बौद्ध धर्म
गौतम बुद्ध, दर्शन, त्रिपिटक, संघ, संगीतियाँ एवं बौद्ध परंपराएँ
गौतम बुद्ध
सिद्धार्थ से बुद्ध तक
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध थे। उन्हें आधुनिक साहित्य में एशिया का प्रकाश भी कहा गया है।
उनका जन्म लुम्बिनी में शाक्य कुल में हुआ। यह स्थान वर्तमान नेपाल में है।
उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के प्रमुख थे।
उनकी माता मायादेवी की मृत्यु उनके जन्म के कुछ समय बाद हो गई। उनका पालन-पोषण महाप्रजापति गौतमी ने किया।
उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।
उनकी पत्नी का नाम यशोधरा और पुत्र का नाम राहुल था।
प्रतियोगी परीक्षाओं में बुद्ध की पारंपरिक तिथियाँ 563–483 ईसा पूर्व प्रचलित हैं। उनकी सटीक ऐतिहासिक तिथियों के विषय में विद्वानों में मतभेद है।
महाभिनिष्क्रमण
गृहत्याग और प्रारंभिक गुरु
लगभग 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने गृहत्याग किया। इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है।
गृहत्याग के बाद उन्होंने आलार कालाम से ध्यान की उच्च अवस्थाओं की शिक्षा प्राप्त की।
इसके बाद उन्होंने उद्दक रामपुत्त से भी साधना की शिक्षा ली।
इन साधनाओं से अंतिम मुक्ति का मार्ग न मिलने पर सिद्धार्थ ने कठोर तपस्या की। बाद में उन्होंने अत्यधिक तपस्या छोड़कर मध्यम मार्ग अपनाया।
ज्ञान प्राप्ति
बोधगया
लगभग छह वर्षों की साधना के बाद सिद्धार्थ ने उरुवेला में निरंजना नदी के निकट पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान किया।
लगभग 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात उन्हें सम्बोधि या ज्ञान प्राप्त हुआ।
इसके बाद वे बुद्ध अर्थात जाग्रत कहलाए और वह स्थान बोधगया के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने बोधगया के आसपास लगभग सात सप्ताह अर्थात 49 दिन बिताए।
धर्मचक्रप्रवर्तन
सारनाथ का प्रथम उपदेश
ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के निकट सारनाथ में दिया।
यह स्थान प्राचीन साहित्य में ऋषिपत्तन या इसिपतन कहलाता है।
इस प्रथम उपदेश को धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है।
बुद्ध ने अपनी शिक्षाएँ जनसामान्य द्वारा समझी जाने वाली मध्य भारतीय बोलियों में दीं। बाद में उनकी शिक्षाएँ पाली सहित कई भाषाओं में सुरक्षित हुईं।
श्रावस्ती बुद्ध के सबसे महत्वपूर्ण प्रवास और उपदेश-स्थलों में था।
बुद्ध के राजकीय संरक्षक
मगध और कोशल
मगध के बिम्बिसार और अजातशत्रु तथा कोशल के प्रसेनजित बुद्ध के समय के प्रमुख शासक थे जिनका बौद्ध परंपरा से निकट संबंध था।
व्यापारी अनाथपिण्डिक ने श्रावस्ती में प्रसिद्ध जेतवन विहार बुद्ध और संघ के लिए प्रदान किया।
महापरिनिर्वाण
कुशीनारा
बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध ने लगभग 80 वर्ष की आयु में मल्ल गणराज्य के कुशीनारा में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
महापरिनिर्वाण से पहले चुंद द्वारा उन्हें अंतिम भोजन अर्पित किया गया था।
बुद्ध की मृत्यु को महापरिनिर्वाण कहा जाता है।
त्रिपिटक
बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ
बौद्ध धर्म की प्रारंभिक शिक्षाओं और संघ-व्यवस्था की विस्तृत जानकारी त्रिपिटक से मिलती है।
थेरवाद परंपरा का पाली त्रिपिटक तीन भागों में विभाजित है — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक।
विनय पिटक में संघ के नियम, सुत्त पिटक में उपदेश और अभिधम्म पिटक में दार्शनिक विश्लेषण मिलता है।
श्रीलंकाई परंपरा के अनुसार पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा वट्टगामणि अभय के समय पाली त्रिपिटक को लिखित रूप दिया गया।
थेरगाथा और थेरीगाथा
भिक्षु एवं भिक्षुणियों के पद्य
थेरगाथा में प्रारंभिक बौद्ध भिक्षुओं के पद्य सुरक्षित हैं।
थेरीगाथा में प्रारंभिक बौद्ध भिक्षुणियों के अनुभव और आध्यात्मिक पद्य मिलते हैं।
बौद्ध दर्शन
दुःख, तृष्णा और निर्वाण
बौद्ध धर्म किसी सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को मोक्ष का आवश्यक आधार नहीं मानता।
बौद्ध दर्शन का महत्वपूर्ण सिद्धांत अनात्मवाद है। इसके अनुसार कोई स्थायी और अपरिवर्तनीय आत्मा नहीं है।
बौद्ध धर्म कर्म और पुनर्जन्म को स्वीकार करता है।
बुद्ध ने दुःख का कारण तृष्णा बताया। तृष्णा के क्षय से निर्वाण प्राप्त होता है।
बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य हैं — दुःख, दुःख-समुदय, दुःख-निरोध और दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा।
बौद्ध संघ
भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक और उपासिका
संन्यास ग्रहण कर संघ में रहने वाले पुरुष भिक्षु और स्त्रियाँ भिक्षुणी कहलाती थीं।
गृहस्थ पुरुष अनुयायी उपासक और गृहस्थ स्त्री अनुयायी उपासिका कहलाती थी।
संघ में प्रारंभिक प्रवेश को प्रव्रज्या और पूर्ण भिक्षु-दीक्षा को उपसम्पदा कहा जाता था।
पूर्ण उपसम्पदा के लिए सामान्य न्यूनतम आयु 20 वर्ष मानी गई।
बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं — बुद्ध, धम्म और संघ।
चार प्रमुख बौद्ध संगीतियाँ
परंपरागत विवरण
| संगीति | स्थान | प्रमुख भिक्षु | शासक | मुख्य महत्व |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | राजगृह | महाकश्यप | अजातशत्रु | बुद्ध की शिक्षाओं और विनय का मौखिक संकलन |
| द्वितीय | वैशाली | सब्बकामी / रेवत परंपरा | कालाशोक | विनय संबंधी विवादों पर चर्चा |
| तृतीय | पाटलिपुत्र | मोग्गलिपुत्त तिस्स | अशोक | संघ का पुनर्गठन और धर्म-प्रचार |
| चतुर्थ | कश्मीर क्षेत्र / कुंडलवन | वसुमित्र | कनिष्क | सर्वास्तिवाद परंपरा की महत्वपूर्ण संगीति |
महायान और प्रारंभिक बौद्ध परंपराएँ
बोधिसत्त्व और अर्हत
समय के साथ बौद्ध धर्म में अनेक निकाय और दार्शनिक परंपराएँ विकसित हुईं।
महायान परंपरा में बोधिसत्त्व आदर्श को विशेष महत्व मिला।
प्रारंभिक बौद्ध निकायों और थेरवाद परंपरा में अर्हत आदर्श का विशेष महत्व है।
महायान का विकास कई शताब्दियों में धीरे-धीरे हुआ। इसे कनिष्क की चतुर्थ संगीति के तुरंत बाद हुए एक ही विभाजन का परिणाम नहीं माना जाता।
बुद्ध पूर्णिमा और निर्वाण
वैशाख पूर्णिमा
वैशाख पूर्णिमा बौद्ध धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है।
थेरवाद परंपरा में बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण तीनों वैशाख पूर्णिमा से संबंधित माने जाते हैं।
निर्वाण का अर्थ तृष्णा, द्वेष और मोह की अग्नि का शांत होना और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति है।
जैन धर्म स्थायी जीव या आत्मा को स्वीकार करता है, जबकि बौद्ध धर्म अनात्मवाद मानता है।
मैत्रेय और पद्मसंभव
बौद्ध धर्म का विस्तार
बौद्ध परंपरा में मैत्रेय को भविष्य का बुद्ध माना जाता है।
गौतम बुद्ध को शाक्य कुल में जन्म लेने के कारण शाक्यमुनि भी कहा जाता है।
आठवीं शताब्दी में पद्मसंभव ने तिब्बत में तांत्रिक बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनका संबंध वज्रयान परंपरा से था।
हिमाचल प्रदेश की रेवालसर झील के निकट उनकी विशाल प्रतिमा स्थित है।
बुद्ध प्रतिमाओं का विकास
गांधार और मथुरा
प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, पदचिह्न और खाली सिंहासन जैसे प्रतीकों से दिखाया जाता था।
बुद्ध की मानव-रूप प्रतिमाएँ लगभग पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास गांधार और मथुरा कला-केंद्रों में प्रमुख रूप से विकसित हुईं।
भारत में बुद्ध की प्रतिमा से पहले भी यक्ष-यक्षिणी तथा अन्य धार्मिक प्रतिमाओं की परंपरा मौजूद थी।
भारत के प्रमुख बौद्ध मठ
महत्वपूर्ण स्थान
| मठ | स्थान | राज्य / केंद्रशासित प्रदेश |
|---|---|---|
| ताबो मठ | ताबो, स्पीति | हिमाचल प्रदेश |
| नामग्याल मठ | धर्मशाला | हिमाचल प्रदेश |
| हेमिस मठ | हेमिस | लद्दाख |
| थिकसे मठ | थिकसे | लद्दाख |
| शाशुर मठ | लाहौल क्षेत्र | हिमाचल प्रदेश |
| माइंड्रोलिंग मठ | देहरादून | उत्तराखंड |
| रुमटेक मठ | गंगटोक के निकट | सिक्किम |
| तवांग मठ | तवांग | अरुणाचल प्रदेश |
| नामद्रोलिंग मठ | बायलाकुप्पे | कर्नाटक |
| बोधिमंड विहार | बोधगया | बिहार |
चार दृश्य और गृहत्याग
बुद्ध के जीवन की पारंपरिक कथा
बौद्ध परंपरा में सिद्धार्थ के वैराग्य से पहले चार दृश्यों का उल्लेख मिलता है — वृद्ध व्यक्ति, रोगी, मृत व्यक्ति और संन्यासी।
इन दृश्यों ने उन्हें जीवन में जरा, रोग और मृत्यु की अनिवार्यता पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद लगभग 29 वर्ष की आयु में उनका गृहत्याग महाभिनिष्क्रमण कहलाया।
बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाएँ
चार प्रमुख पवित्र स्थल
| घटना | स्थान | महत्व |
|---|---|---|
| जन्म | लुम्बिनी | सिद्धार्थ का जन्म |
| ज्ञान प्राप्ति | बोधगया | बुद्धत्व की प्राप्ति |
| प्रथम उपदेश | सारनाथ | धर्मचक्रप्रवर्तन |
| महापरिनिर्वाण | कुशीनगर / कुशीनारा | बुद्ध का अंतिम निर्वाण |
एक लाइन में
लुम्बिनी → बोधगया → सारनाथ → कुशीनगर
चार आर्य सत्य
बौद्ध दर्शन का आधार
बुद्ध की शिक्षाओं का केंद्रीय आधार चार आर्य सत्य हैं।
प्रथम — दुःख: सांसारिक जीवन में दुःख विद्यमान है।
द्वितीय — दुःख-समुदय: दुःख का प्रमुख कारण तृष्णा है।
तृतीय — दुःख-निरोध: तृष्णा के समाप्त होने पर दुःख का निरोध संभव है।
चतुर्थ — दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा: दुःख की समाप्ति का मार्ग आर्य अष्टांगिक मार्ग है।
आर्य अष्टांगिक मार्ग
निर्वाण की ओर आठ मार्ग
बुद्ध ने दुःख से मुक्ति के लिए आर्य अष्टांगिक मार्ग बताया।
इसके आठ अंग हैं — सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।
इन आठ अंगों को व्यापक रूप से प्रज्ञा, शील और समाधि के अंतर्गत भी समझा जाता है।
मध्यम प्रतिपदा
दो अतियों से बचने का मार्ग
बुद्ध ने अत्यधिक भोग-विलास और अत्यधिक कठोर तपस्या, दोनों को मुक्ति के लिए उचित नहीं माना।
इन दोनों अतियों के बीच के संतुलित मार्ग को मध्यम प्रतिपदा या मध्यम मार्ग कहा गया।
बुद्ध के अनुसार नैतिक जीवन, मानसिक अनुशासन और प्रज्ञा का संतुलित विकास दुःख से मुक्ति की दिशा में आवश्यक है।
प्रतीत्यसमुत्पाद
कारण और परिणाम का सिद्धांत
बौद्ध दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतीत्यसमुत्पाद है।
इसका सामान्य अर्थ है कि वस्तुएँ और घटनाएँ कारणों तथा परिस्थितियों पर निर्भर होकर उत्पन्न होती हैं।
अर्थात किसी घटना का अस्तित्व स्वतंत्र और बिना कारण के नहीं होता। कारणों के समाप्त होने पर उनसे उत्पन्न परिणाम भी समाप्त हो जाते हैं।
दुःख की उत्पत्ति और दुःख के निरोध को समझने में प्रतीत्यसमुत्पाद का विशेष महत्व है।
अनित्य और अनात्मवाद
बौद्ध दर्शन के प्रमुख सिद्धांत
बौद्ध दर्शन में अनित्य का अर्थ है कि सभी संस्कारित वस्तुएँ परिवर्तनशील हैं।
अनात्मवाद के अनुसार मनुष्य में कोई स्थायी और अपरिवर्तनीय आत्मा नहीं मानी जाती।
इस प्रकार अनित्य, दुःख और अनात्म बौद्ध चिंतन में अस्तित्व को समझने के महत्वपूर्ण आधार हैं।
पंचशील
गृहस्थ अनुयायियों का नैतिक आचरण
बौद्ध धर्म में गृहस्थ अनुयायियों के लिए पंचशील महत्वपूर्ण नैतिक नियम हैं।
इनमें — प्राणीहत्या से बचना, चोरी से बचना, अनुचित यौन आचरण से बचना, असत्य भाषण से बचना और मादक पदार्थों से बचना शामिल हैं।
इनका उद्देश्य व्यक्ति के आचरण में अहिंसा, सत्य, संयम और सजगता का विकास करना है।
बुद्ध के प्रमुख शिष्य
संघ के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व
सारिपुत्त बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में थे और प्रज्ञा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध माने जाते हैं।
मोग्गल्लान भी बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में थे। सारिपुत्त और मोग्गल्लान को परंपरा में बुद्ध के दो प्रमुख शिष्य माना जाता है।
आनंद बुद्ध के निकट सहयोगी और परिचारक थे। बुद्ध के अनेक उपदेशों को स्मरण रखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
महाकश्यप का प्रथम बौद्ध संगीति से विशेष संबंध है।
उपालि को विनय परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है।
महाप्रजापति गौतमी बुद्ध की पालक माता थीं और बौद्ध भिक्षुणी संघ की स्थापना से उनका विशेष संबंध है।
सुत्त पिटक के पाँच निकाय
पाली त्रिपिटक
पाली त्रिपिटक के सुत्त पिटक को पाँच प्रमुख निकायों में व्यवस्थित किया गया है।
ये हैं — दीघ निकाय, मज्झिम निकाय, संयुत्त निकाय, अंगुत्तर निकाय और खुद्दक निकाय।
अंगुत्तर निकाय भारतीय इतिहास में सोलह महाजनपदों की प्रसिद्ध सूची के लिए भी महत्वपूर्ण है।
धम्मपद खुद्दक निकाय से संबंधित अत्यंत प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ है, जिसमें नैतिक और धार्मिक उपदेशों के पद्य मिलते हैं।
जातक कथाएँ
बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाएँ
जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों से संबंधित कथाएँ मिलती हैं।
इन कथाओं में नैतिक शिक्षा, सामाजिक जीवन, व्यापार, राजनीति और तत्कालीन समाज से संबंधित अनेक विवरण सुरक्षित हैं।
प्राचीन भारतीय इतिहास और समाज के अध्ययन में जातक साहित्य एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है।
मिलिंदपन्हो
मिनांडर और नागसेन
मिलिंदपन्हो एक प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ है।
इसमें हिन्द-यूनानी शासक मिनांडर या मिलिंद और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच प्रश्नोत्तर और दार्शनिक संवाद मिलता है।
यह ग्रंथ बौद्ध दर्शन के अनेक सिद्धांतों को संवादात्मक शैली में प्रस्तुत करता है।
अशोक और बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म के प्रसार में भूमिका
मौर्य सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध राजकीय संरक्षकों में था।
कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने धम्म के प्रचार को विशेष महत्व दिया। उसका धम्म केवल संकीर्ण बौद्ध धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक आचरण की व्यापक नीति थी।
बौद्ध परंपरा में अशोक के समय तृतीय बौद्ध संगीति पाटलिपुत्र में आयोजित मानी जाती है।
परंपरा के अनुसार महेंद्र और संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रसार से जोड़ा जाता है।
अशोक के संरक्षण में स्तूपों, धार्मिक स्मारकों और बौद्ध तीर्थस्थलों का विकास हुआ।
थेरवाद, महायान और वज्रयान
बौद्ध धर्म की प्रमुख परंपराएँ
| परंपरा | प्रमुख विशेषता | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| थेरवाद | पाली त्रिपिटक और अर्हत आदर्श को विशेष महत्व | श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार आदि |
| महायान | बोधिसत्त्व आदर्श और अनेक महायान सूत्रों का विकास | चीन, कोरिया, जापान आदि |
| वज्रयान | मंत्र, मंडल और तांत्रिक साधना की विशिष्ट परंपराएँ | तिब्बत, हिमालयी क्षेत्र आदि |
स्तूप, चैत्य और विहार
बौद्ध स्थापत्य
स्तूप बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण स्मारक रूप है। प्रारंभ में स्तूपों का संबंध अवशेषों के संरक्षण और स्मृति से था।
चैत्य सामान्यतः बौद्ध उपासना या प्रार्थना स्थल को कहा जाता है। शैलकृत चैत्यगृहों में स्तूप प्रमुख उपासना केंद्र होता था।
विहार बौद्ध भिक्षुओं के निवास और अध्ययन के लिए बने मठीय परिसर थे।
सांची भारत के सबसे प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप-केंद्रों में से एक है।
प्रमुख बौद्ध तीर्थ एवं केंद्र
भारत और उपमहाद्वीप
| स्थान | महत्व |
|---|---|
| लुम्बिनी | बुद्ध का जन्मस्थान |
| बोधगया | ज्ञान प्राप्ति |
| सारनाथ | प्रथम उपदेश |
| कुशीनगर | महापरिनिर्वाण |
| श्रावस्ती | बुद्ध के लंबे प्रवास और उपदेशों का प्रमुख केंद्र |
| राजगृह | बुद्ध से संबंधित प्रमुख स्थल तथा प्रथम संगीति |
| वैशाली | बुद्ध से संबंधित महत्वपूर्ण स्थल तथा द्वितीय संगीति |
| सांची | प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप |
| नालंदा | प्रसिद्ध प्राचीन बौद्ध शिक्षा और मठीय केंद्र |
बौद्ध धर्म के प्रमुख प्रतीक
जीवन की घटनाओं से संबंध
| प्रतीक | सामान्य संबंध |
|---|---|
| कमल | पवित्रता तथा बुद्ध के जन्म से प्रतीकात्मक संबंध |
| बोधिवृक्ष | ज्ञान प्राप्ति |
| धर्मचक्र | प्रथम उपदेश और धर्मचक्रप्रवर्तन |
| पदचिह्न | बुद्ध की उपस्थिति का प्रारंभिक प्रतीक |
| स्तूप | अवशेष, स्मृति और महापरिनिर्वाण से संबंध |
बुद्ध की प्रमुख मुद्राएँ
बौद्ध प्रतिमा कला
बुद्ध प्रतिमाओं में हाथों की विशिष्ट स्थितियों को मुद्रा कहा जाता है।
भूमिस्पर्श मुद्रा — ज्ञान प्राप्ति के प्रसंग से संबंधित प्रसिद्ध मुद्रा है।
धर्मचक्र मुद्रा — धर्म के उपदेश और धर्मचक्रप्रवर्तन से संबंधित मानी जाती है।
अभय मुद्रा — निर्भयता और सुरक्षा का प्रतीक है।
ध्यान मुद्रा — ध्यान और समाधि से संबंधित है।
वरद मुद्रा — दान, अनुग्रह और करुणा से संबंधित मानी जाती है।
बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण
भारत से एशिया तक
बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ अपेक्षाकृत सरल, व्यावहारिक और नैतिक जीवन पर आधारित थीं।
बुद्ध ने जनसामान्य द्वारा समझी जाने वाली भाषाओं और बोलियों में उपदेश दिए, जिससे उनकी शिक्षाएँ व्यापक समाज तक पहुँचीं।
संघ ने शिक्षाओं के संरक्षण और प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अशोक, कनिष्क और अनेक अन्य शासकों तथा व्यापारियों के संरक्षण ने बौद्ध धर्म के प्रसार में सहायता की।
व्यापारिक मार्गों के माध्यम से बौद्ध धर्म मध्य एशिया, श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, कोरिया, जापान और तिब्बत सहित एशिया के अनेक क्षेत्रों तक पहुँचा।
बौद्ध धर्म — अंतिम परीक्षा पुनरावृत्ति
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक — गौतम बुद्ध।
बचपन का नाम — सिद्धार्थ।
कुल — शाक्य।
पिता — शुद्धोधन; माता — मायादेवी।
पालन-पोषण — महाप्रजापति गौतमी।
पत्नी — यशोधरा; पुत्र — राहुल।
जन्मस्थान — लुम्बिनी।
गृहत्याग — लगभग 29 वर्ष; महाभिनिष्क्रमण।
प्रमुख गुरु — आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त।
ज्ञान प्राप्ति — लगभग 35 वर्ष की आयु में, बोधगया।
प्रथम उपदेश — सारनाथ; धर्मचक्रप्रवर्तन।
महापरिनिर्वाण — कुशीनारा/कुशीनगर।
चार आर्य सत्य — दुःख, समुदय, निरोध और मार्ग।
दुःख का प्रमुख कारण — तृष्णा।
दुःख-निरोध का मार्ग — आर्य अष्टांगिक मार्ग।
प्रमुख सिद्धांत — मध्यम मार्ग, अनित्य, अनात्मवाद और प्रतीत्यसमुत्पाद।
त्रिरत्न — बुद्ध, धम्म और संघ।
त्रिपिटक — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक।
थेरगाथा — भिक्षुओं के पद्य; थेरीगाथा — भिक्षुणियों के पद्य।
जातक — बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाएँ।
मिलिंदपन्हो — मिलिंद और नागसेन का संवाद।
प्रथम संगीति — राजगृह; अजातशत्रु; महाकश्यप।
द्वितीय संगीति — वैशाली; कालाशोक।
तृतीय संगीति — पाटलिपुत्र; अशोक; मोग्गलिपुत्त तिस्स।
चतुर्थ संगीति — कश्मीर/कुंडलवन; कनिष्क; वसुमित्र।
भविष्य का बुद्ध — मैत्रेय।
पद्मसंभव — तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रसार से संबंधित।
मानवाकार बुद्ध प्रतिमाओं के प्रमुख प्रारंभिक केंद्र — गांधार और मथुरा।
चार प्रमुख स्थल — लुम्बिनी → बोधगया → सारनाथ → कुशीनगर।