लॉर्ड कैनिंग
1856–1862 — 1857 का विद्रोह, कंपनी शासन का अंत और क्राउन शासन की शुरुआत
लॉर्ड कैनिंग
लॉर्ड कैनिंग 1856 से 1862 तक भारत का गवर्नर-जनरल रहा। वह ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल का अंतिम गवर्नर-जनरल और 1858 में शासन ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित होने के बाद भारत का पहला वायसराय बना। उसके शासनकाल में 1857 का विद्रोह, भारत शासन अधिनियम 1858, महारानी विक्टोरिया की घोषणा, श्वेत विद्रोह, विधि-संहिताओं का विकास, विश्वविद्यालयों की स्थापना तथा कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक परिवर्तन हुए।
अंतिम कंपनी गवर्नर-जनरल और पहला वायसराय
लॉर्ड कैनिंग भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंतिम गवर्नर-जनरल था। उसने 1856 में गवर्नर-जनरल का पद संभाला।
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम, 1858 पारित किया और भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।
इस परिवर्तन के बाद कैनिंग ही पद पर बना रहा और ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में भारत का पहला वायसराय कहलाया। इस प्रकार वह एक ही व्यक्ति था जिसने कंपनी शासन के अंतिम गवर्नर-जनरल और क्राउन शासन के प्रथम वायसराय—दोनों रूपों में कार्य किया।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण जोड़ी
कंपनी शासन का अंतिम गवर्नर-जनरल — लॉर्ड कैनिंग।
भारत का पहला वायसराय — लॉर्ड कैनिंग।
1857 का विद्रोह
1857 के विद्रोह के समय लॉर्ड कैनिंग भारत का गवर्नर-जनरल था। विद्रोह की शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से व्यापक सैनिक विद्रोह के रूप में हुई और शीघ्र ही दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, बरेली तथा मध्य भारत सहित कई क्षेत्रों में फैल गई।
दिल्ली में मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय को विद्रोह का प्रतीकात्मक नेता बनाया गया। अंग्रेजों ने 1857–1858 के दौरान सैन्य अभियानों द्वारा विद्रोह को दबाया।
विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन की भारतीय नीति में बड़ा परिवर्तन हुआ। कंपनी का शासन समाप्त किया गया और भारतीय रियासतों, सेना तथा प्रशासन के प्रति नई नीति अपनाई गई।
📗 परीक्षा तथ्य
1857 का विद्रोह — गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग।
भारत शासन अधिनियम — 1858
भारत शासन अधिनियम, 1858 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत पर शासन समाप्त कर दिया गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।
कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कंट्रोल की पुरानी व्यवस्था समाप्त की गई तथा ब्रिटेन में भारत सचिव का पद बनाया गया। उसकी सहायता के लिए भारत परिषद की व्यवस्था की गई।
इस परिवर्तन के बाद गवर्नर-जनरल ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि भी था और सामान्य रूप से उसे वायसराय कहा जाने लगा। कैनिंग इस व्यवस्था का पहला वायसराय था।
महारानी विक्टोरिया की घोषणा — 1858
1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा भारत में सार्वजनिक रूप से पढ़ी गई। इस घोषणा ने कंपनी शासन के अंत और ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष शासन की नई नीति को स्पष्ट किया।
घोषणा में भारतीय रियासतों के साथ की गई संधियों का सम्मान करने, उनके राज्यों को अनावश्यक रूप से हड़पने की नीति न अपनाने, धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने तथा भारतीय प्रजा के प्रति समान और न्यायपूर्ण शासन की बात कही गई।
इसी नई नीति के कारण लॉर्ड डलहौजी के समय व्यापक रूप से अपनाई गई व्यपगत सिद्धांत या राज्य-विलय की नीति को त्याग दिया गया और भारतीय राजाओं के गोद लेने के अधिकार को मान्यता दी गई।
🎯 क्रम याद रखें
1857 का विद्रोह → भारत शासन अधिनियम 1858 → कंपनी शासन समाप्त → महारानी की घोषणा → क्राउन शासन।
व्यपगत सिद्धांत की समाप्ति
लॉर्ड डलहौजी के समय अपनाए गए व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत ऐसी रियासतों को कंपनी में मिलाया जा सकता था जिनका शासक बिना प्राकृतिक पुरुष उत्तराधिकारी के मर जाता था और गोद लिए उत्तराधिकारी को कंपनी मान्यता नहीं देती थी।
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय रियासतों के प्रति अपनी नीति बदल दी। 1858 की महारानी की घोषणा के बाद व्यपगत सिद्धांत को व्यवहारतः समाप्त कर दिया गया और भारतीय शासकों को उत्तराधिकारी गोद लेने की अनुमति दी गई।
इस नई नीति का उद्देश्य भारतीय रियासतों को ब्रिटिश शासन का सहयोगी बनाना था ताकि भविष्य में वे बड़े विद्रोहों में अंग्रेजों के विरोध में एकजुट न हों।
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम — 1856
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में पारित हुआ। इस कानून ने हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह के रास्ते में मौजूद कानूनी बाधाओं को हटाकर ऐसे विवाहों को कानूनी मान्यता दी।
इस सुधार के लिए ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने व्यापक सामाजिक और वैचारिक अभियान चलाया। उन्होंने शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और सरकार के सामने इसके पक्ष में याचिकाएँ प्रस्तुत कीं।
इसलिए विधवा पुनर्विवाह अधिनियम से संबंधित परीक्षा प्रश्नों में 1856 — ईश्वरचंद्र विद्यासागर — लॉर्ड कैनिंग तीनों को एक साथ याद रखना उपयोगी है।
📗 याद रखें
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम — 1856 — ईश्वरचंद्र विद्यासागर — लॉर्ड कैनिंग।
1856 का प्रमुख विधवा पुनर्विवाह
विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित होने के बाद 7 दिसंबर 1856 को कलकत्ता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रेरणा और देखरेख में एक अत्यंत प्रसिद्ध विधवा पुनर्विवाह संपन्न हुआ।
इस विवाह में विधवा कालीमती देवी का विवाह श्रीशचंद्र विद्यारत्न के साथ कराया गया। इसे सामान्य इतिहास और परीक्षा-परंपरा में अधिनियम लागू होने के बाद हुए प्रथम प्रमुख वैध हिंदू विधवा विवाह के रूप में उल्लेखित किया जाता है।
इस विवाह का सामाजिक महत्व बहुत बड़ा था, क्योंकि उस समय विधवा पुनर्विवाह के विरुद्ध समाज के एक बड़े वर्ग में कठोर रूढ़ियाँ मौजूद थीं। विद्यासागर ने केवल कानून बनवाने में ही नहीं, बल्कि व्यवहार में विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय — 1857
1857 में लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय स्थापित किए गए। इन विश्वविद्यालयों की स्थापना भारत में आधुनिक उच्च शिक्षा के संस्थागत विकास की महत्वपूर्ण घटना थी।
इनका प्रारंभिक स्वरूप मुख्य रूप से परीक्षा लेने और डिग्री प्रदान करने वाली संस्थाओं का था। इनके अंतर्गत विभिन्न संबद्ध महाविद्यालय कार्य करते थे।
इसलिए कैनिंग से संबंधित महत्वपूर्ण शिक्षा तथ्य है — 1857 में तीन विश्वविद्यालय: कलकत्ता, बंबई और मद्रास।
🎯 तीन विश्वविद्यालय
1857 — कलकत्ता + बंबई + मद्रास विश्वविद्यालय।
श्वेत विद्रोह — 1859
लॉर्ड कैनिंग के समय 1859 में यूरोपीय सैनिकों द्वारा श्वेत विद्रोह हुआ। यह विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी की यूरोपीय सेना के सैनिकों में हुआ था।
भारत का शासन कंपनी से ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित होने के बाद कंपनी की यूरोपीय सैनिक इकाइयों को ब्रिटिश सेना में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया। कई सैनिक बिना उनकी पूर्व सहमति के किए जा रहे इस परिवर्तन से असंतुष्ट थे।
सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में स्थानांतरण के बदले नई भर्ती का बोनस या सेवा से मुक्त किए जाने जैसी माँगें कीं। यह विद्रोह 1857 की तरह भारतीय जनविद्रोह नहीं था, बल्कि यूरोपीय कंपनी सैनिकों का सैन्य असंतोष था।
🎯 भ्रम से बचें
1857 — भारतीय सैनिकों और जनता का व्यापक विद्रोह।
1859 — यूरोपीय कंपनी सैनिकों का श्वेत विद्रोह।
भारतीय दंड संहिता — 1860
भारतीय दंड संहिता 1860 में लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में कानून के रूप में पारित हुई। इसका मूल प्रारूप प्रथम विधि आयोग ने तैयार किया था, जिसके अध्यक्ष थॉमस बैबिंगटन मैकाले थे।
भारतीय दंड संहिता ने विभिन्न अपराधों और उनके लिए निर्धारित दंडों को एक व्यवस्थित संहिता में संगठित किया। इसे 6 अक्टूबर 1860 को अधिनियमित किया गया और यह 1 जनवरी 1862 से लागू हुई।
इसलिए “भारतीय दंड संहिता का निर्माण कैनिंग ने किया” कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। अधिक सही तथ्य है कि मैकाले की अध्यक्षता वाले प्रथम विधि आयोग द्वारा तैयार प्रारूप पर आधारित भारतीय दंड संहिता कैनिंग के शासनकाल में 1860 में पारित हुई।
विधि-संहिताओं का विकास
कैनिंग के शासनकाल में भारतीय कानूनों को व्यवस्थित और संहिताबद्ध करने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी। इस समय दीवानी प्रक्रिया संहिता 1859 और भारतीय दंड संहिता 1860 महत्वपूर्ण विधायी उपलब्धियाँ थीं।
इसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता 1861 तथा अन्य विधायी सुधारों द्वारा न्यायिक व्यवस्था को अधिक एकरूप बनाने का प्रयास किया गया।
इसलिए “भारतीय विधि संहिता 1859” जैसे सामान्य शब्द के बजाय परीक्षा में संबंधित संहिता का स्पष्ट नाम और वर्ष याद रखना चाहिए।
📗 सही क्रम
1859 — दीवानी प्रक्रिया संहिता।
1860 — भारतीय दंड संहिता।
1861 — दंड प्रक्रिया से संबंधित संहिताकरण आगे बढ़ा।
महालेखा और लेखापरीक्षा व्यवस्था
भारत की आधुनिक सरकारी लेखा-परीक्षा व्यवस्था की संस्थागत जड़ें 1858 में कंपनी शासन समाप्त होने के बाद विकसित हुईं। इसी काल में सरकारी आय-व्यय के लेखांकन और लेखापरीक्षा को अधिक संगठित रूप दिया गया।
1860 में सर एडवर्ड ड्रमंड भारत के पहले ऑडिटर जनरल नियुक्त हुए। उनके पास लेखांकन और लेखापरीक्षा—दोनों प्रकार के कार्य थे।
स्वतंत्र भारत में यह संस्था संवैधानिक रूप से विकसित होकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के रूप में स्थापित हुई। इसलिए “1857 में सीधे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का पद बनाया गया” कहना सही नहीं है।
🎯 सही तथ्य
1858 — आधुनिक भारतीय लेखापरीक्षा संस्था की शुरुआत से जुड़ा वर्ष।
1860 — प्रथम ऑडिटर जनरल सर एडवर्ड ड्रमंड।
भारतीय परिषद अधिनियम — 1861
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक घटना थी। इससे गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद का विस्तार किया गया और कानून निर्माण में अतिरिक्त सदस्यों को शामिल करने की व्यवस्था की गई।
इस अधिनियम के बाद पहली बार कुछ भारतीयों को भी गवर्नर-जनरल की विस्तारित विधायी परिषद में नामित किया गया। इससे भारतीयों की सीमित भागीदारी की शुरुआत हुई, हालांकि वास्तविक सत्ता ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही रही।
इसी काल में पोर्टफोलियो प्रणाली के विकास से शासन के विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी अलग-अलग कार्यकारी सदस्यों को सौंपने की व्यवस्था अधिक स्पष्ट हुई।
उच्च न्यायालय अधिनियम — 1861
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 कैनिंग के शासनकाल में पारित हुआ। इसके द्वारा कलकत्ता, बंबई और मद्रास में पुराने सर्वोच्च न्यायालयों तथा सदर अदालतों को मिलाकर नए उच्च न्यायालय स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इन प्रावधानों के आधार पर 1862 में कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालय अस्तित्व में आए। इस प्रकार कैनिंग का शासनकाल भारत की आधुनिक न्यायिक संस्थाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण रहा।
आयकर की शुरुआत — 1860
1857 के विद्रोह और उसके दमन के कारण ब्रिटिश भारतीय सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा। इस वित्तीय संकट से निपटने के लिए कैनिंग के शासनकाल में नए राजस्व उपाय अपनाए गए।
1860 में जेम्स विल्सन ने भारत में पहली बार आयकर लागू किया। इसे ब्रिटिश भारतीय सरकार की वित्तीय स्थिति सुधारने के उद्देश्य से पेश किया गया था।
इसलिए परीक्षा में भारत में आयकर की शुरुआत — 1860 — जेम्स विल्सन — लॉर्ड कैनिंग का काल एक महत्वपूर्ण जोड़ी है।
प्रमुख घटनाएँ — एक नजर में
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1856 | लॉर्ड कैनिंग भारत का गवर्नर-जनरल बना। |
| 1856 | हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ। |
| 7 दिसंबर 1856 | कलकत्ता में विद्यासागर की प्रेरणा से प्रसिद्ध विधवा पुनर्विवाह संपन्न हुआ। |
| 1857 | 1857 का विद्रोह। |
| 1857 | कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय स्थापित हुए। |
| 1858 | भारत शासन अधिनियम; कंपनी शासन समाप्त। |
| 1 नवंबर 1858 | महारानी विक्टोरिया की घोषणा। |
| 1858 | लॉर्ड कैनिंग भारत का पहला वायसराय बना। |
| 1859 | यूरोपीय सैनिकों का श्वेत विद्रोह। |
| 1859 | दीवानी प्रक्रिया संहिता से संबंधित महत्वपूर्ण संहिताकरण। |
| 1860 | भारतीय दंड संहिता पारित हुई। |
| 1860 | सर एडवर्ड ड्रमंड प्रथम ऑडिटर जनरल नियुक्त हुए। |
| 1860 | जेम्स विल्सन द्वारा आयकर की शुरुआत। |
| 1861 | भारतीय परिषद अधिनियम। |
| 1861 | भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम। |
| 1862 | कैनिंग का कार्यकाल समाप्त हुआ। |
परीक्षा के लिए त्वरित क्रम
🧠 एक क्रम में याद रखें
⚡ त्वरित पुनरावृत्ति
लॉर्ड कैनिंग — 1856 से 1862 तक भारत का गवर्नर-जनरल।
कैनिंग — कंपनी शासन का अंतिम गवर्नर-जनरल और ब्रिटिश क्राउन शासन का पहला वायसराय।
1857 के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर-जनरल — लॉर्ड कैनिंग।
भारत शासन अधिनियम 1858 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत को ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।
1 नवंबर 1858 — महारानी विक्टोरिया की घोषणा।
व्यपगत सिद्धांत या राज्य-विलय की नीति को त्याग दिया गया और भारतीय रियासतों के गोद लिए उत्तराधिकारियों को मान्यता देने की नीति अपनाई गई।
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम — 1856 — ईश्वरचंद्र विद्यासागर — कैनिंग का काल।
7 दिसंबर 1856 — कलकत्ता में विद्यासागर की प्रेरणा से प्रसिद्ध वैध विधवा पुनर्विवाह।
1857 — कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालयों की स्थापना।
1859 — यूरोपीय कंपनी सैनिकों का श्वेत विद्रोह।
भारतीय दंड संहिता — 1860; प्रथम विधि आयोग और मैकाले के प्रारूप पर आधारित।
1860 — सर एडवर्ड ड्रमंड प्रथम ऑडिटर जनरल नियुक्त हुए।
1860 — जेम्स विल्सन द्वारा भारत में आयकर की शुरुआत।
1861 — भारतीय परिषद अधिनियम तथा उच्च न्यायालय अधिनियम।
कैनिंग का शासनकाल वह निर्णायक दौर था जिसमें भारत में कंपनी शासन समाप्त होकर ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन शुरू हुआ।