उच्चतम न्यायालय
गठन, न्यायाधीश, क्षेत्राधिकार, न्यायिक समीक्षा, रिट और महत्वपूर्ण निर्णय
भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था
भारत का उच्चतम न्यायालय देश की न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च न्यायालय है। संविधान के भाग V के अध्याय VI में अनुच्छेद 124 से 147 तक उच्चतम न्यायालय से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं। यह देश का सर्वोच्च संवैधानिक और अपीलीय न्यायालय है तथा संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
उच्चतम न्यायालय संविधान की अंतिम न्यायिक व्याख्या करने वाला न्यायालय है। इसके द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती है।
संविधान की संरचना — महत्वपूर्ण आधार
मूल और वर्तमान संरचना में अंतर
भारतीय संविधान संविधान सभा द्वारा तैयार किया गया। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई, संविधान को 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया और इसका अधिकांश भाग 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ।
मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं। संवैधानिक संशोधनों के बाद अनेक नए अनुच्छेद, भाग और अनुसूचियाँ जोड़ी गईं तथा कुछ प्रावधान निरस्त भी हुए। वर्तमान संविधान में 12 अनुसूचियाँ हैं।
प्रतियोगी पुस्तकों में वर्तमान संविधान के लिए प्रायः 448 अनुच्छेद लिखा मिलता है, लेकिन इसे बहुत कठोर स्थायी संख्या की तरह नहीं पढ़ना चाहिए, क्योंकि मूल अनुच्छेद संख्या 395 तक ही चलती है और संशोधनों द्वारा 21A, 39A, 51A, 243A जैसे अक्षरयुक्त अनुच्छेद जोड़े गए हैं।
इसी प्रकार मूल संविधान में 22 भाग थे; बाद में नए भाग जोड़ने और एक भाग के निरसन के कारण वर्तमान संरचना को समझते समय केवल “22 भाग” लिखना पर्याप्त नहीं है।
उच्चतम न्यायालय की स्थापना
26 जनवरी और 28 जनवरी 1950 का अंतर
संविधान लागू होने के साथ 26 जनवरी 1950 को भारत का उच्चतम न्यायालय अस्तित्व में आया।
उच्चतम न्यायालय का औपचारिक उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को पुराने संसद भवन के चैंबर ऑफ प्रिंसेज में हुआ।
इसलिए परीक्षा में दोनों तिथियों को अलग-अलग समझना चाहिए—अस्तित्व में आया 26 जनवरी 1950, उद्घाटन 28 जनवरी 1950।
भारत के प्रथम मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया थे।
🎯 तिथि याद रखें
26 जनवरी 1950 — उच्चतम न्यायालय अस्तित्व में आया।
28 जनवरी 1950 — उच्चतम न्यायालय का औपचारिक उद्घाटन।
अनुच्छेद 124 — उच्चतम न्यायालय का गठन
मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश
अनुच्छेद 124 भारत के उच्चतम न्यायालय की स्थापना और न्यायाधीशों से संबंधित मूल संवैधानिक प्रावधान करता है।
उच्चतम न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा संसद द्वारा कानून से निर्धारित अधिकतम संख्या तक अन्य न्यायाधीश होते हैं।
वर्तमान स्वीकृत संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 34 न्यायाधीश है, अर्थात मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम 33 अन्य न्यायाधीश।
ध्यान रखें कि “मुख्य न्यायाधीश + 33” की वर्तमान संख्या सीधे अनुच्छेद 124 में स्थायी रूप से नहीं लिखी गई है; न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा बनाए गए कानून के माध्यम से बढ़ाई गई है।
न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि
संसद की शक्ति
मूल संविधान में उच्चतम न्यायालय के लिए एक मुख्य न्यायाधीश और 7 अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था थी।
न्यायिक कार्यभार बढ़ने के साथ संसद ने समय-समय पर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई। वर्तमान स्वीकृत संख्या कुल 34 है।
इसलिए उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने या निर्धारित करने की विधायी शक्ति संसद के पास है।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति
राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति
भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की औपचारिक नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था संवैधानिक प्रावधानों तथा न्यायिक निर्णयों से विकसित कॉलेजियम व्यवस्था के अनुसार संचालित होती है।
उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्ति का प्रस्ताव वर्तमान प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश के स्तर से प्रारंभ होता है और कॉलेजियम की अनुशंसा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
न्यायाधीश बनने की योग्यता
तीन वैकल्पिक योग्यताएँ
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त उसने एक या अधिक उच्च न्यायालयों में लगातार कम-से-कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो; या
एक या अधिक उच्च न्यायालयों में लगातार कम-से-कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो; या
राष्ट्रपति की राय में वह विशिष्ट विधिवेत्ता हो।
इसलिए केवल “10 वर्ष उच्च न्यायालय में वकालत आवश्यक है” कहना अधूरा है; यह तीन वैकल्पिक योग्यताओं में से केवल एक है।
🎯 योग्यता याद रखें
भारतीय नागरिक + 5 वर्ष उच्च न्यायालय न्यायाधीश / 10 वर्ष उच्च न्यायालय अधिवक्ता / विशिष्ट विधिवेत्ता।
सेवानिवृत्ति और त्यागपत्र
65 वर्ष की आयु
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष है।
इसके विपरीत उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष है।
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश अपने हस्ताक्षर सहित लिखित पत्र द्वारा राष्ट्रपति को त्यागपत्र दे सकता है।
🧠 आयु का अंतर
न्यायाधीश को पद से हटाना
सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को केवल सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है।
संसद के प्रत्येक सदन को उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से राष्ट्रपति को संबोधित अभिभाषण पारित करना होता है।
इसके बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश जारी करता है।
सामान्य बोलचाल में इसे न्यायाधीश का “महाभियोग” कहा जाता है, लेकिन संविधान की सटीक भाषा न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया है।
अनुच्छेद 125 — वेतन और भत्ते
आर्थिक स्वतंत्रता की सुरक्षा
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों का निर्धारण संविधान के अधीन संसद द्वारा कानून से किया जाता है।
नियुक्ति के बाद उनकी सेवा शर्तों में सामान्यतः उनके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते और पेंशन से संबंधित व्यय भारत की संचित निधि पर भारित होता है।
वित्तीय आपातकाल की स्थिति संवैधानिक अपवाद हो सकती है।
अनुच्छेद 126 से 128
कार्यवाहक, तदर्थ और सेवानिवृत्त न्यायाधीश
| अनुच्छेद | प्रावधान |
|---|---|
| 126 | मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त होने या उनके कार्य करने में असमर्थ होने पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की व्यवस्था। |
| 127 | आवश्यक गणपूर्ति न होने पर निर्धारित प्रक्रिया से तदर्थ न्यायाधीश की उपस्थिति। |
| 128 | सेवानिवृत्त उच्चतम न्यायालय या पात्र उच्च न्यायालय न्यायाधीश से उच्चतम न्यायालय में बैठने और कार्य करने का अनुरोध। |
अनुच्छेद 129 — अभिलेख न्यायालय
अवमानना के लिए दंड की शक्ति
अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है।
अभिलेख न्यायालय होने के कारण इसके न्यायिक अभिलेख और निर्णय प्रमाणिक महत्व रखते हैं तथा न्यायिक दृष्टांत के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
उच्चतम न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति भी प्राप्त है।
उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 215 और उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 129 के अंतर्गत अभिलेख न्यायालय माना गया है।
अनुच्छेद 130 — उच्चतम न्यायालय का स्थान
दिल्ली और अन्य संभावित स्थान
उच्चतम न्यायालय का मुख्य स्थान दिल्ली है और इसकी वर्तमान मुख्य पीठ नई दिल्ली में स्थित है।
संविधान के अनुच्छेद 130 के अनुसार भारत का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की स्वीकृति से समय-समय पर किसी अन्य स्थान को भी उच्चतम न्यायालय के बैठने के स्थान के रूप में नियुक्त कर सकता है।
इसलिए “उच्चतम न्यायालय केवल नई दिल्ली में ही बैठ सकता है” सही नहीं है।
अनुच्छेद 131 — मूल अधिकारिता
संघ और राज्यों के बीच विवाद
अनुच्छेद 131 के अंतर्गत कुछ संघीय विवादों में उच्चतम न्यायालय को अनन्य मूल अधिकारिता प्राप्त है।
इसमें भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद, एक ओर भारत सरकार और एक या अधिक राज्य तथा दूसरी ओर अन्य राज्य के बीच विवाद और दो या अधिक राज्यों के बीच विवाद शामिल हो सकते हैं।
यह अधिकारिता तभी लागू होती है जब विवाद में किसी कानूनी अधिकार के अस्तित्व या सीमा से संबंधित विधि या तथ्य का प्रश्न शामिल हो।
अनुच्छेद 132 से 134A — अपीलीय अधिकारिता
संवैधानिक, दीवानी और आपराधिक अपील
| अनुच्छेद | मुख्य विषय |
|---|---|
| 132 | संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न वाले मामलों में अपील। |
| 133 | दीवानी मामलों में उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में अपील। |
| 134 | आपराधिक मामलों में अपीलीय अधिकारिता। |
| 134A | उच्च न्यायालय द्वारा उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाणपत्र से संबंधित व्यवस्था। |
अनुच्छेद 135 — पुरानी संघीय न्यायालयीय अधिकारिता
महत्वपूर्ण तथ्य-सुधार
अनुच्छेद 135 को “संसद द्वारा उच्चतम न्यायालय को अतिरिक्त शक्तियाँ देने वाला अनुच्छेद” कहना सही नहीं है।
यह मुख्यतः उन विषयों में पूर्व संघीय न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियों के उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयोग की निरंतरता से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान है, जहाँ अनुच्छेद 133 या 134 लागू नहीं होते और संसद अन्यथा व्यवस्था नहीं करती।
उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता बढ़ाने की संसद की स्पष्ट शक्ति अनुच्छेद 138 से संबंधित है।
अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका
विशेष और विवेकाधीन शक्ति
अनुच्छेद 136 उच्चतम न्यायालय को भारत के क्षेत्र में किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण के निर्णय, आदेश, दंडादेश या निर्धारण के विरुद्ध अपील के लिए विशेष अनुमति देने की व्यापक विवेकाधीन शक्ति देता है।
इसे प्रत्येक व्यक्ति का सामान्य “अपील का अधिकार” नहीं समझना चाहिए। विशेष अनुमति देना या न देना उच्चतम न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है।
सशस्त्र बलों से संबंधित कानूनों के अंतर्गत गठित न्यायालयों या न्यायाधिकरणों के मामलों पर अनुच्छेद 136 में संवैधानिक अपवाद है।
⚠️ भ्रम न करें
अधूरा: अनुच्छेद 136 सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील करने का अधिकार देता है।
सही: यह उच्चतम न्यायालय की विशेष और विवेकाधीन अनुमति की शक्ति है।
अनुच्छेद 137 — पुनर्विचार
अपने निर्णय की समीक्षा
अनुच्छेद 137 उच्चतम न्यायालय को कानून और अपने बनाए नियमों के अधीन अपने निर्णयों तथा आदेशों का पुनर्विचार करने की शक्ति देता है।
इसलिए उच्चतम न्यायालय का निर्णय अंतिम होने के बावजूद संविधान सीमित परिस्थितियों में पुनर्विचार का रास्ता प्रदान करता है।
अनुच्छेद 138 से 140
अधिकारिता और सहायक शक्तियाँ
| अनुच्छेद | मुख्य विषय |
|---|---|
| 138 | संसद कानून द्वारा उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियों का विस्तार कर सकती है। |
| 139 | संसद उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 में उल्लिखित प्रयोजनों के अतिरिक्त अन्य प्रयोजनों के लिए भी कुछ रिट जारी करने की शक्ति प्रदान कर सकती है। |
| 140 | संसद उच्चतम न्यायालय को उसकी अधिकारिता प्रभावी ढंग से प्रयोग करने के लिए सहायक शक्तियाँ दे सकती है। |
अनुच्छेद 141 — उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि
सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी
अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के क्षेत्र में स्थित सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती है।
इसे केवल “संविधान की व्याख्या वाला अनुच्छेद” कहना अधूरा है। संविधान की व्याख्या उच्चतम न्यायालय का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन अनुच्छेद 141 का सीधा विषय उसके द्वारा घोषित विधि की बाध्यकारी शक्ति है।
अनुच्छेद 142 — पूर्ण न्याय की शक्ति
महत्वपूर्ण अतिरिक्त परीक्षा तथ्य
अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक डिक्री या आदेश पारित करने की विशेष संवैधानिक शक्ति देता है।
यह उच्चतम न्यायालय की विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक शक्तियों में से एक है।
अनुच्छेद 143 — राष्ट्रपति का परामर्श
परामर्शी अधिकारिता
अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्व के किसी विधिक या तथ्यात्मक प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय माँग सकता है।
इसे उच्चतम न्यायालय की परामर्शी अधिकारिता कहा जाता है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा इस प्रकार दी गई राय सामान्य अपीलीय निर्णय के समान नहीं होती।
अनुच्छेद 144 से 147
सहायता, नियम और व्याख्या
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 144 | भारत के सभी नागरिक और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे। |
| 145 | उच्चतम न्यायालय की प्रक्रिया और नियम बनाने से संबंधित प्रावधान। |
| 146 | उच्चतम न्यायालय के अधिकारी, कर्मचारी और व्यय। |
| 147 | इस अध्याय और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में प्रयुक्त कुछ अभिव्यक्तियों की व्याख्या। |
संविधान पीठ
कम-से-कम पाँच न्यायाधीश
अनुच्छेद 145(3) के अनुसार संविधान की व्याख्या से संबंधित विधि के किसी महत्वपूर्ण प्रश्न वाले मामले की सुनवाई के लिए न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या 5 होगी।
अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा किए गए संदर्भ की सुनवाई में भी कम-से-कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ आवश्यक होती है।
इसे संविधान पीठ कहा जाता है।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
गलत: संविधान के “निर्वाचन” से जुड़े मामलों के लिए पाँच न्यायाधीश चाहिए।
सही: संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न के लिए कम-से-कम पाँच न्यायाधीश।
अनुच्छेद 32 — मौलिक अधिकारों की रक्षा
संवैधानिक उपचारों का अधिकार
अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय जाने का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।
उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए निर्देश, आदेश और संवैधानिक रिट जारी कर सकता है।
उच्चतम न्यायालय की पाँच रिट
अनुच्छेद 32 के अंतर्गत संवैधानिक उपचार
| रिट | सरल अर्थ |
|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण | अवैध हिरासत में रखे व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराने और अवैध निरुद्धता से मुक्ति हेतु। |
| परमादेश | लोक प्राधिकारी को उसका वैधानिक सार्वजनिक कर्तव्य पूरा करने का आदेश। |
| उत्प्रेषण | अधीनस्थ न्यायिक या अर्ध-न्यायिक आदेश को मंगाकर उपयुक्त स्थिति में निरस्त करना। |
| प्रतिषेध | अधीनस्थ न्यायालय या न्यायाधिकरण को उसकी अधिकारिता से बाहर कार्य करने से रोकना। |
| अधिकार-पृच्छा | किसी व्यक्ति से पूछना कि वह किसी सार्वजनिक पद को किस वैध अधिकार से धारण कर रहा है। |
अनुच्छेद 32 और 226 में अंतर
उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की रिट शक्ति
| आधार | अनुच्छेद 32 | अनुच्छेद 226 |
|---|---|---|
| न्यायालय | उच्चतम न्यायालय | उच्च न्यायालय |
| उद्देश्य | मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन | मौलिक अधिकार और अन्य कानूनी अधिकार |
| स्वरूप | अनुच्छेद 32 स्वयं मौलिक अधिकार है | संवैधानिक न्यायिक शक्ति |
| विषयगत विस्तार | मौलिक अधिकारों तक केंद्रित | विषयगत रूप से अधिक व्यापक |
न्यायिक समीक्षा
संविधान की सर्वोच्चता की रक्षा
न्यायिक समीक्षा के माध्यम से न्यायालय यह जाँच सकता है कि विधायिका द्वारा बनाया गया कानून या कार्यपालिका द्वारा की गई कार्रवाई संविधान के अनुरूप है या नहीं।
अनुच्छेद 13 न्यायिक समीक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक आधार है, क्योंकि मौलिक अधिकारों से असंगत कानूनों की वैधता पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
लेकिन भारतीय न्यायिक समीक्षा को केवल अनुच्छेद 13 तक सीमित नहीं करना चाहिए। अनुच्छेद 32, 136, 226 तथा संविधान की सर्वोच्चता से जुड़े अन्य प्रावधान भी इसके व्यापक संवैधानिक ढाँचे में महत्वपूर्ण हैं।
न्यायिक समीक्षा में विधायी कार्यों की संवैधानिकता, प्रशासनिक कार्यों की वैधता और संविधान तथा कानूनों की न्यायिक व्याख्या जैसे पहलू सम्मिलित हो सकते हैं।
न्यायिक समीक्षा और मूल संरचना
दोनों का सही संबंध
यह कहना कि “न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना सिद्धांत का स्रोत है” पूरी तरह सही अभिव्यक्ति नहीं है।
अधिक सुरक्षित तथ्य यह है कि उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में न्यायिक समीक्षा को स्वयं संविधान की मूल संरचना का महत्वपूर्ण तत्व माना है।
मूल संरचना सिद्धांत का निर्णायक प्रतिपादन केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 में हुआ।
केशवानंद भारती मामला, 1973
मूल संरचना सिद्धांत
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है।
उच्चतम न्यायालय ने माना कि संसद संविधान के प्रावधानों में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती।
इसी निर्णय को मूल संरचना सिद्धांत के निर्णायक प्रतिपादन से जोड़ा जाता है।
गोलकनाथ मामला, 1967
मौलिक अधिकार और संशोधन शक्ति
आई. सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967 में उच्चतम न्यायालय ने उस समय यह दृष्टिकोण अपनाया कि संसद संविधान संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकारों को सीमित या छीन नहीं सकती।
इस निर्णय में मौलिक अधिकारों की विशेष महत्ता पर बल दिया गया।
बाद में केशवानंद भारती मामले में संसद की संशोधन शक्ति को स्वीकार करते हुए उस पर मूल संरचना की सीमा स्थापित की गई। इसलिए गोलकनाथ के सिद्धांत को बाद के संवैधानिक विकास से अलग करके नहीं पढ़ना चाहिए।
गोलकनाथ निर्णय में मौलिक अधिकारों को व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास और अपनी जीवन-योजना बनाने की स्वतंत्रता से निकटता से जोड़कर देखा गया।
मिनर्वा मिल्स मामला, 1980
मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्व
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980 में उच्चतम न्यायालय ने मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य और संतुलन को संवैधानिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना।
इस निर्णय ने संसद की संशोधन शक्ति की सीमित प्रकृति तथा संविधान की मूल संरचना को भी मजबूत किया।
शाहबानो मामला, 1985
भरण-पोषण से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय
मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम, 1985 मुस्लिम तलाकशुदा महिला के भरण-पोषण से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय था।
उच्चतम न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की तत्कालीन धारा 125 के संदर्भ में शाहबानो के भरण-पोषण के अधिकार को स्वीकार किया।
यह निर्णय व्यक्तिगत विधि, महिला अधिकार और समान नागरिक संहिता की बहस से भी जुड़ गया।
विनीत नारायण मामला, 1997
जाँच एजेंसियों की संस्थागत स्वतंत्रता
विनीत नारायण बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार संबंधी जाँचों और केंद्रीय जाँच एजेंसियों की कार्यप्रणाली के संबंध में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए।
इस निर्णय का उद्देश्य जाँच प्रक्रिया को अनुचित बाहरी प्रभाव से अधिक सुरक्षित बनाना और संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करना था।
इसे केवल “सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता दे दी गई” के रूप में पढ़ना अत्यधिक सरलीकरण होगा।
लोकहित याचिका
भारतीय न्यायपालिका में विकास
लोकहित याचिका ने न्याय तक पहुँच की परंपरागत धारणा को व्यापक बनाया। सार्वजनिक महत्व के मामलों में केवल सीधे प्रभावित व्यक्ति ही नहीं, बल्कि जनहित में कार्य करने वाला व्यक्ति या संस्था भी न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है।
भारत में उच्चतम न्यायालय ने कई अवसरों पर पत्र, तार, पोस्टकार्ड और सार्वजनिक महत्व की शिकायतों को भी रिट याचिका के रूप में स्वीकार किया, जिससे जनहित न्यायशास्त्र का विशिष्ट भारतीय स्वरूप विकसित हुआ।
लोकहित कानून और जनहित वाद की अवधारणाओं पर अमेरिकी न्यायिक अनुभव का प्रभाव बताया जाता है, लेकिन भारतीय लोकहित याचिका व्यवस्था ने अपनी विशिष्ट और व्यापक न्यायिक पहचान विकसित की।
इसलिए केवल “लोकहित याचिका की उत्पत्ति अमेरिका में हुई” लिखना भारतीय संदर्भ के लिए अधूरा है।
दूरसंचार अपीलीय अधिकरण और उच्चतम न्यायालय
दूरसंचार क्षेत्र का महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य
दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपील अधिकरण के कुछ अंतिम आदेशों के विरुद्ध कानून में निर्धारित आधारों पर उच्चतम न्यायालय में अपील का प्रावधान है।
दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 की धारा 18 अधिकरण के गैर-अंतरिम आदेश के विरुद्ध निर्धारित आधारों पर उच्चतम न्यायालय में अपील की व्यवस्था करती है।
इसलिए “अधिकरण के प्रत्येक निर्णय को केवल उच्चतम न्यायालय में ही चुनौती दी जा सकती है” कहना बहुत व्यापक है; सही तथ्य संबंधित कानून में निर्धारित अपीलीय शर्तों के साथ पढ़ना चाहिए।
सेवानिवृत्त न्यायाधीश और वकालत
अनुच्छेद 124(7)
अनुच्छेद 124(7) के अनुसार जो व्यक्ति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पद धारण कर चुका है, वह भारत के क्षेत्र में किसी न्यायालय या किसी प्राधिकारी के समक्ष वकालत या पैरवी नहीं कर सकता।
इस प्रकार सेवानिवृत्त उच्चतम न्यायालय न्यायाधीशों पर वकालत के संबंध में व्यापक संवैधानिक प्रतिबंध है।
न्यायमूर्ति के. जी. बालकृष्णन
भारत के मुख्य न्यायाधीश
न्यायमूर्ति के. जी. बालकृष्णन 14 जनवरी 2007 को भारत के मुख्य न्यायाधीश बने और 12 मई 2010 तक इस पद पर रहे।
प्रतियोगी परीक्षा-साहित्य और सार्वजनिक जीवन में उन्हें भारत के प्रथम दलित मुख्य न्यायाधीश के रूप में व्यापक रूप से उल्लेखित किया जाता है।
वे इससे पहले केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी रहे थे।
उच्चतम न्यायालय की प्रमुख अधिकारिताएँ
एक नज़र में
| अधिकारिता | प्रमुख अनुच्छेद | मुख्य विषय |
|---|---|---|
| मूल अधिकारिता | 131 | संघ और राज्यों अथवा राज्यों के बीच कुछ संघीय विवाद |
| मौलिक अधिकार | 32 | रिट और मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन |
| अपीलीय | 132–134 | संवैधानिक, दीवानी और आपराधिक अपील |
| विशेष अनुमति | 136 | विशेष अनुमति से अपील |
| पुनर्विचार | 137 | अपने निर्णय का पुनर्विचार |
| परामर्शी | 143 | राष्ट्रपति द्वारा राय माँगना |
| पूर्ण न्याय | 142 | पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक आदेश |
प्रमुख अनुच्छेद — त्वरित क्रम
परीक्षा के लिए अनुच्छेदवार पुनरावृत्ति
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 124 | उच्चतम न्यायालय की स्थापना, गठन और न्यायाधीश |
| 125 | वेतन और भत्ते |
| 126 | कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश |
| 127 | तदर्थ न्यायाधीश |
| 128 | सेवानिवृत्त न्यायाधीश की उपस्थिति |
| 129 | अभिलेख न्यायालय |
| 130 | उच्चतम न्यायालय का स्थान |
| 131 | मूल अधिकारिता |
| 132 | संवैधानिक मामलों में अपील |
| 133 | दीवानी अपील |
| 134 | आपराधिक अपील |
| 134A | अपील के प्रमाणपत्र से संबंधित प्रावधान |
| 135 | पूर्व संघीय न्यायालय की कुछ अधिकारिता |
| 136 | विशेष अनुमति |
| 137 | पुनर्विचार |
| 138 | अधिकारिता का विस्तार |
| 139 | कुछ अतिरिक्त रिट शक्तियाँ प्रदान करने की संसदीय शक्ति |
| 140 | सहायक शक्तियाँ |
| 141 | उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि बाध्यकारी |
| 142 | पूर्ण न्याय |
| 143 | राष्ट्रपति का परामर्श |
| 144 | सभी नागरिक और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे |
| 145 | न्यायालय के नियम और प्रक्रिया |
| 146 | अधिकारी और कर्मचारी |
| 147 | व्याख्या संबंधी प्रावधान |
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
परीक्षा में गलती से बचें
अधूरा: उच्चतम न्यायालय की स्थापना 28 जनवरी 1950 को हुई।
सही: 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया; 28 जनवरी 1950 को औपचारिक उद्घाटन हुआ।
गलत: अनुच्छेद 124 में सीधे मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य न्यायाधीश लिखे हैं।
सही: वर्तमान स्वीकृत कुल संख्या 34 है; संख्या संसद द्वारा कानून से बढ़ाई गई है।
गलत: उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश बनने के लिए केवल 10 वर्ष वकालत आवश्यक है।
सही: 5 वर्ष उच्च न्यायालय न्यायाधीश, या 10 वर्ष अधिवक्ता, या राष्ट्रपति की राय में विशिष्ट विधिवेत्ता।
अधूरा: न्यायिक समीक्षा केवल अनुच्छेद 13 से मिलती है।
सही: अनुच्छेद 13 महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन न्यायिक समीक्षा का संवैधानिक ढाँचा अधिक व्यापक है।
गलत: अनुच्छेद 141 संविधान की व्याख्या का अनुच्छेद है।
सही: अनुच्छेद 141 उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि को सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी बनाता है।
गलत: अनुच्छेद 136 प्रत्येक व्यक्ति को सीधे अपील का अधिकार देता है।
सही: यह उच्चतम न्यायालय की विशेष विवेकाधीन अनुमति की शक्ति है।
गलत: अनुच्छेद 135 संसद द्वारा उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता बढ़ाने की शक्ति देता है।
सही: अधिकारिता के विस्तार का प्रमुख प्रावधान अनुच्छेद 138 है।
गलत: संविधान पीठ का संबंध “संविधान के निर्वाचन” से है।
सही: संविधान की व्याख्या के महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न की सुनवाई के लिए कम-से-कम पाँच न्यायाधीश।
गलत: न्यायिक समीक्षा मूल संरचना सिद्धांत का स्रोत मात्र है।
सही: न्यायिक समीक्षा स्वयं संविधान की मूल संरचना के महत्वपूर्ण तत्वों में मानी गई है।
अति-व्यापक: लोकहित याचिका पूरी तरह अमेरिका से भारत में ली गई।
सही: जनहित कानून की अवधारणाओं पर अमेरिकी प्रभाव रहा, लेकिन भारत में लोकहित याचिका ने विशिष्ट न्यायिक स्वरूप विकसित किया।
अति-व्यापक: दूरसंचार अधिकरण के प्रत्येक आदेश को केवल उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
सही: संबंधित कानून में निर्धारित गैर-अंतरिम आदेशों और वैधानिक आधारों पर उच्चतम न्यायालय में अपील का प्रावधान है।
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उच्चतम न्यायालय — भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था।
संवैधानिक प्रावधान — भाग V, अध्याय VI, अनुच्छेद 124 से 147।
अस्तित्व में आया — 26 जनवरी 1950।
औपचारिक उद्घाटन — 28 जनवरी 1950।
प्रथम मुख्य न्यायाधीश — न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया।
वर्तमान स्वीकृत न्यायाधीश संख्या — मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 34।
न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति — संसद।
न्यायाधीशों की नियुक्ति — राष्ट्रपति।
योग्यता — भारतीय नागरिक + 5 वर्ष उच्च न्यायालय न्यायाधीश / 10 वर्ष अधिवक्ता / विशिष्ट विधिवेत्ता।
सेवानिवृत्ति आयु — 65 वर्ष।
वेतन, भत्ते और पेंशन — भारत की संचित निधि पर भारित।
अनुच्छेद 129 — अभिलेख न्यायालय और अवमानना के लिए दंड की शक्ति।
अनुच्छेद 130 — मुख्य स्थान दिल्ली; राष्ट्रपति की स्वीकृति से अन्य स्थान निर्धारित किया जा सकता है।
अनुच्छेद 131 — संघीय विवादों की मूल अधिकारिता।
अनुच्छेद 132–134 — अपीलीय अधिकारिता।
अनुच्छेद 136 — विशेष अनुमति याचिका; सामान्य अपील का अधिकार नहीं बल्कि विवेकाधीन शक्ति।
अनुच्छेद 137 — पुनर्विचार।
अनुच्छेद 138 — संसद द्वारा अधिकारिता का विस्तार।
अनुच्छेद 141 — उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी।
अनुच्छेद 142 — पूर्ण न्याय करने की शक्ति।
अनुच्छेद 143 — राष्ट्रपति द्वारा परामर्श माँगना।
अनुच्छेद 145(3) — संविधान की व्याख्या के महत्वपूर्ण प्रश्न में कम-से-कम पाँच न्यायाधीश।
अनुच्छेद 32 — मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय की रिट शक्ति।
पाँच रिट — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेषण, प्रतिषेध और अधिकार-पृच्छा।
न्यायिक समीक्षा — संविधान की सर्वोच्चता और अधिकारों की रक्षा का महत्वपूर्ण न्यायिक साधन तथा संविधान की मूल संरचना का महत्वपूर्ण तत्व।
केशवानंद भारती, 1973 — मूल संरचना सिद्धांत।
गोलकनाथ, 1967 — मौलिक अधिकारों और संसद की संशोधन शक्ति से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय।
मिनर्वा मिल्स, 1980 — मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य और संतुलन।
शाहबानो, 1985 — मुस्लिम तलाकशुदा महिला के भरण-पोषण से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय।
विनीत नारायण — भ्रष्टाचार जाँच और जाँच एजेंसियों की संस्थागत स्वतंत्रता से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय।
सेवानिवृत्त उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश — भारत में किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता।
के. जी. बालकृष्णन — 2007 में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने; सामान्य परीक्षा-साहित्य में भारत के प्रथम दलित मुख्य न्यायाधीश के रूप में प्रसिद्ध।
उच्च न्यायालय — अनुच्छेद 215 के तहत अभिलेख न्यायालय; उच्चतम न्यायालय — अनुच्छेद 129 के तहत अभिलेख न्यायालय।