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अगस्त प्रस्ताव
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अगस्त प्रस्ताव

1940 — द्वितीय विश्व युद्ध, संवैधानिक आश्वासन और कांग्रेस की प्रतिक्रिया

अगस्त प्रस्ताव की पृष्ठभूमि

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं की सहमति लिए बिना भारत को भी युद्धरत देश घोषित कर दिया। इसके विरोध में कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने 1939 में इस्तीफा दे दिया। युद्ध के बढ़ते संकट के बीच ब्रिटिश सरकार को भारतीय सहयोग की आवश्यकता थी। इसी राजनीतिक परिस्थिति में 1940 का अगस्त प्रस्ताव सामने आया।

01

रामगढ़ अधिवेशन

मार्च 1940

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मार्च 1940 में रामगढ़ में आयोजित हुआ। रामगढ़ उस समय बिहार में था और वर्तमान में झारखंड में स्थित है।

इस अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की।

कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि भारत के लोगों की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल करना स्वीकार्य नहीं था और भारत को अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए।

युद्ध के दौरान कांग्रेस की नीति का केंद्रीय आधार यह था कि भारत को वास्तविक राजनीतिक सत्ता और उत्तरदायी राष्ट्रीय शासन मिले। 1940 के दौरान कांग्रेस ने केंद्र में ऐसी अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की माँग भी आगे रखी जिसके आधार पर स्वतंत्र भारत युद्ध और अपनी रक्षा के संबंध में निर्णय ले सके।

🔎 ध्यान रखें

परीक्षा पुस्तकों में प्रायः लिखा मिलता है कि रामगढ़ अधिवेशन में कांग्रेस ने अंतरिम राष्ट्रीय सरकार बनने पर युद्ध में सहयोग का प्रस्ताव दिया। व्यापक घटनाक्रम में कांग्रेस की युद्ध-नीति रामगढ़ प्रस्ताव से आगे जून-जुलाई 1940 में कार्यसमिति और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के प्रस्तावों के माध्यम से विकसित हुई। इसलिए इसे केवल एक वाक्य में रामगढ़ अधिवेशन तक सीमित करके समझना अधूरा होगा।

02

अगस्त प्रस्ताव की घोषणा

8 अगस्त 1940

कांग्रेस की माँगों और द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय सहयोग प्राप्त करने की आवश्यकता के बीच भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को ब्रिटिश सरकार की ओर से एक घोषणा की।

यह घोषणा भारतीय इतिहास में अगस्त प्रस्ताव के नाम से प्रसिद्ध हुई।

इसका मुख्य उद्देश्य युद्ध के समय भारतीय राजनीतिक दलों का सहयोग प्राप्त करना और भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था के संबंध में कुछ आश्वासन देना था।

🎯 सीधा प्रश्न

अगस्त प्रस्ताव — 8 अगस्त 1940 — लॉर्ड लिनलिथगो।

03

डोमिनियन स्टेटस

ब्रिटिश सरकार का संवैधानिक उद्देश्य

अगस्त प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार ने भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस को अपने संवैधानिक उद्देश्य के रूप में दोहराया।

इसका अर्थ भारत को तत्काल डोमिनियन स्टेटस प्रदान करना नहीं था। प्रस्ताव में युद्ध समाप्त होने के बाद भारत की नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही गई।

कांग्रेस पहले ही पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित कर चुकी थी, इसलिए डोमिनियन स्टेटस का आश्वासन उसकी माँग को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

🎯 भ्रम न रखें

अगस्त प्रस्ताव = तत्काल डोमिनियन स्टेटस नहीं।
ब्रिटिश सरकार ने इसे भारत के भावी संवैधानिक विकास का उद्देश्य बताया था।

04

संविधान निर्माण का अधिकार

भारतीयों के अधिकार की महत्वपूर्ण स्वीकृति

अगस्त प्रस्ताव की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक यह थी कि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के अपना संविधान स्वयं बनाने के अधिकार को स्वीकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

प्रस्ताव के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद एक प्रतिनिधि संविधान-निर्माण निकाय गठित किया जाना था, जिसमें भारतीय भारत की नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाते।

यह भारतीय संविधान सभा की माँग की दिशा में ब्रिटिश सरकार की महत्वपूर्ण स्वीकृति थी, यद्यपि उस समय पूर्ण संप्रभु संविधान सभा तुरंत स्थापित नहीं की गई।

📗 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण

अगस्त प्रस्ताव में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों द्वारा अपना संविधान बनाने के सिद्धांत को महत्वपूर्ण रूप से स्वीकार किया।

05

वायसराय की कार्यकारिणी परिषद

अधिक भारतीय सदस्यों की भागीदारी

अगस्त प्रस्ताव में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार करने और उसमें अधिक भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया।

ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य युद्धकालीन शासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाकर भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का सहयोग प्राप्त करना था।

लेकिन वास्तविक सत्ता वायसराय और ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही रहने वाली थी। इसलिए कांग्रेस इसे वास्तविक राष्ट्रीय सरकार का विकल्प नहीं मानती थी।

06

युद्ध सलाहकार परिषद

युद्ध संबंधी मामलों में भारतीय भागीदारी

अगस्त प्रस्ताव में एक युद्ध सलाहकार परिषद स्थापित करने की भी बात कही गई।

इसमें ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को शामिल करके युद्ध संबंधी मामलों पर उनकी सलाह लेने की योजना थी।

यह परिषद मूलतः सलाहकारी प्रकृति की थी; अंतिम सत्ता ब्रिटिश शासन के पास ही बनी रहती।

07

अल्पसंख्यकों को आश्वासन

भावी संविधान पर महत्वपूर्ण शर्त

अगस्त प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी ऐसी संवैधानिक व्यवस्था को लागू नहीं किया जाएगा जिसे भारत के महत्वपूर्ण और शक्तिशाली राजनीतिक तत्व स्वीकार न करते हों।

इससे अल्पसंख्यकों की सहमति को विशेष महत्व मिला। व्यवहार में इस व्यवस्था ने मुस्लिम लीग की सहमति को भावी संवैधानिक परिवर्तन में अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया।

कांग्रेस ने इस व्यवस्था की आलोचना की, क्योंकि इससे राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक प्रगति को अल्पसंख्यक असहमति के आधार पर रोके जाने की संभावना उत्पन्न होती थी।

08

कांग्रेस ने प्रस्ताव क्यों अस्वीकार किया?

तत्काल सत्ता हस्तांतरण का अभाव

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

कांग्रेस की प्रमुख माँग केंद्र में वास्तविक उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार की स्थापना और भारतीयों को प्रभावी राजनीतिक सत्ता देना थी। अगस्त प्रस्ताव ने तत्काल ऐसी सरकार स्थापित करने की माँग स्वीकार नहीं की।

डोमिनियन स्टेटस का भावी आश्वासन भी कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि कांग्रेस 1929 के लाहौर अधिवेशन से पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित कर चुकी थी।

🎯 निष्कर्ष

कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

09

जवाहरलाल नेहरू की प्रतिक्रिया

डोमिनियन स्टेटस की आलोचना

जवाहरलाल नेहरू ने अगस्त प्रस्ताव में प्रस्तुत डोमिनियन स्टेटस की धारणा को अत्यंत अपर्याप्त माना।

उनका आशय था कि भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ डोमिनियन स्टेटस की पुरानी अवधारणा से बहुत आगे निकल चुकी थीं और अब भारत की माँग वास्तविक स्वतंत्रता थी।

10

मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया

पाकिस्तान की माँग और अल्पसंख्यक अधिकार

मुस्लिम लीग ने भी अगस्त प्रस्ताव को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया, क्योंकि मार्च 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद वह मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग आगे बढ़ा चुकी थी।

फिर भी अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना कोई भावी संवैधानिक व्यवस्था लागू न करने का ब्रिटिश आश्वासन मुस्लिम लीग के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।

11

व्यक्तिगत सत्याग्रह की पृष्ठभूमि

अक्टूबर 1940

अगस्त प्रस्ताव से कांग्रेस संतुष्ट नहीं हुई और ब्रिटिश सरकार तथा कांग्रेस के बीच राजनीतिक गतिरोध बना रहा।

इसके बाद गांधीजी ने बड़े पैमाने पर जन आंदोलन के स्थान पर सीमित रूप में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू करने का निर्णय किया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रमुख उद्देश्य भारतीय जनता के युद्ध का विरोध करने और युद्ध में जबरन सहयोग न करने के अधिकार को व्यक्त करना था।

17 अक्टूबर 1940 को विनोबा भावे प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही बने। जवाहरलाल नेहरू दूसरे व्यक्तिगत सत्याग्रही थे।

🎯 बहुत महत्वपूर्ण

प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही — विनोबा भावे
द्वितीय व्यक्तिगत सत्याग्रही — जवाहरलाल नेहरू

12

अगस्त प्रस्ताव के मुख्य प्रावधान

एक नज़र में

प्रावधान मुख्य बात
डोमिनियन स्टेटस भारत के भावी संवैधानिक विकास के उद्देश्य के रूप में दोहराया गया
संविधान निर्माण युद्ध के बाद प्रतिनिधि भारतीय निकाय द्वारा नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार करने की बात
कार्यकारिणी परिषद वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार और अधिक भारतीयों को शामिल करना
युद्ध सलाहकार परिषद युद्ध से संबंधित मामलों के लिए सलाहकार परिषद की स्थापना
अल्पसंख्यक उनकी सहमति और विचारों को भावी संवैधानिक व्यवस्था में विशेष महत्व
कांग्रेस की माँग तत्काल अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की माँग स्वीकार नहीं की गई
13

पूरा घटनाक्रम

क्रम से याद करें

🧠 त्वरित क्रम

1939 — द्वितीय विश्व युद्ध कांग्रेस मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र मार्च 1940 — रामगढ़ अधिवेशन राष्ट्रीय सरकार की माँग 8 अगस्त 1940 — अगस्त प्रस्ताव कांग्रेस ने अस्वीकार किया 17 अक्टूबर 1940 — व्यक्तिगत सत्याग्रह

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

अगस्त प्रस्ताव — 8 अगस्त 1940 — वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो।

1940 में कांग्रेस का अधिवेशन रामगढ़ में हुआ जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की।

कांग्रेस की युद्ध संबंधी नीति का आधार यह था कि भारत को वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता और उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार मिले; 1940 में केंद्र में अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की माँग प्रमुख बनी।

ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से 8 अगस्त 1940 को अगस्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

अगस्त प्रस्ताव में भारत को तत्काल डोमिनियन स्टेटस नहीं दिया गया, बल्कि डोमिनियन स्टेटस को भावी संवैधानिक उद्देश्य के रूप में दोहराया गया।

युद्ध के बाद भारतीयों को अपना संविधान तैयार करने में प्रमुख भूमिका देने के लिए प्रतिनिधि संविधान-निर्माण निकाय की बात कही गई।

वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार करके उसमें अधिक भारतीयों को शामिल करने का प्रस्ताव था।

एक युद्ध सलाहकार परिषद बनाने की भी घोषणा की गई।

भावी संवैधानिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों की सहमति को विशेष महत्व दिया गया।

कांग्रेस की तत्काल राष्ट्रीय सरकार की माँग स्वीकार नहीं होने के कारण कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

अगस्त प्रस्ताव के बाद राजनीतिक गतिरोध बना रहा और गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ किया। इसके प्रथम सत्याग्रही विनोबा भावे और दूसरे जवाहरलाल नेहरू थे।

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