विनिवेश एवं प्रमुख आर्थिक पहल
विनिवेश नीति, प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान और मेक इन इंडिया
आर्थिक सुधारों से जुड़ी प्रमुख पहलें
भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद सार्वजनिक क्षेत्र, निजी निवेश, आधारभूत संरचना और विनिर्माण से जुड़ी नीतियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। विनिवेश के माध्यम से सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी कम करने की नीति अपनाई गई, प्रधानमंत्री गति शक्ति के माध्यम से आधारभूत संरचना परियोजनाओं के एकीकृत नियोजन पर जोर दिया गया और मेक इन इंडिया के माध्यम से देश को विनिर्माण, निवेश और नवाचार का प्रमुख केंद्र बनाने का प्रयास किया गया।
विनिवेश का अर्थ
विनिवेश वह प्रक्रिया है जिसमें सरकार किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम में अपनी इक्विटी या हिस्सेदारी का कुछ भाग अथवा पूरा भाग बेचती है।
विनिवेश में सरकार की हिस्सेदारी कम हो सकती है, लेकिन प्रत्येक विनिवेश का अर्थ निजीकरण नहीं होता।
यदि सरकार केवल कुछ शेयर बेचती है और प्रबंधन नियंत्रण अपने पास बनाए रखती है तो इसे सामान्यतः अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री कहा जाता है।
यदि सरकार अपनी पूरी या पर्याप्त हिस्सेदारी के साथ उद्यम का प्रबंधन नियंत्रण भी हस्तांतरित करती है, तो इसे रणनीतिक विनिवेश कहा जाता है।
निजीकरण रणनीतिक विनिवेश का वह रूप है जिसमें सरकारी हिस्सेदारी और प्रबंधन नियंत्रण निजी खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण अंतर
हर निजीकरण विनिवेश है, लेकिन हर विनिवेश निजीकरण नहीं होता।
भारत में विनिवेश की शुरुआत
भारत में व्यापक आर्थिक सुधारों के साथ 1991-92 से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी के विनिवेश की प्रक्रिया शुरू हुई।
इस समय भारत भुगतान संतुलन संकट, ऊँचे राजकोषीय दबाव और सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उपक्रमों की कमजोर वित्तीय स्थिति जैसी समस्याओं का सामना कर रहा था।
विनिवेश का उद्देश्य सरकारी संसाधनों पर दबाव कम करना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में दक्षता बढ़ाना, पूँजी बाजार को व्यापक बनाना और निजी निवेश के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराना था।
शुरुआती चरण में मुख्य रूप से कुछ सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार की आंशिक हिस्सेदारी बेची गई।
विनिवेश से प्राप्त राशि का उपयोग सरकार की वित्तीय आवश्यकताओं तथा राजकोषीय प्रबंधन में भी किया जाता रहा।
रंगराजन समिति और विनिवेश
विनिवेश से संबंधित नीति को अधिक स्पष्ट बनाने के लिए सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी।
इस समिति की महत्वपूर्ण सिफारिशें 1993 में सामने आईं।
इसलिए यह कहना कि “रंगराजन समिति की 1991 की सिफारिश पर ही 1991 में विनिवेश शुरू हुआ” सही नहीं है।
भारत में विनिवेश की शुरुआत 1991 की आर्थिक सुधार प्रक्रिया के साथ हो चुकी थी, जबकि रंगराजन समिति ने बाद में विनिवेश की सीमा और नीति संबंधी महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
⚠️ परीक्षा-सावधानी
विनिवेश की शुरुआत — 1991-92
रंगराजन समिति की प्रमुख रिपोर्ट — 1993
1991 से पहले सार्वजनिक क्षेत्र की स्थिति
1991 से पहले भारत की विकास रणनीति में सार्वजनिक क्षेत्र को अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था।
सरकार ने इस्पात, भारी मशीनरी, ऊर्जा, खनन, परिवहन, बैंकिंग तथा अनेक आधारभूत क्षेत्रों में बड़े सार्वजनिक उपक्रम स्थापित किए।
उस समय निजीकरण अथवा व्यापक विनिवेश की कोई औपचारिक नीति नहीं थी।
सार्वजनिक क्षेत्र को देश के औद्योगीकरण और आर्थिक विकास का प्रमुख साधन माना जाता था।
1991 से 1999 — विनिवेश नीति का विकास
1991 की नई आर्थिक नीति के बाद सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन किया और कुछ सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया प्रारंभ की।
प्रारंभिक वर्षों में विनिवेश मुख्य रूप से अल्पांश हिस्सेदारी की बिक्री के रूप में किया गया।
1996 में सरकार ने विनिवेश संबंधी मामलों पर सलाह देने के लिए विनिवेश आयोग का गठन किया।
इस चरण में विनिवेश को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और संस्थागत रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाए गए।
विनिवेश विभाग का गठन
10 दिसंबर 1999 को विनिवेश से संबंधित कार्यों के लिए एक अलग विनिवेश विभाग स्थापित किया गया।
बाद में सितंबर 2001 में इसे विनिवेश मंत्रालय का दर्जा दिया गया।
27 मई 2004 से विनिवेश विभाग को पुनः वित्त मंत्रालय के अंतर्गत एक विभाग बनाया गया।
14 अप्रैल 2016 को इसका नाम बदलकर निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग — डीआईपीएएम कर दिया गया।
वर्तमान में डीआईपीएएम भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
📗 याद रखें
रणनीतिक बिक्री का दौर
1999 से 2004 के दौरान विनिवेश नीति में रणनीतिक बिक्री को विशेष महत्व मिला।
रणनीतिक बिक्री में केवल सरकारी शेयरों की बिक्री ही नहीं, बल्कि कई मामलों में प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण भी शामिल था।
इस दौर में मॉडर्न फूड्स, बाल्को और वीएसएनएल जैसे सार्वजनिक उपक्रमों में रणनीतिक विनिवेश महत्वपूर्ण उदाहरण बने।
इससे विनिवेश नीति केवल सरकारी हिस्सेदारी की छोटी बिक्री तक सीमित न रहकर प्रबंधन नियंत्रण के हस्तांतरण तक पहुँची।
2004 से 2014 — विनिवेश की स्थिति
2004 से 2014 के दौरान विनिवेश जारी रहा, लेकिन बड़े पैमाने की रणनीतिक बिक्री की तुलना में अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री अधिक प्रमुख रही।
राजनीतिक परिस्थितियों, गठबंधन संबंधी विचारों और कर्मचारी संगठनों के विरोध के कारण कई रणनीतिक बिक्री प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाए।
इस अवधि में सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर बाजार के माध्यम से बेचकर सरकार की हिस्सेदारी सीमित रूप से कम करने की नीति अधिक दिखाई देती है।
2014 के बाद विनिवेश की नई दिशा
2014 के बाद केंद्र सरकार ने विनिवेश, रणनीतिक बिक्री और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन को फिर से अधिक सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया।
सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों में अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री के साथ-साथ कुछ उपक्रमों में रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया भी शुरू की।
सीपीएसई एक्सचेंज ट्रेडेड फंड जैसे माध्यमों से सार्वजनिक उपक्रमों के शेयरों में खुदरा और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाई गई।
एयर इंडिया, बीपीसीएल, बीईएमएल तथा शिपिंग कॉरपोरेशन जैसे सार्वजनिक उपक्रम विभिन्न समय पर रणनीतिक विनिवेश या हिस्सेदारी बिक्री की प्रक्रिया से जुड़े।
नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति — 2021
4 फरवरी 2021 को आत्मनिर्भर भारत से संबंधित नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति अधिसूचित की गई।
इस नीति का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र के व्यावसायिक उपक्रमों की उपस्थिति को आवश्यक क्षेत्रों तक सीमित करना और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना है।
नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को रणनीतिक और गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया।
रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार का केवल न्यूनतम आवश्यक सार्वजनिक क्षेत्र उपस्थिति बनाए रखने का सिद्धांत अपनाया गया।
गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण, विलय, पुनर्गठन अथवा बंद करने की नीति अपनाई जा सकती है।
चार व्यापक रणनीतिक क्षेत्र
| क्रम | रणनीतिक क्षेत्र |
|---|---|
| 1 | परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा |
| 2 | परिवहन और दूरसंचार |
| 3 | बिजली, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज |
| 4 | बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाएँ |
🎯 परीक्षा तथ्य
रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की न्यूनतम आवश्यक उपस्थिति बनाए रखने का सिद्धांत है; इसका अर्थ यह नहीं कि हर रणनीतिक क्षेत्र में केवल एक ही सार्वजनिक उपक्रम निश्चित रूप से रहेगा।
एयर इंडिया का निजीकरण
एयर इंडिया भारत की रणनीतिक विनिवेश प्रक्रिया का प्रमुख उदाहरण है।
टाटा समूह की टैलेस प्राइवेट लिमिटेड को अक्टूबर 2021 में एयर इंडिया के लिए सफल बोलीदाता घोषित किया गया।
सरकार और सफल बोलीदाता के बीच शेयर खरीद समझौता अक्टूबर 2021 में हुआ।
लेकिन एयर इंडिया का रणनीतिक विनिवेश और स्वामित्व हस्तांतरण 27 जनवरी 2022 को औपचारिक रूप से पूरा हुआ।
इसलिए केवल “एयर इंडिया को 2021 में टाटा समूह को बेच दिया गया” कहना अधूरा है। सफल बोली और समझौता 2021 में, जबकि लेन-देन पूरा 2022 में हुआ।
विनिवेश नीति के प्रमुख उद्देश्य
विनिवेश का एक प्रमुख उद्देश्य सरकार पर सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़ा वित्तीय और प्रबंधकीय बोझ कम करना है।
इससे सार्वजनिक उपक्रमों में प्रतिस्पर्धा और परिचालन दक्षता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।
विनिवेश निजी क्षेत्र को ऐसे क्षेत्रों में निवेश और प्रबंधन के अवसर प्रदान करता है जहाँ सरकारी उपस्थिति कम की जा सकती है।
इससे पूँजी बाजार का विस्तार, निवेशकों की भागीदारी और पूँजी निर्माण को बढ़ावा मिल सकता है।
सरकार विनिवेश से प्राप्त संसाधनों का उपयोग विकास और अन्य सार्वजनिक वित्तीय आवश्यकताओं के लिए कर सकती है।
विनिवेश नीति का व्यापक उद्देश्य सार्वजनिक संसाधनों और परिसंपत्तियों का अधिक प्रभावी उपयोग करना भी है।
प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान
प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान की शुरुआत 13 अक्टूबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई।
इसका उद्देश्य विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की आधारभूत संरचना परियोजनाओं को एक साझा डिजिटल मंच पर लाकर एकीकृत योजना, बेहतर समन्वय और समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है।
इस योजना का विशेष जोर बहु-माध्यम संपर्क पर है, जिसमें सड़क, रेलवे, बंदरगाह, जलमार्ग, हवाई परिवहन, पाइपलाइन, ऊर्जा और डिजिटल संपर्क जैसी व्यवस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है।
इसका उद्देश्य विभागों के बीच अलग-अलग योजना बनाने की प्रवृत्ति को कम करके परियोजनाओं का समन्वित विकास करना है।
प्रधानमंत्री गति शक्ति के मुख्य उद्देश्य
विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की आधारभूत संरचना परियोजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना इसका प्रमुख उद्देश्य है।
परियोजनाओं की योजना, स्वीकृति और क्रियान्वयन में होने वाली अनावश्यक देरी को कम करना भी इसका लक्ष्य है।
एकीकृत परिवहन नेटवर्क विकसित करके लॉजिस्टिक लागत कम करने और माल की आवाजाही अधिक कुशल बनाने का प्रयास किया जाता है।
बेहतर सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई और अन्य संपर्क के माध्यम से देश की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने का लक्ष्य है।
इसके माध्यम से औद्योगिक क्षेत्रों, आर्थिक क्षेत्रों, कृषि उत्पादन क्षेत्रों और बाजारों के बीच बेहतर संपर्क विकसित किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री गति शक्ति के छह स्तंभ
| क्रम | स्तंभ | सरल अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | व्यापकता | सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों की मौजूदा तथा प्रस्तावित परियोजनाओं को एक मंच पर देखना |
| 2 | प्राथमिकता | महत्वपूर्ण परियोजनाओं को आवश्यकता के अनुसार प्राथमिकता देना |
| 3 | अनुकूलन | सबसे प्रभावी मार्ग, लागत और संसाधन उपयोग का चयन करना |
| 4 | समन्वय | अलग-अलग विभागों की परियोजनाओं को समय और स्थान के अनुसार समन्वित करना |
| 5 | विश्लेषण | भौगोलिक और अन्य आँकड़ों का विश्लेषण करके बेहतर निर्णय लेना |
| 6 | गतिशीलता | परियोजनाओं की प्रगति और बदलावों को लगातार अद्यतन करना |
डिजिटल और भौगोलिक मंच
प्रधानमंत्री गति शक्ति का राष्ट्रीय मास्टर प्लान भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित डिजिटल मंच का उपयोग करता है।
इसमें सड़क, रेलवे, बंदरगाह, पाइपलाइन, ऊर्जा, उद्योग, वन, भूमि और अन्य महत्वपूर्ण भौगोलिक सूचनाओं की विभिन्न परतों को एक साथ देखा जा सकता है।
उपग्रह चित्रों, दूरसंवेदी सूचनाओं और भू-स्थानिक आँकड़ों की सहायता से परियोजनाओं की बेहतर योजना और विश्लेषण किया जा सकता है।
इस डिजिटल व्यवस्था से अलग-अलग मंत्रालय किसी क्षेत्र में पहले से मौजूद तथा प्रस्तावित आधारभूत संरचना को देखकर अपनी परियोजना तैयार कर सकते हैं।
इससे परियोजना टकराव, अनावश्यक दोहराव और लागत बढ़ने की समस्या को कम करने में सहायता मिलती है।
प्रधानमंत्री गति शक्ति के प्रमुख लाभ
एकीकृत आधारभूत संरचना से उद्योगों और व्यवसायों को कच्चे माल तथा तैयार उत्पादों की आवाजाही में बेहतर संपर्क मिलता है।
किसानों को उत्पादन क्षेत्रों से मंडियों, भंडारण केंद्रों, प्रसंस्करण इकाइयों और परिवहन नेटवर्क तक बेहतर पहुँच मिल सकती है।
लॉजिस्टिक व्यवस्था में सुधार होने से समय और परिवहन लागत कम करने में सहायता मिलती है।
बड़े आधारभूत संरचना निर्माण कार्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर उत्पन्न करते हैं।
बेहतर संपर्क से औद्योगिक गलियारों, आर्थिक क्षेत्रों और निर्यात केंद्रों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने में सहायता मिलती है।
प्रारंभिक क्षेत्रीय लक्ष्य
प्रधानमंत्री गति शक्ति के शुरुआती ढाँचे में विभिन्न आधारभूत संरचना मंत्रालयों के लिए 2024-25 तक प्राप्त किए जाने वाले कई क्षेत्रीय लक्ष्य निर्धारित किए गए थे।
इनमें राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क को लगभग 2 लाख किलोमीटर तक बढ़ाने जैसे लक्ष्य शामिल थे।
रेलवे की माल परिवहन क्षमता को लगभग 1,600 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुँचाने का लक्ष्य भी विभिन्न प्रारंभिक दस्तावेजों में दिया गया।
हवाई अड्डों, हेलिपोर्ट तथा संबंधित विमानन संपर्क सुविधाओं की संख्या बढ़ाने के लक्ष्य निर्धारित किए गए।
गैस पाइपलाइन नेटवर्क में लगभग 17,000 किलोमीटर से अधिक अतिरिक्त विस्तार तथा बिजली पारेषण नेटवर्क में विस्तार जैसे लक्ष्य भी इससे जुड़े थे।
इन आँकड़ों को वर्तमान उपलब्धि नहीं समझना चाहिए। ये प्रधानमंत्री गति शक्ति के शुरुआती चरण में निर्धारित 2024-25 तक के क्षेत्रीय लक्ष्य थे।
⚠️ परीक्षा-सावधानी
2024-25 वाले आँकड़े लक्ष्य थे, इन्हें 2026 की वर्तमान उपलब्धि के रूप में न लिखें।
वर्धा–बल्लारशाह और रतलाम–नागदा रेलवे परियोजनाएँ
वर्धा–बल्लारशाह तथा रतलाम–नागदा रेलवे क्षमता विस्तार से संबंधित परियोजनाएँ प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के सिद्धांतों के आधार पर तैयार की गईं।
इन परियोजनाओं को 2024 में नहीं, मई 2025 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति द्वारा मंजूरी दी गई।
इनकी कुल अनुमानित लागत लगभग ₹3,399 करोड़ है।
इन परियोजनाओं के माध्यम से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के लगभग 784 गाँवों की संपर्क व्यवस्था को लाभ मिलने का अनुमान है।
निर्माण अवधि में लगभग 74 लाख मानव-दिवस प्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होने का अनुमान बताया गया।
इन रेल लाइनों से माल परिवहन क्षमता बढ़ाने, रेल मार्गों पर भीड़ कम करने और कोयला, सीमेंट, कृषि उत्पाद तथा अन्य वस्तुओं की आवाजाही में सुधार की अपेक्षा है।
मेक इन इंडिया
मेक इन इंडिया पहल की शुरुआत 25 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई।
इसका उद्देश्य भारत को विनिर्माण, डिजाइन, नवाचार और निवेश का प्रमुख वैश्विक केंद्र बनाना है।
इस पहल के माध्यम से देश में घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित करने, औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने, रोजगार उत्पन्न करने और आधुनिक विनिर्माण क्षमता विकसित करने पर जोर दिया गया।
मेक इन इंडिया के प्रारंभिक चरण में 25 प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
बाद में मेक इन इंडिया 2.0 के तहत इसका दायरा बढ़ाकर 27 क्षेत्रों तक किया गया।
🎯 महत्वपूर्ण सुधार
प्रारंभिक मेक इन इंडिया = 25 क्षेत्र
मेक इन इंडिया 2.0 = 27 क्षेत्र
मेक इन इंडिया के प्रमुख क्षेत्र
मेक इन इंडिया के अंतर्गत ऑटोमोबाइल और ऑटो घटक, रक्षा और एयरोस्पेस, औषधि और चिकित्सा उपकरण, वस्त्र एवं परिधान, जैव प्रौद्योगिकी, पूँजीगत वस्तुएँ, रसायन और पेट्रोरसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, खाद्य प्रसंस्करण, रेलवे, निर्माण, जहाजरानी और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे विनिर्माण क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जाता है।
मेक इन इंडिया 2.0 में विनिर्माण के साथ पर्यटन, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएँ, शिक्षा, संचार और अन्य सेवा क्षेत्रों को भी शामिल करके कुल 27 क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
मेक इन इंडिया के प्रमुख उद्देश्य
देश में घरेलू और विदेशी निवेश को आकर्षित करना मेक इन इंडिया का प्रमुख उद्देश्य है।
भारत में आधुनिक और विश्वस्तरीय विनिर्माण आधारभूत संरचना विकसित करने पर जोर दिया गया।
नवाचार, डिजाइन, अनुसंधान और नई तकनीक को औद्योगिक विकास से जोड़ने का प्रयास किया गया।
देश के युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास के अवसर बढ़ाना भी इस पहल का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और अंतरराष्ट्रीय विनिर्माण नेटवर्क में अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिलाना भी इसका लक्ष्य है।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और कारोबारी सुगमता
मेक इन इंडिया के अंतर्गत अनेक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से संबंधित नियमों को उदार और सरल किया गया।
विभिन्न क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग और सरकारी स्वीकृति मार्ग के माध्यम से विदेशी निवेश की व्यवस्था की जाती है।
निवेशकों के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाने, अनुमति संबंधी बोझ कम करने और डिजिटल व्यवस्थाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
कारोबार शुरू करने और चलाने की प्रक्रियाओं को सरल बनाना कारोबारी सुगमता सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
ऑनलाइन अनुमति, डिजिटल आवेदन, नियमों के सरलीकरण और अनुपालन बोझ में कमी जैसे सुधारों का उद्देश्य निवेश वातावरण बेहतर बनाना है।
मेक इन इंडिया और मोबाइल विनिर्माण
मेक इन इंडिया और इससे जुड़ी अन्य विनिर्माण नीतियों के दौरान भारत में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का तेजी से विस्तार हुआ।
देश में मोबाइल फोन संयोजन और विनिर्माण इकाइयों की संख्या बढ़ी तथा अनेक वैश्विक कंपनियों ने भारत में उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला गतिविधियों का विस्तार किया।
इस विकास में मेक इन इंडिया के साथ-साथ चरणबद्ध विनिर्माण कार्यक्रम, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ तथा इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की अन्य नीतियों की भी भूमिका रही है।
इसलिए मोबाइल विनिर्माण में हुई पूरी वृद्धि का श्रेय केवल एक योजना को देना उचित नहीं है; यह कई औद्योगिक और निवेश नीतियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है।
मेक इन इंडिया की प्रमुख चुनौतियाँ
विनिर्माण क्षेत्र के विकास के लिए उच्च गुणवत्ता वाली सड़क, रेल, बंदरगाह, बिजली और लॉजिस्टिक आधारभूत संरचना की निरंतर आवश्यकता रहती है।
भूमि की उपलब्धता और भूमि अधिग्रहण अनेक बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं में चुनौती बन सकता है।
श्रम बाजार में कौशल की कमी और उद्योग की आवश्यकता के अनुरूप प्रशिक्षित श्रमिक उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण चुनौती है।
नियमों और अनुमतियों को सरल बनाना तथा केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखना निवेश आकर्षित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
वैश्विक विनिर्माण प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए लागत, गुणवत्ता, तकनीक, अनुसंधान और लॉजिस्टिक दक्षता में लगातार सुधार आवश्यक है।
तीनों पहलों का संबंध
| पहल | मुख्य उद्देश्य | सरल अर्थ |
|---|---|---|
| विनिवेश | सरकारी हिस्सेदारी और सार्वजनिक परिसंपत्तियों का बेहतर प्रबंधन | सरकार का कुछ या पूरा हिस्सा बेचना |
| प्रधानमंत्री गति शक्ति | एकीकृत आधारभूत संरचना और बहु-माध्यम संपर्क | सड़क, रेल, बंदरगाह आदि की संयुक्त योजना |
| मेक इन इंडिया | विनिर्माण, निवेश, नवाचार और रोजगार | भारत में उत्पादन और निवेश बढ़ाना |
भ्रम वाले महत्वपूर्ण तथ्य
भ्रम: रंगराजन समिति की 1991 की सिफारिश पर विनिवेश शुरू हुआ।
सही: विनिवेश प्रक्रिया 1991-92 में शुरू हुई; रंगराजन समिति की प्रमुख रिपोर्ट 1993 से संबंधित है।
भ्रम: वर्तमान में केवल “विनिवेश विभाग” विनिवेश का काम करता है।
सही: वर्तमान विभाग का नाम निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग — डीआईपीएएम है और यह वित्त मंत्रालय के अधीन है।
भ्रम: हर विनिवेश का अर्थ निजीकरण होता है।
सही: अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री में सरकार प्रबंधन नियंत्रण अपने पास रख सकती है; निजीकरण में नियंत्रण निजी खरीदार को जाता है।
भ्रम: 2021 की नीति के बाद रणनीतिक क्षेत्रों में केवल एक सार्वजनिक उपक्रम ही रहेगा।
सही: नीति का सिद्धांत रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र की न्यूनतम आवश्यक उपस्थिति बनाए रखना है।
भ्रम: एयर इंडिया का निजीकरण पूरी तरह 2021 में पूरा हो गया था।
सही: सफल बोली और समझौता 2021 में हुआ; लेन-देन और स्वामित्व हस्तांतरण 27 जनवरी 2022 को पूरा हुआ।
भ्रम: वर्धा–बल्लारशाह और रतलाम–नागदा रेल परियोजनाएँ 2024 में स्वीकृत हुई थीं।
सही: ₹3,399 करोड़ की इन परियोजनाओं को मई 2025 में मंजूरी मिली।
भ्रम: मेक इन इंडिया आज भी केवल 25 क्षेत्रों तक सीमित है।
सही: प्रारंभिक पहल में 25 क्षेत्र थे; मेक इन इंडिया 2.0 में 27 क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
त्वरित पुनरावृत्ति
⚡ एक नज़र में
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
विनिवेश में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम में अपनी हिस्सेदारी का कुछ या पूरा भाग बेचती है।
अल्पांश हिस्सेदारी बिक्री में सरकार प्रबंधन नियंत्रण बनाए रख सकती है, जबकि रणनीतिक विनिवेश में प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण भी हो सकता है।
भारत में विनिवेश की प्रक्रिया 1991-92 से आर्थिक सुधारों के साथ शुरू हुई।
रंगराजन समिति की प्रमुख विनिवेश सिफारिशें 1993 से जुड़ी हैं।
10 दिसंबर 1999 — विनिवेश विभाग की स्थापना।
14 अप्रैल 2016 — विनिवेश विभाग का नाम डीआईपीएएम किया गया।
डीआईपीएएम वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
2021 की नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति में चार व्यापक रणनीतिक क्षेत्र निर्धारित किए गए।
गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण अथवा बंद करने की नीति अपनाई जा सकती है।
एयर इंडिया — सफल बोली 2021; स्वामित्व हस्तांतरण 27 जनवरी 2022।
प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान — 13 अक्टूबर 2021।
इसका मुख्य उद्देश्य एकीकृत आधारभूत संरचना, बहु-माध्यम संपर्क और लॉजिस्टिक लागत में कमी है।
प्रधानमंत्री गति शक्ति के छह स्तंभ हैं—व्यापकता, प्राथमिकता, अनुकूलन, समन्वय, विश्लेषण और गतिशीलता।
प्रधानमंत्री गति शक्ति में भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित डिजिटल मंच का उपयोग किया जाता है।
वर्धा–बल्लारशाह और रतलाम–नागदा रेल परियोजनाएँ — ₹3,399 करोड़ — मंजूरी 2025।
मेक इन इंडिया — 25 सितंबर 2014।
इसका मुख्य उद्देश्य भारत को विनिर्माण, डिजाइन, नवाचार और निवेश का वैश्विक केंद्र बनाना है।
मेक इन इंडिया के प्रारंभिक चरण में 25 क्षेत्र थे।
मेक इन इंडिया 2.0 में 27 क्षेत्र शामिल हैं।
मेक इन इंडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सुधार, कारोबारी सुगमता, आधारभूत संरचना, रोजगार और औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।