थी और सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण चल रहा था।
🎯 महत्वपूर्ण तथ्य
तृतीय गोलमेज सम्मेलन — 17 नवंबर से 24 दिसंबर 1932 — लंदन — कांग्रेस अनुपस्थित।
तीनों सम्मेलनों में भाग लेने वाले नेता
बार-बार पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण नाम
तेज बहादुर सप्रू और डॉ. भीमराव आंबेडकर उन प्रमुख भारतीय नेताओं में थे जिन्होंने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। डॉ. आंबेडकर ने इन सम्मेलनों में दलित वर्गों के राजनीतिक अधिकार और प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया।
इन दोनों के अतिरिक्त एम. आर. जयकर, एन. एम. जोशी और ए. रामास्वामी मुदलियार जैसे कुछ अन्य भारतीय प्रतिनिधि भी तीनों गोलमेज सम्मेलनों में शामिल हुए थे। इसलिए “केवल तेज बहादुर सप्रू और आंबेडकर ही तीनों सम्मेलनों में गए थे” कहना पूर्ण रूप से सही नहीं होगा।
महात्मा गांधी केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए थे। उन्होंने प्रथम और तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
📌 भ्रम से बचें
गांधीजी — केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
डॉ. भीमराव आंबेडकर — तीनों गोलमेज सम्मेलन
तेज बहादुर सप्रू — तीनों गोलमेज सम्मेलन
तृतीय गोलमेज सम्मेलन के प्रमुख विषय
भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था
तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भारत के लिए प्रस्तावित संघीय शासन व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता और भावी संविधान से संबंधित प्रश्नों पर विचार किया गया।
ब्रिटिश भारत के प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने की योजना गोलमेज सम्मेलनों की संवैधानिक चर्चाओं का महत्वपूर्ण विषय थी।
कांग्रेस की अनुपस्थिति और अनेक प्रमुख राजनीतिक नेताओं की भागीदारी न होने के कारण यह सम्मेलन पहले की तुलना में कम प्रभावशाली रहा और इससे तत्काल कोई व्यापक राजनीतिक समझौता नहीं निकल सका।
श्वेत पत्र और भारत शासन अधिनियम
गोलमेज सम्मेलनों के बाद संवैधानिक विकास
तीनों गोलमेज सम्मेलनों में हुई संवैधानिक चर्चाओं और ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों को आगे बढ़ाते हुए मार्च 1933 में एक श्वेत पत्र प्रकाशित किया गया।
इसके बाद इन संवैधानिक प्रस्तावों पर ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति ने विचार किया। इस पूरी प्रक्रिया ने आगे चलकर भारत शासन अधिनियम, 1935 के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की।
भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश काल का एक अत्यंत विस्तृत संवैधानिक अधिनियम था। इसके अंतर्गत प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था की गई और अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा गया, यद्यपि प्रस्तावित संघ व्यवहार में लागू नहीं हो सका।
📗 घटनाओं का संबंध
गोलमेज सम्मेलन → 1933 का श्वेत पत्र → संसदीय विचार-विमर्श → भारत शासन अधिनियम, 1935
अस्पृश्यता के विरुद्ध गांधीजी का अभियान
1932 के बाद सामाजिक सुधार पर विशेष बल
1932 में सांप्रदायिक निर्णय और उसके बाद हुए पूना समझौते के समय अस्पृश्यता का प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया। गांधीजी ने इसके बाद हिंदू समाज में प्रचलित अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए व्यापक सामाजिक अभियान चलाने पर विशेष बल दिया।
इसी उद्देश्य से 1932 में अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना हुई। इसकी स्थापना 30 सितंबर 1932 को बंबई में हुई गतिविधियों और निर्णयों से जुड़ी थी। इस संगठन का उद्देश्य अस्पृश्यता को समाप्त करना तथा उस समय दलित कहे जाने वाले वंचित समुदायों के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करना था।
इस संस्था से गांधीजी का गहरा संबंध था, लेकिन इसे केवल गांधीजी द्वारा अकेले स्थापित संस्था समझना ठीक नहीं है। यह अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के संगठित प्रयास से बनी थी। घनश्यामदास बिड़ला इसके प्रथम अध्यक्ष और अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर इसके प्रमुख सचिव बने।
हरिजन सेवक संघ
अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग का नया नाम
अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग का नाम बाद में बदलकर हरिजन सेवक संघ कर दिया गया। गांधीजी ने नवंबर 1932 में संस्था के लिए यह नाम सुझाया था।
इस संगठन का उद्देश्य अस्पृश्यता के विरुद्ध जनमत तैयार करना, सामाजिक भेदभाव कम करना तथा शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक उत्थान से संबंधित कार्यों को प्रोत्साहित करना था।
गांधीजी ने इस सामाजिक अभियान को केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने देशभर में यात्राएँ, सभाएँ और जनसंपर्क के माध्यम से अस्पृश्यता के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया।
🎯 महत्वपूर्ण संबंध
अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग → बाद में हरिजन सेवक संघ।
‘हरिजन’ साप्ताहिक पत्र
अस्पृश्यता-विरोधी विचारों के प्रचार का माध्यम
अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक सुधार से जुड़े विचारों को व्यापक समाज तक पहुँचाने के लिए गांधीजी ने ‘हरिजन’ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र के प्रकाशन को प्रारंभ कराया। इसका पहला अंक 11 फरवरी 1933 को प्रकाशित हुआ। इसलिए ‘हरिजन’ साप्ताहिक का प्रकाशन 1932 में प्रारंभ हुआ कहना सही नहीं है।
‘हरिजन’ में अस्पृश्यता, सामाजिक समानता, ग्राम सुधार और गांधीजी के सामाजिक विचारों से संबंधित लेख प्रमुखता से प्रकाशित होते थे।
इसके साथ भारतीय भाषाओं में भी संबंधित प्रकाशन निकले। हिंदी में ‘हरिजन सेवक’ और गुजराती में ‘हरिजन बंधु’ प्रकाशित हुए।
📌 नाम और वर्ष याद रखें
1932 — अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग
बाद में — हरिजन सेवक संघ
11 फरवरी 1933 — ‘हरिजन’ साप्ताहिक का पहला अंक
तीनों गोलमेज सम्मेलन — एक नज़र में
तिथि और कांग्रेस की भागीदारी
| सम्मेलन | समय | कांग्रेस की स्थिति | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 12 नवंबर 1930 – 19 जनवरी 1931 | भाग नहीं लिया | कांग्रेस अनुपस्थित रही। |
| द्वितीय | 7 सितंबर – 1 दिसंबर 1931 | भाग लिया | गांधीजी कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। |
| तृतीय | 17 नवंबर – 24 दिसंबर 1932 | भाग नहीं लिया | गांधीजी और कांग्रेस दोनों अनुपस्थित रहे। |
क्रम से याद करें
1932–1935 का महत्वपूर्ण घटनाक्रम
🧠 घटनाक्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
तृतीय गोलमेज सम्मेलन 17 नवंबर 1932 से 24 दिसंबर 1932 तक लंदन में आयोजित हुआ।
इस सम्मेलन में भागीदारी पहले की तुलना में कम थी और सामान्यतः 46 प्रतिनिधियों के भाग लेने का उल्लेख मिलता है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
डॉ. भीमराव आंबेडकर और तेज बहादुर सप्रू तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले प्रमुख भारतीय नेताओं में थे।
एम. आर. जयकर, एन. एम. जोशी और ए. रामास्वामी मुदलियार भी तीनों सम्मेलनों में शामिल हुए थे।
महात्मा गांधी केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए।
गोलमेज सम्मेलनों के बाद संवैधानिक प्रस्तावों को 1933 के श्वेत पत्र में आगे बढ़ाया गया और इस प्रक्रिया ने भारत शासन अधिनियम, 1935 की पृष्ठभूमि तैयार की।
1932 में अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना हुई, जिसका नाम बाद में हरिजन सेवक संघ रखा गया।
घनश्यामदास बिड़ला इसके प्रथम अध्यक्ष तथा अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर इसके प्रमुख सचिव बने।
गांधीजी से संबंधित ‘हरिजन’ अंग्रेजी साप्ताहिक का पहला अंक 11 फरवरी 1933 को प्रकाशित हुआ।
हिंदी में ‘हरिजन सेवक’ तथा गुजराती में ‘हरिजन बंधु’ भी अस्पृश्यता-विरोधी सामाजिक अभियान से जुड़े महत्वपूर्ण प्रकाशन बने।