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पृथ्वी की गतियाँ
MOTIONS OF THE EARTH

पृथ्वी की गतियाँ

घूर्णन, परिक्रमण, ऋतुएँ, पृथ्वी-सूर्य दूरी, दिन की अवधि तथा ग्रहण

पृथ्वी की प्रमुख गतियाँ

पृथ्वी स्थिर नहीं है। वह अपनी धुरी पर लगातार घूमने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर भी परिक्रमा करती है। पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ घूर्णन और परिक्रमण हैं। इनके कारण दिन-रात, ऋतु परिवर्तन तथा दिन और रात की अवधि में परिवर्तन जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ होती हैं। पृथ्वी की धुरी और कक्षा में बहुत लंबे समय में अयनचालन, न्युटेशन और कक्षीय उत्केन्द्रता से संबंधित परिवर्तन भी होते रहते हैं।

01

पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ

घूर्णन और परिक्रमण

पृथ्वी मुख्य रूप से दो प्रमुख गतियाँ करती है—घूर्णन और परिक्रमण

घूर्णन में पृथ्वी अपनी काल्पनिक धुरी पर घूमती है, जबकि परिक्रमण में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अपनी निर्धारित कक्षा में घूमती है।

02

पृथ्वी का घूर्णन

अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व गति

पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है। इस कारण सूर्य, चंद्रमा और तारे हमें सामान्यतः पूर्व से पश्चिम की ओर जाते दिखाई देते हैं।

उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखने पर पृथ्वी का घूर्णन वामावर्त दिखाई देता है।

पृथ्वी की धुरी एक काल्पनिक रेखा है जो पृथ्वी के केंद्र से गुजरते हुए उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को जोड़ती है।

03

घूर्णन का समय

नाक्षत्र दिवस और सौर दिवस

दूर स्थित तारों के सापेक्ष पृथ्वी अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड में पूरा करती है। इसे नाक्षत्र दिवस कहा जाता है।

दैनिक जीवन में उपयोग होने वाला सामान्य सौर दिवस लगभग 24 घंटे का होता है।

दोनों में लगभग चार मिनट का अंतर इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर आगे भी बढ़ रही होती है।

⚠️ भ्रम से बचें

23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड — नाक्षत्र दिवस
लगभग 24 घंटे — औसत सौर दिवस

04

घूर्णन की गति

भूमध्यरेखा पर सर्वाधिक रेखीय गति

भूमध्यरेखा पर पृथ्वी की रेखीय घूर्णन गति लगभग 1670 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।

भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ने पर यह रेखीय गति कम होती जाती है और भौगोलिक ध्रुवों पर लगभग शून्य हो जाती है।

05

दिन और रात का निर्माण

घूर्णन का प्रमुख परिणाम

पृथ्वी के घूर्णन का सबसे प्रत्यक्ष परिणाम दिन और रात का बनना है।

पृथ्वी का सूर्य की ओर वाला भाग प्रकाश प्राप्त करता है, इसलिए वहाँ दिन होता है। इसके विपरीत भाग पर सूर्य का प्रकाश प्रत्यक्ष रूप से नहीं पड़ता, इसलिए वहाँ रात होती है।

पृथ्वी लगातार पश्चिम से पूर्व घूमती रहती है, इसलिए पृथ्वी के विभिन्न भाग बारी-बारी से सूर्य के सामने आते हैं।

पृथ्वी के प्रकाशित और अंधकारमय भाग को अलग करने वाली काल्पनिक सीमा को प्रदीप्ति वृत्त कहा जाता है।

06

कोरिओलिस प्रभाव

हवाओं और महासागरीय धाराओं का विचलन

पृथ्वी के घूर्णन के कारण उसकी सतह पर लंबी दूरी तक चलने वाली हवाएँ, महासागरीय धाराएँ तथा अन्य गतिमान पिंड अपनी सीधी दिशा से प्रत्यक्ष रूप से विचलित दिखाई देते हैं। इसे कोरिओलिस प्रभाव कहा जाता है।

उत्तरी गोलार्ध में गतिमान वस्तुएँ अपनी गति की दिशा के सापेक्ष दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विचलित होती हैं।

भूमध्यरेखा पर कोरिओलिस प्रभाव लगभग शून्य होता है तथा ध्रुवों की ओर इसका प्रभाव बढ़ता है।

🎯 याद रखें

उत्तरी गोलार्ध — दाईं ओर
दक्षिणी गोलार्ध — बाईं ओर

07

अपकेन्द्रीय प्रभाव और पृथ्वी का आकार

भूमध्यरेखीय उभार और ध्रुवीय चपटन

पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न अपकेन्द्रीय प्रभाव भूमध्यरेखा पर सर्वाधिक और ध्रुवों पर न्यूनतम होता है।

घूर्णन तथा गुरुत्वीय संतुलन के कारण पृथ्वी पूर्ण गोलाकार नहीं है। इसका आकार भूमध्यरेखा पर उभरा हुआ तथा ध्रुवों पर थोड़ा चपटा है।

इस आकृति को सरल रूप में चपटा गोलाभ कहा जाता है। पृथ्वी का भूमध्यरेखीय व्यास ध्रुवीय व्यास से थोड़ा अधिक है।

08

पृथ्वी का परिक्रमण

सूर्य के चारों ओर गति

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा करती है।

सूर्य पृथ्वी की दीर्घवृत्ताकार कक्षा के बिल्कुल केंद्र में नहीं, बल्कि उसके एक फोकस के निकट स्थित होता है।

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा भी पश्चिम से पूर्व दिशा में करती है। उत्तरी ध्रुव की ओर से देखने पर इसकी गति वामावर्त दिखाई देती है।

09

परिक्रमण का समय और गति

एक वर्ष की अवधि

ऋतु चक्र के संदर्भ में पृथ्वी के एक वर्ष की अवधि लगभग 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 45 सेकंड मानी जाती है। यह उष्णकटिबंधीय वर्ष के लगभग बराबर है।

दूर स्थित तारों के सापेक्ष पृथ्वी की एक परिक्रमा की अवधि लगभग 365 दिन 6 घंटे 9 मिनट होती है, जिसे नाक्षत्र वर्ष कहा जाता है।

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा औसतन लगभग 29.8 किलोमीटर प्रति सेकंड अर्थात लगभग 1,07,000 से 1,08,000 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से करती है।

कक्षा दीर्घवृत्ताकार होने के कारण पृथ्वी की परिक्रमण गति पूरे वर्ष एक समान नहीं रहती। सूर्य के निकट इसकी गति कुछ अधिक तथा सूर्य से दूर कुछ कम होती है।

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पृथ्वी की धुरी का झुकाव

ऋतुओं के निर्माण का आधार

पृथ्वी की घूर्णन धुरी उसकी कक्षीय सतह पर खींची गई लंबवत रेखा से लगभग 23.5° झुकी हुई है। दूसरे शब्दों में पृथ्वी की धुरी कक्षीय तल से लगभग 66.5° का कोण बनाती है।

पृथ्वी की धुरी का यह झुकाव और सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का परिक्रमण मिलकर ऋतुओं के परिवर्तन का मुख्य कारण बनते हैं।

यदि पृथ्वी की धुरी झुकी हुई न होती, तो पृथ्वी पर वर्तमान प्रकार का स्पष्ट ऋतु परिवर्तन नहीं होता।

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परिक्रमण के प्रमुख परिणाम

ऋतु और दिन-रात की अवधि

पृथ्वी के परिक्रमण तथा अक्षीय झुकाव के संयुक्त प्रभाव से ऋतुओं का परिवर्तन होता है।

वर्ष के दौरान विभिन्न अक्षांशों पर सूर्य की किरणों के कोण में परिवर्तन के कारण दिन और रात की अवधि बदलती रहती है।

पृथ्वी की वार्षिक गति के दौरान विषुव और अयनांत की खगोलीय स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

ऋतुओं का मुख्य कारण पृथ्वी की सूर्य से बदलती दूरी नहीं, बल्कि पृथ्वी का अक्षीय झुकाव और परिक्रमण है।

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विषुव और अयनांत

वर्ष की चार महत्वपूर्ण खगोलीय स्थितियाँ

स्थिति पारंपरिक परीक्षा तिथि वैज्ञानिक रूप से सामान्य अवधि उत्तरी गोलार्ध की स्थिति
वसंत विषुव 21 मार्च लगभग 20–21 मार्च वसंत ऋतु का आरंभ
ग्रीष्म अयनांत 21 जून लगभग 20–21 जून वर्ष का सबसे लंबा दिन
शरद विषुव 23 सितंबर लगभग 22–23 सितंबर शरद ऋतु का आरंभ
शीत अयनांत 22 दिसंबर लगभग 21–22 दिसंबर वर्ष का सबसे छोटा दिन

🎯 पारंपरिक परीक्षा तिथियाँ

21 मार्च → 21 जून → 23 सितंबर → 22 दिसंबर

⚠️ तिथियों की सावधानी

विषुव और अयनांत वास्तविक खगोलीय घटनाएँ हैं। इनका समय हर वर्ष थोड़ा बदलता है, इसलिए वास्तविक तिथि एक दिन के आसपास आगे-पीछे हो सकती है।

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विषुव

भूमध्यरेखा पर सूर्य की सीधी किरणें

विषुव के समय सूर्य की सीधी किरणें भूमध्यरेखा के आसपास पड़ती हैं। यह स्थिति वर्ष में दो बार मार्च और सितंबर में आती है।

मार्च विषुव को उत्तरी गोलार्ध में वसंत विषुव तथा सितंबर विषुव को शरद विषुव कहा जाता है।

विषुव के समय दिन और रात की अवधि लगभग समान मानी जाती है। हालांकि वास्तविक सूर्योदय-सूर्यास्त की गणना में वायुमंडलीय अपवर्तन और सूर्य के दृश्य आकार के कारण ठीक 12-12 घंटे का दिन और रात होना आवश्यक नहीं है।

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ग्रीष्म और शीत अयनांत

सबसे लंबा और सबसे छोटा दिन

लगभग 21 जून को उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर अधिक झुका होता है और सूर्य की सीधी किरणें कर्क रेखा के आसपास पड़ती हैं। इसे ग्रीष्म अयनांत कहा जाता है। इस समय उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात होती है।

लगभग 21–22 दिसंबर को सूर्य की सीधी किरणें मकर रेखा के आसपास पड़ती हैं। इसे शीत अयनांत कहा जाता है। इस समय उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होती है।

दक्षिणी गोलार्ध में ऋतुओं और दिन-रात की स्थिति उत्तरी गोलार्ध के विपरीत होती है।

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अयनचालन

पृथ्वी की धुरी की दिशा में धीमा परिवर्तन

अयनचालन पृथ्वी की घूर्णन धुरी की दिशा में होने वाला बहुत धीमा चक्रीय परिवर्तन है। इसे घूमते हुए लट्टू की धुरी के धीमे डगमगाने से समझा जा सकता है।

पृथ्वी की धुरी अयनचालन का एक पूरा चक्र लगभग 25,700 से 26,000 वर्षों में पूरा करती है।

इसका प्रमुख कारण सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का पृथ्वी के भूमध्यरेखीय उभार पर प्रभाव है।

अयनचालन के कारण आकाशीय उत्तरी ध्रुव की दिशा धीरे-धीरे बदलती है। इस कारण हजारों वर्षों में ध्रुव तारा भी बदल सकता है। वर्तमान समय में ध्रुव तारा ध्रुव के बहुत निकट है, लेकिन यह स्थिति सदैव नहीं रहेगी।

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न्युटेशन

पृथ्वी की धुरी का छोटा दोलन

न्युटेशन पृथ्वी की धुरी की दिशा में होने वाला छोटा आवर्ती दोलन है, जो बड़े अयनचालन चक्र के साथ जुड़ा रहता है।

यह मुख्यतः चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण तथा चंद्रमा की कक्षा की स्थिति के कारण उत्पन्न होता है।

न्युटेशन के प्रमुख घटकों में लगभग 18.6 वर्ष का चक्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

⚠️ दोनों एक नहीं हैं

अयनचालन — लगभग 26,000 वर्षों का बड़ा चक्र
न्युटेशन — धुरी का छोटा आवर्ती दोलन

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कक्षीय उत्केन्द्रता में परिवर्तन

पृथ्वी की कक्षा के आकार में दीर्घकालिक बदलाव

पृथ्वी की कक्षा पूर्ण वृत्त नहीं है, बल्कि थोड़ी दीर्घवृत्ताकार है। कक्षा किसी पूर्ण वृत्त से कितनी अलग है, इसे उसकी उत्केन्द्रता कहा जाता है।

अन्य ग्रहों के गुरुत्वीय प्रभाव के कारण बहुत लंबे समय में पृथ्वी की कक्षा की उत्केन्द्रता बदलती रहती है। इसके कारण कक्षा कभी अपेक्षाकृत अधिक गोलाकार और कभी कुछ अधिक दीर्घवृत्ताकार होती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि पृथ्वी की कक्षा समय-समय पर पूर्ण गोलाकार बन जाती है। परिवर्तन बहुत छोटा और क्रमिक होता है।

कक्षीय उत्केन्द्रता में परिवर्तन के प्रमुख चक्रों में लगभग एक लाख वर्ष का चक्र जलवायु अध्ययन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

कक्षीय उत्केन्द्रता, अक्षीय झुकाव और अयनचालन से जुड़े दीर्घकालिक परिवर्तनों को सामूहिक रूप से मिलानकोविच चक्र कहा जाता है। ये पृथ्वी पर सौर ऊर्जा के दीर्घकालिक वितरण को प्रभावित कर सकते हैं।

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पृथ्वी और सूर्य के बीच दूरी

एक खगोलीय इकाई

पृथ्वी और सूर्य के बीच औसत दूरी लगभग 149.6 मिलियन किलोमीटर अर्थात लगभग 14.96 करोड़ किलोमीटर है।

पृथ्वी और सूर्य की इस औसत दूरी को एक खगोलीय इकाई कहा जाता है।

पृथ्वी की कक्षा थोड़ी दीर्घवृत्ताकार होने के कारण पृथ्वी और सूर्य के बीच वास्तविक दूरी पूरे वर्ष समान नहीं रहती।

🎯 महत्वपूर्ण तथ्य

एक खगोलीय इकाई ≈ 14.96 करोड़ किलोमीटर।

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उपसौर

सूर्य से न्यूनतम दूरी

जब पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य के सबसे निकट होती है, उस स्थिति को उपसौर कहा जाता है।

उपसौर सामान्यतः जनवरी के आरंभ में आता है और उस समय पृथ्वी-सूर्य की दूरी लगभग 147.1 मिलियन किलोमीटर अर्थात लगभग 14.71 करोड़ किलोमीटर होती है।

उपसौर के आसपास पृथ्वी की परिक्रमण गति औसत की तुलना में कुछ अधिक होती है।

📗 याद रखें

उपसौर — जनवरी का आरंभ — सूर्य के सबसे निकट।

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अपसौर

सूर्य से अधिकतम दूरी

जब पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य से सबसे दूर होती है, उस स्थिति को अपसौर कहा जाता है।

अपसौर सामान्यतः जुलाई के आरंभ में आता है और इस समय पृथ्वी-सूर्य की दूरी लगभग 152.1 मिलियन किलोमीटर अर्थात लगभग 15.21 करोड़ किलोमीटर होती है।

अपसौर के आसपास पृथ्वी की परिक्रमण गति उपसौर की तुलना में कुछ कम होती है।

🎯 उपसौर और अपसौर

उपसौर — जनवरी — लगभग 14.71 करोड़ किमी
अपसौर — जुलाई — लगभग 15.21 करोड़ किमी

⚠️ सबसे महत्वपूर्ण भ्रम

जनवरी में पृथ्वी सूर्य के अधिक निकट और जुलाई में अधिक दूर होती है। इसलिए ऋतुओं का कारण पृथ्वी-सूर्य दूरी नहीं है। ऋतुओं का मुख्य कारण पृथ्वी का अक्षीय झुकाव है।

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उत्तरी गोलार्ध में दिन की अवधि

मार्च विषुव से सितंबर विषुव तक

मार्च विषुव के बाद सूर्य का प्रत्यक्ष स्थान भूमध्यरेखा से उत्तर की ओर बढ़ने लगता है। इस कारण लगभग 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्ध के अधिकांश स्थानों पर दिन की अवधि सामान्यतः 12 घंटे से अधिक रहती है।

इस अवधि में उत्तरी गोलार्ध में दिन अपेक्षाकृत बड़े और रातें छोटी होती हैं। सबसे लंबा दिन जून अयनांत के आसपास होता है।

उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में मार्च विषुव के आसपास सूर्य क्षितिज के ऊपर आने लगता है और सितंबर विषुव तक लंबे समय तक दिखाई देता है। सरल परीक्षा भाषा में इसे उत्तरी ध्रुव पर लगभग छह महीने का दिन कहा जाता है।

वास्तविक ध्रुवीय सूर्योदय और सूर्यास्त की अवधि वायुमंडलीय अपवर्तन तथा सूर्य के दृश्य आकार के कारण ठीक छह कैलेंडर महीने नहीं होती।

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दक्षिणी गोलार्ध में दिन की अवधि

सितंबर विषुव से मार्च विषुव तक

सितंबर विषुव के बाद सूर्य का प्रत्यक्ष स्थान भूमध्यरेखा से दक्षिण की ओर बढ़ता है। इस कारण लगभग 23 सितंबर से 21 मार्च के बीच दक्षिणी गोलार्ध के अधिकांश स्थानों पर दिन की अवधि सामान्यतः 12 घंटे से अधिक रहती है।

इस अवधि में दक्षिणी गोलार्ध में दिन अपेक्षाकृत बड़े तथा रातें छोटी होती हैं।

दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सितंबर विषुव से मार्च विषुव के आसपास तक सूर्य लंबे समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है। सरल परीक्षा भाषा में इसे दक्षिणी ध्रुव पर लगभग छह महीने का दिन कहा जाता है।

इसी समय उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में लगभग छह महीने की लंबी अंधकार अवधि होती है।

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ग्रहण

सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा का विशेष संरेखण

ग्रहण एक खगोलीय घटना है जिसमें सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की विशेष स्थिति के कारण एक खगोलीय पिंड का प्रकाश दूसरे पिंड द्वारा आंशिक या पूर्ण रूप से अवरुद्ध हो जाता है।

पृथ्वी से दिखाई देने वाले प्रमुख ग्रहण दो प्रकार के होते हैं—सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण

चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर कक्षीय सतह से लगभग 5° झुकी हुई है। इसी कारण प्रत्येक अमावस्या पर सूर्य ग्रहण और प्रत्येक पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण नहीं होता।

ग्रहण होने के लिए सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा का उचित संरेखण चंद्रमा की कक्षा के उन बिंदुओं के निकट होना चाहिए जहाँ उसकी कक्षा पृथ्वी के कक्षीय तल को काटती है।

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सूर्य ग्रहण

चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच

सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है तथा सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी के किसी भाग तक पहुँचने से आंशिक या पूर्ण रूप से रोक देता है।

सूर्य ग्रहण केवल अमावस्या के आसपास संभव है, लेकिन प्रत्येक अमावस्या को सूर्य ग्रहण नहीं होता।

चंद्रमा की गहरी केंद्रीय छाया को प्रच्छाया तथा बाहरी हल्की छाया को उपछाया कहा जाता है। पूर्ण सूर्य ग्रहण केवल उस संकरे क्षेत्र में दिखाई देता है जहाँ चंद्रमा की प्रच्छाया पृथ्वी पर पड़ती है।

🎯 ग्रहण क्रम

सूर्य ग्रहण — सूर्य → चंद्रमा → पृथ्वी

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पूर्ण सूर्य ग्रहण

सूर्य का प्रकाशमंडल पूरी तरह ढका हुआ

पूर्ण सूर्य ग्रहण उस स्थिति में दिखाई देता है जब चंद्रमा पृथ्वी से देखने पर सूर्य के दृश्य प्रकाशमंडल को पूरी तरह ढक लेता है।

पूर्णता के समय सूर्य का चमकीला प्रकाशमंडल ढक जाता है और सूर्य का बाहरी वातावरण अर्थात कोरोना दिखाई दे सकता है।

पूर्ण सूर्य ग्रहण पृथ्वी के केवल एक सीमित और संकरे क्षेत्र से दिखाई देता है।

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आंशिक सूर्य ग्रहण

सूर्य का केवल कुछ भाग ढका हुआ

आंशिक सूर्य ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा सूर्य के केवल कुछ भाग को ढकता है।

यह स्थिति उन क्षेत्रों से दिखाई देती है जो चंद्रमा की उपछाया में स्थित होते हैं।

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वलयाकार सूर्य ग्रहण

सूर्य की चमकीली अंगूठी

वलयाकार सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य के सामने तो आता है, लेकिन पृथ्वी से उसकी दृश्य आकृति सूर्य की तुलना में थोड़ी छोटी दिखाई देती है।

ऐसी स्थिति में चंद्रमा सूर्य के मध्य भाग को ढक देता है, लेकिन सूर्य का बाहरी किनारा चमकता रहता है और आकाश में चमकीली अंगूठी जैसी आकृति दिखाई देती है।

यह स्थिति सामान्यतः तब संभव होती है जब चंद्रमा पृथ्वी से अपेक्षाकृत अधिक दूरी पर होने के कारण आकाश में थोड़ा छोटा दिखाई देता है।

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चंद्र ग्रहण

पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच

चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है।

चंद्र ग्रहण केवल पूर्णिमा के आसपास संभव है, लेकिन प्रत्येक पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण नहीं होता।

सूर्य ग्रहण की तुलना में चंद्र ग्रहण पृथ्वी के उस पूरे रात्रि वाले बड़े क्षेत्र से दिखाई दे सकता है जहाँ उस समय चंद्रमा क्षितिज के ऊपर होता है।

🎯 ग्रहण क्रम

चंद्र ग्रहण — सूर्य → पृथ्वी → चंद्रमा

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पूर्ण चंद्र ग्रहण

चंद्रमा पूरी तरह पृथ्वी की प्रच्छाया में

पूर्ण चंद्र ग्रहण तब होता है जब पूरा चंद्रमा पृथ्वी की गहरी केंद्रीय छाया अर्थात प्रच्छाया में प्रवेश कर जाता है।

पूर्ण चंद्र ग्रहण के दौरान चंद्रमा पूरी तरह गायब नहीं होता। पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरने वाला लाल रंग का प्रकाश चंद्रमा तक पहुँच सकता है, जिससे वह लाल या तांबे के रंग का दिखाई दे सकता है।

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आंशिक चंद्र ग्रहण

चंद्रमा का कुछ भाग प्रच्छाया में

आंशिक चंद्र ग्रहण उस समय होता है जब चंद्रमा का केवल एक भाग पृथ्वी की गहरी प्रच्छाया में प्रवेश करता है और शेष भाग उसके बाहर रहता है।

इस स्थिति में चंद्रमा के एक भाग पर स्पष्ट गहरी छाया दिखाई देती है।

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उपछाया चंद्र ग्रहण

पृथ्वी की हल्की बाहरी छाया

उपछाया चंद्र ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की गहरी प्रच्छाया में प्रवेश किए बिना केवल उसकी हल्की बाहरी उपछाया से गुजरता है।

इसमें चंद्रमा की चमक थोड़ी कम दिखाई देती है। कई बार यह परिवर्तन इतना हल्का होता है कि सामान्य आँख से पहचानना कठिन हो सकता है।

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सूर्य और चंद्र ग्रहण में अंतर

परीक्षा के लिए सीधी तुलना

आधार सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण
मध्य में कौन? चंद्रमा पृथ्वी
क्रम सूर्य → चंद्रमा → पृथ्वी सूर्य → पृथ्वी → चंद्रमा
चंद्र अवस्था अमावस्या पूर्णिमा
दिखाई देने वाला क्षेत्र पृथ्वी के अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र से पृथ्वी के रात्रि वाले बड़े क्षेत्र से
मुख्य प्रकार पूर्ण, आंशिक, वलयाकार पूर्ण, आंशिक, उपछाया
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एक नज़र में प्रमुख संख्याएँ

त्वरित तथ्य

तथ्य मान
नाक्षत्र घूर्णन काल लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड
सौर दिवस लगभग 24 घंटे
भूमध्यरेखीय घूर्णन गति लगभग 1670 किमी प्रति घंटा
उष्णकटिबंधीय वर्ष लगभग 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 45 सेकंड
औसत परिक्रमण गति लगभग 1.07–1.08 लाख किमी प्रति घंटा
पृथ्वी की धुरी का झुकाव लंबवत से लगभग 23.5°
औसत पृथ्वी-सूर्य दूरी लगभग 14.96 करोड़ किमी
उपसौर दूरी लगभग 14.71 करोड़ किमी
अपसौर दूरी लगभग 15.21 करोड़ किमी
अयनचालन लगभग 26,000 वर्ष
प्रमुख न्युटेशन चक्र लगभग 18.6 वर्ष
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भ्रम से बचने वाले तथ्य

परीक्षा में गलती रोकने वाले बिंदु

23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड ही सामान्य दिन है — नहीं। यह नाक्षत्र दिवस है; सामान्य सौर दिवस लगभग 24 घंटे का है।

ऋतुएँ पृथ्वी और सूर्य की दूरी बदलने के कारण होती हैं — गलत। ऋतुओं का मुख्य कारण पृथ्वी का अक्षीय झुकाव और परिक्रमण है।

21 मार्च, 21 जून, 23 सितंबर और 22 दिसंबर हर वर्ष बिल्कुल निश्चित तिथियाँ हैं — नहीं। ये पारंपरिक परीक्षा तिथियाँ हैं; वास्तविक खगोलीय तिथियाँ वर्ष के अनुसार थोड़ा बदल सकती हैं।

विषुव के दिन हर स्थान पर बिल्कुल 12 घंटे दिन और 12 घंटे रात होती है — वास्तविक सूर्योदय-सूर्यास्त में थोड़ा अंतर हो सकता है।

पृथ्वी की कक्षा समय-समय पर पूर्ण वृत्त बन जाती है — नहीं। इसकी उत्केन्द्रता बदलती है और कक्षा अधिक या कम दीर्घवृत्ताकार होती रहती है।

उत्तरी ध्रुव पर ठीक छह कैलेंडर महीने दिन और छह महीने रात होती है — सरल परीक्षा कथन है। वास्तविक ध्रुवीय दिन-रात की सीमा वायुमंडलीय अपवर्तन सहित कुछ अलग होती है।

हर अमावस्या पर सूर्य ग्रहण होता है — गलत। चंद्रमा की कक्षा झुकी हुई होने के कारण उचित संरेखण आवश्यक है।

हर पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण होता है — गलत। इसके लिए भी सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा का उचित संरेखण आवश्यक है।

सूर्य ग्रहण में पृथ्वी बीच में होती है — गलत। सूर्य ग्रहण में चंद्रमा बीच में होता है।

चंद्र ग्रहण में चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच होता है — गलत। चंद्र ग्रहण में पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच होती है।

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त्वरित पुनरावृत्ति

मुख्य तथ्य एक क्रम में

⚡ एक नज़र में याद करें

घूर्णन—पश्चिम से पूर्व 23:56:04—नाक्षत्र दिवस दिन-रात—घूर्णन ऋतु—झुकाव + परिक्रमण उपसौर—जनवरी अपसौर—जुलाई
21 मार्च—वसंत विषुव 21 जून—ग्रीष्म अयनांत 23 सितंबर—शरद विषुव 22 दिसंबर—शीत अयनांत
सूर्य ग्रहण—अमावस्या चंद्र ग्रहण—पूर्णिमा अयनचालन—26,000 वर्ष

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ — घूर्णन और परिक्रमण

पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व घूमती है।

पृथ्वी का नाक्षत्र घूर्णन काल लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड तथा औसत सौर दिवस लगभग 24 घंटे है।

भूमध्यरेखा पर पृथ्वी की रेखीय घूर्णन गति लगभग 1670 किलोमीटर प्रति घंटा है।

घूर्णन के प्रमुख परिणाम — दिन और रात, कोरिओलिस प्रभाव तथा भूमध्यरेखीय उभार।

कोरिओलिस प्रभाव — उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विचलन।

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर थोड़ी दीर्घवृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा करती है।

पृथ्वी की औसत परिक्रमण गति लगभग 1.07 से 1.08 लाख किलोमीटर प्रति घंटा है।

ऋतुओं का मुख्य कारण पृथ्वी का लगभग 23.5° अक्षीय झुकाव तथा परिक्रमण है।

पारंपरिक परीक्षा तिथियाँ — 21 मार्च वसंत विषुव, 21 जून ग्रीष्म अयनांत, 23 सितंबर शरद विषुव और 22 दिसंबर शीत अयनांत

पृथ्वी और सूर्य की औसत दूरी लगभग 14.96 करोड़ किलोमीटर अर्थात एक खगोलीय इकाई है।

उपसौर जनवरी के आरंभ में होता है; पृथ्वी सूर्य से लगभग 14.71 करोड़ किलोमीटर दूर होती है।

अपसौर जुलाई के आरंभ में होता है; पृथ्वी सूर्य से लगभग 15.21 करोड़ किलोमीटर दूर होती है।

मार्च विषुव से सितंबर विषुव के बीच उत्तरी गोलार्ध में सामान्यतः दिन 12 घंटे से अधिक तथा सितंबर से मार्च के बीच दक्षिणी गोलार्ध में दिन 12 घंटे से अधिक होते हैं।

उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर सरल रूप में लगभग छह महीने दिन और छह महीने रात की स्थिति समझी जाती है।

अयनचालन का एक चक्र लगभग 26,000 वर्षों में पूरा होता है और इसके कारण ध्रुव तारे की स्थिति दीर्घकाल में बदलती है।

न्युटेशन पृथ्वी की धुरी में होने वाला छोटा आवर्ती दोलन है।

कक्षीय उत्केन्द्रता में दीर्घकालिक परिवर्तन पृथ्वी की कक्षा को कभी अपेक्षाकृत अधिक गोलाकार और कभी अधिक दीर्घवृत्ताकार बनाता है तथा दीर्घकालिक जलवायु को प्रभावित कर सकता है।

सूर्य ग्रहण में क्रम — सूर्य → चंद्रमा → पृथ्वी। यह अमावस्या के आसपास संभव है।

सूर्य ग्रहण के प्रमुख प्रकार — पूर्ण, आंशिक और वलयाकार

चंद्र ग्रहण में क्रम — सूर्य → पृथ्वी → चंद्रमा। यह पूर्णिमा के आसपास संभव है।

चंद्र ग्रहण के प्रमुख प्रकार — पूर्ण, आंशिक और उपछाया

हर अमावस्या और पूर्णिमा को ग्रहण नहीं होता, क्योंकि चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी के कक्षीय तल से लगभग 5° झुकी हुई है।

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