प्रायद्वीपीय पठार
मध्यवर्ती उच्च भूमियाँ, दक्कन का पठार, पश्चिमी घाट एवं पूर्वी घाट
प्रायद्वीपीय पठार
प्रायद्वीपीय पठार भारत के सबसे प्राचीन और स्थिर भू-भागों में से एक है। यह प्राचीन गोंडवाना भू-भाग का हिस्सा रहा है और मुख्यतः आग्नेय तथा कायांतरित चट्टानों से निर्मित है।
इसका सामान्य आकार त्रिभुजाकार है। इसका व्यापक विस्तार उत्तर-पश्चिम में राजस्थान तथा गुजरात के क्षेत्र से दक्षिण में कुमारी अंतरीप तक और पूर्व की ओर पश्चिम बंगाल तथा छोटानागपुर क्षेत्र तक पाया जाता है।
पुरानी भूगोल पुस्तकों में इसका उत्तर-दक्षिण विस्तार लगभग 1,700 किमी, पूर्व-पश्चिम विस्तार लगभग 1,400 किमी और क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किमी बताया जाता है। इन संख्याओं को सामान्य भौगोलिक विस्तार के रूप में समझना अधिक उचित है।
प्रायद्वीपीय पठार का विभाजन
नर्मदा घाटी के उत्तर और दक्षिण का भाग
नर्मदा नदी एक प्रमुख भ्रंश अथवा रिफ्ट घाटी में बहती है। इस घाटी के आधार पर प्रायद्वीपीय पठार को मोटे तौर पर दो बड़े भागों में समझा जाता है।
नर्मदा के उत्तर स्थित पठारी क्षेत्र को सामान्यतः मध्यवर्ती उच्च भूमियाँ कहा जाता है।
नर्मदा के दक्षिण में विस्तृत विशाल त्रिभुजाकार पठारी क्षेत्र दक्कन का पठार कहलाता है।
🧠 मुख्य विभाजन
मध्यवर्ती उच्च भूमियों के प्रमुख भाग
उत्तर एवं उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश
| क्रम | प्रमुख भू-भाग |
|---|---|
| 1 | अरावली श्रेणी |
| 2 | पूर्वी राजस्थान की उच्च भूमि |
| 3 | मालवा का पठार |
| 4 | बुंदेलखंड उच्च भूमि |
| 5 | विंध्याचल एवं बघेलखंड |
| 6 | छोटानागपुर का पठार |
| 7 | मेघालय का पठार |
अरावली पर्वत श्रेणी
भारत की अत्यंत प्राचीन पर्वत प्रणाली
अरावली पर्वत श्रेणी भारत की अत्यंत प्राचीन पर्वत प्रणालियों में से एक है। इसका विस्तार गुजरात के उत्तर-पूर्वी भाग से राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक पाया जाता है।
इसकी लंबाई लगभग 700 से 800 किमी के आसपास मानी जाती है। पुरानी पुस्तकों में इसका विस्तार गुजरात के पालनपुर क्षेत्र से दिल्ली तक लगभग 800 किमी दिया जाता है।
अरावली की सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर है, जिसकी ऊँचाई लगभग 1,722 मीटर है। यह राजस्थान के माउंट आबू क्षेत्र में स्थित है।
अरावली का उत्तरी विस्तार दिल्ली तक पहुँचकर दिल्ली रिज के रूप में दिखाई देता है।
उदयपुर के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, टॉडगढ़ तथा अलवर के आसपास अरावली की विभिन्न स्थानीय पहाड़ी इकाइयाँ पाई जाती हैं। पुरानी क्षेत्रीय भूगोल पुस्तकों में इनके लिए जर्गा, मारवाड़ तथा हर्षनाथ जैसी पहाड़ियों का उल्लेख मिलता है।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण
अरावली की सर्वोच्च चोटी — गुरु शिखर — 1,722 मीटर — माउंट आबू
पूर्वी राजस्थान की उच्च भूमि
अरावली के पूर्व का पठारी प्रदेश
अरावली पर्वतमाला के पूर्व में राजस्थान का एक विस्तृत उच्च भू-भाग पाया जाता है। यह क्षेत्र आगे मालवा पठार और चंबल नदी तंत्र से जुड़ता है।
यहाँ की नदियाँ स्थलरूप को काटते हुए अनेक घाटियाँ तथा अपरदित भू-आकृतियाँ बनाती हैं।
मालवा का पठार
मध्य भारत का महत्वपूर्ण लावा पठार
मालवा का पठार मुख्यतः मध्य प्रदेश और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के भागों में विस्तृत है।
इसके पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में अरावली का प्रभाव दिखाई देता है, दक्षिण में विंध्य क्षेत्र स्थित है और पूर्व में इसका संबंध बुंदेलखंड तथा मध्य भारत की उच्च भूमियों से जुड़ता है।
मालवा पठार का बड़ा भाग प्राचीन लावा प्रवाह से निर्मित है और यहाँ काली मिट्टी भी व्यापक रूप से पाई जाती है।
इसके उत्तरी भाग को चंबल नदी और उसकी सहायक नदियों ने गहराई से काटा है। चंबल क्षेत्र अपने अवनालिका अथवा बीहड़ अपरदन के लिए प्रसिद्ध है।
बुंदेलखंड एवं बघेलखंड
मध्य भारत की प्राचीन उच्च भूमियाँ
बुंदेलखंड मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती प्राचीन कठोर शैल क्षेत्र में विस्तृत है।
यहाँ ग्रेनाइट तथा नीस जैसी अत्यंत प्राचीन चट्टानों की प्रधानता है।
बघेलखंड बुंदेलखंड के पूर्व तथा उत्तर-पूर्व की दिशा में मध्य प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में विस्तृत उच्च भूमि है।
बुंदेलखंड और बघेलखंड को केवल “मालवा पठार का उत्तरी तथा उत्तर-पूर्वी भाग” मानना अत्यधिक सरल है। ये मध्यवर्ती उच्च भूमि के अलग-अलग भू-आकृतिक प्रदेश हैं।
विंध्य पर्वत एवं नर्मदा भ्रंश घाटी
मध्य भारत की प्रमुख संरचना
विंध्य पर्वत श्रेणी मध्य भारत में पश्चिम से पूर्व दिशा में एक लंबा पर्वतीय एवं उच्चभूमि तंत्र बनाती है।
पुरानी पुस्तकों में इसकी लंबाई लगभग 1,050 किमी दी जाती है। वास्तव में विंध्य एक अकेली सतत पर्वत श्रेणी न होकर कई पठारी कगारों और पहाड़ी भागों से मिलकर बना विस्तृत तंत्र है।
विंध्य क्षेत्र के दक्षिण में नर्मदा नदी की लंबी संकीर्ण भ्रंश घाटी स्थित है।
नर्मदा घाटी का विकास भ्रंशन तथा भू-पर्पटी के धँसाव से संबंधित है। इसी कारण नर्मदा प्रायद्वीपीय भारत की अन्य अनेक नदियों से अलग एक प्रमुख रिफ्ट घाटी में बहती है।
नर्मदा नदी जबलपुर के निकट भेड़ाघाट क्षेत्र में संगमरमर की चट्टानों को काटती हुई बहती है और आगे प्रसिद्ध धुआँधार जलप्रपात बनाती है।
छोटानागपुर का पठार
भारत का प्रमुख खनिज प्रदेश
छोटानागपुर का पठार मुख्यतः झारखंड में स्थित है और इसके विस्तार का प्रभाव पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा आसपास के पठारी क्षेत्रों तक दिखाई देता है।
ऐतिहासिक भूगोल की कुछ पुस्तकों में बिहार का भी उल्लेख मिलता है, क्योंकि आधुनिक झारखंड पहले बिहार का हिस्सा था। वर्तमान प्रशासनिक दृष्टि से इसका मुख्य क्षेत्र झारखंड में है।
इस पठारी प्रदेश की प्रमुख नदियों में दामोदर, स्वर्णरेखा तथा दक्षिणी कोयल शामिल हैं। सोन और महानदी नदी तंत्रों से भी आसपास के पठारी क्षेत्रों का संबंध है।
यह प्राचीन ग्रेनाइट और नीस सहित कठोर चट्टानों से बना खनिज संपन्न प्रदेश है।
यहाँ कोयला, लौह अयस्क, अभ्रक, तांबा और यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं।
अपने विशाल कोयला-लौह संसाधनों और भारी उद्योगों के कारण छोटानागपुर क्षेत्र को सामान्य GK में “भारत का रूर” भी कहा जाता है।
दामोदर घाटी एक महत्वपूर्ण भ्रंश अथवा रिफ्ट घाटी से संबंधित संरचनात्मक क्षेत्र है। इसी घाटी में झरिया, बोकारो और रानीगंज जैसे महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्र विकसित हुए हैं।
🎯 याद रखें
छोटानागपुर पठार = भारत का खनिज हृदय प्रदेश
मेघालय का पठार
प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पूर्वी विस्तार
मेघालय का पठार प्राचीन प्रायद्वीपीय भू-भाग का उत्तर-पूर्वी विस्तार माना जाता है।
यह मुख्य प्रायद्वीपीय पठार से एक निम्न एवं अवसादी क्षेत्र द्वारा अलग दिखाई देता है, जिसे सामान्यतः मालदा गैप से जोड़ा जाता है।
मेघालय पठार की मुख्य पहाड़ियाँ पश्चिम से पूर्व गारो → खासी → जयंतिया हैं।
इसके पूर्व की ओर असम में कार्बी आंगलोंग का प्राचीन पठारी क्षेत्र स्थित है, जिसे पुरानी पुस्तकों में मिकिर पहाड़ियों के नाम से भी लिखा गया मिलता है।
शिलांग शिखर मेघालय के प्रमुख उच्च बिंदुओं में से एक है। इसकी ऊँचाई लगभग 1,965 मीटर मानी जाती है। पुरानी पुस्तकों में 1,961 मीटर भी मिलता है।
⚠️ नामों का सही समूह
गारो, खासी और जयंतिया मेघालय पठार की प्रमुख पहाड़ियाँ हैं। मिकिर/कार्बी आंगलोंग को इनके साथ सीधे मेघालय की पहाड़ी न मानें; यह मुख्यतः असम में स्थित अलग पठारी विस्तार है।
दक्कन का पठार
नर्मदा के दक्षिण का विशाल पठारी प्रदेश
दक्कन का पठार नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित विशाल त्रिभुजाकार पठारी क्षेत्र है।
इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट और पूर्व में पूर्वी घाट स्थित हैं। इसके उत्तरी भाग का संबंध सतपुड़ा, महादेव तथा मैकाल के उच्च क्षेत्रों से है।
पुरानी पुस्तकों में दक्कन पठार का क्षेत्रफल लगभग 7 लाख वर्ग किमी बताया जाता है।
इसकी सामान्य ऊँचाई लगभग 500 से 1,000 मीटर के बीच है, हालाँकि अलग-अलग क्षेत्रों में इसमें काफी अंतर मिलता है।
इस पठार में अत्यंत प्राचीन ग्रेनाइट, नीस, क्वार्टजाइट आदि चट्टानों के साथ दक्कन ट्रैप क्षेत्र में विशाल बेसाल्टिक लावा पाया जाता है। कुछ भागों में चूना पत्थर जैसी अवसादी चट्टानें भी मिलती हैं।
“दक्कन पठार की सभी चट्टानें जीवाश्म रहित हैं” कहना सही नहीं है। यहाँ विभिन्न भूवैज्ञानिक आयु और प्रकार की चट्टानें पाई जाती हैं।
दक्कन पठार के प्रमुख भाग
दक्षिणी प्रायद्वीपीय उच्च भूमि
| क्रम | प्रमुख भू-भाग |
|---|---|
| 1 | सतपुड़ा श्रेणी |
| 2 | महाराष्ट्र का पठार |
| 3 | महानदी बेसिन / छत्तीसगढ़ मैदान |
| 4 | ओडिशा उच्च भूमि |
| 5 | दंडकारण्य |
| 6 | तेलंगाना एवं रायलसीमा उच्च भूमि |
| 7 | कर्नाटक का पठार |
| 8 | तमिलनाडु का पठार |
| 9 | पश्चिमी घाट |
| 10 | पूर्वी घाट |
सतपुड़ा पर्वत श्रेणी
नर्मदा और ताप्ती घाटियों के बीच
सतपुड़ा पर्वत श्रेणी मुख्यतः नर्मदा नदी की घाटी के दक्षिण और ताप्ती नदी की घाटी के उत्तर में स्थित है।
इसके विस्तृत पर्वतीय तंत्र में पश्चिम की ओर राजपीपला पहाड़ियाँ, मध्य भाग में महादेव पहाड़ियाँ तथा पूर्व की ओर मैकाल क्षेत्र का उल्लेख किया जाता है।
सतपुड़ा श्रेणी की सर्वोच्च चोटी धूपगढ़ है, जिसकी ऊँचाई लगभग 1,350 मीटर है। यह मध्य प्रदेश में पचमढ़ी के निकट महादेव पहाड़ियों में स्थित है।
अमरकंटक मैकाल उच्च भूमि का महत्वपूर्ण पठारी क्षेत्र है। यह नर्मदा तथा सोन जैसी नदियों के उद्गम क्षेत्र के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अमरकंटक को बिना स्पष्टीकरण “मैकाल पर्वत की सर्वोच्च चोटी और सतपुड़ा की दूसरी सबसे ऊँची चोटी” कहना सुरक्षित नहीं है। इसका महत्व मुख्यतः उच्च पठारी जल-विभाजक एवं नदी उद्गम क्षेत्र के रूप में है।
महाराष्ट्र का पठार
दक्कन ट्रैप का प्रमुख भाग
महाराष्ट्र का अधिकांश आंतरिक भाग दक्कन पठार का हिस्सा है। पश्चिम में कोंकण तटीय मैदान और सह्याद्रि इसके प्रमुख भौगोलिक सीमांत हैं।
इस पठार का बड़ा भाग प्राचीन बेसाल्टिक लावा प्रवाह से निर्मित है, जिसे दक्कन ट्रैप कहा जाता है।
इस क्षेत्र में काली मिट्टी का व्यापक विकास हुआ है, जो विशेष रूप से कपास की खेती के लिए महत्वपूर्ण है।
क्षेत्रीय भूगोल में महाराष्ट्र पठार की सूक्ष्म इकाइयों के रूप में अजंता पहाड़ियाँ, गोदावरी घाटी, अहमदनगर-बालाघाट उच्च भूमि, भीमा बेसिन और महादेव उच्च भूमि का उल्लेख मिलता है।
महानदी बेसिन एवं छत्तीसगढ़ मैदान
मध्य-पूर्वी दक्कन का निम्न पठारी क्षेत्र
ऊपरी महानदी बेसिन का महत्वपूर्ण हिस्सा छत्तीसगढ़ के मैदान में स्थित है।
इसी कारण इसे सामान्य भूगोल में छत्तीसगढ़ का मैदान भी कहा जाता है।
इसके पश्चिम तथा उत्तर-पश्चिमी भागों पर मैकाल और आसपास की उच्च भूमि का प्रभाव है, जबकि दक्षिण की ओर बस्तर-दंडकारण्य का उच्च क्षेत्र स्थित है।
राजहरा की पहाड़ियाँ लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध हैं और इस क्षेत्र में प्राचीन धारवाड़ शैल समूह से संबंधित खनिजयुक्त चट्टानें मिलती हैं।
ओडिशा की उच्च भूमि
पूर्वी घाट एवं गढ़जात पहाड़ियाँ
ओडिशा के आंतरिक भाग में विस्तृत पहाड़ी और पठारी प्रदेश पाए जाते हैं। इनमें गढ़जात पहाड़ियाँ तथा पूर्वी घाट से संबंधित विभिन्न उच्च भू-भाग महत्वपूर्ण हैं।
इस क्षेत्र में मलयगिरि लगभग 1,187 मीटर तथा मेघासानी लगभग 1,165 मीटर के आसपास ऊँची प्रमुख पहाड़ियाँ हैं; अलग स्रोतों में इनके ऊँचाई आँकड़ों में थोड़ा अंतर मिल सकता है।
महेंद्रगिरि ओडिशा के गजपति जिले में पूर्वी घाट की प्रसिद्ध पर्वत चोटी है और इसकी ऊँचाई लगभग 1,501 मीटर है।
ओडिशा की वर्तमान मान्य सर्वोच्च चोटी देवमाली है, जिसकी ऊँचाई लगभग 1,672 मीटर है।
🎯 बहुत महत्वपूर्ण अंतर
ओडिशा की सर्वोच्च चोटी — देवमाली
महेंद्रगिरि — लगभग 1,501 मीटर — पूर्वी घाट की प्रसिद्ध चोटी
दंडकारण्य
मध्य एवं पूर्वी भारत का पठारी-वन क्षेत्र
दंडकारण्य मध्य भारत का विशाल पठारी एवं वनाच्छादित क्षेत्र है। इसका विस्तार मुख्यतः दक्षिणी छत्तीसगढ़, दक्षिण-पश्चिमी ओडिशा तथा आसपास के आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के भागों तक माना जाता है।
बस्तर का पठार दंडकारण्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दक्षिण-पूर्व की ओर मलकानगिरि पठार स्थित है।
इस क्षेत्र की नदी प्रणाली में इंद्रावती, साबरी, सिलेरू, उदंती तथा अन्य महानदी और गोदावरी तंत्र की नदियाँ महत्वपूर्ण हैं।
पुरानी सूचियों में तेल नदी को भी दंडकारण्य के साथ जोड़ दिया जाता है, लेकिन तेल नदी मुख्यतः महानदी की सहायक नदी है और इसका प्रमुख प्रवाह ओडिशा के अधिक उत्तरी भाग में है।
तेलंगाना एवं रायलसीमा की उच्च भूमि
दक्कन पठार का दक्षिण-मध्य भाग
दक्कन पठार के दक्षिण-मध्य भाग में तेलंगाना पठार महत्वपूर्ण भू-आकृतिक इकाई है। यह मुख्यतः तेलंगाना राज्य में विस्तृत है।
इसके दक्षिण और दक्षिण-पूर्व की ओर आंध्र प्रदेश में रायलसीमा उच्च भूमि स्थित है।
इसलिए तेलंगाना और रायलसीमा को एक ही “आंध्र पठार” की दो वर्तमान प्रशासनिक इकाइयाँ समझना उचित नहीं है। वर्तमान में दोनों अलग राज्यों के क्षेत्रों में आते हैं।
रायलसीमा का बड़ा भाग अपेक्षाकृत शुष्क, प्राचीन कठोर शैलों से निर्मित लहरदार पठारी भू-भाग है।
कर्नाटक का पठार
मैसूर पठार एवं बाबा बुदन पहाड़ियाँ
कर्नाटक पठार दक्कन पठार का महत्वपूर्ण दक्षिणी भाग है। इसे कई पुस्तकों में मैसूर पठार भी कहा जाता है।
यह मुख्यतः कर्नाटक में विस्तृत है और दक्षिण-पश्चिमी दिशा में केरल के निकट उच्च पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़ता है।
कर्नाटक की सर्वोच्च चोटी मुल्लयनगिरि है। यह चिकमगलूरु जिले में बाबा बुदन पहाड़ियों के क्षेत्र में स्थित है।
इसकी ऊँचाई लगभग 1,930 मीटर है। पुरानी पुस्तकों में 1,923 मीटर जैसा आँकड़ा भी मिलता है।
🎯 याद रखें
कर्नाटक की सर्वोच्च चोटी — मुल्लयनगिरि
तमिलनाडु का पठार
दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय उच्च भूमि
तमिलनाडु के आंतरिक भाग में प्रायद्वीपीय पठार का दक्षिण-पूर्वी विस्तार पाया जाता है। इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट और पूर्व में तटीय मैदान स्थित हैं।
तमिलनाडु के इस पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र में जवाड़ी, शेवरॉय, कलरायन और पचमलाई जैसी पहाड़ियाँ महत्वपूर्ण हैं।
इन क्षेत्रों में प्राचीन नीस, चार्नोकाइट और अन्य कायांतरित शैलें व्यापक रूप से पाई जाती हैं।
शेवरॉय पहाड़ियों में स्थित येरकौड प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थल है।
पश्चिमी घाट अथवा सह्याद्रि
प्रायद्वीपीय पठार का ऊँचा पश्चिमी किनारा
पश्चिमी घाट को महाराष्ट्र में प्रायः सह्याद्रि कहा जाता है।
इनका विस्तार तापी नदी के दक्षिण से लेकर प्रायद्वीप के दक्षिणी भाग तक लगभग 1,600 किमी की लंबाई में पाया जाता है।
पश्चिमी घाट प्रायद्वीपीय पठार के पश्चिमी किनारे पर एक ऊँचे कगार अथवा तीव्र ढाल का निर्माण करते हैं।
इन्हें सीधे साधारण “ब्लॉक पर्वत” कहना भू-आकृतिक दृष्टि से अत्यधिक सरलीकरण है। पश्चिमी घाट मुख्यतः दक्कन पठार का ऊँचा, भ्रंश एवं अपरदन से प्रभावित पश्चिमी कगार है।
पश्चिमी घाट पूर्वी घाट की अपेक्षा अधिक ऊँचे तथा अधिक सतत हैं। इन्हें केवल कुछ प्रमुख दर्रों द्वारा पार किया जा सकता है।
उत्तरी सह्याद्रि
कालसुबाई और महाबलेश्वर
महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट की सर्वोच्च चोटी कालसुबाई है, जिसकी ऊँचाई लगभग 1,646 मीटर है।
महाबलेश्वर लगभग 1,400 मीटर से अधिक ऊँचाई पर स्थित प्रसिद्ध पर्वतीय क्षेत्र है।
कृष्णा नदी का उद्गम महाबलेश्वर क्षेत्र के निकट होता है। इसी क्षेत्र से कोयना, वेण्णा, सावित्री और गायत्री जैसी नदियों के उद्गम से भी संबंधित परंपरागत स्थल मिलते हैं।
कुद्रेमुख
कर्नाटक के पश्चिमी घाट की प्रसिद्ध चोटी
कुद्रेमुख कर्नाटक के पश्चिमी घाट में स्थित प्रसिद्ध पर्वतीय क्षेत्र है और इसकी ऊँचाई लगभग 1,892 मीटर है।
पुरानी पुस्तकों में इसे कभी-कभी “दक्षिणी सह्याद्रि की सर्वोच्च चोटी” कहा जाता है, लेकिन यह कथन सही नहीं है।
दक्षिणी पश्चिमी घाट में कुद्रेमुख से कहीं अधिक ऊँची चोटियाँ हैं, जिनमें अनामुडी और नीलगिरि क्षेत्र की चोटियाँ प्रमुख हैं।
नीलगिरि पर्वत
पूर्वी एवं पश्चिमी घाट का संगम क्षेत्र
दक्षिण भारत में पश्चिमी और पूर्वी घाट नीलगिरि पर्वतीय क्षेत्र के निकट एक-दूसरे से मिलते हैं।
नीलगिरि की सर्वोच्च चोटी डोडाबेट्टा है, जिसकी ऊँचाई लगभग 2,637 मीटर है।
ऊटी अथवा उदगमंडलम नीलगिरि पहाड़ियों में स्थित भारत का प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन नगर है।
डोडाबेट्टा को पुरानी पुस्तकों में कभी-कभी “दक्षिण भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी” कहा जाता है। यह कथन आधुनिक विस्तृत ऊँचाई सूची के अनुसार सुरक्षित नहीं है; इसे नीलगिरि की सर्वोच्च चोटी के रूप में याद करना सबसे सही है।
पालघाट दर्रा
नीलगिरि और अनामलाई के बीच महत्वपूर्ण अंतराल
नीलगिरि पहाड़ियों के दक्षिण में पश्चिमी घाट में एक चौड़ा प्राकृतिक अंतराल पाया जाता है, जिसे पालघाट अथवा पालक्काड दर्रा कहते हैं।
यह नीलगिरि पर्वतीय क्षेत्र को दक्षिण में स्थित अनामलाई पहाड़ियों से अलग करता है।
यह केरल और तमिलनाडु के बीच यातायात का अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक मार्ग है।
अनामलाई एवं अनामुडी
दक्षिण भारत का सर्वोच्च पर्वतीय क्षेत्र
पालघाट दर्रे के दक्षिण में अनामलाई पहाड़ियाँ स्थित हैं।
इसी व्यापक दक्षिणी पश्चिमी घाट क्षेत्र में अनामुडी स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 2,695 मीटर है।
अनामुडी पश्चिमी घाट तथा प्रायद्वीपीय दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी है।
यह केरल में स्थित है और एराविकुलम राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के निकट है।
🎯 बहुत महत्वपूर्ण
दक्षिण भारत / पश्चिमी घाट की सर्वोच्च चोटी — अनामुडी — 2,695 मीटर
पलनी और इलायची पहाड़ियाँ
दक्षिणी पश्चिमी घाट की शाखाएँ
अनामलाई क्षेत्र से पूर्व और उत्तर-पूर्व की दिशा में पलनी पहाड़ियों का विस्तार मिलता है।
कोडाइकनाल पलनी पहाड़ियों में स्थित प्रसिद्ध पर्वतीय नगर है।
दक्षिण की ओर कार्डमम अथवा इलायची पहाड़ियाँ विस्तृत हैं, जो केरल और तमिलनाडु के दक्षिणी पश्चिमी घाट का हिस्सा हैं।
इलायची पहाड़ियों से और दक्षिण की ओर पश्चिमी घाट अगस्त्यमलाई तथा कन्याकुमारी-नागरकोइल के पर्वतीय क्षेत्र की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
पूर्वी घाट
खंडित एवं असतत पर्वतीय श्रेणी
पूर्वी घाट प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी किनारे पर स्थित असतत और अत्यधिक अपरदित पर्वतीय श्रेणी है।
इसका विस्तार सामान्यतः महानदी घाटी से नीलगिरि क्षेत्र तक लगभग 1,300 किमी माना जाता है।
पश्चिमी घाट के विपरीत पूर्वी घाट एक सतत पर्वत दीवार नहीं बनाते।
महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदियों ने पूर्वी घाट को काटते हुए बंगाल की खाड़ी की ओर अपना मार्ग बनाया है। इसी कारण पूर्वी घाट अनेक स्थानों पर खंडित है।
पूर्वी घाट की प्रमुख पहाड़ियाँ
उत्तर से दक्षिण का व्यापक क्रम
पूर्वी घाट का पर्वतीय तंत्र ओडिशा से आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक अनेक स्थानीय पहाड़ी समूहों में विभाजित है।
उत्तर से दक्षिण की ओर इसके प्रमुख क्षेत्रों को मोटे रूप में ओडिशा की पूर्वी घाट उच्च भूमि एवं महेंद्रगिरि क्षेत्र → आंध्र प्रदेश की पालकोंडा एवं संबंधित पहाड़ियाँ → नल्लमाला पहाड़ियाँ → तमिलनाडु की जवाड़ी, शेवरॉय, कलरायन एवं अन्य पहाड़ियाँ → नीलगिरि क्षेत्र के रूप में समझा जा सकता है।
पुरानी सूची में “शेवरॉय → जवाड़ी → नल्लमाला → पालकोंडा → नीलगिरि” को उत्तर से दक्षिण का क्रम देना गलत है, क्योंकि शेवरॉय और जवाड़ी दक्षिण में तमिलनाडु में स्थित हैं।
पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी
पुरानी पुस्तक और आधुनिक आँकड़े का अंतर
पुरानी NCERT तथा अनेक प्रतियोगी परीक्षा पुस्तकों में महेंद्रगिरि — लगभग 1,501 मीटर को पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी बताया गया है।
महेंद्रगिरि वास्तव में ओडिशा के पूर्वी घाट की अत्यंत महत्वपूर्ण और ऊँची चोटी है।
लेकिन आधुनिक स्थलाकृतिक आँकड़ों में आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट में स्थित जिंदगड़ा पर्वत, जिसे अरमा कोंडा भी कहा जाता है, की ऊँचाई लगभग 1,690 मीटर मानी जाती है, जो महेंद्रगिरि से अधिक है।
इसलिए आधुनिक भौगोलिक तथ्य के अनुसार जिंदगड़ा/अरमा कोंडा पूर्वी घाट का सर्वोच्च बिंदु माना जाता है।
⚠️ परीक्षा-सावधानी
पुरानी NCERT/GK — महेंद्रगिरि
आधुनिक ऊँचाई आँकड़ा — जिंदगड़ा/अरमा कोंडा
यदि प्रश्न विशेष रूप से पुरानी पाठ्यपुस्तक पर आधारित हो तो दिए गए विकल्पों को ध्यान से देखें।
पश्चिमी और पूर्वी घाट में अंतर
अत्यंत महत्वपूर्ण तुलना
| आधार | पश्चिमी घाट | पूर्वी घाट |
|---|---|---|
| स्थिति | प्रायद्वीप का पश्चिमी किनारा | प्रायद्वीप का पूर्वी किनारा |
| निरंतरता | अधिक सतत | खंडित एवं असतत |
| औसत ऊँचाई | तुलनात्मक रूप से अधिक | तुलनात्मक रूप से कम |
| नदियों का प्रभाव | अधिकांश नदियों का उद्गम/जल-विभाजक | बड़ी नदियाँ काटकर समुद्र तक पहुँचती हैं |
| सर्वोच्च प्रमुख शिखर | अनामुडी — 2,695 मीटर | आधुनिक आँकड़ों में जिंदगड़ा/अरमा कोंडा — लगभग 1,690 मीटर |
पश्चिमी घाट के प्रमुख दर्रे
उत्तर से दक्षिण
| क्रम | दर्रा | महत्व |
|---|---|---|
| 1 | थाल घाट | महाराष्ट्र में मुंबई क्षेत्र को नासिक तथा आगे मध्य भारत की दिशा से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण मार्ग |
| 2 | भोर घाट | मुंबई और पुणे के बीच महत्वपूर्ण सड़क एवं रेल संपर्क |
| 3 | पालघाट | केरल और तमिलनाडु के बीच; कोयंबटूर-पालक्काड क्षेत्र का महत्वपूर्ण प्राकृतिक मार्ग |
| 4 | शेनकोट्टा / सेंगोट्टई | दक्षिणी पश्चिमी घाट में तमिलनाडु और केरल के बीच महत्वपूर्ण मार्ग |
थाल घाट
महाराष्ट्र का महत्वपूर्ण दर्रा
थाल घाट महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में स्थित महत्वपूर्ण दर्रा है। इसे कसारा घाट भी कहा जाता है।
यह मुंबई क्षेत्र को नासिक तथा आगे उत्तर-पूर्वी और मध्य भारत की दिशा से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण रेल और सड़क मार्ग का हिस्सा है।
पुरानी पुस्तकों में इसे मुंबई–नागपुर–कोलकाता मार्ग से संबंधित बताया जाता है। व्यावहारिक रूप से इसका सबसे प्रमुख भौगोलिक महत्व मुंबई–नासिक संपर्क में है।
भोर घाट
मुंबई और पुणे के बीच प्राकृतिक मार्ग
भोर घाट महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में स्थित अत्यंत महत्वपूर्ण दर्रा है।
यह मुंबई और पुणे के बीच सड़क तथा रेल संपर्क का ऐतिहासिक मार्ग है।
पुरानी पुस्तकों में मुंबई–पुणे–बेलगावी तथा आगे दक्षिण भारत की ओर जाने वाले रेल और सड़क मार्गों को भोर घाट से संबंधित बताया जाता है।
पालघाट दर्रा
केरल और तमिलनाडु का प्राकृतिक द्वार
पालघाट दर्रा नीलगिरि और अनामलाई पर्वतीय क्षेत्र के बीच स्थित पश्चिमी घाट का एक विस्तृत प्राकृतिक अंतराल है।
यह केरल के पालक्काड क्षेत्र को तमिलनाडु के कोयंबटूर क्षेत्र से जोड़ता है।
इसके माध्यम से केरल और तमिलनाडु के बीच महत्वपूर्ण रेल तथा सड़क मार्ग गुजरते हैं।
पुरानी पुस्तकों में कालीकट, त्रिशूर, कोयंबटूर और कोच्चि से जुड़े मार्गों के संदर्भ में भी पालघाट का उल्लेख मिलता है।
शेनकोट्टा दर्रा
दक्षिणी पश्चिमी घाट का महत्वपूर्ण मार्ग
शेनकोट्टा अथवा सेंगोट्टई दर्रा दक्षिणी पश्चिमी घाट में स्थित महत्वपूर्ण पर्वतीय मार्ग है।
यह तमिलनाडु के तिरुनेलवेली-मदुरै क्षेत्र और केरल के दक्षिणी भाग के बीच संपर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पुरानी प्रतियोगी पुस्तकों में इसे तिरुवनंतपुरम और मदुरै को जोड़ने वाले मार्ग से संबंधित बताया जाता है।
पश्चिमी घाट के दर्रों का क्रम
उत्तर से दक्षिण याद करें
🧠 आसान क्रम
महत्वपूर्ण चोटियाँ — एक नज़र में
परीक्षा के लिए आवश्यक ऊँचाइयाँ
| चोटी | ऊँचाई | क्षेत्र |
|---|---|---|
| अनामुडी | 2,695 मीटर | पश्चिमी घाट / केरल |
| डोडाबेट्टा | 2,637 मीटर | नीलगिरि |
| मुल्लयनगिरि | लगभग 1,930 मीटर | कर्नाटक |
| गुरु शिखर | 1,722 मीटर | अरावली |
| जिंदगड़ा / अरमा कोंडा | लगभग 1,690 मीटर | पूर्वी घाट / आंध्र प्रदेश |
| कालसुबाई | 1,646 मीटर | महाराष्ट्र |
| महेंद्रगिरि | 1,501 मीटर | पूर्वी घाट / ओडिशा |
| धूपगढ़ | लगभग 1,350 मीटर | सतपुड़ा |
परीक्षा में होने वाले प्रमुख भ्रम
एक बार में सही याद करें
अरावली केवल पालनपुर से दिल्ली तक ठीक 800 किमी लंबी है — अधिक सुरक्षित तथ्य यह है कि अरावली गुजरात-राजस्थान-हरियाणा से दिल्ली तक लगभग 700–800 किमी के क्षेत्र में विस्तृत प्राचीन पर्वत प्रणाली है।
बुंदेलखंड मालवा का उत्तरी भाग और बघेलखंड मालवा का उत्तर-पूर्वी भाग है — इसे ऐसे सीधे नहीं पढ़ें। ये मध्यवर्ती उच्च भूमि के अलग भू-आकृतिक प्रदेश हैं।
छोटानागपुर आज मुख्यतः बिहार में है — नहीं। इसका मुख्य भाग वर्तमान झारखंड में है। पुरानी पुस्तकों में बिहार इसलिए मिलता है क्योंकि झारखंड 2000 से पहले बिहार का हिस्सा था।
गारो, खासी, जयंतिया, मिकिर और रेंगमा सभी मेघालय पठार की पहाड़ियाँ हैं — सही नहीं। गारो-खासी-जयंतिया मेघालय की मुख्य पहाड़ियाँ हैं; कार्बी आंगलोंग/मिकिर मुख्यतः असम में है।
दक्कन पठार की सभी चट्टानें जीवाश्म रहित हैं — सही नहीं। यहाँ आग्नेय, कायांतरित तथा कुछ अवसादी शैलें भी मिलती हैं।
अमरकंटक सतपुड़ा की निश्चित दूसरी सर्वोच्च चोटी है — इसे इस प्रकार याद करना सुरक्षित नहीं। अमरकंटक का मुख्य महत्व नर्मदा-सोन उद्गम और मैकाल उच्च भूमि के रूप में है।
मुल्लयनगिरि 1,923 मीटर — आधुनिक स्रोतों में लगभग 1,930 मीटर अधिक प्रचलित है।
पश्चिमी घाट साधारण ब्लॉक पर्वत हैं — यह अत्यधिक सरलीकरण है। इन्हें प्रायद्वीपीय पठार का ऊँचा पश्चिमी कगार समझना अधिक सही है।
कुद्रेमुख दक्षिणी सह्याद्रि की सर्वोच्च चोटी है — गलत। अनामुडी और कई अन्य दक्षिणी पश्चिमी घाट चोटियाँ इससे अधिक ऊँची हैं।
डोडाबेट्टा दक्षिण भारत की दूसरी सर्वोच्च चोटी है — इसे निश्चित तथ्य न मानें। डोडाबेट्टा नीलगिरि की सर्वोच्च चोटी है।
महेंद्रगिरि पूर्वी घाट की निर्विवाद सर्वोच्च चोटी है — पुरानी NCERT/GK में ऐसा मिलता है, लेकिन आधुनिक ऊँचाई आँकड़ों में जिंदगड़ा/अरमा कोंडा अधिक ऊँचा है।
शेवरॉय → जवाड़ी → नल्लमाला → पालकोंडा को उत्तर से दक्षिण का क्रम मानना गलत है। शेवरॉय और जवाड़ी दक्षिण में तमिलनाडु में स्थित हैं।
अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| प्रायद्वीपीय पठार किस प्राचीन भू-भाग का हिस्सा है? | गोंडवाना भू-भाग |
| प्रायद्वीपीय पठार की सामान्य आकृति | त्रिभुजाकार |
| प्रायद्वीपीय पठार के दो बड़े विभाग | मध्यवर्ती उच्च भूमि एवं दक्कन पठार |
| अरावली की सर्वोच्च चोटी | गुरु शिखर — 1,722 मीटर |
| चंबल क्षेत्र की प्रमुख भू-आकृति | बीहड़ / अवनालिका अपरदन |
| नर्मदा किस प्रकार की घाटी में बहती है? | भ्रंश / रिफ्ट घाटी |
| नर्मदा का प्रसिद्ध प्रपात | धुआँधार — जबलपुर के निकट |
| खनिजों के लिए प्रसिद्ध पठार | छोटानागपुर पठार |
| मेघालय की प्रमुख पहाड़ियाँ | गारो, खासी, जयंतिया |
| सतपुड़ा की सर्वोच्च चोटी | धूपगढ़ |
| कर्नाटक की सर्वोच्च चोटी | मुल्लयनगिरि |
| महाराष्ट्र की सर्वोच्च चोटी | कालसुबाई |
| नीलगिरि की सर्वोच्च चोटी | डोडाबेट्टा |
| पश्चिमी घाट / दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी | अनामुडी |
| नीलगिरि और अनामलाई के बीच | पालघाट दर्रा |
| कोडाइकनाल कहाँ है? | पलनी पहाड़ियों में |
| ऊटी कहाँ है? | नीलगिरि पहाड़ियों में |
| पूर्वी घाट का स्वरूप | खंडित एवं असतत |
| पश्चिमी घाट का स्वरूप | अधिक ऊँचा एवं अधिक सतत |
⚡ अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
प्रायद्वीपीय पठार भारत का अत्यंत प्राचीन और स्थिर भू-भाग है तथा प्राचीन गोंडवाना भू-भाग से संबंधित है।
इसका सामान्य आकार त्रिभुजाकार है।
नर्मदा घाटी के आधार पर इसका व्यापक विभाजन — मध्यवर्ती उच्च भूमि + दक्कन का पठार।
मध्यवर्ती उच्च भूमि — अरावली, राजस्थान उच्च भूमि, मालवा, बुंदेलखंड, बघेलखंड-विंध्य, छोटानागपुर और मेघालय पठार।
अरावली — गुरु शिखर — 1,722 मीटर।
मालवा — चंबल नदी — बीहड़ एवं अवनालिका अपरदन।
नर्मदा — भ्रंश घाटी — धुआँधार जलप्रपात।
छोटानागपुर — कोयला, लौह अयस्क, अभ्रक, तांबा और यूरेनियम।
मेघालय पठार — गारो → खासी → जयंतिया।
दक्कन पठार — नर्मदा के दक्षिण का विशाल त्रिभुजाकार पठार।
सतपुड़ा — नर्मदा और ताप्ती के बीच — धूपगढ़ सर्वोच्च चोटी।
महाराष्ट्र पठार — दक्कन ट्रैप — बेसाल्ट — काली मिट्टी।
कर्नाटक — मुल्लयनगिरि।
पश्चिमी घाट — लगभग 1,600 किमी — पूर्वी घाट से अधिक ऊँचे और सतत।
कालसुबाई — महाराष्ट्र की सर्वोच्च चोटी।
डोडाबेट्टा — नीलगिरि की सर्वोच्च चोटी — 2,637 मीटर।
अनामुडी — 2,695 मीटर — पश्चिमी घाट एवं दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी।
नीलगिरि और अनामलाई के बीच — पालघाट दर्रा।
कोडाइकनाल — पलनी पहाड़ियाँ।
पूर्वी घाट — महानदी घाटी से नीलगिरि तक — खंडित एवं असतत।
पूर्वी घाट को महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियाँ काटती हैं।
पुरानी पुस्तकों में महेंद्रगिरि — 1,501 मीटर को पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी बताया गया है; आधुनिक ऊँचाई आँकड़ों में जिंदगड़ा/अरमा कोंडा — लगभग 1,690 मीटर अधिक ऊँचा है।
पश्चिमी घाट के प्रमुख दर्रे उत्तर से दक्षिण — थाल घाट → भोर घाट → पालघाट → शेनकोट्टा।