भारतीय संविधान का ऐतिहासिक विकास
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से स्वतंत्र भारत तक संवैधानिक विकास की संपूर्ण यात्रा
भारतीय संविधान का ऐतिहासिक विकास
संविधान राज्य की मूल विधि है। यह शासन की संरचना, विभिन्न संस्थाओं की शक्तियों एवं सीमाओं, राज्य और नागरिकों के संबंध तथा नागरिकों के अधिकारों की मूल रूपरेखा निर्धारित करता है।
अंग्रेजी शब्द Constitution को लैटिन के Constitutio / Constituere से निकला माना जाता है, जिसका सामान्य अर्थ किसी व्यवस्था को स्थापित या व्यवस्थित करना है।
भारत का वर्तमान संविधान अचानक निर्मित नहीं हुआ। इसके पीछे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन, ब्रिटिश संसद द्वारा बनाए गए अनेक अधिनियमों, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, संवैधानिक सुधारों और भारतीयों द्वारा स्वशासन की लगातार बढ़ती मांग की लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया रही।
🎯 परीक्षा-सावधानी
ब्रिटिश संविधान को संसदीय शासन तथा अनेक आधुनिक संवैधानिक संस्थाओं के विकास का प्रमुख स्रोत माना जाता है। कभी-कभी इसे संसदीय शासन की जननी जैसे वर्णनात्मक शब्दों से भी संबोधित किया जाता है, लेकिन इसे किसी औपचारिक संवैधानिक उपाधि के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
संविधान सभा की मांग का विकास
भारतीयों द्वारा अपना संविधान स्वयं बनाने की मांग
1895 में सामने आए ‘भारत का संविधान विधेयक’ अथवा ‘स्वराज विधेयक’ को भारत के आरंभिक गैर-सरकारी संवैधानिक प्रारूपों में गिना जाता है। इसमें शासन की संरचना के साथ कई नागरिक अधिकारों की भी कल्पना की गई थी।
इस प्रारूप को कई पुराने विवरणों में बाल गंगाधर तिलक से जोड़ा जाता है, लेकिन इसका वास्तविक लेखक निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। इसलिए परीक्षा में इसे सीधे “तिलक द्वारा लिखा गया संविधान” कहना सुरक्षित नहीं है।
1922 में महात्मा गांधी ने यह विचार स्पष्ट किया कि भारत का संविधान भारतीय जनता की इच्छा के अनुसार चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा बनाया जाना चाहिए। इस विचार में आगे चलकर संविधान सभा की मूल भावना दिखाई देती है।
1934 में एम. एन. रॉय ने भारत के लिए संविधान सभा की मांग को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। सामान्य परीक्षा-प्रश्नों में संविधान सभा का विचार सर्वप्रथम प्रस्तुत करने का श्रेय एम. एन. रॉय को दिया जाता है।
1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने संविधान सभा की मांग को औपचारिक राजनीतिक लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया। कांग्रेस का विचार था कि भारत का संविधान ऐसी संविधान सभा द्वारा बनाया जाए जो भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करे।
📗 याद रखें
संविधान सभा का विचार स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने वाले — एम. एन. रॉय, 1934।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा औपचारिक मांग — 1935।
ईस्ट इंडिया कंपनी और प्रारंभिक पृष्ठभूमि
व्यापारिक कंपनी से राजनीतिक शक्ति बनने तक
1600 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए शाही चार्टर प्रदान किया। कंपनी का प्रबंधन एक गवर्नर तथा 24 सदस्यीय निदेशक निकाय द्वारा किया जाता था।
प्रारंभ में कंपनी का उद्देश्य व्यापार था, लेकिन धीरे-धीरे उसने भारत में राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति प्राप्त करनी शुरू कर दी।
1757 के प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की विजय ने बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक शक्ति का आधार मजबूत कर दिया।
1764 के बक्सर के युद्ध में कंपनी की सेना ने बंगाल के पूर्व नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त शक्ति को पराजित किया।
बक्सर की विजय के बाद कंपनी की स्थिति और मजबूत हो गई। 1765 में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान की। इसका अर्थ मुख्य रूप से इन क्षेत्रों के राजस्व-संग्रह के अधिकार से था।
इस प्रकार एक व्यापारिक कंपनी धीरे-धीरे विशाल भू-भाग की राजस्व एवं राजनीतिक शक्ति बन गई। इसी बढ़ती शक्ति और प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण ब्रिटिश संसद को कंपनी के भारतीय शासन में हस्तक्षेप करना पड़ा।
⚠️ भ्रम से बचें
रॉबर्ट क्लाइव बंगाल का गवर्नर था। उसे भारत का अथवा बंगाल का प्रथम गवर्नर-जनरल नहीं कहा जाना चाहिए। बंगाल का प्रथम गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स था।
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773
कंपनी शासन पर संसदीय नियंत्रण की शुरुआत
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 ब्रिटिश संसद द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय प्रशासन को नियंत्रित करने का पहला महत्वपूर्ण प्रयास था। इसी कारण भारतीय संवैधानिक विकास के इतिहास में इसका विशेष महत्व है।
इस अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर के पद को बंगाल का गवर्नर-जनरल बना दिया गया।
वारेन हेस्टिंग्स बंगाल के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
गवर्नर-जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद की व्यवस्था की गई।
बंबई और मद्रास प्रेसिडेंसी को विशेष रूप से युद्ध और संधि के मामलों में बंगाल की सरकार के अधीन किया गया। इससे भारतीय प्रशासन के केंद्रीकरण की शुरुआत हुई।
अधिनियम ने कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट स्थापित करने का प्रावधान किया।
इसके अनुसार 1774 में कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट स्थापित किया गया। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य न्यायाधीश रखे गए।
कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार तथा भारतीयों से उपहार या रिश्वत लेने पर रोक लगाने की दिशा में भी प्रावधान किए गए।
🎯 परीक्षा में सबसे महत्वपूर्ण
ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी शासन को नियंत्रित करने का पहला बड़ा कदम — रेगुलेटिंग एक्ट, 1773।
संशोधन अधिनियम, 1781
रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों में सुधार
संशोधन अधिनियम, 1781 को प्रायः एक्ट ऑफ सेटलमेंट, 1781 के नाम से जाना जाता है।
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के बाद सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल की परिषद के अधिकार-क्षेत्र को लेकर अनेक व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न हुई थीं। 1781 के अधिनियम का उद्देश्य इन्हीं समस्याओं को कम करना था।
इसने सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र को अधिक स्पष्ट किया तथा कंपनी के राजस्व संबंधी मामलों और प्रशासनिक कार्यों को न्यायालय के हस्तक्षेप से कुछ सीमा तक अलग किया।
अधिनियम ने भारतीयों के व्यक्तिगत मामलों में उनके धार्मिक और प्रचलित कानूनों को ध्यान में रखने की दिशा को भी स्पष्ट किया।
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784
कंपनी और ब्रिटिश सरकार का द्वैध नियंत्रण
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 ने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक कार्यों और उसके राजनीतिक एवं प्रशासनिक कार्यों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया।
राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों की निगरानी के लिए ब्रिटिश सरकार ने नियंत्रण बोर्ड की स्थापना की।
कंपनी का निदेशक मंडल उसके व्यापारिक एवं आंतरिक कंपनी संबंधी मामलों का संचालन करता रहा।
इस प्रकार भारतीय मामलों पर एक ओर कंपनी का निदेशक मंडल और दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बोर्ड काम करता था। इसे सामान्यतः द्वैध नियंत्रण कहा जाता है।
इस अधिनियम के बाद भारत में कंपनी की राजनीतिक गतिविधियों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हो गया।
🎯 एक पंक्ति में
रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 = संसदीय नियंत्रण की शुरुआत
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 = द्वैध नियंत्रण
चार्टर एक्ट, 1793
कंपनी के अधिकारों की अवधि बढ़ी
चार्टर एक्ट, 1793 द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार तथा भारत में शासन करने संबंधी अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
इस अधिनियम ने पूर्व की प्रशासनिक व्यवस्था को बड़े स्तर पर जारी रखा और गवर्नर-जनरल की केंद्रीय स्थिति को और मजबूत किया।
चार्टर एक्ट, 1813
कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार पर पहला बड़ा प्रहार
चार्टर एक्ट, 1813 द्वारा भारत के साथ व्यापार करने पर ईस्ट इंडिया कंपनी का सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया।
हालाँकि चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा।
इस अधिनियम ने ईसाई मिशनरियों को भारत में आने और धार्मिक प्रचार तथा शिक्षा संबंधी गतिविधियाँ करने की अनुमति दी।
भारतीय शिक्षा के विकास के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया।
इसके बाद निजी ब्रिटिश व्यापारियों के लिए भारत के साथ व्यापार के अवसर अधिक खुले।
📗 याद रखें
1813 में कंपनी का व्यापार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। चाय और चीन के व्यापार पर उसका एकाधिकार बना रहा।
चार्टर एक्ट, 1833
केंद्रीकरण और कंपनी के व्यापार का पूर्ण अंत
चार्टर एक्ट, 1833 भारतीय संवैधानिक विकास का अत्यंत महत्वपूर्ण अधिनियम था।
इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी की बची हुई व्यापारिक गतिविधियाँ भी समाप्त कर दी गईं। अब कंपनी मुख्य रूप से ब्रिटिश सरकार की ओर से भारत का प्रशासन चलाने वाली संस्था बन गई।
बंगाल के गवर्नर-जनरल को अब भारत का गवर्नर-जनरल बनाया गया।
लॉर्ड विलियम बेंटिंक भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
भारत में कानून निर्माण की शक्ति का अधिक केंद्रीकरण किया गया और बंबई तथा मद्रास की विधायी शक्तियों को सीमित करते हुए केंद्रीय शासन को प्रमुख बनाया गया।
गवर्नर-जनरल की परिषद में कानून बनाने के कार्य के लिए एक अतिरिक्त विधि सदस्य रखने का प्रावधान किया गया।
लॉर्ड मैकाले गवर्नर-जनरल की परिषद के प्रथम विधि सदस्य बने।
अधिनियम ने सिद्धांत रूप में यह घोषित किया कि केवल धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग आदि के आधार पर भारतीयों को कंपनी के अधीन सरकारी पदों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। व्यवहार में यह सिद्धांत तत्काल पूरी तरह लागू नहीं हुआ।
1834 में लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में प्रथम विधि आयोग गठित किया गया।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
भारत का प्रथम गवर्नर-जनरल — लॉर्ड विलियम बेंटिंक।
कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों का पूर्ण अंत — चार्टर एक्ट, 1833।
चार्टर एक्ट, 1853
विधायी और कार्यकारी कार्यों का पृथक्करण
चार्टर एक्ट, 1853 ईस्ट इंडिया कंपनी से संबंधित अंतिम चार्टर एक्ट था।
इस अधिनियम ने गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी और कार्यकारी कार्यों को अलग करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।
कानून निर्माण के समय परिषद में अतिरिक्त सदस्यों को शामिल किया गया, जिससे केंद्रीय विधायी व्यवस्था का विस्तार हुआ।
सिविल सेवाओं में अधिकारियों की नियुक्ति के लिए खुली प्रतियोगिता की व्यवस्था लागू करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
कंपनी के शासन को पहले की तरह किसी निश्चित 20-वर्षीय अवधि के लिए न बढ़ाकर ब्रिटिश संसद की इच्छा तक जारी रखा गया।
1854 में मैकाले की अध्यक्षता वाली समिति ने भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की सिफारिश की।
📗 परीक्षा-संबंध
1853 का चार्टर एक्ट → खुली प्रतियोगिता का मार्ग
1854 की मैकाले समिति → प्रतियोगी सिविल सेवा परीक्षा की व्यवस्था की सिफारिश
भारत शासन अधिनियम, 1858
कंपनी शासन का अंत और ब्रिटिश क्राउन का शासन
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत के प्रशासन में बड़ा परिवर्तन किया। इसके परिणामस्वरूप भारत शासन अधिनियम, 1858 पारित किया गया।
इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत पर शासन समाप्त कर दिया गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।
कंपनी शासन से संबंधित नियंत्रण बोर्ड और निदेशक मंडल समाप्त कर दिए गए।
भारत के प्रशासन की देखरेख के लिए ब्रिटिश मंत्रिमंडल में भारत सचिव का पद बनाया गया।
भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यीय भारत परिषद बनाई गई।
भारत के गवर्नर-जनरल को ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में वायसराय भी कहा जाने लगा।
लॉर्ड कैनिंग कंपनी शासन के अंत के समय भारत के गवर्नर-जनरल थे और क्राउन शासन प्रारंभ होने के बाद भारत के प्रथम वायसराय बने।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण
कंपनी शासन का अंत — भारत शासन अधिनियम, 1858।
भारत का प्रथम वायसराय — लॉर्ड कैनिंग।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
भारतीय प्रतिनिधित्व और विकेंद्रीकरण की शुरुआत
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 ने कानून निर्माण की प्रक्रिया में भारतीयों को सीमित रूप से शामिल करने की शुरुआत की।
वायसराय को अपनी विस्तारित विधायी परिषद में भारतीयों को गैर-सरकारी सदस्य के रूप में नामित करने की शक्ति दी गई।
1862 में लॉर्ड कैनिंग ने बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव को अपनी विधायी परिषद में नामित किया। इन्हें इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रारंभिक नामित भारतीय सदस्यों में गिना जाता है।
इस अधिनियम ने बंबई और मद्रास को फिर से कानून बनाने की कुछ शक्तियाँ प्रदान कीं। इससे अत्यधिक केंद्रीकरण के स्थान पर विधायी विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई।
वायसराय को आपात स्थिति में अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई। ऐसे अध्यादेश की अधिकतम अवधि छह महीने थी।
गवर्नर-जनरल की परिषद में विकसित विभागीय अथवा पोर्टफोलियो प्रणाली को वैधानिक आधार मिला। इस व्यवस्था के अंतर्गत अलग-अलग सदस्यों को अलग-अलग प्रशासनिक विभागों की जिम्मेदारी दी जाती थी।
📗 एक पंक्ति में
1861 = भारतीयों का सीमित विधायी प्रतिनिधित्व + विकेंद्रीकरण + अध्यादेश शक्ति।
ईस्ट इंडिया कंपनी स्टॉक डिविडेंड रिडेम्प्शन एक्ट, 1873
ईस्ट इंडिया कंपनी का औपचारिक अंत
भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन 1858 में ही समाप्त हो चुका था, लेकिन कंपनी एक कॉरपोरेट संस्था के रूप में कुछ समय तक अस्तित्व में रही।
ईस्ट इंडिया कंपनी स्टॉक डिविडेंड रिडेम्प्शन एक्ट, 1873 के बाद कंपनी को औपचारिक रूप से समाप्त करने का मार्ग साफ हुआ।
ईस्ट इंडिया कंपनी को 1 जून 1874 को औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया।
⚠️ अंतर याद रखें
1858 — भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त।
1874 — ईस्ट इंडिया कंपनी संस्था के रूप में औपचारिक रूप से भंग।
शाही उपाधि अधिनियम, 1876
महारानी विक्टोरिया और भारत की सम्राज्ञी की उपाधि
शाही उपाधि अधिनियम, 1876 के माध्यम से महारानी विक्टोरिया ने भारत की सम्राज्ञी की उपाधि धारण की।
इस उपाधि की औपचारिक उद्घोषणा 1 जनवरी 1877 को दिल्ली में आयोजित भव्य दरबार में की गई।
उस समय भारत का वायसराय लॉर्ड लिटन था।
🎯 भ्रम से बचें
अधिनियम — 1876
दिल्ली दरबार में औपचारिक घोषणा — 1 जनवरी 1877
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
सीमित निर्वाचन और बजट चर्चा की शुरुआत
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 द्वारा केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
परिषद के सदस्यों को वार्षिक बजट पर चर्चा करने का सीमित अधिकार दिया गया। हालांकि वे बजट को पूर्ण रूप से नियंत्रित या मतदान द्वारा अस्वीकार नहीं कर सकते थे।
सदस्यों को सार्वजनिक मामलों से संबंधित प्रश्न पूछने की सीमित शक्ति भी दी गई।
इस अधिनियम के अंतर्गत भारतीय प्रतिनिधित्व में अप्रत्यक्ष निर्वाचन का तत्व दिखाई दिया। स्थानीय निकायों, विश्वविद्यालयों, वाणिज्य मंडलों आदि द्वारा सुझाए गए व्यक्तियों को नामित किया जा सकता था।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिनियम में ‘निर्वाचन’ शब्द का स्पष्ट औपचारिक प्रयोग नहीं किया गया था, लेकिन व्यवहार में निर्वाचन जैसी व्यवस्था का विकास हुआ।
🎯 परीक्षा सूत्र
1892 = बजट पर चर्चा + प्रश्न पूछना + अप्रत्यक्ष निर्वाचन का तत्व।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909
मॉर्ले–मिंटो सुधार
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 को उसके प्रमुख निर्माताओं के नाम पर मॉर्ले–मिंटो सुधार कहा जाता है।
उस समय जॉन मॉर्ले भारत सचिव और लॉर्ड मिंटो भारत के वायसराय थे।
इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था थी।
इस व्यवस्था में मुस्लिम मतदाता मुस्लिम प्रतिनिधियों के चुनाव में अलग निर्वाचन व्यवस्था के अंतर्गत भाग लेते थे। इससे भारतीय चुनावी व्यवस्था में सामुदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व को संस्थागत रूप मिला।
इसी कारण लॉर्ड मिंटो को कई परीक्षा पुस्तकों में सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक कहा जाता है।
केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के आकार में वृद्धि की गई तथा गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
केंद्रीय विधान परिषद में सरकारी सदस्यों का प्रभाव और बहुमत बना रहा, जबकि प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
सदस्यों को बजट और सार्वजनिक मामलों पर चर्चा करने, प्रस्ताव रखने तथा पूरक प्रश्न पूछने की पहले की तुलना में अधिक अनुमति मिली।
सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारी परिषद में नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय बने। उन्हें विधि सदस्य बनाया गया।
🎯 सबसे अधिक पूछा जाने वाला तथ्य
मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल — भारतीय परिषद अधिनियम, 1909।
📗 नामों की सही जोड़ी
जॉन मॉर्ले — भारत सचिव
लॉर्ड मिंटो — भारत के वायसराय
भारत शासन अधिनियम, 1919
मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार
भारत शासन अधिनियम, 1919 को मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से जाना जाता है। उस समय एडविन मॉन्टेग्यू भारत सचिव और लॉर्ड चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे।
इस अधिनियम की सबसे प्रमुख विशेषता प्रांतों में द्वैध शासन की स्थापना थी।
प्रांतीय प्रशासन के विषयों को दो वर्गों—आरक्षित विषय और हस्तांतरित विषय—में बाँट दिया गया।
पुलिस, न्याय, भूमि-राजस्व और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण विषय सामान्यतः आरक्षित श्रेणी में रखे गए और वे गवर्नर तथा उसकी कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में रहे।
शिक्षा, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा कृषि जैसे विषय हस्तांतरित श्रेणी में रखे गए और इनके संचालन में भारतीय मंत्रियों की भूमिका बढ़ी।
केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधानमंडल स्थापित किया गया। इसके दो सदन थे—राज्य परिषद और केंद्रीय विधान सभा।
राज्य परिषद में अधिकतम 60 सदस्य और केंद्रीय विधान सभा में अधिकतम 145 सदस्य रखने की व्यवस्था थी।
प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था का विस्तार किया गया, हालांकि मताधिकार अभी भी संपत्ति, कर, आय और अन्य योग्यताओं के आधार पर बहुत सीमित था।
सिखों, भारतीय ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों और यूरोपियों सहित कुछ अन्य वर्गों के लिए पृथक अथवा विशेष प्रतिनिधित्व की व्यवस्था का विस्तार किया गया।
महिलाओं को मताधिकार देने का मार्ग भी खोला गया, लेकिन सभी महिलाओं को तत्काल सार्वभौमिक मताधिकार नहीं मिला। इसका वास्तविक विस्तार संबंधित प्रांतीय नियमों एवं योग्यताओं पर निर्भर था।
इस अधिनियम में भारत के लिए लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया।
इसके बाद ली आयोग की सिफारिशों की पृष्ठभूमि में 1926 में केंद्रीय लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई।
⚠️ बड़ा भ्रम
1919 में द्वैध शासन प्रांतों में लागू हुआ था, केंद्र में नहीं।
🎯 परीक्षा सूत्र
1919 = प्रांतों में द्वैध शासन + केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल।
भारत शासन अधिनियम, 1935
ब्रिटिश काल का सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियम
भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के शासन के लिए बनाया गया सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियम था। इसमें 321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ थीं।
इस अधिनियम ने भारत में एक अखिल भारतीय संघ स्थापित करने का प्रावधान किया, जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा देशी रियासतों को शामिल किया जाना था।
देशी रियासतों द्वारा आवश्यक संख्या में संघ में शामिल होने की सहमति न देने के कारण प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ वास्तव में स्थापित नहीं हो सका।
प्रांतों में 1919 से चली आ रही द्वैध शासन प्रणाली समाप्त कर दी गई और उसके स्थान पर प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई।
प्रांतीय मंत्रियों को प्रांतीय विषयों के प्रशासन में अधिक उत्तरदायित्व दिया गया, हालांकि गवर्नरों के पास अभी भी विशेष और विवेकाधीन शक्तियाँ मौजूद थीं।
अधिनियम ने केंद्र में द्वैध शासन लागू करने का प्रावधान किया, लेकिन प्रस्तावित संघ ही अस्तित्व में नहीं आया, इसलिए केंद्रीय द्वैध शासन भी लागू नहीं हो सका।
शक्तियों को तीन सूचियों में बाँटा गया—संघीय सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची।
अवशिष्ट विषयों पर अधिकार गवर्नर-जनरल के पास रखा गया।
अधिनियम ने भारत में संघीय न्यायालय स्थापित करने का प्रावधान किया। संघीय न्यायालय ने 1937 में कार्य करना आरंभ किया।
कुछ प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था की गई।
मताधिकार का काफी विस्तार किया गया, फिर भी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार लागू नहीं हुआ। उस समय कुल जनसंख्या के केवल लगभग 14 प्रतिशत लोगों तक मताधिकार पहुँचा।
बर्मा को भारत से अलग करने की व्यवस्था की गई।
पुरानी भारत परिषद को समाप्त किया गया।
इस अधिनियम में प्रस्तावना नहीं थी।
भारत के वर्तमान संविधान की अनेक प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर 1935 के अधिनियम का प्रभाव देखा जा सकता है, विशेष रूप से संघीय ढाँचे, प्रांतीय प्रशासन, राज्यपाल के पद, लोक सेवा आयोग, न्यायिक व्यवस्था तथा केंद्र-राज्य शक्तियों के विभाजन में।
तीनों सूचियों को उदाहरण से समझें
| सूची | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|
| संघीय सूची | रक्षा, विदेश संबंध, मुद्रा, नौसेना और वायुसेना |
| प्रांतीय सूची | पुलिस, शिक्षा, स्थानीय शासन और लोक स्वास्थ्य |
| समवर्ती सूची | फौजदारी कानून, विवाह-विच्छेद और दीवानी प्रक्रिया |
⚠️ भारतीय रिजर्व बैंक वाला भ्रम
भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत हुई थी। इसलिए यह कहना कि भारतीय रिजर्व बैंक को सीधे भारत शासन अधिनियम, 1935 ने स्थापित किया था, सटीक नहीं है।
🎯 1919 और 1935 में अंतर
1919 — प्रांतों में द्वैध शासन।
1935 — प्रांतों से द्वैध शासन समाप्त, प्रांतीय स्वायत्तता लागू।
1935 — केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान, लेकिन लागू नहीं हुआ।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947
ब्रिटिश शासन का वैधानिक अंत
माउंटबेटन योजना के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण के लिए भारतीय स्वतंत्रता विधेयक तैयार किया।
यह विधेयक 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया गया।
विधेयक को 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश सम्राट की शाही स्वीकृति मिली और यह भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 बन गया।
अधिनियम के अनुसार 15 अगस्त 1947 से ब्रिटिश भारत को दो स्वतंत्र डोमिनियन—भारत और पाकिस्तान—में विभाजित किया गया।
ब्रिटिश संसद का भारत पर विधायी नियंत्रण समाप्त हो गया।
भारत सचिव का पद समाप्त कर दिया गया।
देशी रियासतों के ऊपर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता समाप्त हो गई और उनके साथ ब्रिटिश सरकार की पुरानी संधियाँ समाप्त होने लगीं।
भारत और पाकिस्तान दोनों की संविधान सभाओं को अपना-अपना संविधान बनाने की पूर्ण शक्ति दी गई।
संविधान सभा को संविधान निर्माण के साथ अपने डोमिनियन के लिए कानून बनाने की विधायी शक्ति भी प्राप्त हुई।
प्रत्येक डोमिनियन में गवर्नर-जनरल की व्यवस्था रखी गई। उसकी नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा संबंधित डोमिनियन सरकार की सलाह के अनुसार की जानी थी।
ब्रिटिश सम्राट का भारतीय विधेयकों को सुरक्षित रखने या उन पर वीटो जैसी पुरानी प्रत्यक्ष विधायी भूमिका समाप्त हो गई।
जब तक स्वतंत्र भारत का नया संविधान लागू नहीं हुआ, तब तक देश का शासन मुख्यतः भारत शासन अधिनियम, 1935 के संशोधित रूप के आधार पर चलता रहा।
📗 तीन तिथियाँ एक साथ याद रखें
4 जुलाई 1947 — विधेयक प्रस्तुत
18 जुलाई 1947 — शाही स्वीकृति
15 अगस्त 1947 — भारत स्वतंत्र
प्रमुख अधिनियमों की तुलना
एक नज़र में पूरा संवैधानिक विकास
| वर्ष | अधिनियम | सबसे महत्वपूर्ण विशेषता |
|---|---|---|
| 1773 | रेगुलेटिंग एक्ट | कंपनी शासन पर ब्रिटिश संसद के नियंत्रण की शुरुआत |
| 1781 | संशोधन अधिनियम | सुप्रीम कोर्ट और प्रशासन के अधिकार-क्षेत्र को स्पष्ट किया |
| 1784 | पिट्स इंडिया एक्ट | द्वैध नियंत्रण की व्यवस्था |
| 1793 | चार्टर एक्ट | कंपनी के अधिकार 20 वर्ष के लिए बढ़े |
| 1813 | चार्टर एक्ट | भारत के व्यापार पर सामान्य एकाधिकार समाप्त |
| 1833 | चार्टर एक्ट | कंपनी का व्यापार पूर्णतः समाप्त; भारत का गवर्नर-जनरल |
| 1853 | चार्टर एक्ट | विधायी-कार्यकारी कार्यों का पृथक्करण; खुली प्रतियोगिता का मार्ग |
| 1858 | भारत शासन अधिनियम | कंपनी शासन समाप्त; क्राउन शासन |
| 1861 | भारतीय परिषद अधिनियम | भारतीय प्रतिनिधित्व और विकेंद्रीकरण की शुरुआत |
| 1892 | भारतीय परिषद अधिनियम | बजट चर्चा और अप्रत्यक्ष निर्वाचन का तत्व |
| 1909 | भारतीय परिषद अधिनियम | मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल |
| 1919 | भारत शासन अधिनियम | प्रांतों में द्वैध शासन और केंद्र में द्विसदनीयता |
| 1935 | भारत शासन अधिनियम | प्रांतीय स्वायत्तता और तीन सूचियाँ |
| 1947 | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम | ब्रिटिश शासन का वैधानिक अंत |
सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा-बिंदु
तेज पुनरावृत्ति के लिए आवश्यक तथ्य
- ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी प्रशासन पर नियंत्रण की शुरुआत — रेगुलेटिंग एक्ट, 1773।
- बंगाल का प्रथम गवर्नर-जनरल — वारेन हेस्टिंग्स।
- कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट की स्थापना — 1774।
- कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के प्रथम मुख्य न्यायाधीश — सर एलिजा इम्पे।
- कंपनी और ब्रिटिश सरकार का द्वैध नियंत्रण — पिट्स इंडिया एक्ट, 1784।
- भारत के साथ कंपनी का सामान्य व्यापारिक एकाधिकार समाप्त — चार्टर एक्ट, 1813।
- कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों का पूर्ण अंत — चार्टर एक्ट, 1833।
- भारत का प्रथम गवर्नर-जनरल — लॉर्ड विलियम बेंटिंक।
- सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता का मार्ग — चार्टर एक्ट, 1853।
- कंपनी शासन का अंत — भारत शासन अधिनियम, 1858।
- भारत का प्रथम वायसराय — लॉर्ड कैनिंग।
- भारतीयों को विधायी परिषद में नामित करने की शुरुआत — भारतीय परिषद अधिनियम, 1861।
- सीमित अप्रत्यक्ष निर्वाचन का तत्व — भारतीय परिषद अधिनियम, 1892।
- मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल — भारतीय परिषद अधिनियम, 1909।
- वायसराय की कार्यकारी परिषद का प्रथम भारतीय सदस्य — सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा।
- प्रांतों में द्वैध शासन — भारत शासन अधिनियम, 1919।
- केंद्र में पहली बार द्विसदनीय विधानमंडल — भारत शासन अधिनियम, 1919।
- प्रांतीय स्वायत्तता — भारत शासन अधिनियम, 1935।
- केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान — भारत शासन अधिनियम, 1935; लेकिन लागू नहीं हुआ।
- ब्रिटिश शासन का वैधानिक अंत — भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947।
भ्रम से बचने वाले महत्वपूर्ण तथ्य
समान दिखने वाले तथ्यों को अलग-अलग समझें
गलत: रॉबर्ट क्लाइव भारत का प्रथम गवर्नर-जनरल था।
सही: बंगाल का प्रथम गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स और भारत का प्रथम गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक था।
गलत: 1813 में कंपनी का पूरा व्यापार समाप्त हो गया।
सही: 1813 में सामान्य भारतीय व्यापार का एकाधिकार समाप्त हुआ; चाय और चीन के व्यापार का एकाधिकार 1833 तक बना रहा।
गलत: 1833 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी समाप्त हो गई।
सही: 1833 में कंपनी की व्यापारिक गतिविधियाँ समाप्त हुईं; भारत पर उसका शासन 1858 में समाप्त हुआ और कंपनी संस्था के रूप में 1874 में भंग हुई।
गलत: 1853 में ही भारतीयों को बड़ी संख्या में सिविल सेवा में नियुक्त कर दिया गया।
सही: 1853 के अधिनियम ने खुली प्रतियोगिता का मार्ग प्रशस्त किया और 1854 की मैकाले समिति ने प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की सिफारिश की।
गलत: लॉर्ड कैनिंग भारत का प्रथम गवर्नर-जनरल था।
सही: लॉर्ड कैनिंग कंपनी शासन के अंत का अंतिम गवर्नर-जनरल और क्राउन शासन का प्रथम वायसराय था।
गलत: 1892 के अधिनियम ने आधुनिक प्रत्यक्ष चुनाव शुरू कर दिया।
सही: इसमें अप्रत्यक्ष निर्वाचन का तत्व आया, जबकि अधिनियम ने स्वयं ‘निर्वाचन’ शब्द का स्पष्ट औपचारिक प्रयोग नहीं किया।
गलत: 1909 में सभी भारतीयों को समान चुनाव अधिकार मिल गया।
सही: 1909 में सीमित प्रतिनिधित्व बढ़ा और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल स्थापित हुआ।
गलत: 1919 में द्वैध शासन केंद्र में लागू हुआ।
सही: 1919 में द्वैध शासन प्रांतों में लागू हुआ।
गलत: 1935 में भी प्रांतों में द्वैध शासन जारी रहा।
सही: 1935 के अधिनियम ने प्रांतों से द्वैध शासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्तता लागू की।
गलत: भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक स्थापित किया गया।
सही: भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत 1 अप्रैल 1935 को हुई।
गलत: 1935 का अखिल भारतीय संघ वास्तव में स्थापित हो गया था।
सही: संघ का केवल प्रावधान किया गया; देशी रियासतों के आवश्यक संख्या में शामिल न होने के कारण यह लागू नहीं हुआ।
गलत: भारत को 1947 में तुरंत वर्तमान संविधान मिल गया।
सही: स्वतंत्रता के बाद नया संविधान बनने तक भारत का शासन मुख्यतः संशोधित भारत शासन अधिनियम, 1935 के आधार पर चलता रहा।
क्रम याद करने की सरल विधि
1773 से 1947 तक एक ही प्रवाह में
🧠 संवैधानिक विकास का क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
1895 — भारत का संविधान विधेयक अथवा स्वराज विधेयक; आरंभिक भारतीय संवैधानिक प्रारूपों में महत्वपूर्ण, लेकिन लेखक निश्चित नहीं।
1934 — एम. एन. रॉय ने स्पष्ट रूप से संविधान सभा का विचार रखा।
1935 — भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने संविधान सभा की मांग को औपचारिक राजनीतिक लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया।
1773 — रेगुलेटिंग एक्ट; ब्रिटिश संसदीय नियंत्रण की शुरुआत; वारेन हेस्टिंग्स बंगाल के प्रथम गवर्नर-जनरल।
1781 — संशोधन अधिनियम; सुप्रीम कोर्ट और प्रशासन के अधिकार-क्षेत्र में सुधार।
1784 — पिट्स इंडिया एक्ट; नियंत्रण बोर्ड और निदेशक मंडल के माध्यम से द्वैध नियंत्रण।
1793 — कंपनी के अधिकार अगले 20 वर्षों के लिए बढ़े।
1813 — सामान्य भारतीय व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार समाप्त; चाय और चीन का व्यापार कंपनी के पास रहा।
1833 — कंपनी का व्यापार पूर्णतः समाप्त; लॉर्ड विलियम बेंटिंक भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल; कानून निर्माण का केंद्रीकरण।
1853 — विधायी और कार्यकारी कार्यों में पृथक्करण; सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता का मार्ग।
1858 — कंपनी शासन समाप्त; ब्रिटिश क्राउन का शासन; लॉर्ड कैनिंग प्रथम वायसराय।
1861 — भारतीयों को विधायी परिषद में नामित करने की शुरुआत; विकेंद्रीकरण; अध्यादेश शक्ति।
1873–74 — कंपनी को संस्था के रूप में समाप्त करने की प्रक्रिया; 1 जून 1874 को औपचारिक विघटन।
1876–77 — महारानी विक्टोरिया ने भारत की सम्राज्ञी की उपाधि धारण की; 1 जनवरी 1877 के दिल्ली दरबार में घोषणा।
1892 — बजट पर चर्चा, प्रश्न पूछने का अधिकार और अप्रत्यक्ष निर्वाचन का तत्व।
1909 — मॉर्ले–मिंटो सुधार; मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल; सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारी परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य।
1919 — मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार; प्रांतों में द्वैध शासन; केंद्र में राज्य परिषद और केंद्रीय विधान सभा वाला द्विसदनीय विधानमंडल।
1935 — प्रांतीय स्वायत्तता; संघीय, प्रांतीय और समवर्ती सूचियाँ; प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ; संघीय न्यायालय।
1935 के अधिनियम में केंद्र के लिए द्वैध शासन का प्रावधान था, लेकिन यह लागू नहीं हुआ।
भारतीय रिजर्व बैंक — भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत 1 अप्रैल 1935 से कार्य प्रारंभ।
4 जुलाई 1947 — भारतीय स्वतंत्रता विधेयक ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत।
18 जुलाई 1947 — भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को शाही स्वीकृति।
15 अगस्त 1947 — भारत और पाकिस्तान स्वतंत्र डोमिनियन बने तथा भारत में ब्रिटिश शासन का वैधानिक अंत हुआ।
पूरे अध्याय का सबसे छोटा क्रम: 1773 नियंत्रण → 1784 द्वैध नियंत्रण → 1833 केंद्रीकरण → 1858 क्राउन शासन → 1861 प्रतिनिधित्व → 1892 सीमित निर्वाचन → 1909 पृथक निर्वाचन → 1919 प्रांतीय द्वैध शासन → 1935 प्रांतीय स्वायत्तता → 1947 स्वतंत्रता।