लॉर्ड एमहर्स्ट
1823–1828 — प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध, यंडाबू की संधि और भरतपुर विजय
लॉर्ड एमहर्स्ट
लॉर्ड विलियम एमहर्स्ट 1823 से 1828 तक बंगाल का गवर्नर-जनरल रहा। उसके शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध (1824–1826) थी, जिसका अंत 1826 की यंडाबू की संधि से हुआ। इसी काल में 1824 का बैरकपुर सैनिक विद्रोह और 1826 में भरतपुर दुर्ग पर अंग्रेजी विजय जैसी घटनाएँ भी हुईं। उसके शासनकाल में पूर्वोत्तर भारत तथा बर्मा की दिशा में अंग्रेजी प्रभाव का उल्लेखनीय विस्तार हुआ।
लॉर्ड एमहर्स्ट का कार्यकाल
लॉर्ड एमहर्स्ट 1823 से 1828 तक बंगाल का गवर्नर-जनरल रहा। उसने ऐसे समय में पद संभाला जब भारत में मराठों की शक्ति काफी कमजोर हो चुकी थी, लेकिन पूर्वोत्तर सीमा पर बर्मा के विस्तार के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी और बर्मी साम्राज्य के बीच तनाव बढ़ रहा था।
एमहर्स्ट के शासनकाल का सबसे बड़ा सैन्य संघर्ष प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध था। यह युद्ध अत्यधिक खर्चीला सिद्ध हुआ, लेकिन इसके बाद अंग्रेजों का प्रभाव असम और पूर्वोत्तर भारत के विस्तृत क्षेत्रों में बढ़ गया।
प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध — 1824–1826
लॉर्ड एमहर्स्ट के समय 1824 से 1826 तक प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध हुआ। यह अंग्रेजों और बर्मा के बीच हुए तीन प्रमुख युद्धों में पहला था।
बर्मी साम्राज्य ने उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मणिपुर और असम की दिशा में अपना प्रभाव बढ़ाया था। कछार, जैंतिया और बंगाल-बर्मा सीमा से जुड़े क्षेत्रों में भी अंग्रेजों तथा बर्मा के हित टकराने लगे। सीमा संबंधी विवाद और दोनों शक्तियों की विस्तारवादी गतिविधियाँ अंततः युद्ध का कारण बनीं।
युद्ध केवल वर्तमान म्यांमार के क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि असम, मणिपुर, कछार और पूर्वोत्तर सीमा के कई क्षेत्रों में भी संघर्ष हुआ। अंग्रेजों ने समुद्री मार्ग से रंगून पर भी आक्रमण किया।
अंग्रेजी अभियान का प्रमुख सैन्य नेतृत्व सर आर्चिबाल्ड कैंपबेल ने किया। लंबे और कठिन युद्ध के बाद अंग्रेजी सेना बर्मा की राजधानी अवा के निकट तक पहुँच गई, जिसके बाद बर्मी शासक को संधि स्वीकार करनी पड़ी।
🎯 परीक्षा में याद रखें
प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध — 1824–1826 — लॉर्ड एमहर्स्ट — अंत: यंडाबू की संधि।
यंडाबू की संधि — 1826
24 फरवरी 1826 को अंग्रेजों और बर्मा के बीच यंडाबू की संधि हुई। इस संधि ने प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध को समाप्त कर दिया। अंग्रेजों की ओर से सर आर्चिबाल्ड कैंपबेल ने संधि पर हस्ताक्षर किए।
संधि के अनुसार बर्मा ने अराकान और तेनासेरिम अंग्रेजों को सौंप दिए तथा असम और मणिपुर पर अपने दावे छोड़ दिए। इसके साथ ही बर्मा ने कछार और जैंतिया के मामलों में हस्तक्षेप न करने की बात स्वीकार की।
बर्मा को अंग्रेजों को एक करोड़ रुपये के लगभग, अर्थात दस लाख पाउंड की युद्ध-क्षतिपूर्ति देने की शर्त भी स्वीकार करनी पड़ी। दोनों पक्षों के बीच राजनयिक प्रतिनिधियों के आदान-प्रदान और बाद में व्यापारिक संबंध स्थापित करने की व्यवस्था भी की गई।
यंडाबू की संधि के परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर भारत में अंग्रेजों की स्थिति बहुत मजबूत हुई और बर्मी साम्राज्य का पश्चिम दिशा में विस्तार रुक गया।
📗 यंडाबू की संधि एक नजर में
1826 → प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध समाप्त → अराकान और तेनासेरिम अंग्रेजों को → असम और मणिपुर पर बर्मी दावा समाप्त → कछार और जैंतिया में हस्तक्षेप न करने की स्वीकृति।
असम पर अंग्रेजी प्रभाव
प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध और यंडाबू की संधि का भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण परिणाम असम में अंग्रेजी प्रभुत्व की शुरुआत था। बर्मा ने असम पर अपना दावा छोड़ दिया और इसके बाद अंग्रेजों ने असम के राजनीतिक मामलों पर अपना नियंत्रण बढ़ाना प्रारंभ किया।
इस परिवर्तन के कारण पूर्वोत्तर भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की सीमाएँ और राजनीतिक प्रभाव काफी बढ़ गए। इसलिए यंडाबू की संधि को केवल अंग्रेज-बर्मा संबंधों की घटना न मानकर पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश विस्तार की महत्वपूर्ण घटना के रूप में भी पढ़ा जाता है।
बैरकपुर सैनिक विद्रोह — 1824
1824 में लॉर्ड एमहर्स्ट के शासनकाल में बैरकपुर में भारतीय सिपाहियों का विद्रोह हुआ। यह घटना प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध के समय हुई थी।
बंगाल सेना की 47वीं नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों को बर्मा अभियान के लिए आगे बढ़ने का आदेश दिया गया था। सैनिकों में यात्रा, परिवहन, भत्तों और समुद्री यात्रा से जुड़ी धार्मिक-सामाजिक आशंकाओं को लेकर असंतोष था।
सैनिकों ने आदेश मानने से इनकार किया, जिसके बाद अंग्रेज अधिकारियों ने बल प्रयोग कर विद्रोह को दबा दिया। कई सैनिक मारे गए और बाद में अनेक विद्रोहियों को कठोर दंड दिया गया।
इसे 1857 के बैरकपुर विद्रोह से अलग याद रखना चाहिए। 1824 की घटना एमहर्स्ट और प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध के समय हुई थी, जबकि 1857 में इसी बैरकपुर छावनी का नाम मंगल पांडे की घटना से जुड़ा।
🎯 भ्रम से बचें
1824 — बैरकपुर सैनिक विद्रोह — लॉर्ड एमहर्स्ट।
1857 — बैरकपुर — मंगल पांडे।
भरतपुर विजय — 1826
1826 में लॉर्ड एमहर्स्ट के शासनकाल में अंग्रेजों ने भरतपुर के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार किया। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड कॉम्बरमियर ने किया था।
भरतपुर का किला अत्यंत मजबूत माना जाता था। अंग्रेजों ने 1805 में भी इसे जीतने का प्रयास किया था, लेकिन उस समय वे सफल नहीं हुए थे। इसलिए 1826 की विजय से अंग्रेजों की सैन्य प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई।
भरतपुर में उत्तराधिकार विवाद उत्पन्न होने के बाद दुर्जन साल ने सत्ता पर कब्जा कर लिया था, जबकि अंग्रेजों ने बालक बलवंत सिंह के उत्तराधिकार का समर्थन किया। दिसंबर 1825 से भरतपुर की घेराबंदी शुरू हुई और 18 जनवरी 1826 को अंग्रेजी सेना ने दुर्ग पर कब्जा कर लिया।
भरतपुर की इस घटना को सामान्य परीक्षा-पुस्तकों में कभी-कभी “भरतपुर का अधिग्रहण — 1826” कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भरतपुर राज्य को स्थायी रूप से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। अंग्रेजों ने दुर्ग पर कब्जा करके दुर्जन साल को हटाया और वैध उत्तराधिकारी बलवंत सिंह को शासन सौंपा।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण अंतर
1826 में भरतपुर का किला अंग्रेजों ने जीत लिया था, लेकिन भरतपुर राज्य का पूर्ण विलय ब्रिटिश भारत में नहीं हुआ था।
भरतपुर दुर्ग का महत्व
भरतपुर का दुर्ग जाट शासकों द्वारा निर्मित और मजबूत किया गया था तथा अपनी सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था के कारण प्रसिद्ध था। 1805 में लॉर्ड लेक के नेतृत्व में अंग्रेज इस दुर्ग को जीतने में असफल रहे थे।
इसलिए 1826 में लॉर्ड कॉम्बरमियर द्वारा इसका सफलतापूर्वक कब्जा केवल एक स्थानीय राजनीतिक घटना नहीं था। इससे भारतीय रियासतों के बीच अंग्रेजी सैन्य शक्ति की प्रतिष्ठा और भय दोनों बढ़े।
🧠 एक साथ याद रखें
प्रमुख घटनाएँ — एक नजर में
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1823 | लॉर्ड एमहर्स्ट ने बंगाल के गवर्नर-जनरल का पद संभाला। |
| 1824 | प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध प्रारंभ हुआ। |
| 1824 | बैरकपुर में भारतीय सैनिकों का विद्रोह हुआ। |
| 1824–1826 | प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध। |
| 18 जनवरी 1826 | लॉर्ड कॉम्बरमियर की सेना ने भरतपुर दुर्ग पर अधिकार किया। |
| 24 फरवरी 1826 | अंग्रेजों और बर्मा के बीच यंडाबू की संधि हुई। |
| 1826 | यंडाबू की संधि से प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध समाप्त हुआ। |
| 1828 | लॉर्ड एमहर्स्ट का गवर्नर-जनरल के रूप में कार्यकाल समाप्त हुआ। |
परीक्षा के लिए त्वरित क्रम
🧠 एक क्रम में याद रखें
⚡ त्वरित पुनरावृत्ति
लॉर्ड एमहर्स्ट — 1823 से 1828 तक बंगाल का गवर्नर-जनरल।
प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध — 1824 से 1826 — लॉर्ड एमहर्स्ट के समय।
युद्ध के प्रमुख कारणों में असम, मणिपुर, कछार और पूर्वोत्तर सीमा पर अंग्रेज-बर्मी हितों का टकराव शामिल था।
24 फरवरी 1826 — यंडाबू की संधि — प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध समाप्त।
यंडाबू की संधि के बाद अराकान और तेनासेरिम अंग्रेजों को मिले तथा बर्मा ने असम और मणिपुर पर अपने दावे छोड़ दिए।
बर्मा ने कछार और जैंतिया में हस्तक्षेप न करने तथा भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति देने की शर्त भी स्वीकार की।
1824 — बैरकपुर सैनिक विद्रोह भी एमहर्स्ट के शासनकाल में हुआ।
1826 — अंग्रेजों ने भरतपुर दुर्ग पर अधिकार किया; अंग्रेजी सेना का नेतृत्व लॉर्ड कॉम्बरमियर ने किया।
भरतपुर के दुर्ग पर अंग्रेजी कब्जे के बाद दुर्जन साल को हटाकर बलवंत सिंह को शासक बनाया गया; भरतपुर राज्य का पूर्ण विलय ब्रिटिश भारत में नहीं किया गया।
एमहर्स्ट के समय अंग्रेजी प्रभाव पूर्वोत्तर भारत में तेजी से बढ़ा और असम में ब्रिटिश प्रभुत्व की शुरुआत के लिए यंडाबू की संधि निर्णायक सिद्ध हुई।