राज्य विधानमंडल
विधानसभा, विधान परिषद, विधायी प्रक्रिया, शक्तियाँ और महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान
राज्य विधानमंडल
भारतीय संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्यों के विधानमंडलों से संबंधित प्रमुख प्रावधान दिए गए हैं।
राज्य विधानमंडल राज्य स्तर पर कानून निर्माण, बजट स्वीकृति, कराधान, सरकार पर संसदीय नियंत्रण और संविधान द्वारा सौंपे गए अन्य विधायी कार्यों का निर्वहन करता है।
राज्य विधानमंडल एकसदनीय अथवा द्विसदनीय हो सकता है। प्रत्येक राज्य में राज्यपाल विधानमंडल का संवैधानिक अंग होता है।
राज्य विधानमंडल की संरचना
अनुच्छेद 168
संविधान के अनुच्छेद 168 में राज्य विधानमंडल की संरचना दी गई है।
जिन राज्यों में केवल एक सदन है वहाँ विधानमंडल में राज्यपाल और विधानसभा शामिल होते हैं।
जिन राज्यों में दो सदन हैं वहाँ विधानमंडल में राज्यपाल, विधानसभा और विधान परिषद शामिल होते हैं।
विधानसभा को राज्य विधानमंडल का निम्न सदन तथा विधान परिषद को उच्च सदन कहा जाता है।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण
एकसदनीय — राज्यपाल + विधानसभा।
द्विसदनीय — राज्यपाल + विधानसभा + विधान परिषद।
एकसदनीय और द्विसदनीय विधानमंडल
दो प्रकार की राज्य व्यवस्था
एकसदनीय विधानमंडल में केवल विधानसभा होती है। भारत के अधिकांश राज्यों में यही व्यवस्था है।
द्विसदनीय विधानमंडल में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी होती है।
विधानसभा जनता का प्रत्यक्ष निर्वाचित सदन है, जबकि विधान परिषद की संरचना विभिन्न निर्वाचन समूहों और राज्यपाल द्वारा नामित सदस्यों से होती है।
विधान परिषद वाले राज्य
वर्तमान व्यवस्था
वर्तमान में छह राज्यों में विधान परिषद कार्यरत है— आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश।
इन राज्यों में द्विसदनीय राज्य विधानमंडल है।
🎯 छह राज्य
आंध्र प्रदेश + बिहार + कर्नाटक + महाराष्ट्र + तेलंगाना + उत्तर प्रदेश।
विधान परिषद का सृजन या समाप्ति
अनुच्छेद 169
संविधान का अनुच्छेद 169 किसी राज्य में विधान परिषद बनाने अथवा समाप्त करने की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
संबंधित राज्य की विधानसभा को इस संबंध में एक विशेष प्रस्ताव पारित करना होता है।
प्रस्ताव विधानसभा की कुल सदस्य-संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
इसके बाद संसद कानून बनाकर विधान परिषद का सृजन अथवा समाप्ति करती है।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण सुधार
विधानसभा स्वयं विधान परिषद का गठन या समाप्ति नहीं करती। वह विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करती है; अंतिम विधायी कार्रवाई संसद कानून बनाकर करती है।
विधानसभा की संरचना
अनुच्छेद 170
राज्य विधानसभा के सदस्यों का चुनाव राज्य के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा होता है।
अनुच्छेद 170 की सामान्य व्यवस्था के अनुसार किसी राज्य की विधानसभा में सदस्यों की संख्या 500 से अधिक और 60 से कम नहीं होनी चाहिए।
लेकिन संविधान और संसद द्वारा बनाए गए विशेष कानूनों के कारण कुछ छोटे राज्यों में विधानसभा की सदस्य-संख्या 60 से कम है।
उदाहरण के लिए गोवा और मिजोरम में 40 तथा सिक्किम में 32 विधानसभा सीटें हैं।
राज्य विधानसभाओं के चुनाव का संचालन भारत निर्वाचन आयोग करता है।
विधानसभा सदस्य की योग्यता
न्यूनतम आयु 25 वर्ष
विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना आवश्यक है।
विधानसभा सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष है।
उम्मीदवार को संसद द्वारा बनाए गए कानूनों तथा संविधान में निर्धारित अन्य योग्यताएँ भी पूरी करनी होती हैं।
📗 आयु याद रखें
विधानसभा — 25 वर्ष।
विधान परिषद — 30 वर्ष।
विधानसभा का कार्यकाल
अनुच्छेद 172
राज्य विधानसभा का सामान्य कार्यकाल उसकी प्रथम बैठक की तारीख से 5 वर्ष होता है, यदि उसे इससे पहले भंग न किया जाए।
राष्ट्रीय आपातकाल लागू रहने की अवधि में संसद कानून द्वारा विधानसभा का कार्यकाल एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ा सकती है।
लेकिन आपातकाल समाप्त होने के बाद ऐसा विस्तारित कार्यकाल छह महीने से अधिक नहीं चल सकता।
राज्यपाल और विधानसभा का विघटन
अनुच्छेद 174
राज्यपाल राज्य विधानमंडल के सदन या सदनों को आहूत करता है तथा उनका सत्रावसान करता है।
राज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकता है।
संसदीय शासन की सामान्य व्यवस्था में विधानसभा भंग करने की शक्ति का प्रयोग मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक सलाह के संदर्भ में किया जाता है।
विधान परिषद स्थायी सदन होने के कारण भंग नहीं की जाती।
विधान परिषद की सदस्य-संख्या
अनुच्छेद 171
किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य-संख्या सामान्यतः उस राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य-संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती।
विधान परिषद में सामान्यतः कम से कम 40 सदस्य होने चाहिए।
विधान परिषद की वास्तविक सदस्य-संख्या संसद द्वारा बनाए गए कानून से निर्धारित होती है।
विधान परिषद की संरचना
कौन चुनता है सदस्यों को?
| लगभग अनुपात | निर्वाचन/नामांकन |
|---|---|
| 1/3 | नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों और संसद द्वारा निर्धारित अन्य स्थानीय प्राधिकरणों के निर्वाचक मंडल द्वारा। |
| 1/12 | कम से कम तीन वर्ष से स्नातक व्यक्तियों से बने निर्वाचन मंडल द्वारा। |
| 1/12 | कम से कम तीन वर्ष से माध्यमिक स्तर या उससे ऊपर की निर्धारित शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन करने वाले व्यक्तियों द्वारा। |
| 1/3 | राज्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा उन व्यक्तियों में से जो स्वयं विधानसभा सदस्य नहीं हैं। |
| शेष | राज्यपाल द्वारा मनोनीत। |
राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य
विधान परिषद
विधान परिषद के शेष सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करता है।
ऐसे व्यक्तियों को साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।
🎯 पाँच क्षेत्र
साहित्य + विज्ञान + कला + सहकारी आंदोलन + समाज सेवा।
विधान परिषद का कार्यकाल
स्थायी सदन
विधान परिषद एक स्थायी सदन है और इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जाता।
इसके सदस्य सामान्यतः 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं।
लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।
यद्यपि विधान परिषद को भंग नहीं किया जा सकता, लेकिन अनुच्छेद 169 की प्रक्रिया द्वारा स्वयं विधान परिषद की संस्था को समाप्त किया जा सकता है।
विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
अनुच्छेद 178
विधानसभा अपने सदस्यों में से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करती है।
विधानसभा अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को देता है।
उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष को देता है।
अध्यक्ष सदन की कार्यवाही का संचालन करता है तथा मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत दे सकता है।
विधान परिषद के सभापति और उपसभापति
अनुच्छेद 182
विधान परिषद अपने सदस्यों में से सभापति और उपसभापति का चुनाव करती है।
यह व्यवस्था राज्यसभा से अलग है, क्योंकि राज्यसभा का सभापति भारत का उपराष्ट्रपति होता है जबकि विधान परिषद का सभापति परिषद के सदस्यों में से ही चुना जाता है।
राज्य विधानमंडल की विधायी शक्तियाँ
राज्य सूची और समवर्ती सूची
राज्य विधानमंडल सामान्य परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाता है।
वह समवर्ती सूची के विषयों पर भी कानून बना सकता है।
समवर्ती सूची में राज्य कानून और संसद के कानून में असंगति होने पर सामान्यतः संसद का कानून प्रभावी होता है, हालांकि संविधान में राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कुछ राज्य कानूनों के लिए विशेष व्यवस्था भी है।
राज्य विधानमंडल की विधायी शक्ति संविधान और संसद को प्राप्त संवैधानिक शक्तियों के अधीन होती है।
वित्तीय शक्तियाँ
बजट और धन विधेयक
राज्य सरकार का वार्षिक वित्तीय विवरण राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
राज्य में धन विधेयक केवल विधानसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
धन विधेयक प्रस्तुत करने के लिए राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक होती है।
विधान परिषद धन विधेयक को अधिकतम 14 दिन तक रख सकती है और केवल सिफारिशें कर सकती है।
विधानसभा विधान परिषद की सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
🎯 संसद जैसा सूत्र
लोकसभा ↔ विधानसभा
राज्यसभा ↔ विधान परिषद
धन विधेयक — केवल निचले सदन में।
साधारण विधेयक और विधान परिषद
अधिकतम लगभग चार महीने का विलंब
द्विसदनीय राज्य में साधारण विधेयक के संबंध में विधानसभा की स्थिति विधान परिषद से अधिक शक्तिशाली है।
यदि विधानसभा से पारित साधारण विधेयक पहली बार विधान परिषद को भेजा जाता है तो परिषद उसे अधिकतम तीन महीने तक रोक सकती है।
यदि विधानसभा उसे दोबारा पारित कर परिषद को भेजती है तो विधान परिषद उसे अधिकतम एक महीने तक रोक सकती है।
इस प्रकार विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को स्थायी रूप से अस्वीकार नहीं कर सकती; वह प्रभावी रूप से उसे अधिकतम लगभग चार महीने विलंबित कर सकती है।
⚠️ 4 महीने कैसे?
पहली बार — अधिकतम 3 महीने।
दूसरी बार — अधिकतम 1 महीना।
कुल प्रभावी विलंब — लगभग 4 महीने।
राज्य में संयुक्त बैठक नहीं
विधानसभा और विधान परिषद का गतिरोध
संसद में लोकसभा और राज्यसभा के बीच कुछ साधारण विधेयकों पर गतिरोध समाप्त करने के लिए संयुक्त बैठक की व्यवस्था है।
लेकिन राज्य स्तर पर विधानसभा और विधान परिषद के बीच गतिरोध समाप्त करने के लिए संयुक्त बैठक का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
इसी कारण साधारण विधेयक के मामले में अंततः विधानसभा की इच्छा प्रभावी होती है।
सरकार पर नियंत्रण
मंत्रिपरिषद की उत्तरदायित्व व्यवस्था
राज्य मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
विधानसभा प्रश्न, चर्चा, अविश्वास प्रस्ताव, बजट और अन्य संसदीय साधनों से राज्य सरकार को उत्तरदायी बनाती है।
विधान परिषद सरकार से प्रश्न पूछ सकती है और चर्चा कर सकती है, लेकिन मंत्रिपरिषद को पद से हटाने के लिए निर्णायक अविश्वास शक्ति विधानसभा के पास होती है।
संविधान संशोधन में राज्यों की भूमिका
अनुच्छेद 368
कुछ संविधान संशोधन केवल संसद के विशेष बहुमत से पूर्ण हो जाते हैं।
लेकिन संविधान की संघीय व्यवस्था से संबंधित कुछ संशोधनों के लिए संसद से पारित होने के बाद कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा अनुसमर्थन आवश्यक होता है।
ऐसे अनुसमर्थन में राज्य विधानमंडल की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका होती है।
राज्यपाल की विधायी भूमिका
अनुच्छेद 200 और 201
राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
संविधान के अनुसार राज्यपाल विधेयक पर स्वीकृति दे सकता है, निर्धारित परिस्थितियों में स्वीकृति रोक सकता है अथवा गैर-धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित भी रख सकता है।
राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित विधेयकों से संबंधित व्यवस्था अनुच्छेद 201 में है।
मुख्यमंत्री और मंत्रियों की नियुक्ति
अनुच्छेद 164
राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है।
अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है।
संविधान में मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, लेकिन संसदीय शासन में यह व्यवस्था मुख्यमंत्री और विधानसभा में बहुमत की संवैधानिक प्रणाली के साथ पढ़ी जाती है।
राज्य मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
सुचेता कृपलानी
भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री
सुचेता कृपलानी भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनने वाली पहली महिला थीं।
वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और उन्होंने 2 अक्टूबर 1963 को पद ग्रहण किया।
🎯 परीक्षा तथ्य
भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री — सुचेता कृपलानी — उत्तर प्रदेश।
गोवा और समान नागरिक संहिता
एक अलग महत्वपूर्ण तथ्य
गोवा में विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानून के अनेक विषयों पर पुर्तगाली शासन से चली आ रही एक समान नागरिक कानून व्यवस्था का विशेष ऐतिहासिक ढाँचा लागू है।
इसी कारण प्रतियोगी परीक्षाओं में गोवा को सामान्यतः भारत का वह राज्य कहा जाता है जहाँ समान नागरिक संहिता जैसी व्यवस्था लागू है।
हालाँकि इसे राज्य विधानमंडल के संवैधानिक प्रावधानों से सीधे नहीं जोड़ना चाहिए; यह एक अलग विधिक-ऐतिहासिक तथ्य है।
राज्य विधानमंडल के महत्वपूर्ण अनुच्छेद
एक नज़र में
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 168 | राज्यों में विधानमंडलों की संरचना। |
| 169 | विधान परिषद का सृजन या समाप्ति। |
| 170 | विधानसभा की संरचना। |
| 171 | विधान परिषद की संरचना। |
| 172 | राज्य विधानमंडल के सदनों की अवधि। |
| 173 | सदस्य बनने की योग्यता। |
| 174 | सत्र, सत्रावसान और विधानसभा का विघटन। |
| 175 | राज्यपाल का सदनों को संबोधित करने और संदेश भेजने का अधिकार। |
| 176 | राज्यपाल का विशेष अभिभाषण। |
| 178 | विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष। |
| 182 | विधान परिषद के सभापति और उपसभापति। |
| 196 | विधेयकों के प्रस्तुत और पारित होने से संबंधित प्रावधान। |
| 197 | साधारण विधेयकों पर विधान परिषद की शक्ति की सीमा। |
| 198 | धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया। |
| 199 | धन विधेयक की परिभाषा। |
| 200 | राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर स्वीकृति। |
| 201 | राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित विधेयक। |
| 202 | राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण। |
| 207 | वित्तीय विधेयकों से संबंधित विशेष प्रावधान। |
| 212 | विधानमंडल की कार्यवाही की केवल प्रक्रियागत अनियमितता के आधार पर न्यायालयीय जाँच की सीमा। |
विधानसभा और विधान परिषद में अंतर
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तुलना
| आधार | विधानसभा | विधान परिषद |
|---|---|---|
| स्वरूप | निम्न सदन | उच्च सदन |
| निर्वाचन | प्रत्यक्ष | मिश्रित/मुख्यतः अप्रत्यक्ष |
| न्यूनतम आयु | 25 वर्ष | 30 वर्ष |
| कार्यकाल | सामान्यतः 5 वर्ष | स्थायी सदन; सदस्य 6 वर्ष |
| विघटन | हो सकता है | नहीं होता |
| धन विधेयक | केवल यहीं प्रस्तुत | केवल सिफारिश; 14 दिन |
| सरकार का उत्तरदायित्व | मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से इसके प्रति उत्तरदायी | सरकार इसके प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी नहीं |
| साधारण विधेयक | अंततः अधिक शक्तिशाली | मुख्यतः विलंबकारी शक्ति |
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
परीक्षा में गलती से बचें
गलत: अनुच्छेद 169 के तहत विधानसभा स्वयं विधान परिषद बना या समाप्त कर सकती है।
सही: विधानसभा विशेष प्रस्ताव पारित करती है; इसके बाद संसद कानून बनाती है।
अधूरा: विधान परिषद में सभी सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं।
सही: इसकी संरचना स्थानीय निकाय, स्नातक, शिक्षक, विधायक निर्वाचन और राज्यपाल द्वारा मनोनयन के मिश्रण से होती है।
अधूरा: विधान परिषद साधारण विधेयक को चार महीने रोकती है।
सही: पहली बार अधिकतम तीन महीने और विधानसभा से पुनः पारित होने के बाद अधिकतम एक महीना।
गलत: विधानसभा और विधान परिषद के विवाद पर संयुक्त बैठक होती है।
सही: राज्य स्तर पर संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
गलत: विधान परिषद को भंग किया जा सकता है।
सही: यह स्थायी सदन है; इसे भंग नहीं किया जाता, लेकिन अनुच्छेद 169 की प्रक्रिया से परिषद संस्था समाप्त की जा सकती है।
अधूरा: राज्यपाल अपनी इच्छा से विधानसभा को कभी भी भंग कर सकता है।
सही: संसदीय प्रणाली में यह संवैधानिक शक्ति सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह तथा लागू संवैधानिक परिस्थितियों के अधीन प्रयोग होती है।
गलत: सभी विधानसभाओं में कम से कम 60 सदस्य अनिवार्य हैं।
सही: अनुच्छेद 170 का सामान्य नियम 60–500 है, लेकिन छोटे राज्यों के लिए वैधानिक/संवैधानिक अपवाद मौजूद हैं।
अधूरा: मंत्रियों की नियुक्ति केवल राज्यपाल की इच्छा पर होती है।
सही: मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर होती है; मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
भाग 6 — अनुच्छेद 168 से 212 — राज्य विधानमंडल से संबंधित प्रमुख प्रावधान।
168 — राज्य विधानमंडल की संरचना।
एकसदनीय — राज्यपाल + विधानसभा।
द्विसदनीय — राज्यपाल + विधानसभा + विधान परिषद।
वर्तमान विधान परिषद वाले 6 राज्य — आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश।
169 — विधान परिषद का सृजन/समाप्ति — विधानसभा का विशेष प्रस्ताव + संसद का कानून।
170 — विधानसभा की संरचना।
विधानसभा सामान्य सीमा — 60 से 500; छोटे राज्यों में अपवाद।
विधानसभा — प्रत्यक्ष निर्वाचन।
विधानसभा सदस्य की न्यूनतम आयु — 25 वर्ष।
विधानसभा का सामान्य कार्यकाल — 5 वर्ष।
171 — विधान परिषद की संरचना।
विधान परिषद — विधानसभा सदस्य-संख्या के 1/3 से अधिक नहीं; सामान्यतः न्यूनतम 40।
विधान परिषद सदस्य — 6 वर्ष; लगभग 1/3 प्रत्येक 2 वर्ष में सेवानिवृत्त।
विधान परिषद सदस्य की न्यूनतम आयु — 30 वर्ष।
विधान परिषद — स्थायी सदन; भंग नहीं होती।
विधान परिषद संरचना — 1/3 स्थानीय निकाय + 1/12 स्नातक + 1/12 शिक्षक + 1/3 विधायक + शेष राज्यपाल द्वारा मनोनीत।
राज्यपाल मनोनयन — साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा।
विधानसभा अध्यक्ष त्यागपत्र — उपाध्यक्ष को।
धन विधेयक — केवल विधानसभा में।
धन विधेयक के लिए राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक।
विधान परिषद धन विधेयक — अधिकतम 14 दिन।
साधारण विधेयक — पहली बार 3 महीने + दूसरी बार 1 महीना = अधिकतम प्रभावी विलंब लगभग 4 महीने।
राज्य विधानमंडल में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं।
राज्य मंत्रिपरिषद — विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी।
मुख्यमंत्री — राज्यपाल द्वारा नियुक्त।
अन्य मंत्री — मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा नियुक्त।
राज्य विधानसभा चुनाव — भारत निर्वाचन आयोग।
भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री — सुचेता कृपलानी — उत्तर प्रदेश — 1963।
गोवा — समान नागरिक कानून की विशिष्ट ऐतिहासिक व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध।
सबसे छोटा सूत्र — 168 संरचना → 169 परिषद बनाना/हटाना → 170 विधानसभा → 171 परिषद → 172 कार्यकाल → 178 अध्यक्ष → 196 विधेयक → 197 परिषद की सीमा → 198 धन विधेयक → 200 राज्यपाल।