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निर्वाचन आयोग
ELECTION COMMISSION OF INDIA

निर्वाचन आयोग

गठन, नियुक्ति, स्वतंत्रता, चुनाव संचालन, राजनीतिक दल और महत्वपूर्ण चुनाव सुधार

निर्वाचन आयोग का संवैधानिक स्थान

भारत निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र और स्थायी संवैधानिक निकाय है। संविधान के अनुच्छेद 324 में संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित की गई है।

निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी। इसी कारण प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। आयोग राष्ट्रपति के अधीनस्थ विभाग के रूप में कार्य नहीं करता, बल्कि संविधान द्वारा स्थापित स्वतंत्र संस्था है।

01

अनुच्छेद 324 — निर्वाचन आयोग

संवैधानिक आधार

अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग का मूल संवैधानिक आधार है।

संसद, प्रत्येक राज्य के विधानमंडल तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और चुनावों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित है।

इसलिए निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था का प्रमुख संवैधानिक संरक्षक माना जाता है।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

गलत: अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति के अधीन कार्य करता है।
सही: निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है। राष्ट्रपति नियुक्तियाँ करता है, लेकिन आयोग राष्ट्रपति का अधीनस्थ विभाग नहीं है।

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निर्वाचन आयोग की संरचना

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्त

संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर निर्धारित संख्या में अन्य निर्वाचन आयुक्त हो सकते हैं।

वर्तमान व्यवस्था में निर्वाचन आयोग एक तीन-सदस्यीय निकाय है—एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त।

बहु-सदस्यीय आयोग में निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं और सभी निर्वाचन आयुक्त निर्णय-निर्माण में समान मत रखते हैं।

🧠 संरचना

1 मुख्य निर्वाचन आयुक्त+ 2 निर्वाचन आयुक्त= 3 सदस्य
03

एक-सदस्यीय से बहु-सदस्यीय आयोग

1989 और 1993

निर्वाचन आयोग मूल रूप से केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त वाला एक-सदस्यीय निकाय था।

पहली बार 16 अक्टूबर 1989 को दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए और आयोग तीन-सदस्यीय बना, लेकिन यह व्यवस्था बहुत कम समय तक रही तथा जनवरी 1990 में आयोग फिर एक-सदस्यीय हो गया।

1 अक्टूबर 1993 को दो निर्वाचन आयुक्त फिर नियुक्त किए गए और तब से बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था निरंतर चली आ रही है।

🎯 परीक्षा तथ्य

1989 → पहली बार तीन-सदस्यीय
1993 → स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय व्यवस्था की पुनः स्थापना

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मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति

राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की औपचारिक नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

वर्तमान वैधानिक व्यवस्था मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 द्वारा विनियमित होती है।

इस कानून के अंतर्गत राष्ट्रपति नियुक्ति एक निर्धारित चयन प्रक्रिया और चयन समिति की सिफारिश के आधार पर करता है।

05

वर्तमान चयन समिति

2023 के कानून के अंतर्गत

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होता है।

लोकसभा में विपक्ष का नेता इसका सदस्य होता है। यदि मान्यता प्राप्त विपक्ष का नेता न हो तो लोकसभा में सरकार के विरोध में सबसे बड़े दल के नेता को इस प्रयोजन के लिए विपक्ष का नेता माना जाता है।

प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री इसका तीसरा सदस्य होता है।

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नियुक्ति के लिए योग्यता

वर्तमान वैधानिक प्रावधान

वर्तमान कानून के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाते हैं जो भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद धारण कर चुके हों या कर रहे हों।

उनमें सत्यनिष्ठा हो तथा चुनाव के प्रबंधन और संचालन से संबंधित ज्ञान और अनुभव होना आवश्यक है।

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कार्यकाल और आयु

6 वर्ष या 65 वर्ष

मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की पदावधि 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो, तक होती है।

कार्यकाल समाप्ति से पहले वे राष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र देकर त्यागपत्र दे सकते हैं।

🎯 याद रखें

कार्यकाल → 6 वर्ष
अधिकतम आयु → 65 वर्ष
जो पहले हो

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मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाना

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी प्रकार और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस प्रकार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

इसके लिए संसद के प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।

हटाने का संवैधानिक आधार सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता से संबंधित है।

अंतिम हटाने का आदेश राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

09

अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाना

मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश

अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समान संसदीय प्रक्रिया से हटाना आवश्यक नहीं है।

संविधान तथा वर्तमान कानून के अनुसार अन्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश आवश्यक है।

⚠️ बहुत महत्वपूर्ण सुधार

गलत: निर्वाचन आयोग के सभी सदस्यों को केवल उच्चतम न्यायालय की सिफारिश पर हटाया जा सकता है।
सही: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जैसी संसदीय प्रक्रिया से हटाया जाता है; अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता।

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वेतन और सेवा की शर्तें

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान वेतन

वर्तमान कानून के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के बराबर होता है।

उन्हें कानून में निर्धारित भत्ते और सेवा संबंधी सुविधाएँ भी प्राप्त होती हैं।

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निर्वाचन आयोग किन चुनावों का संचालन करता है?

अनुच्छेद 324 का क्षेत्र

निर्वाचन आयोग लोकसभा और राज्यसभा के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है।

यह राज्यों की विधानसभा और विधान परिषद के चुनावों से संबंधित चुनावी प्रक्रिया का भी संचालन करता है।

भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव भी निर्वाचन आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में संपन्न होते हैं।

इसलिए राष्ट्रपति का चुनाव भारत निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित किया जाना आपका मूल बिंदु सही है।

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किन चुनावों का संचालन भारत निर्वाचन आयोग नहीं करता?

स्थानीय निकाय चुनाव

पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव भारत निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं कराए जाते।

इन स्थानीय निकाय चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए प्रत्येक राज्य में राज्य निर्वाचन आयोग की अलग संवैधानिक व्यवस्था है।

पंचायत चुनाव के लिए अनुच्छेद 243K और नगरपालिका चुनाव के लिए अनुच्छेद 243ZA महत्वपूर्ण हैं।

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निर्वाचन आयोग के प्रमुख कार्य

चुनाव प्रक्रिया का प्रबंधन

निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और अद्यतन की संवैधानिक निगरानी करना निर्वाचन आयोग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करना, चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करना तथा मतदान और मतगणना को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से संपन्न कराने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश देना आयोग के प्रमुख कार्यों में शामिल है।

आयोग चुनाव पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कर सकता है और चुनावी अनियमितताओं की स्थिति में कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई कर सकता है।

निर्वाचन आयोग चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए व्यापक प्रशासनिक और पर्यवेक्षणीय भूमिका निभाता है।

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राजनीतिक दलों का पंजीकरण

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951

राजनीतिक दलों का पंजीकरण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के अंतर्गत निर्वाचन आयोग के समक्ष किया जाता है।

पंजीकरण और राष्ट्रीय या राज्य दल के रूप में मान्यता दो अलग विषय हैं। प्रत्येक पंजीकृत दल आवश्यक नहीं कि मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय अथवा राज्य दल भी हो।

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राष्ट्रीय और राज्य दल की मान्यता

चुनाव चिन्ह आदेश, 1968

राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल या राज्य दल के रूप में मान्यता देने का अधिकार निर्वाचन आयोग को प्राप्त है।

यह मान्यता मुख्यतः निर्वाचन चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 में निर्धारित चुनावी प्रदर्शन के मानदंडों के अनुसार दी जाती है।

इसी व्यवस्था के अंतर्गत मान्यता प्राप्त दलों के चुनाव चिन्हों के आरक्षण और उम्मीदवारों को चिन्ह आवंटन में निर्वाचन आयोग की प्रमुख भूमिका होती है।

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आदर्श आचार संहिता

चुनावी आचरण के मानक

चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के आचरण को नियंत्रित करने के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होती है।

इसका उद्देश्य सत्तारूढ़ दल को सरकारी मशीनरी का अनुचित चुनावी लाभ लेने से रोकना तथा सभी उम्मीदवारों के लिए यथासंभव समान चुनावी वातावरण सुनिश्चित करना है।

आदर्श आचार संहिता स्वयं एक अलग संपूर्ण दंड कानून नहीं है, लेकिन उसके अंतर्गत आने वाला कोई कार्य यदि किसी वैधानिक कानून का भी उल्लंघन करता है तो संबंधित कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

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61वाँ संविधान संशोधन, 1988

मतदान की आयु 21 से 18 वर्ष

61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 326 में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।

यह परिवर्तन 28 मार्च 1989 से प्रभावी हुआ। इसी कारण कई परीक्षा पुस्तकों में इसे 1989 से जोड़कर पूछा जाता है।

⚠️ वर्ष का सही अंतर

अधूरा: 61वाँ संविधान संशोधन, 1989।
सही: 61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1988; मतदान आयु 18 वर्ष करने वाला प्रावधान 1989 में प्रभावी हुआ।

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मताधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार

विधिक अधिकार

भारत में मतदान का अधिकार सामान्यतः मौलिक अधिकार नहीं बल्कि वैधानिक अधिकार माना जाता है, जिसका प्रयोग संविधान और चुनाव कानूनों द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अनुसार किया जाता है।

इसी प्रकार चुनाव लड़ने या निर्वाचित होने का अधिकार भी मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कानून द्वारा नियंत्रित वैधानिक अधिकार है।

अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के संवैधानिक आधार को स्थापित करता है, जबकि मतदाता पंजीकरण और चुनाव की विस्तृत शर्तें चुनाव संबंधी कानूनों में दी गई हैं।

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सांसद की अयोग्यता और निर्वाचन आयोग

अनुच्छेद 103

संसद सदस्य की संविधान के अनुच्छेद 102(1) से संबंधित अयोग्यता का प्रश्न उत्पन्न होने पर निर्णय राष्ट्रपति करता है।

निर्णय देने से पहले राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करता है और उसकी राय के अनुसार कार्य करता है।

यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 103 में दी गई है।

20

राज्य विधानमंडल सदस्य की अयोग्यता

अनुच्छेद 192

राज्य विधानमंडल के सदस्य की संविधान के अनुच्छेद 191(1) से संबंधित अयोग्यता के प्रश्न पर निर्णय राज्यपाल करता है।

राज्यपाल भी निर्णय देने से पहले निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करता है और उसके अनुसार कार्य करता है।

यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 192 में है।

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अपराध में दोषसिद्धि और चुनावी अयोग्यता

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951

किसी व्यक्ति की आपराधिक दोषसिद्धि के कारण चुनाव लड़ने की अयोग्यता का मुख्य वैधानिक आधार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 है।

कौन-सी दोषसिद्धि कितनी अवधि के लिए अयोग्यता उत्पन्न करेगी, यह संसद द्वारा बनाए गए कानून में निर्धारित होता है।

निर्वाचन आयोग स्वयं किसी अपराध को मनमाने ढंग से घोषित करके व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं करता। वह संविधान और चुनाव कानूनों के अनुसार अपनी भूमिका निभाता है।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

गलत/भ्रमित: न्यायालय द्वारा अपराधी घोषित व्यक्ति को निर्वाचन आयोग चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करता है।
सही: दोषसिद्धि से अयोग्यता मुख्यतः संसद द्वारा बनाए गए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों से निर्धारित होती है।

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राजनीतिक दल और 1985

दल-बदल कानून से संबंध

यह कहना ठीक नहीं है कि राजनीतिक दलों को भारत में पहली बार 1985 में सामान्य संवैधानिक मान्यता मिली। राजनीतिक दल चुनावी व्यवस्था में इससे पहले से सक्रिय और वैधानिक रूप से मान्य थे।

1985 का महत्वपूर्ण संवैधानिक विकास 52वाँ संविधान संशोधन था, जिसके द्वारा दल-बदल विरोधी प्रावधानों वाली दसवीं अनुसूची संविधान में जोड़ी गई।

इससे संविधान के पाठ में राजनीतिक दल और विधायक दल से संबंधित अवधारणाओं को प्रत्यक्ष संवैधानिक महत्व मिला।

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दल-बदल विरोधी कानून

52वाँ संविधान संशोधन, 1985

दल-बदल विरोधी कानून 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा लाया गया और संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।

इसका उद्देश्य निर्वाचित सदस्यों द्वारा राजनीतिक दल बदलने से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता पर नियंत्रण करना था।

यह कानून 1985 में लागू हुआ। इसके बाद 91वें संविधान संशोधन, 2003 द्वारा दल-बदल संबंधी व्यवस्था को और कठोर बनाया गया।

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दिनेश गोस्वामी समिति

निर्वाचन सुधार समिति, 1990

दिनेश गोस्वामी समिति का गठन 1990 में निर्वाचन सुधारों पर विचार करने के लिए किया गया था।

समिति ने निर्वाचन आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने, मतदाता पहचान पत्र, पुनर्मतदान, चुनावी प्रक्रिया और अन्य कई चुनाव सुधारों से संबंधित महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं।

इसे केवल लोकसभा चुनाव के सरकारी वित्तीयन से संबंधित समिति कहना सही नहीं है।

चुनावों के राज्य वित्तपोषण से विशेष रूप से जुड़ी महत्वपूर्ण समिति इंद्रजीत गुप्ता समिति, 1998 थी।

🎯 समितियों में अंतर

दिनेश गोस्वामी समिति → निर्वाचन सुधार
इंद्रजीत गुप्ता समिति → चुनावों का राज्य वित्तपोषण

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मुख्य विपक्षी दल और 10 प्रतिशत का नियम

महत्वपूर्ण भ्रम

यह कहना कि किसी राजनीतिक दल को मुख्य विपक्षी दल या विपक्ष के नेता की मान्यता के लिए संविधान या किसी सामान्य संसदीय कानून के तहत अनिवार्य रूप से सदन की 10 प्रतिशत सीटें चाहिए, पूरी तरह सुरक्षित तथ्य नहीं है।

10 प्रतिशत का उल्लेख ऐतिहासिक संसदीय मान्यता और सदन में दल/समूह की मान्यता संबंधी प्रथाओं से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन विपक्ष के नेता की वैधानिक परिभाषा मुख्यतः उस विपक्षी दल के नेता से संबंधित है जिसकी सदन में संख्या सबसे अधिक हो और जिसे संबंधित पीठासीन अधिकारी द्वारा मान्यता दी गई हो।

इसलिए परीक्षा में “मुख्य विपक्षी दल के लिए अनिवार्य संवैधानिक 10% नियम” के रूप में इसे नहीं लिखना चाहिए।

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लोकसभा चुनाव की अधिसूचना

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 14

लोकसभा के सामान्य चुनाव के लिए औपचारिक चुनाव प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 14 के अंतर्गत जारी अधिसूचना से शुरू होती है।

यह अधिसूचना राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग द्वारा अनुशंसित तिथि या तिथियों के अनुसार जारी करता है और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों से सदस्यों को चुनने के लिए आह्वान किया जाता है।

इसलिए आपके मूल बिंदु का धारा 14 वाला हिस्सा सही है, लेकिन इसमें निर्वाचन आयोग की अनुशंसा की भूमिका भी याद रखनी चाहिए।

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विधानसभा चुनाव की अधिसूचना

धारा 15

राज्य विधानसभा के सामान्य चुनाव के लिए इसी प्रकार की व्यवस्था जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 15 में है।

इसमें संबंधित राज्य का राज्यपाल निर्वाचन आयोग द्वारा अनुशंसित तिथि या तिथियों के अनुसार अधिसूचना जारी करता है।

28

आनुपातिक प्रतिनिधित्व और द्विदलीय व्यवस्था

सामान्य राजनीतिक सिद्धांत

यह कहना कि जिस देश में द्विदलीय व्यवस्था हो वहाँ आनुपातिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता ही नहीं होती, कोई सार्वभौमिक संवैधानिक नियम नहीं है।

दलीय प्रणाली और निर्वाचन प्रणाली अलग अवधारणाएँ हैं। कोई देश बहुलता प्रणाली, आनुपातिक प्रतिनिधित्व अथवा मिश्रित प्रणाली का चयन अपनी संवैधानिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार कर सकता है।

भारत में लोकसभा और विधानसभा के सामान्य प्रत्यक्ष चुनावों में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी होने वाली प्रणाली प्रचलित है, जबकि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यसभा जैसे चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की अलग व्यवस्थाएँ प्रयुक्त होती हैं।

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निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता

संवैधानिक संरक्षण

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसका संवैधानिक दर्जा है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान कठिन प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिससे उसके कार्यकाल को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।

अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता।

बहु-सदस्यीय आयोग में निर्णय बहुमत से होते हैं और निर्वाचन आयुक्तों को निर्णय प्रक्रिया में समान मत प्राप्त है।

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महत्वपूर्ण अनुच्छेद

चुनाव व्यवस्था से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद मुख्य विषय
324निर्वाचन आयोग; चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण
325धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर अलग निर्वाचक नामावली नहीं
326वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव
327संसद की चुनाव संबंधी कानून बनाने की शक्ति
328राज्य विधानमंडल की अपनी विधायिका के चुनाव संबंधी कानून बनाने की शक्ति, संसद के कानून के अधीन
329निर्वाचन मामलों में न्यायालयीय हस्तक्षेप पर संवैधानिक सीमाएँ तथा चुनाव याचिका की व्यवस्था
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महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

परीक्षा में गलती से बचें

गलत: निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति के अधीन कार्य करता है।
सही: निर्वाचन आयोग स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है; मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

गलत: आयोग के सभी सदस्यों को उच्चतम न्यायालय की सिफारिश पर हटाया जाता है।
सही: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया से हटाया जाता है; अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता।

अधूरा: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संसद के 2/3 बहुमत से हटाया जाता है।
सही: प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है।

अधूरा: निर्वाचन आयोग 1989 से लगातार तीन-सदस्यीय है।
सही: 1989 में पहली बार तीन-सदस्यीय बना, 1990 में फिर एक-सदस्यीय हुआ और 1 अक्टूबर 1993 से बहु-सदस्यीय व्यवस्था निरंतर है।

अधूरा: 61वाँ संविधान संशोधन 1989 का है।
सही: 61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1988 का है; मतदान आयु 18 वर्ष करने वाला परिवर्तन 1989 में प्रभावी हुआ।

गलत: दिनेश गोस्वामी समिति मुख्य रूप से चुनावों के सरकारी वित्तीयन से संबंधित थी।
सही: दिनेश गोस्वामी समिति निर्वाचन सुधारों से संबंधित थी; चुनावों के राज्य वित्तपोषण पर इंद्रजीत गुप्ता समिति महत्वपूर्ण है।

गलत: मुख्य विपक्षी दल की मान्यता के लिए 10% सीटों की अनिवार्य संवैधानिक शर्त है।
सही: इसे सार्वभौमिक संवैधानिक नियम के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

गलत: राजनीतिक दलों को पहली बार 1985 में ही कानूनी या संवैधानिक अस्तित्व मिला।
सही: राजनीतिक दल पहले से चुनावी व्यवस्था का हिस्सा थे; 1985 में दसवीं अनुसूची के माध्यम से दल-बदल संबंधी संवैधानिक प्रावधान जोड़े गए।

गलत: किसी दोषी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करना निर्वाचन आयोग की स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर है।
सही: दोषसिद्धि संबंधी अयोग्यता जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 सहित लागू कानूनों से निर्धारित होती है।

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त्वरित पुनरावृत्ति

एक नज़र में पूरा अध्याय

⚡ याद रखने का क्रम

324—निर्वाचन आयोग 325—एक सामान्य निर्वाचक नामावली 326—वयस्क मताधिकार
CEC + 2 EC 6 वर्ष 65 वर्ष
1989—पहली बार 3 सदस्य 1993—बहु-सदस्यीय व्यवस्था

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

निर्वाचन आयोग — स्वतंत्र और स्थायी संवैधानिक निकाय।

स्थापना — 25 जनवरी 1950।

अनुच्छेद 324 — निर्वाचन आयोग का संवैधानिक आधार।

मुख्य कार्य — संसद, राज्य विधानमंडल, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण।

स्थानीय निकाय चुनाव — भारत निर्वाचन आयोग नहीं, राज्य निर्वाचन आयोग कराता है।

वर्तमान संरचना — एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त।

1989 — पहली बार आयोग तीन-सदस्यीय बनाया गया।

1 अक्टूबर 1993 — दो निर्वाचन आयुक्त फिर नियुक्त हुए; बहु-सदस्यीय व्यवस्था तब से निरंतर।

नियुक्ति — राष्ट्रपति द्वारा।

वर्तमान नियुक्ति कानून — मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023।

चयन समिति — प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।

कार्यकाल — 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाना — उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया और आधार।

अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाना — मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश आवश्यक।

वेतन — उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के बराबर।

राजनीतिक दल का पंजीकरण — जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A।

राष्ट्रीय/राज्य दल की मान्यता — निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित चुनावी मानदंडों के अनुसार।

चुनाव चिन्ह — निर्वाचन चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 महत्वपूर्ण।

61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 — मतदान आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष; परिवर्तन 1989 में प्रभावी।

मतदान का अधिकार — मौलिक अधिकार नहीं; वैधानिक अधिकार।

चुनाव लड़ने का अधिकार — वैधानिक अधिकार।

अनुच्छेद 103 — सांसद की अयोग्यता पर राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार निर्णय करता है।

अनुच्छेद 192 — राज्य विधानमंडल सदस्य की अयोग्यता पर राज्यपाल, निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार निर्णय करता है।

आपराधिक दोषसिद्धि संबंधी अयोग्यता — जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 महत्वपूर्ण।

52वाँ संविधान संशोधन, 1985 — दसवीं अनुसूची और दल-बदल विरोधी प्रावधान।

दिनेश गोस्वामी समिति, 1990 — निर्वाचन सुधार।

इंद्रजीत गुप्ता समिति, 1998 — चुनावों के राज्य वित्तपोषण से संबंधित महत्वपूर्ण समिति।

लोकसभा चुनाव की अधिसूचना — जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 14 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा, निर्वाचन आयोग की अनुशंसा के अनुसार।

विधानसभा चुनाव की अधिसूचना — धारा 15 के अंतर्गत राज्यपाल द्वारा, निर्वाचन आयोग की अनुशंसा के अनुसार।

अनुच्छेद 326 — वयस्क मताधिकार।

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