शैव धर्म
रुद्र, शिव, पाशुपत, नाथ, लिंगायत एवं प्रमुख शैव परंपराएँ
रुद्र से शिव तक
वैदिक परंपरा
ऋग्वेद में रुद्र एक महत्वपूर्ण देवता हैं। बाद की धार्मिक परंपरा में रुद्र का स्वरूप शिव से जुड़ गया।
अथर्ववेद और बाद के वैदिक साहित्य में रुद्र-शिव से संबंधित भव, शर्व और पशुपति जैसे नाम मिलते हैं।
हड़प्पा सभ्यता की कुछ मुहरों और वस्तुओं को कुछ विद्वानों ने शिव या लिंग-पूजा के प्रारंभिक रूप से जोड़ा है। इस विषय में विद्वानों में मतभेद है।
शिव-लिंग की स्पष्ट और विकसित उपासना उत्तरवैदिक, महाकाव्य और पुराणिक परंपराओं में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
शैव संप्रदाय
पाशुपत से लिंगायत तक
पाशुपत शैव धर्म की सबसे प्राचीन संगठित परंपराओं में से एक है।
इसके व्यवस्थित विकास का संबंध लकुलीश से जोड़ा जाता है।
पाशुपत दर्शन में पाँच प्रमुख विषयों के कारण इसे पंचार्थ परंपरा भी कहा गया।
प्राचीन और मध्यकाल में पाशुपत, कापालिक और कालामुख जैसी शैव परंपराएँ विकसित हुईं।
लिंगायत या वीरशैव परंपरा का व्यापक संगठन 12वीं शताब्दी के कर्नाटक में बसव और अन्य शिवशरणों से जुड़ा है।
लिंगायत धार्मिक गुरुओं और संन्यासियों को जंगम कहा जाता है।
शून्य संपादने लिंगायत साहित्य की महत्वपूर्ण कन्नड़ रचना है।
नाथ संप्रदाय
मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ
नाथ परंपरा के प्रारंभिक महान गुरुओं में मत्स्येंद्रनाथ का प्रमुख स्थान है।
उन्हें सामान्यतः 9वीं–10वीं शताब्दी के आसपास रखा जाता है।
गोरखनाथ ने नाथ संप्रदाय को व्यापक संगठन और लोकप्रियता प्रदान की।
नाथ परंपरा में योग, हठयोग और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व रहा।
दक्षिण भारत में शैव धर्म
चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोल
दक्षिण भारत में चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोल काल में शैव धर्म अत्यंत प्रभावशाली रहा।
एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम के काल में निर्मित हुआ।
चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजावुर में प्रसिद्ध राजराजेश्वर या बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
पशुपतिनाथ मंदिर
काठमांडू
प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू में बागमती नदी के किनारे स्थित है।
मुख्य मंदिर नेपाली पैगोडा स्थापत्य का प्रसिद्ध उदाहरण है।
पशुपतिनाथ मंदिर क्षेत्र काठमांडू घाटी विश्व धरोहर स्थल के स्मारक-समूहों में शामिल है। काठमांडू घाटी को 1979 में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
शैव धर्म का सामान्य स्वरूप
शिव की उपासना
शैव धर्म हिंदू धार्मिक परंपराओं की प्रमुख धाराओं में से एक है, जिसमें शिव को सर्वोच्च देवता या परम तत्त्व के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है।
शिव की उपासना मानवाकार मूर्ति और शिवलिंग दोनों रूपों में की जाती है।
शिव के अनेक नाम और रूप प्रचलित हैं, जैसे — महादेव, महेश, शंकर, पशुपति, नटराज, भैरव और अर्धनारीश्वर।
शैव परंपरा भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम सभी क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में विकसित हुई।
शिवलिंग
शैव उपासना का प्रमुख प्रतीक
शिवलिंग शिव की उपासना के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक है।
मंदिरों में शिवलिंग सामान्यतः योनि-पट्ट पर स्थापित होता है।
शैव धार्मिक परंपरा में शिवलिंग शिव के निराकार और सृजनात्मक स्वरूप से संबंधित प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है।
शिवलिंग पर जल, दूध और अन्य पूजन-सामग्री से अभिषेक करने की परंपरा व्यापक है।
पाशुपत संप्रदाय और लकुलीश
प्राचीन संगठित शैव परंपरा
पाशुपत संप्रदाय शैव धर्म की सबसे प्राचीन ज्ञात संगठित संप्रदायिक परंपराओं में गिना जाता है।
इसमें शिव को पशुपति अर्थात जीवों के स्वामी के रूप में विशेष महत्व दिया गया।
लकुलीश को पाशुपत परंपरा के प्रमुख आचार्य के रूप में माना जाता है।
पाशुपत परंपरा के दार्शनिक आधार से पाशुपत सूत्र का विशेष संबंध है।
परीक्षा बिंदु
प्राचीन संगठित शैव संप्रदाय — पाशुपत।
पाशुपत परंपरा के प्रमुख आचार्य — लकुलीश।
नयनार संत
तमिल शैव भक्ति आंदोलन
दक्षिण भारत में प्रारंभिक मध्यकाल के दौरान शिव-भक्ति को लोकप्रिय बनाने में नयनार संतों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही।
तमिल शैव परंपरा में 63 नयनार प्रसिद्ध हैं।
नयनार संत विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए थे और उन्होंने व्यक्तिगत भक्ति को विशेष महत्व दिया।
प्रमुख नयनार संतों में अप्पर, सम्बंदर और सुंदरर विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
इन संतों की तमिल भक्ति रचनाओं ने दक्षिण भारत में शैव भक्ति के व्यापक प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तेवारम्
तमिल शैव भक्ति साहित्य
तेवारम् तमिल शैव भक्ति साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है।
इसमें मुख्य रूप से अप्पर, सम्बंदर और सुंदरर से संबंधित शिव-भक्ति के स्तोत्र संकलित हैं।
तेवारम् तमिल भक्ति साहित्य और दक्षिण भारतीय शैव परंपरा के अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत है।
शैव सिद्धांत
दक्षिण भारत की महत्वपूर्ण शैव परंपरा
शैव सिद्धांत शैव धर्म की महत्वपूर्ण दार्शनिक और धार्मिक परंपराओं में से एक है।
इसका विशेष विकास दक्षिण भारत, विशेषकर तमिल क्षेत्र में हुआ।
शैव सिद्धांत में सामान्यतः पति, पशु और पाश की अवधारणाएँ महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
पति शिव, पशु जीव और पाश जीव को बाँधने वाले बंधनों को दर्शाता है।
शिव की कृपा और आध्यात्मिक साधना द्वारा जीव को बंधनों से मुक्ति प्राप्त होने की धारणा महत्वपूर्ण है।
कश्मीर शैव दर्शन
उत्तर भारत की दार्शनिक परंपरा
कश्मीर क्षेत्र में शैव धर्म की एक अत्यंत विकसित दार्शनिक परंपरा का विकास हुआ, जिसे सामान्यतः कश्मीर शैव दर्शन कहा जाता है।
इसकी प्रमुख धाराओं में त्रिक और प्रत्यभिज्ञा परंपराएँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
कश्मीर शैव दर्शन से जुड़े प्रसिद्ध आचार्यों में वसुगुप्त, उत्पलदेव और अभिनवगुप्त के नाम उल्लेखनीय हैं।
शिवसूत्र का संबंध वसुगुप्त की परंपरा से माना जाता है।
अभिनवगुप्त कश्मीर शैव दर्शन के महान दार्शनिक, धर्मचिंतक और सौंदर्यशास्त्री माने जाते हैं।
शैव आगम
पूजा, दर्शन और मंदिर परंपरा
शैव धर्म में आगम ग्रंथों का महत्वपूर्ण स्थान है।
इनमें पूजा-पद्धति, मंदिर-निर्माण, मूर्ति-स्थापना, योग, मंत्र और धार्मिक दर्शन से संबंधित विस्तृत परंपराएँ मिलती हैं।
दक्षिण भारतीय शैव मंदिरों की पूजा-पद्धति और धार्मिक व्यवस्था पर शैव आगमिक परंपराओं का विशेष प्रभाव रहा।
नटराज
नृत्य करते शिव
शिव के नृत्यरत स्वरूप को नटराज कहा जाता है।
नटराज की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमाओं का उत्कृष्ट विकास विशेष रूप से चोल काल में हुआ।
नटराज रूप में शिव का तांडव नृत्य सृष्टि, स्थिति, संहार और ब्रह्मांडीय गति से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा जाता है।
तमिलनाडु का चिदंबरम नटराज मंदिर नटराज उपासना का अत्यंत प्रसिद्ध केंद्र है।
अर्धनारीश्वर
शिव और शक्ति का संयुक्त रूप
अर्धनारीश्वर शिव का एक प्रसिद्ध संयुक्त स्वरूप है, जिसमें शिव और पार्वती को एक ही शरीर के दो भागों के रूप में दिखाया जाता है।
इस प्रतिमा-रूप में सामान्यतः एक भाग पुरुष और दूसरा भाग स्त्री रूप में प्रदर्शित होता है।
अर्धनारीश्वर शिव और शक्ति की परस्पर पूरकता और अभिन्नता का महत्वपूर्ण धार्मिक प्रतीक है।
लिंगायत या वीरशैव परंपरा
बसव और शिवशरण
लिंगायत या वीरशैव परंपरा का व्यापक संगठन 12वीं शताब्दी के कर्नाटक में हुआ।
बसव इस धार्मिक-सामाजिक आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध व्यक्तित्वों में थे।
इस परंपरा में व्यक्तिगत रूप से धारण किए जाने वाले इष्टलिंग को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।
लिंगायत संत-कवियों को शिवशरण कहा गया और उनकी कन्नड़ रचनाओं को वचन साहित्य के रूप में विशेष प्रसिद्धि मिली।
अल्लम प्रभु और अक्का महादेवी इस परंपरा के प्रसिद्ध शिवशरणों में गिने जाते हैं।
शून्य संपादने
लिंगायत साहित्य
शून्य संपादने कन्नड़ भाषा में लिंगायत या वीरशैव परंपरा से संबंधित महत्वपूर्ण साहित्यिक संग्रह है।
इसमें शिवशरणों के बीच होने वाले आध्यात्मिक संवादों और विचारों को प्रस्तुत किया गया है।
लिंगायत साहित्य के अध्ययन में वचन साहित्य और शून्य संपादने दोनों का विशेष महत्व है।
शिव के प्रमुख प्रतीक
एक नजर में
| प्रतीक / वस्तु | शिव से संबंध |
|---|---|
| त्रिशूल | शिव का प्रमुख आयुध |
| डमरू | शिव से संबंधित प्रमुख वाद्य |
| नंदी | शिव का वाहन |
| गंगा | शिव की जटाओं से संबंधित पुराणिक परंपरा |
| तीसरा नेत्र | शिव का विशिष्ट प्रतीक |
| अर्धचंद्र | शिव के मस्तक पर प्रदर्शित |
| सर्प | शिव की प्रतिमाओं में प्रमुख अलंकरण |
| कैलाश पर्वत | शिव का पौराणिक निवास |
शिव परिवार
पार्वती, गणेश और कार्तिकेय
पुराणिक हिंदू परंपरा में शिव की पत्नी पार्वती मानी जाती हैं।
गणेश और कार्तिकेय शिव-पार्वती के पुत्रों के रूप में प्रसिद्ध हैं।
शिव का वाहन नंदी है, जिसकी प्रतिमा सामान्यतः शिव मंदिरों में शिवलिंग की ओर मुख किए दिखाई देती है।
प्रमुख शैव मंदिर
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
| मंदिर | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| कैलाश मंदिर | एलोरा, महाराष्ट्र | राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम से संबंधित प्रसिद्ध एकाश्म मंदिर |
| बृहदीश्वर मंदिर | तंजावुर, तमिलनाडु | राजराज प्रथम द्वारा निर्मित प्रसिद्ध चोल मंदिर |
| पशुपतिनाथ मंदिर | काठमांडू, नेपाल | बागमती नदी के किनारे प्रसिद्ध शिव मंदिर |
| चिदंबरम नटराज मंदिर | तमिलनाडु | नटराज रूप में शिव की उपासना |
| लिंगराज मंदिर | भुवनेश्वर, ओडिशा | शैव मंदिर स्थापत्य का प्रसिद्ध उदाहरण |
| कंदारिया महादेव मंदिर | खजुराहो, मध्य प्रदेश | चंदेल कालीन प्रसिद्ध शिव मंदिर |
| कैलासनाथ मंदिर | कांचीपुरम, तमिलनाडु | पल्लव काल का महत्वपूर्ण शिव मंदिर |
एलोरा का कैलाश मंदिर
एकाश्म शैलकृत स्थापत्य
एलोरा की गुफा संख्या 16 को कैलाश या कैलासनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।
यह विशाल मंदिर एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए भारतीय शैलकृत स्थापत्य के सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है।
इसका निर्माण मुख्य रूप से राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम के काल से संबंधित माना जाता है।
मंदिर शिव को समर्पित है और इसमें शिव से संबंधित अनेक मूर्तिकला दृश्य बने हैं।
बृहदीश्वर मंदिर
चोल स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण
तमिलनाडु के तंजावुर स्थित बृहदीश्वर मंदिर चोल स्थापत्य का अत्यंत प्रसिद्ध उदाहरण है।
इसका निर्माण चोल शासक राजराज प्रथम ने कराया।
इसे राजराजेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
यह मंदिर शिव को समर्पित है और चोल काल की मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला तथा कला परंपरा का महत्वपूर्ण स्मारक है।
महाशिवरात्रि
शिव का प्रमुख पर्व
महाशिवरात्रि शिव-उपासना का प्रमुख धार्मिक पर्व है।
इस अवसर पर शिव मंदिरों में पूजा, उपवास, रात्रि-जागरण और शिवलिंग के अभिषेक की परंपरा है।
यह पर्व भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय धार्मिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
शैव धर्म — अंतिम परीक्षा पुनरावृत्ति
ऋग्वेद में संबंधित प्रारंभिक देवता — रुद्र।
रुद्र-शिव के नाम — भव, शर्व और पशुपति।
शैव धर्म का प्रमुख उपास्य — शिव।
शिव का प्रमुख प्रतीक — शिवलिंग।
शिव का वाहन — नंदी।
शिव का प्रमुख आयुध — त्रिशूल।
शिव का नृत्य रूप — नटराज।
शिव-पार्वती का संयुक्त रूप — अर्धनारीश्वर।
प्राचीन संगठित शैव संप्रदाय — पाशुपत।
पाशुपत परंपरा के प्रमुख आचार्य — लकुलीश।
अन्य शैव परंपराएँ — कापालिक और कालामुख।
नाथ परंपरा — मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ।
तमिल शैव भक्ति संत — नयनार।
नयनार संतों की प्रसिद्ध संख्या — 63।
प्रमुख नयनार — अप्पर, सम्बंदर और सुंदरर।
तेवारम् — तमिल शैव भक्ति साहित्य।
शैव सिद्धांत — पति, पशु और पाश।
कश्मीर शैव दर्शन — त्रिक और प्रत्यभिज्ञा।
प्रमुख कश्मीर शैव आचार्य — वसुगुप्त, उत्पलदेव और अभिनवगुप्त।
लिंगायत/वीरशैव परंपरा — 12वीं शताब्दी का कर्नाटक।
लिंगायत परंपरा का प्रमुख नाम — बसव।
लिंगायत गुरु/संन्यासी — जंगम।
लिंगायत साहित्य — वचन साहित्य और शून्य संपादने।
एलोरा कैलाश मंदिर — कृष्ण प्रथम।
एलोरा कैलाश मंदिर — गुफा संख्या 16।
बृहदीश्वर मंदिर — राजराज प्रथम, तंजावुर।
पशुपतिनाथ मंदिर — काठमांडू, बागमती नदी।
शिव का प्रमुख पर्व — महाशिवरात्रि।