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सर जॉन शोर
SIR JOHN SHORE

सर जॉन शोर

1793–1798 — अहस्तक्षेप की नीति, चार्टर एक्ट और खर्डा का युद्ध

सर जॉन शोर

सर जॉन शोर ने लॉर्ड कॉर्नवालिस के बाद 1793 में बंगाल के गवर्नर-जनरल का पद संभाला और 1798 तक इस पद पर रहा। उसका कार्यकाल व्यापक सैन्य विस्तार की अपेक्षा अहस्तक्षेप और शांति की नीति के लिए जाना जाता है। उसके समय 1793 का चार्टर एक्ट लागू हुआ तथा 1795 में निजाम और मराठों के बीच प्रसिद्ध खर्डा का युद्ध हुआ।

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जॉन शोर का कार्यकाल

Governor-General — 1793–1798

सर जॉन शोर 1793 से 1798 तक बंगाल का गवर्नर-जनरल रहा। उसने लॉर्ड कॉर्नवालिस के बाद पद संभाला। वह ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक और राजस्व व्यवस्था से लंबे समय से जुड़ा हुआ था।

जॉन शोर विशेष रूप से राजस्व मामलों का जानकार माना जाता था। बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू किए जाने से पहले राजस्व व्यवस्था के अध्ययन और निर्धारण में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

1798 में भारत से लौटने के बाद उसे बैरन टेगनमाउथ की उपाधि प्रदान की गई और बाद में वह इसी नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।

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अहस्तक्षेप की नीति

Policy of Non-Intervention

सर जॉन शोर की विदेश नीति का मुख्य आधार अहस्तक्षेप की नीति था। वह भारतीय रियासतों के आपसी संघर्षों में अनावश्यक रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी को शामिल करने के पक्ष में नहीं था।

उसका उद्देश्य कंपनी के पहले से प्राप्त क्षेत्रों को सुरक्षित रखना और बिना आवश्यकता के नए युद्धों में धन तथा सैनिक शक्ति खर्च करने से बचना था। इसीलिए उसके शासनकाल को लॉर्ड कॉर्नवालिस और बाद में लॉर्ड वेलेजली की अधिक सक्रिय विस्तारवादी नीतियों के बीच एक अपेक्षाकृत शांत काल माना जाता है।

🎯 परीक्षा में सबसे महत्वपूर्ण

सर जॉन शोर की नीति — अहस्तक्षेप की नीति।

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चार्टर एक्ट — 1793

Charter Act — 1793

जॉन शोर के गवर्नर-जनरल बनने के वर्ष ही ब्रिटिश संसद द्वारा चार्टर एक्ट, 1793 पारित किया गया। इस अधिनियम द्वारा भारत के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए जारी रखा गया।

इस अधिनियम ने भारत में कंपनी के शासन और व्यापारिक अधिकारों की निरंतरता बनाए रखी तथा पूर्ववर्ती रेगुलेटिंग एक्ट और पिट्स इंडिया एक्ट से विकसित प्रशासनिक नियंत्रण की व्यवस्था को आगे बढ़ाया।

📗 याद रखें

चार्टर एक्ट 1793 — ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए जारी रखा गया।

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खर्डा का युद्ध — 1795

Battle of Kharda — 1795

सर जॉन शोर के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण भारतीय राजनीतिक घटनाओं में 1795 का खर्डा का युद्ध था। यह युद्ध हैदराबाद के निजाम और मराठों के बीच लड़ा गया।

हैदराबाद के निजाम निजाम अली खान, आसफ जाह द्वितीय का मराठों के साथ बकाया चौथ और अन्य राजनीतिक मामलों को लेकर विवाद बढ़ गया था। अंततः दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष हुआ और 11 मार्च 1795 को खर्डा के निकट निर्णायक युद्ध हुआ।

इस युद्ध में मराठों ने निजाम को पराजित किया। पराजय के बाद निजाम को मराठों की कठोर शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं और क्षेत्र तथा धन संबंधी रियायतें देनी पड़ीं।

यह युद्ध मराठा शक्ति के लिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें विभिन्न प्रमुख मराठा शक्तियाँ निजाम के विरुद्ध एक साथ खड़ी हुईं।

🎯 परीक्षा तथ्य

खर्डा का युद्ध — 1795 — निजाम बनाम मराठा — मराठों की विजय।

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खर्डा के युद्ध में अंग्रेजों की भूमिका

British Policy at Kharda

खर्डा के युद्ध के समय हैदराबाद का निजाम अंग्रेजों से सहायता की आशा रखता था, लेकिन जॉन शोर ने अपनी अहस्तक्षेप की नीति के कारण निजाम को सैनिक सहायता नहीं दी

अंग्रेजों के तटस्थ रहने के बाद निजाम को अकेले मराठों का सामना करना पड़ा और उसकी पराजय हुई। इस घटना से निजाम को यह अनुभव हुआ कि केवल तत्कालीन अंग्रेजी मैत्री उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं थी।

बाद में लॉर्ड वेलेजली के समय अंग्रेजों की नीति बदल गई और हैदराबाद का निजाम सहायक संधि व्यवस्था स्वीकार करने वाली प्रमुख भारतीय शक्तियों में शामिल हुआ।

🧠 कारण और परिणाम

जॉन शोर अहस्तक्षेप की नीति निजाम को अंग्रेजी सहायता नहीं खर्डा में निजाम की हार
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अवध का उत्तराधिकार विवाद

Awadh Succession Dispute

जॉन शोर के शासनकाल के अंतिम चरण में अवध के उत्तराधिकार का विवाद भी महत्वपूर्ण घटना थी। अवध के नवाब आसफ-उद-दौला की मृत्यु के बाद वजीर अली को नवाब बनाया गया, लेकिन उसकी वैधता और अंग्रेजों के साथ संबंधों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।

जॉन शोर ने बाद में वजीर अली को हटाकर सआदत अली खान द्वितीय को अवध का नवाब बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस घटना ने अवध के आंतरिक मामलों में कंपनी के बढ़ते प्रभाव को स्पष्ट कर दिया।

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जॉन शोर के शासन की विशेषता

Nature of Administration

जॉन शोर का शासन भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के बड़े सैन्य विस्तार के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्थिरता और अहस्तक्षेप की नीति के लिए अधिक प्रसिद्ध है।

उसने भारतीय शक्तियों के बीच चल रहे संघर्षों में कंपनी को यथासंभव तटस्थ रखने का प्रयास किया। हालांकि इस नीति की आलोचना भी हुई, क्योंकि खर्डा के युद्ध जैसे अवसरों पर अंग्रेजों के सहयोगी माने जाने वाले निजाम को सहायता नहीं मिली।

उसके बाद लॉर्ड वेलेजली गवर्नर-जनरल बना और उसने जॉन शोर की अहस्तक्षेप की नीति से अलग अधिक आक्रामक तथा विस्तारवादी नीति अपनाई।

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प्रमुख घटनाएँ — एक नजर में

Key Events

वर्ष घटना
1793 सर जॉन शोर ने बंगाल के गवर्नर-जनरल का पद संभाला।
1793 चार्टर एक्ट पारित हुआ; ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकार अगले 20 वर्षों के लिए जारी रहे।
1795 हैदराबाद के निजाम और मराठों के बीच खर्डा का युद्ध हुआ।
1795 खर्डा के युद्ध में मराठों ने निजाम को पराजित किया।
1795 जॉन शोर ने अहस्तक्षेप की नीति के कारण निजाम को सैनिक सहायता नहीं दी।
1798 जॉन शोर का गवर्नर-जनरल के रूप में कार्यकाल समाप्त हुआ।
1798 उसे बैरन टेगनमाउथ की उपाधि प्रदान की गई।
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त्वरित घटनाक्रम

Quick Revision

🧠 एक क्रम में याद रखें

1793 — जॉन शोर चार्टर एक्ट अहस्तक्षेप की नीति 1795 — खर्डा निजाम बनाम मराठा मराठों की विजय

⚡ त्वरित पुनरावृत्ति

सर जॉन शोर — 1793 से 1798 तक बंगाल का गवर्नर-जनरल।

वह लॉर्ड कॉर्नवालिस का उत्तराधिकारी था और उसके बाद लॉर्ड वेलेजली का काल प्रारंभ हुआ।

जॉन शोर की सबसे प्रसिद्ध नीति — अहस्तक्षेप की नीति।

1793 का चार्टर एक्ट उसके शासनकाल की प्रमुख संवैधानिक घटना थी।

चार्टर एक्ट 1793 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए जारी रखा गया।

1795 में हैदराबाद के निजाम और मराठों के बीच खर्डा का युद्ध हुआ।

खर्डा के युद्ध में मराठों की विजय और निजाम की पराजय हुई।

जॉन शोर ने अपनी अहस्तक्षेप की नीति के कारण निजाम को अंग्रेजी सैनिक सहायता नहीं दी।

उसके शासनकाल के अंतिम चरण में अवध के उत्तराधिकार मामले में वजीर अली को हटाकर सआदत अली खान द्वितीय को नवाब बनाने में कंपनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

1798 में जॉन शोर का कार्यकाल समाप्त हुआ और इसके बाद लॉर्ड वेलेजली का काल प्रारंभ हुआ।

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