भारत का राष्ट्रपति
निर्वाचन, योग्यता, कार्यकाल, शक्तियाँ, महाभियोग और महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य
भारत का संवैधानिक प्रमुख
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष है। संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है और उसका प्रयोग संविधान के अनुसार किया जाता है।
भारत में संसदीय शासन प्रणाली है। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में राष्ट्रपति अपनी अधिकांश संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर करता है।
राष्ट्रपति राष्ट्र का औपचारिक एवं संवैधानिक प्रतिनिधि है, जबकि दैनिक शासन का वास्तविक राजनीतिक नेतृत्व प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है।
राष्ट्रपति से संबंधित महत्वपूर्ण अनुच्छेद
अनुच्छेद 52 से 73
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 52 | भारत का एक राष्ट्रपति होगा। |
| 53 | संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। |
| 54 | राष्ट्रपति का निर्वाचन करने वाला निर्वाचक मंडल। |
| 55 | राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति और मत-मूल्य की व्यवस्था। |
| 56 | राष्ट्रपति की पदावधि। |
| 57 | पुनर्निर्वाचन की पात्रता। |
| 58 | राष्ट्रपति निर्वाचित होने की अर्हताएँ। |
| 59 | राष्ट्रपति के पद की शर्तें। |
| 60 | राष्ट्रपति की शपथ या प्रतिज्ञान। |
| 61 | संविधान के उल्लंघन पर राष्ट्रपति के महाभियोग की प्रक्रिया। |
| 62 | पद रिक्त होने पर राष्ट्रपति चुनाव कराने का समय तथा आकस्मिक रिक्ति भरने वाले राष्ट्रपति की पदावधि। |
| 72 | क्षमादान तथा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राष्ट्रपति की शक्ति। |
| 73 | संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार। |
राष्ट्रपति का निर्वाचन
अप्रत्यक्ष निर्वाचन
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से नहीं होता। राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा किया जाता है।
राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए एक विशेष निर्वाचक मंडल बनाया गया है।
इसमें संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।
इसके साथ सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेते हैं।
संघ राज्यक्षेत्रों में केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में शामिल हैं।
संसद के नामित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं करते।
राज्य विधान परिषदों के सदस्य भी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं करते।
विधानसभा के नामित सदस्य, जहाँ ऐसी व्यवस्था हो, निर्वाचक मंडल का हिस्सा नहीं होते।
🎯 राष्ट्रपति के मतदाता
निर्वाचित लोकसभा सदस्य + निर्वाचित राज्यसभा सदस्य + राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य + दिल्ली एवं पुडुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
सभी केंद्रशासित प्रदेशों के विधायक राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं करते। संवैधानिक रूप से इस निर्वाचक मंडल में दिल्ली और पुडुचेरी को विशेष रूप से शामिल किया गया है।
निर्वाचन की पद्धति
आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत
राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
मतदान गुप्त मतदान द्वारा किया जाता है।
निर्वाचक उम्मीदवारों के सामने अपनी पसंद का क्रम निर्धारित करते हैं—पहली पसंद, दूसरी पसंद और आगे की पसंद।
राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्येक सांसद और विधायक के मत का मूल्य एक समान नहीं होता। संविधान ने राज्यों के बीच तथा राज्यों और संसद के बीच प्रतिनिधित्व में यथासंभव समानता स्थापित करने के लिए मत-मूल्य की विशेष गणना निर्धारित की है।
वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में राष्ट्रपति चुनाव के लिए जनसंख्या संबंधी गणना में, जब तक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रासंगिक आँकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते, पुरानी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार 1971 की जनगणना का आधार जारी रहता है।
राष्ट्रपति उम्मीदवार का नामांकन
प्रस्तावक, अनुमोदक और जमानत
राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नामांकन-पत्र पर कम से कम 50 निर्वाचकों का प्रस्तावक के रूप में हस्ताक्षर होना आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त कम से कम 50 निर्वाचकों का अनुमोदक के रूप में हस्ताक्षर होना आवश्यक है।
राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार को निर्धारित ₹15,000 की जमानत राशि भी जमा करनी होती है।
🎯 सूत्र
50 प्रस्तावक + 50 अनुमोदक + ₹15,000 जमानत राशि।
राष्ट्रपति बनने की योग्यता
अनुच्छेद 58
राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भारत का नागरिक होना चाहिए।
उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
वह भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या इनके नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय अथवा अन्य प्राधिकरण के अंतर्गत लाभ का पद धारण नहीं करता हो।
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल तथा संघ या राज्य के मंत्री का पद इस उद्देश्य से लाभ का पद नहीं माना जाता।
पद की शर्तें और कार्यकाल
अनुच्छेद 56, 57 और 59
राष्ट्रपति का सामान्य कार्यकाल पद ग्रहण करने की तारीख से पाँच वर्ष होता है।
पाँच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी उत्तराधिकारी द्वारा पद ग्रहण किए जाने तक वर्तमान राष्ट्रपति पद पर बना रह सकता है।
भारत के संविधान में राष्ट्रपति के पुनर्निर्वाचन की संख्या पर कोई संवैधानिक सीमा नहीं है।
यदि संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है तो उसके राष्ट्रपति पद ग्रहण करते ही उसकी संबंधित सदन की सीट रिक्त मानी जाती है।
राष्ट्रपति कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं कर सकता।
राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देता है।
🎯 डॉ. राजेंद्र प्रसाद
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद एकमात्र व्यक्ति हैं जो राष्ट्रपति पद के लिए दो पूर्ण कार्यकालों हेतु निर्वाचित हुए।
राष्ट्रपति की शपथ
अनुच्छेद 60
राष्ट्रपति पद ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान करता है कि वह श्रद्धापूर्वक राष्ट्रपति पद का कार्यपालन करेगा।
वह संविधान और विधि का संरक्षण, परिरक्षण और प्रतिरक्षण करने तथा भारत की जनता की सेवा और कल्याण में स्वयं को समर्पित करने की शपथ लेता है।
राष्ट्रपति को शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं।
मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित हों तो सर्वोच्च न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है।
कार्यपालिका शक्तियाँ
संघ की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख
संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है।
राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है।
प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति अन्य केंद्रीय मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
भारत सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाइयाँ राष्ट्रपति के नाम से की जाती हैं।
राष्ट्रपति राज्यों के राज्यपालों सहित अनेक प्रमुख संवैधानिक पदाधिकारियों की नियुक्ति संविधान और संबंधित कानूनों के अनुसार करता है।
सामान्य संसदीय शासन में इन शक्तियों का अधिकांश प्रयोग मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर होता है।
विधायी शक्तियाँ
संसद, विधेयक और अध्यादेश
राष्ट्रपति भारतीय संसद का संवैधानिक अंग है। संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संसद राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनती है।
राष्ट्रपति संसद के सदनों को बुलाता है और उनका सत्रावसान करता है।
राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह के आधार पर लोकसभा को भंग कर सकता है।
राष्ट्रपति संसद के किसी सदन को संदेश भेज सकता है।
सामान्य चुनाव के बाद पहली बैठक और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को संबोधित करता है।
राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को प्रस्तुत करता है और इसका प्रारूप मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार किया जाता है।
अनुच्छेद 108 के अंतर्गत कुछ विधेयकों पर दोनों सदनों में गतिरोध होने पर संसद की संयुक्त बैठक राष्ट्रपति द्वारा बुलाई जाती है।
जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और तत्काल कानून की आवश्यकता हो, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 123 के अंतर्गत अध्यादेश जारी कर सकता है।
विधेयक पर राष्ट्रपति की स्वीकृति
अनुच्छेद 111 और वीटो शक्तियाँ
संसद के दोनों सदनों से पारित विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। राष्ट्रपति की संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त होने के बाद वह विधेयक अधिनियम बनता है।
साधारण विधेयक के मामले में राष्ट्रपति स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है अथवा विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस भेज सकता है।
यदि संसद साधारण विधेयक को पुनर्विचार करके पुनः पारित कर राष्ट्रपति को भेजती है तो राष्ट्रपति स्वीकृति रोक नहीं सकता।
धन विधेयक को राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिए संसद को वापस नहीं भेज सकता।
धन विधेयक संसद में प्रस्तुत किए जाने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है।
संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया के अनुसार पारित होने के बाद राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है और राष्ट्रपति को उस पर स्वीकृति देनी होती है।
📗 राष्ट्रपति की वीटो शक्तियाँ
भारत में राष्ट्रपति की वीटो शक्तियों को सामान्यतः पूर्ण वीटो, निलंबनकारी वीटो और जेबी वीटो के रूप में समझाया जाता है।
जेबी वीटो
भारतीय डाकघर विधेयक, 1986
जेबी वीटो में राष्ट्रपति किसी विधेयक पर न तो स्वीकृति देता है, न अस्वीकृति देता है और न ही उसे वापस करता है, बल्कि उसे अनिश्चित समय तक लंबित रखता है।
राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक, 1986 पर स्वीकृति लंबित रखना भारत में जेबी वीटो का प्रसिद्ध उदाहरण माना जाता है।
इसे परीक्षा पुस्तकों में भारत में राष्ट्रपति की जेबी वीटो शक्ति के सबसे चर्चित उदाहरण के रूप में पढ़ा जाता है।
न्यायिक शक्तियाँ
अनुच्छेद 72 और 143
अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति कुछ मामलों में क्षमादान, दंडादेश का निलंबन, परिहार, लघुकरण या रूपांतरण कर सकता है।
राष्ट्रपति की शक्ति विशेष रूप से उन मामलों तक विस्तृत है जहाँ दंड सेना न्यायालय द्वारा दिया गया हो, अपराध संघ की कार्यपालिका शक्ति के विषय से संबंधित कानून के विरुद्ध हो अथवा दंड मृत्युदंड हो।
अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को किसी महत्वपूर्ण विधि या तथ्य के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगने की शक्ति देता है।
🎯 अनुच्छेद
72 — क्षमादान।
143 — सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश
नियुक्ति और हटाने में राष्ट्रपति की भूमिका
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की औपचारिक नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की जाती है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को राष्ट्रपति अकेले अपनी इच्छा से पद से नहीं हटा सकता।
न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा संविधान में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।
उस संसदीय प्रक्रिया के पूरा होने के बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करता है।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
“सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को है” अकेले लिखना अधूरा है। राष्ट्रपति हटाने का औपचारिक आदेश तभी देता है जब संसद आवश्यक विशेष बहुमत से प्रक्रिया पूरी करे।
आपातकालीन शक्तियाँ
अनुच्छेद 352, 356 और 360
| अनुच्छेद | आपात व्यवस्था |
|---|---|
| 352 | राष्ट्रीय आपातकाल — युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति। |
| 356 | राष्ट्रपति शासन — किसी राज्य में संवैधानिक शासन-तंत्र संविधान के अनुसार न चल पाने की स्थिति। |
| 360 | वित्तीय आपातकाल — भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता अथवा साख को खतरा। |
इन घोषणाओं को राष्ट्रपति संविधान में निर्धारित शर्तों और मंत्रिपरिषद की सलाह के आधार पर जारी करता है।
राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल का निर्णय राष्ट्रपति को लिखित रूप में संप्रेषित किया जाना आवश्यक है।
महाभियोग की प्रक्रिया
अनुच्छेद 61
राष्ट्रपति को केवल संविधान के उल्लंघन के आधार पर महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा पद से हटाया जा सकता है।
महाभियोग की प्रक्रिया संसद के किसी भी सदन से प्रारंभ हो सकती है।
आरोप लगाने के प्रस्ताव की सूचना कम से कम 14 दिन पहले दी जानी चाहिए।
इस सूचना पर उस सदन की कुल सदस्य-संख्या के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
पहले सदन में प्रस्ताव उस सदन की कुल सदस्य-संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
इसके बाद दूसरा सदन आरोपों की जाँच करता है अथवा जाँच करवाता है। राष्ट्रपति को इस जाँच में उपस्थित होने और अपना प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार है।
यदि दूसरा सदन भी अपनी कुल सदस्य-संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से आरोप को सिद्ध घोषित कर देता है तो राष्ट्रपति उसी दिन पद से हट जाता है।
🎯 महाभियोग
किसी भी सदन से शुरू → 14 दिन की सूचना → कम से कम 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर → दोनों सदनों में कुल सदस्यता का 2/3 बहुमत।
राष्ट्रपति के पद में रिक्ति
अनुच्छेद 62 और कार्यवाहक राष्ट्रपति
यदि राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र, पद से हटाए जाने या अन्य कारण से रिक्त हो जाए तो नया राष्ट्रपति चुनने का निर्वाचन छह महीने के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
ऐसी आकस्मिक रिक्ति में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है।
यदि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों के पद रिक्त हों तो संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन करते हैं।
यदि मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध न हों तो सर्वोच्च न्यायालय के उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश को यह दायित्व प्राप्त होता है।
इसलिए मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति पद की रिक्ति होते ही स्वतः कार्यवाहक राष्ट्रपति नहीं बनता; पहले उपराष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका आती है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने 1969 में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों पदों से संबंधित विशेष परिस्थिति में राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन किया था।
राष्ट्रपति द्वारा प्रमुख नियुक्तियाँ
संवैधानिक और वैधानिक पद
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
प्रधानमंत्री की सलाह पर केंद्रीय मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
वित्त आयोग का गठन राष्ट्रपति करता है और उसके अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति करता है।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की औपचारिक नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार की जाती है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति संबंधित वर्तमान कानून के अनुसार करता है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति संबंधित वैधानिक चयन-प्रक्रिया के आधार पर करता है।
संघ राज्यक्षेत्रों के प्रशासक अथवा उपराज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री की नियुक्ति संविधान के विशेष प्रावधान के अनुसार राष्ट्रपति करता है। पुडुचेरी में भी मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति संबंधित संवैधानिक एवं वैधानिक व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति के नाम से होती है।
⚠️ मुख्यमंत्री संबंधी अंतर
भारतीय संविधान राष्ट्रपति को राज्यों के मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति का सामान्य अधिकार नहीं देता। किसी राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति उस राज्य का राज्यपाल करता है। दिल्ली और पुडुचेरी की व्यवस्था संघ राज्यक्षेत्र होने के कारण अलग है।
मंत्रिपरिषद की सलाह और राष्ट्रपति
44वें संशोधन का महत्वपूर्ण प्रभाव
राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है।
44वें संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने के लिए कहने का अधिकार प्राप्त है।
यदि मंत्रिपरिषद पुनर्विचार करने के बाद वही सलाह पुनः देती है तो राष्ट्रपति को उस सलाह के अनुसार कार्य करना होता है।
अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक शक्तियाँ
अनुसूचित क्षेत्र, संसद और राज्यों से संबंध
पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकता है तथा उसकी सीमा में परिवर्तन से संबंधित आदेश जारी कर सकता है।
अनुच्छेद 160 के अंतर्गत राष्ट्रपति ऐसी आकस्मिक परिस्थिति में राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक व्यवस्था कर सकता है जिसके लिए संविधान में स्पष्ट प्रावधान न हो।
राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का सदस्य नहीं होता और सामान्य संसदीय बहस तथा मतदान में भाग नहीं लेता।
लेकिन वह संसद का संवैधानिक अंग है और संसद को संबोधित करने तथा संदेश भेजने की शक्ति रखता है।
भारत के राष्ट्रपति
1950 से वर्तमान तक
| क्रम | राष्ट्रपति | कार्यकाल |
|---|---|---|
| 1 | डॉ. राजेंद्र प्रसाद | 1950–1962 |
| 2 | डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन | 1962–1967 |
| 3 | डॉ. जाकिर हुसैन | 1967–1969 |
| 4 | वी. वी. गिरि | 1969–1974 |
| 5 | फखरुद्दीन अली अहमद | 1974–1977 |
| 6 | नीलम संजीव रेड्डी | 1977–1982 |
| 7 | ज्ञानी जैल सिंह | 1982–1987 |
| 8 | आर. वेंकटरमन | 1987–1992 |
| 9 | डॉ. शंकर दयाल शर्मा | 1992–1997 |
| 10 | के. आर. नारायणन | 1997–2002 |
| 11 | डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम | 2002–2007 |
| 12 | श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल | 2007–2012 |
| 13 | प्रणब मुखर्जी | 2012–2017 |
| 14 | राम नाथ कोविंद | 2017–2022 |
| 15 | द्रौपदी मुर्मु | 2022–वर्तमान |
राष्ट्रपतियों से जुड़े विशेष तथ्य
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण
डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे और दो पूर्ण कार्यकाल के लिए निर्वाचित होने वाले एकमात्र राष्ट्रपति हैं।
राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल भारत के सभी नियमित राष्ट्रपतियों में सबसे लंबा रहा।
डॉ. जाकिर हुसैन पद पर रहते हुए निधन होने वाले भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनका राष्ट्रपति कार्यकाल 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक रहा।
नीलम संजीव रेड्डी भारत के पहले और अब तक के एकमात्र राष्ट्रपति हैं जो निर्विरोध निर्वाचित हुए।
द्रौपदी मुर्मु भारत की पहली आदिवासी समुदाय से आने वाली राष्ट्रपति तथा राष्ट्रपति बनने वाली दूसरी महिला हैं।
भारत की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल थीं।
राम नाथ कोविंद भारत के 14वें राष्ट्रपति थे।
⚠️ बिहार वाला तथ्य
डॉ. जाकिर हुसैन और राम नाथ कोविंद को “बिहार के राष्ट्रपति” कहना सही नहीं है। राम नाथ कोविंद उत्तर प्रदेश में जन्मे थे, हालांकि वे बिहार के राज्यपाल रह चुके थे। डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म हैदराबाद में हुआ था। बिहार से सीधे जुड़ा सबसे प्रमुख राष्ट्रपति तथ्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद का है।
राष्ट्रपति चुनाव से जुड़े अन्य तथ्य
विधायक, सांसद और निर्वाचन विवाद
यदि कोई मुख्यमंत्री अपने राज्य की विधान परिषद का सदस्य है और विधानसभा का निर्वाचित सदस्य नहीं है, तो वह राष्ट्रपति चुनाव में विधायक के रूप में मतदान नहीं कर सकता।
राष्ट्रपति चुनाव से उत्पन्न सभी शंकाओं और विवादों का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय करता है।
राष्ट्रपति निर्वाचन से संबंधित यह संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 71 से जुड़ी है।
संसद अथवा राज्य विधानसभा का सदस्य राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ सकता है, लेकिन राष्ट्रपति निर्वाचित होकर पद ग्रहण करने पर उसकी सदन की सदस्यता समाप्त हो जाती है।
राष्ट्रपति का वेतन
वर्तमान वैधानिक उपलब्धियाँ
राष्ट्रपति की उपलब्धियों और पेंशन का प्रावधान राष्ट्रपति उपलब्धियाँ और पेंशन अधिनियम, 1951 के अंतर्गत किया गया है।
वर्तमान वैधानिक प्रावधान के अनुसार राष्ट्रपति को ₹5 लाख प्रतिमाह उपलब्धि दी जाती है।
राष्ट्रपति को आधिकारिक आवास सहित संविधान और कानून के अनुसार अन्य सुविधाएँ भी प्राप्त होती हैं।
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
परीक्षा में इन गलतियों से बचें
गलत: सभी केंद्रशासित प्रदेशों के विधायक राष्ट्रपति चुनाव में वोट करते हैं।
सही: संघ राज्यक्षेत्रों में दिल्ली और पुडुचेरी के निर्वाचित विधायक राष्ट्रपति निर्वाचक मंडल में शामिल हैं।
गलत: राज्य विधान परिषद के सदस्य भी राष्ट्रपति चुनाव में वोट देते हैं।
सही: केवल राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं।
अधूरा: राष्ट्रपति प्रत्याशी के लिए 50 निर्वाचकों का समर्थन चाहिए।
सही: 50 प्रस्तावक और अलग से 50 अनुमोदक आवश्यक हैं।
गलत: राष्ट्रपति किसी भी विधेयक को वापस भेज सकता है।
सही: धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेजा जा सकता।
गलत: राष्ट्रपति अकेले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटा सकता है।
सही: संसद की निर्धारित विशेष बहुमत वाली प्रक्रिया के बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करता है।
गलत: राष्ट्रपति पद रिक्त होते ही मुख्य न्यायाधीश कार्यवाहक राष्ट्रपति बन जाता है।
सही: पहले उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है; दोनों पद रिक्त होने की स्थिति में कानून के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की भूमिका आती है।
गलत: राष्ट्रपति राज्यों के मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति करता है।
सही: राज्यों के मुख्यमंत्री की नियुक्ति संबंधित राज्यपाल करता है।
गलत: संसद से पारित हर विधेयक पर राष्ट्रपति केवल हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य है।
सही: विधेयक के प्रकार के अनुसार राष्ट्रपति के पास स्वीकृति, स्वीकृति रोकने अथवा साधारण विधेयक को एक बार लौटाने जैसी संवैधानिक शक्तियाँ होती हैं।
गलत: राष्ट्रपति संसद का सदस्य है।
सही: राष्ट्रपति संसद का संवैधानिक अंग है, लेकिन लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य नहीं।
गलत: जाकिर हुसैन और राम नाथ कोविंद बिहार के थे।
सही: राम नाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल रहे थे; उनका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ। डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म हैदराबाद में हुआ।
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
52 — भारत का राष्ट्रपति।
53 — संघ की कार्यपालिका शक्ति।
54 — राष्ट्रपति का निर्वाचक मंडल।
55 — निर्वाचन की रीति।
56 — पाँच वर्ष का कार्यकाल।
57 — पुनर्निर्वाचन की पात्रता।
58 — नागरिक + 35 वर्ष + लोकसभा योग्यता + लाभ का पद नहीं।
60 — राष्ट्रपति की शपथ।
61 — महाभियोग।
62 — आकस्मिक रिक्ति का चुनाव छह महीने के भीतर।
71 — राष्ट्रपति चुनाव विवाद का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय।
72 — क्षमादान शक्ति।
74 — मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह।
111 — विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति।
123 — अध्यादेश।
143 — सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श।
160 — कुछ आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था।
राष्ट्रपति चुनाव — अप्रत्यक्ष निर्वाचन।
निर्वाचित सांसद + राज्यों के निर्वाचित विधायक + दिल्ली और पुडुचेरी के निर्वाचित विधायक।
नामित सांसद तथा विधान परिषद सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में मत नहीं देते।
निर्वाचन — आनुपातिक प्रतिनिधित्व + एकल संक्रमणीय मत + गुप्त मतदान।
नामांकन — 50 प्रस्तावक + 50 अनुमोदक + ₹15,000 जमानत।
महाभियोग — संविधान का उल्लंघन — संसद के किसी भी सदन से प्रारंभ।
धन विधेयक राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता।
साधारण विधेयक एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जा सकता है।
जेबी वीटो का प्रसिद्ध उदाहरण — ज्ञानी जैल सिंह और भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक, 1986।
राष्ट्रीय आपातकाल — 352।
राष्ट्रपति शासन — 356।
वित्तीय आपातकाल — 360।
प्रथम राष्ट्रपति — डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
दो पूर्ण कार्यकाल के लिए निर्वाचित एकमात्र राष्ट्रपति — डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
निर्विरोध निर्वाचित राष्ट्रपति — नीलम संजीव रेड्डी।
प्रथम महिला राष्ट्रपति — प्रतिभा देवीसिंह पाटिल।
पहली आदिवासी राष्ट्रपति — द्रौपदी मुर्मु।
15वीं एवं वर्तमान राष्ट्रपति — द्रौपदी मुर्मु — पद ग्रहण 25 जुलाई 2022।
वर्तमान मासिक उपलब्धि — ₹5 लाख।
राष्ट्रपति राष्ट्र का संवैधानिक प्रतिनिधि है; संसदीय शासन का वास्तविक राजनीतिक नेतृत्व प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद करते हैं।