राज्यपाल
नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल, शक्तियाँ, विवेकाधिकार और मुख्यमंत्री से संबंध
राज्यपाल का संवैधानिक स्थान
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक एवं औपचारिक कार्यपालिका प्रमुख होता है। राज्य की कार्यपालिका शक्ति संविधान के अनुसार राज्यपाल में निहित होती है, लेकिन संसदीय शासन व्यवस्था में सामान्यतः इसका प्रयोग मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली राज्य मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर किया जाता है।
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। इस कारण उसे केंद्र और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कड़ी भी माना जाता है। राज्यपाल को केवल राष्ट्रपति का सामान्य “एजेंट” समझना उचित नहीं है, क्योंकि वह एक स्वतंत्र संवैधानिक पद धारण करता है और कुछ सीमित मामलों में संविधान उसे विवेकाधीन भूमिका भी देता है।
राज्यपाल से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद
Constitutional Articles
| अनुच्छेद | प्रमुख विषय |
|---|---|
| 153 | राज्यों के लिए राज्यपाल |
| 154 | राज्य की कार्यपालिका शक्ति |
| 155 | राज्यपाल की नियुक्ति |
| 156 | राज्यपाल का कार्यकाल |
| 157 | राज्यपाल बनने की योग्यता |
| 158 | राज्यपाल के पद की शर्तें |
| 159 | शपथ या प्रतिज्ञान |
| 160 | विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था |
| 161 | दंड के संबंध में क्षमा आदि की शक्ति |
| 163 | राज्यपाल को सहायता और सलाह देने वाली मंत्रिपरिषद |
| 164 | मुख्यमंत्री और मंत्रियों से संबंधित प्रावधान |
| 174 | राज्य विधानमंडल का सत्र, सत्रावसान और विधानसभा का विघटन |
| 200 | राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत विधेयकों पर कार्रवाई |
| 201 | राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित विधेयकों पर कार्रवाई |
| 213 | अध्यादेश जारी करने की शक्ति |
| 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति |
अनुच्छेद 153 — प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल
Article 153
अनुच्छेद 153 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।
लेकिन एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। इस व्यवस्था का मार्ग 7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा प्रशस्त किया गया।
अनुच्छेद 154 — राज्य की कार्यपालिका शक्ति
Article 154
अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है।
राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है।
संसदीय शासन व्यवस्था में राज्यपाल सामान्यतः मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार कार्य करता है।
अनुच्छेद 155 — नियुक्ति
Article 155
राज्यपाल का निर्वाचन जनता द्वारा नहीं किया जाता। राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा करता है।
भारतीय संविधान में राज्यपाल को नियुक्त करने वाली पद्धति पर कनाडा की संघीय व्यवस्था का प्रभाव माना जाता है।
अनुच्छेद 156 — कार्यकाल
Article 156
राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। सामान्य कार्यकाल पद ग्रहण करने की तारीख से 5 वर्ष है।
पाँच वर्ष पूरे हो जाने के बाद भी राज्यपाल तब तक पद पर बना रह सकता है जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता।
राज्यपाल राष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र देकर अपने पद से त्यागपत्र दे सकता है।
राष्ट्रपति राज्यपाल को पाँच वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले भी हटा सकता है। राज्यपाल को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग की कोई प्रक्रिया नहीं है।
राज्यपाल को दोबारा नियुक्त किए जाने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।
🎯 याद रखें
कार्यकाल — 5 वर्ष
पद — राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत
त्यागपत्र — राष्ट्रपति को
महाभियोग — नहीं
अनुच्छेद 157 — राज्यपाल की योग्यता
Article 157
राज्यपाल बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना आवश्यक है।
उसकी आयु कम-से-कम 35 वर्ष पूरी होनी चाहिए।
संविधान में यह आवश्यक नहीं किया गया है कि राज्यपाल उसी राज्य का निवासी हो जहाँ उसे नियुक्त किया जा रहा है।
📗 परीक्षा-सुरक्षित योग्यता
भारतीय नागरिक + कम-से-कम 35 वर्ष आयु।
अनुच्छेद 158 — पद की शर्तें
Article 158
राज्यपाल संसद के किसी सदन या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं हो सकता।
यदि संसद अथवा राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य राज्यपाल नियुक्त हो जाता है, तो जिस तारीख को वह राज्यपाल का पद ग्रहण करता है, उसी तारीख से उसकी संबंधित सदन की सीट रिक्त मानी जाती है।
राज्यपाल कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं कर सकता।
उसे बिना किराया दिए आधिकारिक निवास के उपयोग तथा कानून द्वारा निर्धारित वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उसके वेतन और भत्तों को उसके लिए अलाभकारी रूप से कम नहीं किया जा सकता।
राज्यपाल का वेतन और राज्य की संचित निधि
Emoluments
राज्यपाल के वेतन, भत्तों तथा उसके कार्यालय से संबंधित व्यय राज्य की वित्तीय व्यवस्था से जुड़े होते हैं और राज्यपाल के वेतन एवं भत्तों पर राज्य विधानमंडल सामान्य मतदान द्वारा कटौती नहीं करता।
राज्यपाल से संबंधित व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय की श्रेणी में आता है।
इसलिए इसे भारत की संचित निधि से दिया जाना नहीं पढ़ना चाहिए।
अनुच्छेद 159 — शपथ
Article 159
राज्यपाल पद ग्रहण करने से पहले संविधान और कानून की रक्षा, संरक्षण तथा प्रतिरक्षण करने और राज्य की जनता की सेवा तथा कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करने की शपथ या प्रतिज्ञान करता है।
राज्यपाल को सामान्यतः संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाता है। उसकी अनुपस्थिति में उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश यह कार्य करता है।
अनुच्छेद 160 — विशेष परिस्थिति में व्यवस्था
Article 160
अनुच्छेद 160 ऐसी परिस्थिति से संबंधित है जिसका संविधान के सामान्य प्रावधानों में स्पष्ट समाधान न हो।
ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक समझी जाने वाली व्यवस्था कर सकता है।
अनुच्छेद 163 — मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह
Article 163
राज्यपाल को उसके कार्यों के निर्वहन में सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद होती है।
राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार कार्य करता है।
लेकिन संविधान कुछ सीमित मामलों में राज्यपाल को अपने विवेक से कार्य करने की भूमिका देता है। इस विवेकाधिकार को असीमित व्यक्तिगत शक्ति नहीं समझना चाहिए।
अनुच्छेद 164 — मुख्यमंत्री और मंत्री
Article 164
मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है।
राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच प्रमुख संवैधानिक संपर्क का कार्य करता है।
राज्यपाल की प्रमुख कार्यपालिका शक्तियाँ
Executive Powers
राज्य की कार्यपालिका शक्ति संविधान के अनुसार राज्यपाल में निहित होती है।
राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
राज्यपाल राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करता है।
राज्य के विभिन्न संवैधानिक पदों और आयोगों से संबंधित नियुक्तियों में राज्यपाल की भूमिका संविधान अथवा संबंधित कानून द्वारा निर्धारित होती है। इसलिए यह कहना कि वह सभी आयोगों और समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति स्वयं करता है, बहुत व्यापक कथन होगा।
राज्य सरकार की कार्यपालिका कार्रवाई औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम से की जाती है।
अनुच्छेद 174 — विधानमंडल का सत्र
Article 174
राज्यपाल समय-समय पर राज्य विधानमंडल के सदन या सदनों का सत्र बुलाता है।
राज्यपाल सदन या सदनों का सत्रावसान कर सकता है।
राज्यपाल राज्य की विधानसभा को भंग कर सकता है। सामान्यतः इन शक्तियों का प्रयोग संसदीय शासन के संवैधानिक सिद्धांतों और मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार किया जाता है।
विधानमंडल के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
विधान परिषद में राज्यपाल का मनोनयन
Legislative Council
जिन राज्यों में विधान परिषद है, वहाँ राज्यपाल विधान परिषद के कुल सदस्यों में से लगभग एक-छठे सदस्यों को मनोनीत करता है।
ये व्यक्ति साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले होते हैं।
🎯 याद रखें
विधान परिषद → लगभग 1/6 सदस्य → राज्यपाल द्वारा मनोनीत।
एंग्लो-इंडियन सदस्य का मनोनयन — अब समाप्त
Former Provision
पहले संविधान में राज्यपाल को आवश्यकता होने पर राज्य विधानसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सदस्य को मनोनीत करने की व्यवस्था थी।
यह व्यवस्था अब समाप्त हो चुकी है। इसलिए वर्तमान संविधान के अनुसार राज्यपाल के पास विधानसभा में एंग्लो-इंडियन सदस्य मनोनीत करने की शक्ति नहीं है।
अनुच्छेद 200 — विधेयकों पर राज्यपाल की कार्रवाई
Article 200
राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किए जाने पर राज्यपाल उस पर स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है या उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है।
यदि विधेयक धन विधेयक नहीं है, तो राज्यपाल उसे पुनर्विचार के लिए विधानमंडल को लौटा सकता है।
यदि विधानमंडल विधेयक को पुनः पारित करके राज्यपाल के समक्ष भेज देता है, तो संविधान के अनुसार राज्यपाल उस पर स्वीकृति नहीं रोक सकता।
कुछ परिस्थितियों में विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना संवैधानिक रूप से आवश्यक भी हो सकता है।
अनुच्छेद 200 और 201 में अंतर
Reservation of Bills
विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने की राज्यपाल की शक्ति अनुच्छेद 200 से संबंधित है।
अनुच्छेद 201 उस स्थिति से संबंधित है जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा पहले ही राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा जा चुका हो। तब राष्ट्रपति उस विधेयक पर स्वीकृति दे सकता है या स्वीकृति रोक सकता है तथा गैर-धन विधेयक के मामले में उसे पुनर्विचार की प्रक्रिया में भेजा जा सकता है।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
गलत: अनुच्छेद 201 राज्यपाल को विधेयक राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखने की शक्ति देता है।
सही: सुरक्षित रखने की शक्ति — अनुच्छेद 200; सुरक्षित विधेयक पर राष्ट्रपति की कार्रवाई — अनुच्छेद 201।
अनुच्छेद 213 — अध्यादेश
Article 213
जब राज्य विधानमंडल का सत्र नहीं चल रहा हो और ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हों जिनमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है।
अध्यादेश को कानून के समान प्रभाव प्राप्त होता है, लेकिन यह स्थायी कानून नहीं होता। विधानमंडल के पुनः एकत्र होने के बाद निर्धारित संवैधानिक अवधि के भीतर इसे विधायी स्वीकृति प्राप्त करनी होती है, अन्यथा यह प्रभावहीन हो जाता है।
कुछ विषयों में अध्यादेश जारी करने से पहले राष्ट्रपति के निर्देश की आवश्यकता हो सकती है।
राज्यपाल की वित्तीय शक्तियाँ
Financial Powers
राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण अर्थात बजट राज्यपाल के द्वारा राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाया जाता है।
कुछ वित्तीय विधेयक और धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व अनुशंसा के बिना प्रस्तुत नहीं किए जा सकते।
राज्य की संचित निधि से धन का विनियोग संविधान और विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून की प्रक्रिया के अनुसार होता है। इसे केवल “राज्यपाल स्वयं धन निकालने की अनुमति देता है” कहना अत्यधिक सरल होगा।
राज्यपाल समय-समय पर गठित राज्य वित्त आयोग की रिपोर्ट तथा उसकी सिफारिशों पर राज्य सरकार की कार्रवाई संबंधी विवरण को राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाता है।
अनुच्छेद 161 — क्षमादान की शक्ति
Article 161
अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल को उन अपराधों से संबंधित दंड के विषय में विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं जिन मामलों तक राज्य की कार्यपालिका शक्ति विस्तृत होती है।
राज्यपाल दंड को क्षमादान, प्रविलंबन, विराम, परिहार प्रदान कर सकता है तथा दंड को निलंबित, परिहारित या लघु कर सकता है।
इस शक्ति का संवैधानिक क्षेत्र राष्ट्रपति की अनुच्छेद 72 वाली क्षमादान शक्ति के समान बिल्कुल नहीं है। दोनों के अधिकार-क्षेत्र में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
District Judges
राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है।
यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 233 से संबंधित है।
इसलिए यह कहना कि राज्यपाल राज्य के सभी न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है, गलत होगा।
⚠️ न्यायाधीशों में अंतर
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश → राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त।
जिला न्यायाधीश → राज्यपाल द्वारा, उच्च न्यायालय से परामर्श करके।
अनुच्छेद 356 और राज्यपाल की रिपोर्ट
President’s Rule
यदि किसी राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए जिसमें राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो राज्यपाल राष्ट्रपति को इस संबंध में रिपोर्ट भेज सकता है।
राष्ट्रपति अनुच्छेद 356 के अंतर्गत ऐसी रिपोर्ट के आधार पर या अन्यथा भी संतुष्ट होने पर राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा कर सकता है।
इसलिए यह कहना कि राष्ट्रपति शासन केवल राज्यपाल की अनुशंसा से ही लगाया जा सकता है, पूर्णतः सही नहीं है। राज्यपाल की रिपोर्ट इसका एक प्रमुख आधार है, लेकिन संविधान में “या अन्यथा” भी कहा गया है।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री का संबंध
Governor & Chief Minister
राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
मुख्यमंत्री का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को दे।
राज्यपाल द्वारा माँगी गई आवश्यक सूचना मुख्यमंत्री उपलब्ध कराता है।
यदि किसी मंत्री ने ऐसा निर्णय लिया है जिस पर पूरी मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री से उस विषय को मंत्रिपरिषद के समक्ष रखने के लिए कह सकता है।
मंत्रिपरिषद की बैठक बुलाना स्वयं राज्यपाल का सामान्य दैनिक कार्य नहीं है; मंत्रिपरिषद का संचालन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में होता है।
राज्यपाल का विवेकाधिकार
Discretionary Powers
सामान्यतः राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करता है, लेकिन कुछ संवैधानिक परिस्थितियों में उसे सीमित विवेकाधीन भूमिका प्राप्त होती है।
स्पष्ट बहुमत न होने की स्थिति में मुख्यमंत्री की नियुक्ति, विधानसभा में सरकार से बहुमत सिद्ध कराने से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना इसके महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिने जाते हैं।
राज्यपाल का विवेकाधिकार व्यक्तिगत अथवा असीमित राजनीतिक शक्ति नहीं है; इसका प्रयोग संविधान, न्यायिक निर्णयों और संसदीय शासन के सिद्धांतों की सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
राज्यपाल को संवैधानिक संरक्षण
Constitutional Immunity
संविधान का अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को पद पर रहते हुए कुछ विशेष संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।
राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग एवं निर्वहन के लिए न्यायालय के प्रति व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होता।
राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही न तो प्रारंभ की जा सकती है और न जारी रखी जा सकती है।
उसके कार्यकाल के दौरान न्यायालय उसकी गिरफ्तारी या कारावास की प्रक्रिया जारी नहीं कर सकता।
यह संरक्षण राज्यपाल को कानून से ऊपर नहीं बनाता; यह उसके संवैधानिक पद से संबंधित विशेष प्रतिरक्षा है।
सेवानिवृत्ति के बाद पद धारण करने का प्रश्न
Post-Governorship
संविधान में ऐसा कोई सामान्य प्रावधान नहीं है कि राज्यपाल अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद सरकार के अधीन कोई अन्य पद धारण ही नहीं कर सकता।
इसलिए “सेवानिवृत्ति के बाद राज्यपाल को सरकार कोई पद नहीं दे सकती” सही संवैधानिक तथ्य नहीं है।
❌ सामान्य गलती
गलत: पूर्व राज्यपाल किसी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं हो सकता।
सही: संविधान में ऐसा कोई सामान्य पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।
7वाँ संविधान संशोधन, 1956
Seventh Amendment
7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के बाद एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त करने की संवैधानिक व्यवस्था संभव हुई।
इसलिए प्रत्येक राज्य के लिए अलग व्यक्ति को ही राज्यपाल बनाना आवश्यक नहीं है।
जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल
Lieutenant Governor
जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं बल्कि केंद्रशासित प्रदेश है। वहाँ राज्यपाल के स्थान पर उपराज्यपाल की संवैधानिक-वैधानिक व्यवस्था है।
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
इसलिए राज्यपाल और उपराज्यपाल के पदों को एक ही संवैधानिक पद नहीं समझना चाहिए।
भारत की प्रथम महिला राज्यपाल
First Woman Governor
सरोजिनी नायडू स्वतंत्र भारत की प्रथम महिला राज्यपाल थीं।
वे स्वतंत्रता के बाद संयुक्त प्रांत, जिसे बाद में उत्तर प्रदेश कहा गया, की राज्यपाल बनीं।
सरोजिनी नायडू प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में भी थीं।
“सोने के पिंजरे की चिड़िया” वाला कथन
Famous Description
सरोजिनी नायडू से राज्यपाल के पद के संदर्भ में “सोने के पिंजरे में रहने वाली चिड़िया” जैसी प्रसिद्ध टिप्पणी जोड़ी जाती है।
इसका आशय राज्यपाल के पद की प्रतिष्ठा और औपचारिक महत्त्व के साथ उसकी संसदीय शासन में सीमित वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता की ओर संकेत करना माना जाता है।
इसे संविधान का कोई औपचारिक सिद्धांत न समझें; यह राज्यपाल पद के स्वरूप को व्यक्त करने वाली प्रसिद्ध टिप्पणी के रूप में पढ़ा जाता है।
राज्यपाल की शक्तियाँ — एक नज़र में
Powers at a Glance
| शक्ति | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|
| कार्यपालिका | मुख्यमंत्री की नियुक्ति, अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर, महाधिवक्ता आदि |
| विधायी | सत्र बुलाना, सत्रावसान, विधानसभा विघटन, विधेयकों पर कार्रवाई, विधान परिषद में मनोनयन |
| अध्यादेश | अनुच्छेद 213 के अंतर्गत अध्यादेश जारी करना |
| वित्तीय | बजट रखवाना, कुछ वित्तीय विधेयकों के लिए पूर्व अनुशंसा |
| न्यायिक | अनुच्छेद 161 के अंतर्गत दंड के संबंध में क्षमा आदि; जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति में भूमिका |
| संवैधानिक संकट | अनुच्छेद 356 के संदर्भ में राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना |
| विवेकाधीन | सीमित संवैधानिक परिस्थितियों में विवेक से कार्य |
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
Common Mistakes & Corrections
अति-सरलीकरण: राज्यपाल केवल राष्ट्रपति का प्रतिनिधि है।
सही: राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्य का स्वतंत्र संवैधानिक प्रमुख है और केंद्र-राज्य के बीच संवैधानिक कड़ी की भूमिका भी निभाता है।
गलत: राज्यपाल का पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरी तरह निश्चित है।
सही: सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष है, लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
गलत: राज्यपाल को हटाने के लिए महाभियोग होता है।
सही: राज्यपाल के लिए महाभियोग का संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
गलत: राज्यपाल का उसी राज्य का निवासी होना आवश्यक है।
सही: संविधान ऐसी कोई शर्त नहीं लगाता।
गलत: राज्यपाल का वेतन भारत की संचित निधि से मिलता है।
सही: राज्यपाल से संबंधित वेतन-भत्ते राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय से संबंधित हैं।
गलत: सेवानिवृत्ति के बाद राज्यपाल कोई सरकारी पद नहीं ले सकता।
सही: संविधान में ऐसा कोई सामान्य पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।
गलत: राज्यपाल विधानसभा में एंग्लो-इंडियन सदस्य अभी भी मनोनीत करता है।
सही: यह पुराना प्रावधान अब समाप्त हो चुका है।
गलत: अनुच्छेद 201 राज्यपाल को विधेयक राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखने की शक्ति देता है।
सही: यह शक्ति अनुच्छेद 200 से आती है; अनुच्छेद 201 राष्ट्रपति की कार्रवाई से संबंधित है।
गलत: राज्यपाल राज्य के सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
सही: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति नियुक्त करता है; जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति में राज्यपाल की भूमिका अनुच्छेद 233 के अनुसार होती है।
अधूरा: राज्यपाल की रिपोर्ट पर ही राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।
सही: अनुच्छेद 356 में राष्ट्रपति राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा संतुष्ट हो सकता है।
अति-व्यापक: राज्यपाल सभी आयोगों और समितियों के अध्यक्ष नियुक्त करता है।
सही: नियुक्ति की शक्ति संबंधित संवैधानिक या वैधानिक प्रावधान पर निर्भर करती है।
अनुच्छेदों का त्वरित क्रम
Quick Article Recall
⚡ याद रखने का क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
राज्यपाल — राज्य का संवैधानिक एवं औपचारिक कार्यपालिका प्रमुख।
अनुच्छेद 153 — प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल; एक व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।
अनुच्छेद 154 — राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित।
अनुच्छेद 155 — नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।
अनुच्छेद 156 — सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष; पद राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत।
राज्यपाल का त्यागपत्र — राष्ट्रपति को।
महाभियोग — राज्यपाल के लिए कोई प्रावधान नहीं।
अनुच्छेद 157 — भारत का नागरिक और कम-से-कम 35 वर्ष की आयु।
उसी राज्य का निवासी होना — आवश्यक नहीं।
अनुच्छेद 158 — संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता और अन्य लाभ का पद धारण नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 159 — राज्यपाल की शपथ।
अनुच्छेद 160 — विशेष परिस्थिति में कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था।
अनुच्छेद 161 — दंड के संबंध में क्षमा आदि की शक्ति।
अनुच्छेद 163 — मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह।
अनुच्छेद 164 — मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा; अन्य मंत्री मुख्यमंत्री की सलाह पर।
अनुच्छेद 174 — विधानमंडल का सत्र बुलाना, सत्रावसान और विधानसभा का विघटन।
विधान परिषद — लगभग 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत।
एंग्लो-इंडियन विधानसभा मनोनयन — अब समाप्त।
अनुच्छेद 200 — राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई तथा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने की शक्ति।
अनुच्छेद 201 — राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित विधेयक पर राष्ट्रपति की कार्रवाई।
अनुच्छेद 213 — राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति।
अनुच्छेद 233 — जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति में राज्यपाल तथा उच्च न्यायालय की संवैधानिक भूमिका।
अनुच्छेद 356 — राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्यथा राष्ट्रपति की संतुष्टि पर संवैधानिक तंत्र विफल होने की उद्घोषणा संभव।
अनुच्छेद 361 — राज्यपाल को पद पर रहते हुए विशेष संवैधानिक प्रतिरक्षा।
7वाँ संविधान संशोधन, 1956 — एक व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल बनाया जा सकता है।
राज्यपाल का वेतन-भत्ता — राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय से संबंधित।
जम्मू-कश्मीर — केंद्रशासित प्रदेश; उपराज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।
सरोजिनी नायडू — स्वतंत्र भारत की प्रथम महिला राज्यपाल।
“सोने के पिंजरे की चिड़िया” — राज्यपाल पद के संबंध में सरोजिनी नायडू से जोड़ी जाने वाली प्रसिद्ध टिप्पणी।