लॉर्ड डफरिन
1884–1888 — भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध
लॉर्ड डफरिन
लॉर्ड डफरिन 1884 से 1888 तक भारत का वायसराय रहा। उसके शासनकाल में भारतीय इतिहास की दो अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं—1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और 1885–1886 का तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध। बर्मा युद्ध के परिणामस्वरूप ऊपरी बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया, जबकि कांग्रेस की स्थापना ने भारत में संगठित राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन के विकास को नया रूप दिया।
लॉर्ड डफरिन का कार्यकाल
लॉर्ड डफरिन 1884 से 1888 तक भारत का वायसराय रहा। उसने लॉर्ड रिपन के बाद भारत का शासन संभाला। उसके समय भारतीय राजनीति में शिक्षित मध्यम वर्ग की राजनीतिक सक्रियता बढ़ रही थी।
उसके शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक राजनीतिक घटना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना थी, जबकि उसकी प्रमुख साम्राज्यवादी उपलब्धि ऊपरी बर्मा का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय थी।
डफरिन के काल में उत्तर-पश्चिम दिशा में रूस और ब्रिटेन के बीच मध्य एशिया को लेकर तनाव भी बना रहा, जिसके कारण अफगानिस्तान ब्रिटिश विदेश नीति का महत्वपूर्ण विषय बना रहा।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना — 1885
लॉर्ड डफरिन के शासनकाल में 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। कांग्रेस के गठन में सेवानिवृत्त ब्रिटिश सिविल सेवक ए. ओ. ह्यूम और विभिन्न भारतीय राजनीतिक नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीयों में अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन बनाने की आवश्यकता पहले से विकसित हो रही थी। कलकत्ता, बंबई, मद्रास और पुणे जैसे केंद्रों में राजनीतिक संस्थाएँ सक्रिय थीं और शिक्षित भारतीय प्रशासन में अधिक भागीदारी तथा राजनीतिक सुधारों की माँग कर रहे थे।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक ऐसा अखिल भारतीय मंच प्रदान किया जहाँ विभिन्न प्रांतों के राजनीतिक कार्यकर्ता एक साथ अपनी माँगों और विचारों को प्रस्तुत कर सकते थे।
🎯 परीक्षा में याद रखें
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना — 1885 — लॉर्ड डफरिन का शासनकाल।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन — 1885
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 से 31 दिसंबर 1885 तक बंबई में आयोजित हुआ। इसका आयोजन गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में किया गया।
कांग्रेस का पहला अधिवेशन प्रारंभ में पुणे में आयोजित किया जाना था, लेकिन वहाँ हैजा फैलने के कारण आयोजन स्थल बदलकर बंबई कर दिया गया।
प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी अर्थात डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने की। इस अधिवेशन में विभिन्न प्रांतों से 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
ए. ओ. ह्यूम ने कांग्रेस के संगठन और प्रथम अधिवेशन को आयोजित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आगे भी कांग्रेस के प्रारंभिक संगठन से जुड़े रहे।
📗 चार तथ्य एक साथ
1885 — बंबई — गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज — प्रथम अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी — 72 प्रतिनिधि।
डफरिन और कांग्रेस
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और लॉर्ड डफरिन के संबंध को लेकर इतिहास में कई तरह के विवरण मिलते हैं। इतना निश्चित है कि कांग्रेस की स्थापना डफरिन के वायसराय रहते हुई, लेकिन उसे कांग्रेस का संस्थापक कहना उचित नहीं है।
कांग्रेस के संगठन में मुख्य भूमिका ए. ओ. ह्यूम और उस समय के भारतीय राजनीतिक नेताओं की थी। डफरिन और ह्यूम के बीच प्रस्तावित राजनीतिक संगठन को लेकर संपर्क और बातचीत के विवरण भी मिलते हैं।
बाद के वर्षों में जैसे-जैसे कांग्रेस ने प्रशासनिक सुधार, भारतीय प्रतिनिधित्व और सरकारी नीतियों की आलोचना को अधिक संगठित रूप से उठाना शुरू किया, ब्रिटिश प्रशासन का उसके प्रति दृष्टिकोण अधिक आलोचनात्मक होता गया।
⚠️ भ्रम से बचें
कांग्रेस की स्थापना डफरिन के समय हुई थी; डफरिन कांग्रेस का संस्थापक नहीं था।
कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन की प्रमुख माँगें
कांग्रेस के प्रारंभिक नेताओं का लक्ष्य तत्काल ब्रिटिश शासन समाप्त करना नहीं था। वे संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से प्रशासन में सुधार तथा भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की माँग कर रहे थे।
प्रारंभिक माँगों में विधायी परिषदों का विस्तार, प्रशासन में भारतीयों का अधिक प्रतिनिधित्व, भारतीय सिविल सेवा परीक्षा भारत और इंग्लैंड दोनों स्थानों पर आयोजित करना तथा सरकारी प्रशासन की जाँच जैसी माँगें शामिल थीं।
कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विभिन्न प्रांतों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क स्थापित करना और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक एकता की भावना विकसित करना भी था।
तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध — 1885
लॉर्ड डफरिन के शासनकाल में 1885 में तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध हुआ। यह ब्रिटेन और बर्मा के बीच हुए तीन आंग्ल-बर्मा युद्धों में अंतिम युद्ध था।
इस समय ऊपरी बर्मा पर राजा थीबॉ का शासन था। निचला बर्मा पहले ही द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध के बाद अंग्रेजों के अधिकार में आ चुका था, जबकि ऊपरी बर्मा स्वतंत्र था।
ऊपरी बर्मा में फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ने की आशंका, अंग्रेजी व्यापारिक हित और बर्मी सरकार तथा ब्रिटिश व्यापारिक कंपनियों के बीच विवाद युद्ध की पृष्ठभूमि के प्रमुख कारणों में शामिल थे।
ब्रिटिश सेना ने नवंबर 1885 में तेजी से अभियान चलाया और मांडले पर कब्जा कर लिया। राजा थीबॉ ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
🎯 सीधा परीक्षा तथ्य
तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध — 1885 — लॉर्ड डफरिन — बर्मी राजा थीबॉ।
ऊपरी बर्मा का विलय — 1886
तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध में बर्मा की पराजय के बाद 1 जनवरी 1886 को लॉर्ड डफरिन ने ऊपरी बर्मा के ब्रिटिश साम्राज्य में विलय की घोषणा की।
इस विलय के साथ बर्मा के स्वतंत्र राजतंत्र का अंत हो गया। पहले से अंग्रेजों के अधिकार में मौजूद निचले बर्मा के साथ ऊपरी बर्मा पर भी ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित हो गया।
इसके बाद बर्मा को ब्रिटिश भारतीय प्रशासन के अंतर्गत लाया गया। हालांकि राजतंत्र समाप्त होने के बाद भी बर्मा के कई क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध लंबे समय तक सशस्त्र प्रतिरोध चलता रहा।
📗 क्रम याद रखें
1885 — तृतीय बर्मा युद्ध → मांडले पर अंग्रेजी कब्जा → राजा थीबॉ का अंत → 1 जनवरी 1886 — ऊपरी बर्मा का विलय।
राजा थीबॉ का निर्वासन
राजा थीबॉ बर्मा के अंतिम राजा थे। तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध में अंग्रेजों की विजय के बाद उन्हें सत्ता से हटा दिया गया।
राजा थीबॉ और उनके परिवार को ब्रिटिश शासन ने भारत भेज दिया और उन्हें महाराष्ट्र के रत्नागिरी में निर्वासन में रखा गया।
राजा थीबॉ को हटाए जाने और 1886 में ऊपरी बर्मा के विलय के साथ बर्मा के कोंबाउंग राजवंश और स्वतंत्र राजशाही का अंत हो गया।
🎯 महत्वपूर्ण जोड़ी
बर्मा का अंतिम राजा — थीबॉ — निर्वासन स्थल: रत्नागिरी।
तीनों आंग्ल-बर्मा युद्ध
| युद्ध | वर्ष | समय का गवर्नर-जनरल / वायसराय | प्रमुख परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध | 1824–1826 | लॉर्ड एमहर्स्ट | यंडाबू की संधि; अराकान और तेनासेरिम अंग्रेजों को मिले। |
| द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध | 1852 | लॉर्ड डलहौजी | निचले बर्मा के बड़े भाग पर अंग्रेजी अधिकार। |
| तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध | 1885 | लॉर्ड डफरिन | राजा थीबॉ पराजित; 1886 में ऊपरी बर्मा का विलय। |
🧠 एक क्रम में याद रखें
पंजदेह संकट — 1885
डफरिन के शासनकाल में 1885 का पंजदेह संकट भी ब्रिटिश विदेश नीति की महत्वपूर्ण घटना थी। उस समय मध्य एशिया में रूस दक्षिण की ओर विस्तार कर रहा था और ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि रूसी प्रभाव अफगानिस्तान के रास्ते भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा तक पहुँच सकता है।
रूसी और अफगान सेनाओं के बीच पंजदेह क्षेत्र में संघर्ष के कारण ब्रिटेन और रूस के बीच युद्ध की आशंका पैदा हो गई। अंततः कूटनीतिक वार्ता के माध्यम से बड़ा युद्ध टल गया और अफगानिस्तान की उत्तर-पश्चिमी सीमा के निर्धारण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
यह घटना उन्नीसवीं शताब्दी में मध्य एशिया को लेकर ब्रिटेन और रूस की प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा थी।
प्रमुख घटनाएँ — एक नजर में
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1884 | लॉर्ड डफरिन भारत का वायसराय बना। |
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना। |
| 28–31 दिसंबर 1885 | बंबई में कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन। |
| 1885 | कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी बने। |
| 1885 | कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। |
| 1885 | पंजदेह संकट; रूस और अफगानिस्तान की सीमा का प्रश्न गंभीर हुआ। |
| 1885 | तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध। |
| नवंबर 1885 | अंग्रेजों ने मांडले पर अधिकार किया और राजा थीबॉ को हटा दिया। |
| 1 जनवरी 1886 | ऊपरी बर्मा का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय घोषित किया गया। |
| 1888 | लॉर्ड डफरिन का वायसराय के रूप में कार्यकाल समाप्त हुआ। |
परीक्षा के लिए त्वरित क्रम
🧠 एक क्रम में याद रखें
⚡ त्वरित पुनरावृत्ति
लॉर्ड डफरिन — 1884 से 1888 तक भारत का वायसराय।
1885 में उसके शासनकाल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।
कांग्रेस की स्थापना में ए. ओ. ह्यूम और भारतीय राजनीतिक नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन — 28 से 31 दिसंबर 1885 — बंबई — गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज।
कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष — डब्ल्यू. सी. बनर्जी।
प्रथम अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
डफरिन के समय कांग्रेस स्थापित हुई थी; डफरिन को कांग्रेस का संस्थापक नहीं माना जाता।
तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध — 1885 — लॉर्ड डफरिन।
बर्मा के अंतिम राजा — थीबॉ।
ब्रिटिश विजय के बाद राजा थीबॉ को हटाकर रत्नागिरी में निर्वासित कर दिया गया।
1 जनवरी 1886 — ऊपरी बर्मा का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय घोषित हुआ।
तीनों बर्मा युद्ध याद रखने का क्रम — एमहर्स्ट → डलहौजी → डफरिन।
डफरिन के काल में 1885 का पंजदेह संकट भी ब्रिटेन, रूस और अफगानिस्तान की राजनीति से जुड़ी महत्वपूर्ण घटना थी।