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लॉर्ड लैंसडाउन
LORD LANSDOWNE

लॉर्ड लैंसडाउन

1888–1894 — डूरंड रेखा, कारखाना अधिनियम, सिविल सेवा सुधार और भारत परिषद अधिनियम

लॉर्ड लैंसडाउन

लॉर्ड लैंसडाउन 1888 से 1894 तक भारत का वायसराय रहा। उसके शासनकाल में भारत-अफगान सीमा के निर्धारण से जुड़ा 1893 का डूरंड समझौता, कारखाना अधिनियम 1891, सिविल सेवाओं के पुनर्गठन से संबंधित एचिसन आयोग की सिफारिशों का क्रियान्वयन तथा भारत परिषद अधिनियम 1892 जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं। उसका काल ब्रिटिश भारतीय प्रशासन में सीमित राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए महत्वपूर्ण था।

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लॉर्ड लैंसडाउन का कार्यकाल

लॉर्ड लैंसडाउन 1888 से 1894 तक भारत का वायसराय रहा। उसने लॉर्ड डफरिन के बाद भारत का शासन संभाला।

उसके शासनकाल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी प्रारंभिक माँगों को लगातार सरकार के सामने रख रही थी। प्रतिनिधित्व बढ़ाने, विधायी परिषदों का विस्तार करने और प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की माँगें तेज हो रही थीं।

इसी काल में ब्रिटिश भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा, औद्योगिक श्रमिकों की स्थिति और सिविल सेवाओं के संगठन से संबंधित कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।

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डूरंड समझौता — 1893

1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के प्रभाव क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ, जिसे डूरंड समझौता कहा जाता है।

ब्रिटिश भारत की ओर से सर मॉर्टिमर डूरंड, जो भारत सरकार के विदेश सचिव थे, अफगानिस्तान गए और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के साथ सीमा संबंधी वार्ता की।

12 नवंबर 1893 को दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। इसके आधार पर ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के प्रभाव क्षेत्रों को अलग करने वाली सीमा निर्धारित की गई, जो आगे चलकर डूरंड रेखा कहलायी।

इस समझौते का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि सीमा के दोनों ओर के जनजातीय और सीमावर्ती क्षेत्रों में ब्रिटिश भारत और अफगान शासन का प्रभाव कहाँ तक माना जाएगा।

🎯 परीक्षा में याद रखें

डूरंड समझौता — 1893 — सर मॉर्टिमर डूरंड — अमीर अब्दुर रहमान खान — लॉर्ड लैंसडाउन।

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डूरंड रेखा और सीमा-निर्धारण

1893 का समझौता सीमा के राजनीतिक सिद्धांत और प्रभाव क्षेत्रों को निर्धारित करने से संबंधित था। इसके बाद 1894 से 1896 के बीच संयुक्त सीमा-निर्धारण आयोगों और सर्वेक्षण दलों ने कई क्षेत्रों में वास्तविक सीमा-चिह्न निर्धारित किए।

इसलिए सामान्य पुस्तकों में मिलने वाला “1893 में डूरंड आयोग की स्थापना” वाला कथन घटना का सरल रूप है। 1893 में मुख्य घटना मॉर्टिमर डूरंड और अब्दुर रहमान खान के बीच समझौता था; उसके बाद सीमा के वास्तविक सीमांकन के लिए आयोगों और सर्वेक्षणों का कार्य हुआ।

1947 में पाकिस्तान की स्थापना के बाद ब्रिटिश भारत की इस सीमा का बड़ा भाग अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा बन गया।

⚠️ नाम से भ्रम न हो

1893 — डूरंड समझौता।
इसके बाद — संयुक्त सीमा-निर्धारण आयोगों द्वारा सीमांकन।

04

कारखाना अधिनियम — 1891

लॉर्ड लैंसडाउन के शासनकाल में भारतीय कारखाना अधिनियम 1891 पारित किया गया। यह 1881 के पहले कारखाना कानून में संशोधन और विस्तार करने वाला महत्वपूर्ण श्रम कानून था।

औद्योगिक कारखानों में विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की कार्य-स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए इसमें कई नए प्रावधान किए गए।

9 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों में काम पर रखने पर रोक लगाई गई और बच्चों के लिए दैनिक कार्य की अधिकतम अवधि 7 घंटे निर्धारित की गई।

महिला श्रमिकों के लिए दैनिक वास्तविक कार्य की अधिकतम अवधि 11 घंटे निर्धारित की गई तथा उनके लिए विश्राम की अवधि का प्रावधान भी किया गया।

कानून में कारखानों की सफाई, वायु-संचार, अत्यधिक भीड़ से बचाव, मशीनों की सुरक्षा और निरीक्षण जैसी व्यवस्थाओं को भी अधिक व्यवस्थित किया गया।

🎯 मुख्य तथ्य

कारखाना अधिनियम 1891 — 9 वर्ष से कम बच्चों के काम पर रोक — बच्चों के लिए अधिकतम 7 घंटे — महिलाओं के लिए अधिकतम 11 घंटे।

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1881 और 1891 के कारखाना अधिनियम

अधिनियम वायसराय मुख्य महत्व
कारखाना अधिनियम 1881 लॉर्ड रिपन भारत में कारखाना श्रमिकों की परिस्थितियों को नियंत्रित करने की प्रारंभिक कानूनी व्यवस्था।
कारखाना अधिनियम 1891 लॉर्ड लैंसडाउन 1881 के कानून का विस्तार; महिलाओं और बच्चों के काम के घंटों तथा सुरक्षा संबंधी प्रावधान अधिक मजबूत किए गए।

🧠 सीधा क्रम

1881 — रिपन पहला कारखाना कानून 1891 — लैंसडाउन अधिक व्यापक सुधार
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सिविल सेवाओं का पुनर्गठन

ब्रिटिश भारत की सिविल सेवाओं के पुनर्गठन का महत्वपूर्ण आधार 1886 में गठित एचिसन लोक सेवा आयोग था। इस आयोग के अध्यक्ष सर चार्ल्स एचिसन थे।

आयोग का गठन लॉर्ड डफरिन के शासनकाल में हुआ था और उसने 1887 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग ने पुरानी संविदाबद्ध और असंविदाबद्ध सेवाओं की व्यवस्था के स्थान पर नया वर्गीकरण अपनाने की सिफारिश की।

आयोग ने सिविल सेवाओं को मुख्य रूप से इंपीरियल सेवा, प्रांतीय सेवा और अधीनस्थ सेवा—इन तीन श्रेणियों में व्यवस्थित करने की सिफारिश की।

इन सिफारिशों को बाद के वर्षों में लागू किया गया और लॉर्ड लैंसडाउन के शासनकाल में यह तीन-स्तरीय वर्गीकरण प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बना।

🎯 सही संबंध

एचिसन आयोग — 1886 — डफरिन के समय गठन।
इंपीरियल + प्रांतीय + अधीनस्थ सेवाएँ — आयोग की सिफारिश — बाद में लैंसडाउन के काल में क्रियान्वयन।

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तीन प्रकार की सिविल सेवाएँ

श्रेणी मुख्य स्वरूप
इंपीरियल सेवा ब्रिटिश भारतीय शासन के उच्च और महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों से संबंधित सेवा।
प्रांतीय सेवा विभिन्न प्रांतों के प्रशासन के लिए संगठित सेवा; भारतीयों के लिए इसमें अपेक्षाकृत अधिक अवसर उपलब्ध हुए।
अधीनस्थ सेवा प्रशासन के निचले और सहायक स्तर के पदों से संबंधित सेवाएँ।

📗 याद रखने का क्रम

इंपीरियल → प्रांतीय → अधीनस्थ।

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भारत परिषद अधिनियम — 1892

लॉर्ड लैंसडाउन के शासनकाल में भारत परिषद अधिनियम 1892 पारित हुआ। यह भारतीयों की बढ़ती राजनीतिक माँगों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विधायी परिषदों के विस्तार की माँग की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण था।

इस अधिनियम द्वारा केंद्रीय और प्रांतीय विधायी परिषदों में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई और परिषदों के कार्यक्षेत्र को कुछ हद तक विस्तृत किया गया।

सदस्यों को पहली बार वार्षिक बजट पर चर्चा करने का सीमित अधिकार मिला। हालांकि वे बजट को बदल नहीं सकते थे और उस पर मतदान का पूर्ण अधिकार नहीं था।

सदस्यों को निर्धारित नियमों और पूर्व सूचना के आधार पर सरकार से सार्वजनिक मामलों पर प्रश्न पूछने की भी अनुमति दी गई। पूरक प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता नहीं थी।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण तथ्य

भारत परिषद अधिनियम 1892 — परिषदों का विस्तार — बजट पर चर्चा — सरकार से प्रश्न पूछने का सीमित अधिकार।

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प्रतिनिधित्व और अप्रत्यक्ष निर्वाचन

भारत परिषद अधिनियम 1892 में सीधे तौर पर आधुनिक अर्थों में “निर्वाचन” शब्द का स्पष्ट प्रयोग नहीं किया गया था, लेकिन प्रतिनिधियों के चयन की ऐसी व्यवस्था विकसित हुई जिसमें विभिन्न संस्थाएँ सदस्यों के नाम सुझाती थीं।

नगरपालिकाएँ, जिला बोर्ड, विश्वविद्यालय, वाणिज्य मंडल और जमींदारों के समूह जैसे निकाय कुछ सदस्यों की सिफारिश कर सकते थे और औपचारिक नियुक्ति सरकार करती थी।

इसी कारण 1892 के अधिनियम को भारत में अप्रत्यक्ष निर्वाचन के सिद्धांत की प्रारंभिक शुरुआत से जोड़ा जाता है। यह पूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था नहीं थी।

⚠️ भ्रम से बचें

1892 में प्रत्यक्ष चुनाव शुरू नहीं हुए थे। प्रतिनिधियों की सिफारिश और औपचारिक नामांकन की व्यवस्था से अप्रत्यक्ष निर्वाचन का सिद्धांत विकसित हुआ।

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कांग्रेस और 1892 का अधिनियम

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने शुरुआती वर्षों से ही विधायी परिषदों का विस्तार, उनमें अधिक भारतीय प्रतिनिधित्व तथा प्रशासन पर प्रश्न पूछने का अधिकार माँग रही थी।

भारत परिषद अधिनियम 1892 ने इन माँगों में से कुछ को बहुत सीमित रूप में स्वीकार किया, लेकिन भारतीय नेताओं के लिए यह पर्याप्त नहीं था।

परिषदों में निर्वाचित प्रतिनिधित्व बहुत सीमित था, सरकार का नियंत्रण बना रहा और बजट पर चर्चा के बावजूद वास्तविक वित्तीय शक्ति परिषदों को नहीं दी गई।

फिर भी यह अधिनियम आगे चलकर भारतीय प्रतिनिधित्व के विस्तार और बाद के संवैधानिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण बना।

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1892 और 1909 के अधिनियम में अंतर

भारत परिषद अधिनियम 1892 भारत परिषद अधिनियम 1909
लॉर्ड लैंसडाउन के समय लॉर्ड मिंटो द्वितीय के समय
परिषदों का सीमित विस्तार परिषदों का और अधिक विस्तार
अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व की प्रारंभिक व्यवस्था निर्वाचन व्यवस्था को अधिक स्पष्ट रूप मिला
बजट पर सीमित चर्चा विधायी सदस्यों के अधिकारों में कुछ और वृद्धि
सांप्रदायिक निर्वाचन नहीं मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था
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प्रमुख घटनाएँ — एक नजर में

वर्ष घटना
1888 लॉर्ड लैंसडाउन भारत का वायसराय बना।
1891 भारतीय कारखाना अधिनियम पारित हुआ।
1891 महिलाओं और बच्चों के कारखाना श्रम से संबंधित नियमों को अधिक व्यवस्थित किया गया।
1892 भारत परिषद अधिनियम पारित हुआ।
1892 एचिसन आयोग की सिविल सेवा पुनर्गठन संबंधी सिफारिशों का क्रियान्वयन आगे बढ़ा।
1893 सर मॉर्टिमर डूरंड और अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच डूरंड समझौता।
1893 ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के प्रभाव क्षेत्रों के बीच डूरंड रेखा निर्धारित हुई।
1894 लॉर्ड लैंसडाउन का वायसराय के रूप में कार्यकाल समाप्त हुआ।
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परीक्षा के लिए त्वरित क्रम

🧠 एक क्रम में याद रखें

1888 — लैंसडाउन 1891 — कारखाना अधिनियम 1892 — भारत परिषद अधिनियम सिविल सेवा वर्गीकरण 1893 — डूरंड समझौता

⚡ त्वरित पुनरावृत्ति

लॉर्ड लैंसडाउन — 1888 से 1894 तक भारत का वायसराय।

1893 — सर मॉर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच डूरंड समझौता।

डूरंड रेखा ने ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के प्रभाव क्षेत्रों के बीच सीमा निर्धारित की।

1893 के बाद वास्तविक सीमांकन के लिए संयुक्त सीमा-निर्धारण आयोगों और सर्वेक्षणों का कार्य किया गया।

कारखाना अधिनियम — 1891 — लॉर्ड लैंसडाउन।

1891 के कारखाना अधिनियम में 9 वर्ष से कम बच्चों के रोजगार पर रोक और बच्चों के लिए अधिकतम 7 घंटे दैनिक कार्य का प्रावधान था।

महिला श्रमिकों के लिए अधिकतम 11 घंटे दैनिक वास्तविक कार्य निर्धारित किया गया।

सिविल सेवाओं का इंपीरियल, प्रांतीय और अधीनस्थ सेवाओं में वर्गीकरण एचिसन आयोग की सिफारिशों पर आधारित था।

एचिसन आयोग 1886 में लॉर्ड डफरिन के समय गठित हुआ था; इसकी सिफारिशों का क्रियान्वयन बाद में लैंसडाउन के समय आगे बढ़ा।

भारत परिषद अधिनियम — 1892 — लॉर्ड लैंसडाउन।

1892 के अधिनियम द्वारा केंद्रीय और प्रांतीय विधायी परिषदों का विस्तार किया गया।

सदस्यों को बजट पर सीमित चर्चा और सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार मिला।

1892 में आधुनिक प्रत्यक्ष चुनाव नहीं शुरू हुए थे; अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व के सिद्धांत की प्रारंभिक व्यवस्था विकसित हुई।

लैंसडाउन = कारखाना अधिनियम 1891 + भारत परिषद अधिनियम 1892 + डूरंड समझौता 1893।

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