हरित क्रांति
उच्च उपज वाली किस्में, सिंचाई, उर्वरक, कृषि यंत्रीकरण और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता
हरित क्रांति का परिचय
हरित क्रांति से आशय कृषि उत्पादन, विशेष रूप से खाद्यान्न उत्पादन, में तेजी से वृद्धि करने के लिए उच्च उपज वाली किस्मों, सिंचाई, उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि मशीनों, संस्थागत ऋण और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के संयुक्त उपयोग से है।
भारत में हरित क्रांति की प्रक्रिया 1960 के दशक में शुरू हुई और 1966-67 के बाद उच्च उपज वाली किस्मों के कार्यक्रम के विस्तार के साथ इसे निर्णायक गति मिली।
इसके प्रारंभिक लाभ मुख्यतः उन क्षेत्रों में अधिक दिखाई दिए जहाँ पर्याप्त सिंचाई, उर्वरक, बिजली, कृषि ऋण और बाजार जैसी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। इनमें पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश विशेष रूप से प्रमुख रहे।
हरित क्रांति का प्रारंभिक और सबसे प्रभावशाली परिणाम गेहूँ के उत्पादन में दिखाई दिया। बाद में सिंचित क्षेत्रों में चावल सहित अन्य फसलों में भी उच्च उपज वाली किस्मों और आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ा।
भारत में हरित क्रांति की शुरुआत
1960 के दशक का कृषि परिवर्तन
स्वतंत्रता के बाद भारत को तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिए पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा।
1960 के दशक में लगातार खाद्यान्न संकट, कम कृषि उत्पादकता और आयात पर निर्भरता ने कृषि उत्पादन को तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता पैदा की।
इसी पृष्ठभूमि में उच्च उपज वाली फसल किस्मों, रासायनिक उर्वरकों, सिंचाई और आधुनिक कृषि तकनीकों के संयुक्त प्रयोग को बढ़ावा दिया गया।
भारत में हरित क्रांति का निर्णायक चरण 1966-67 के बाद माना जाता है, जब उच्च उपज वाली किस्मों के कार्यक्रम को बड़े स्तर पर अपनाया गया।
इसका प्रारंभिक विस्तार मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सिंचित क्षेत्रों में हुआ, क्योंकि इन क्षेत्रों में नई कृषि तकनीक अपनाने के लिए आवश्यक सुविधाएँ अपेक्षाकृत बेहतर थीं।
🎯 परीक्षा बिंदु
भारत में हरित क्रांति का निर्णायक चरण — 1960 के दशक का मध्य, विशेष रूप से 1966-67 के बाद।
एम. एस. स्वामीनाथन और नॉर्मन बोरलॉग
हरित क्रांति के प्रमुख वैज्ञानिक
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने भारत में हरित क्रांति को सफल बनाने, उच्च उपज वाली गेहूँ की किस्मों को अपनाने और भारतीय कृषि अनुसंधान को नई दिशा देने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
इसी कारण सामान्य भारतीय परीक्षा-साहित्य में डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को “भारत में हरित क्रांति का जनक” कहा जाता है।
अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन ई. बोरलॉग ने मैक्सिको में बौनी तथा उच्च उपज वाली गेहूँ किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारत में डॉ. स्वामीनाथन और अन्य भारतीय वैज्ञानिकों ने बोरलॉग द्वारा विकसित गेहूँ सामग्री और उनसे प्राप्त किस्मों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाने और विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डॉ. नॉर्मन बोरलॉग को विश्व स्तर पर हरित क्रांति का जनक कहा जाता है।
उन्हें विश्व में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने और भूख के विरुद्ध उनके योगदान के लिए 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।
📗 भ्रम से बचें
विश्व में हरित क्रांति के जनक — नॉर्मन बोरलॉग
भारत में हरित क्रांति के जनक — एम. एस. स्वामीनाथन
हरित क्रांति शब्द की उत्पत्ति
विलियम एस. गॉड
“हरित क्रांति” शब्द का प्रयोग अमेरिकी अधिकारी विलियम एस. गॉड ने वर्ष 1968 में किया।
वह उस समय संयुक्त राज्य अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी के प्रशासक थे।
उन्होंने कृषि उत्पादन में उच्च उपज वाली किस्मों और आधुनिक तकनीकों के कारण हो रहे तीव्र परिवर्तन का वर्णन करने के लिए “हरित क्रांति” शब्द का उपयोग किया।
इसलिए हरित क्रांति शब्द — विलियम एस. गॉड और विश्व में हरित क्रांति के जनक — नॉर्मन बोरलॉग को अलग-अलग याद रखना चाहिए।
🎯 सीधा प्रश्न
हरित क्रांति शब्द — विलियम एस. गॉड, 1968
उच्च उपज वाली किस्में
हरित क्रांति का प्रमुख आधार
हरित क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी आधार उच्च उपज वाली किस्मों के बीज थे।
इन बीजों को पर्याप्त सिंचाई, उर्वरक और उचित कृषि प्रबंधन मिलने पर पारंपरिक किस्मों की तुलना में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता था।
भारत में हरित क्रांति का सबसे प्रारंभिक और तेज प्रभाव गेहूँ पर दिखाई दिया।
बौनी गेहूँ किस्मों ने अधिक उर्वरक का उपयोग करने और पौधों के गिरने की समस्या कम करने में सहायता की, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी।
बाद में उच्च उपज वाली चावल किस्मों का उपयोग भी बढ़ा और सिंचित क्षेत्रों में चावल उत्पादन पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
🎯 याद रखें
हरित क्रांति का प्रारंभिक सबसे बड़ा प्रभाव — गेहूँ उत्पादन।
रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक
आधुनिक कृषि निवेश
उच्च उपज वाली फसल किस्मों को अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती थी। इसलिए हरित क्रांति के दौरान रासायनिक उर्वरकों का उपयोग तेजी से बढ़ा।
नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरकों के प्रयोग से फसलों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने और उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया गया।
फसलों को कीटों और रोगों से बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों और अन्य पौध-संरक्षण रसायनों का भी बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ।
इन साधनों ने उत्पादन बढ़ाने में सहायता की, लेकिन अत्यधिक और असंतुलित उपयोग से मिट्टी, जल, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।
सिंचाई की आधुनिक व्यवस्था
नहर, ट्यूबवेल और पंपसेट
हरित क्रांति की नई फसल किस्मों के लिए समय पर और पर्याप्त जल उपलब्ध होना अत्यंत महत्वपूर्ण था।
इसलिए नहरों, ट्यूबवेलों और पंपसेटों के माध्यम से सिंचाई के विस्तार पर विशेष जोर दिया गया।
भूजल सिंचाई और विद्युत चालित पंपों के विस्तार ने विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचित खेती को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विश्वसनीय सिंचाई सुविधा ने किसानों को वर्षा पर निर्भरता कम करने और एक वर्ष में एक से अधिक फसल लेने में सहायता की।
कृषि यंत्रीकरण
खेती में मशीनों का बढ़ता उपयोग
हरित क्रांति के दौरान कृषि यंत्रीकरण को भी बढ़ावा मिला।
ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर, पंपसेट और अन्य कृषि मशीनों के उपयोग से जुताई, बुवाई, सिंचाई, कटाई और मड़ाई जैसे कार्य अधिक तेजी से किए जाने लगे।
यंत्रीकरण ने बड़े कृषि क्षेत्रों में समय पर कृषि कार्य करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सहायता की।
हालांकि मशीनों की लागत अधिक होने के कारण प्रारंभिक दौर में बड़े और अपेक्षाकृत समृद्ध किसानों के लिए इन्हें अपनाना अधिक आसान था।
सरकारी सहायता एवं नीतियाँ
बीज, खाद, ऋण और मूल्य समर्थन
हरित क्रांति केवल नई बीज किस्मों का कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे व्यापक सरकारी सहायता भी थी।
सरकार और संबंधित संस्थाओं ने किसानों तक उन्नत बीज, उर्वरक, सिंचाई साधन, कृषि मशीनें और संस्थागत ऋण पहुँचाने का प्रयास किया।
कृषि ऋण व्यवस्था के विस्तार ने किसानों को नई कृषि तकनीक अपनाने के लिए आवश्यक पूंजी प्राप्त करने में सहायता की।
खाद्यान्न खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था ने भी किसानों को बाजार संबंधी जोखिमों से कुछ सुरक्षा प्रदान करने और नई तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहन देने में भूमिका निभाई।
भारतीय खाद्य निगम और कृषि मूल्य नीति जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं ने खाद्यान्न खरीद, भंडारण और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया।
कृषि अनुसंधान एवं प्रसार
प्रयोगशाला से खेत तक
हरित क्रांति की सफलता में कृषि अनुसंधान और किसानों तक नई जानकारी पहुँचाने वाली कृषि प्रसार व्यवस्था का महत्वपूर्ण योगदान था।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि अनुसंधान संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों ने उच्च उपज वाली किस्मों, कृषि तकनीकों और फसल प्रबंधन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुँचाने के लिए प्रशिक्षण, प्रदर्शन और कृषि प्रसार सेवाओं का उपयोग किया गया।
इस प्रकार हरित क्रांति में बीज + अनुसंधान + सिंचाई + उर्वरक + ऋण + बाजार + सरकारी समर्थन सभी का संयुक्त योगदान था।
हरित क्रांति का प्रभाव
खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि
हरित क्रांति के कारण भारत में विशेष रूप से गेहूँ और बाद में चावल के उत्पादन तथा उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
इससे देश में खाद्यान्न की उपलब्धता बढ़ी और विदेशी खाद्यान्न सहायता तथा आयात पर अत्यधिक निर्भरता धीरे-धीरे कम हुई।
हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न के मामले में अधिक आत्मनिर्भर बनने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
कृषि उत्पादन बढ़ने से कृषि आधारित उद्योगों, परिवहन, भंडारण, कृषि मशीनरी और ग्रामीण व्यापार को भी लाभ मिला।
कई क्षेत्रों में किसानों की बाजार के लिए कृषि उत्पादन करने की प्रवृत्ति बढ़ी और कृषि का व्यावसायीकरण तेज हुआ।
📗 सबसे बड़ा परिणाम
खाद्यान्न उत्पादन में तेज वृद्धि और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रगति।
हरित क्रांति की सीमाएँ
क्षेत्रीय, फसली और सामाजिक असमानताएँ
हरित क्रांति का लाभ पूरे देश में समान रूप से नहीं पहुँचा। इसका प्रारंभिक प्रभाव मुख्यतः अच्छी सिंचाई और आधारभूत संरचना वाले क्षेत्रों में अधिक रहा।
इससे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों ने तेजी से प्रगति की, जबकि वर्षा आधारित और कम विकसित कृषि क्षेत्रों को अपेक्षाकृत कम लाभ मिला। इससे क्षेत्रीय असमानता बढ़ने की चिंता उत्पन्न हुई।
हरित क्रांति मुख्यतः गेहूँ और चावल जैसी कुछ फसलों पर अधिक केंद्रित रही। दालों, तिलहनों और कई अन्य फसलों को प्रारंभिक दौर में अपेक्षाकृत कम लाभ मिला।
नई तकनीक के लिए बीज, उर्वरक, सिंचाई, मशीनरी और ऋण की आवश्यकता थी। इसलिए बड़े और संसाधन-संपन्न किसानों के लिए नई तकनीक अपनाना छोटे किसानों की तुलना में अपेक्षाकृत आसान था।
पर्यावरणीय चुनौतियाँ
मिट्टी, जल और रसायनों पर दबाव
हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की, लेकिन गहन खेती और संसाधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण कई पर्यावरणीय समस्याएँ भी सामने आईं।
रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से कुछ क्षेत्रों में मिट्टी की पोषक संरचना और मृदा स्वास्थ्य प्रभावित हुआ।
कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण, लाभकारी जीवों और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव की चिंता बढ़ी।
ट्यूबवेल आधारित गहन सिंचाई से कुछ क्षेत्रों में भूजल स्तर तेजी से गिरा।
गेहूँ-धान जैसे सीमित फसल चक्रों के लगातार उपयोग से फसल विविधता और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा।
⚠️ महत्वपूर्ण निष्कर्ष
हरित क्रांति को केवल उत्पादन वृद्धि के आधार पर नहीं समझना चाहिए; इसके क्षेत्रीय, सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं।
द्वितीय हरित क्रांति
उत्पादकता के साथ टिकाऊ कृषि
द्वितीय हरित क्रांति कोई एक निश्चित वर्ष में शुरू हुई, एक ही तकनीक वाली औपचारिक क्रांति नहीं है। इस शब्द का उपयोग कृषि में उत्पादन और उत्पादकता की अगली बड़ी वृद्धि को अधिक टिकाऊ, समावेशी और संसाधन-कुशल बनाने की व्यापक रणनीति के लिए किया जाता है।
पहली हरित क्रांति में उत्पादन बढ़ाने पर प्रमुख जोर था, जबकि दूसरी हरित क्रांति की अवधारणा में उत्पादकता + पर्यावरण संरक्षण + जल संरक्षण + मृदा स्वास्थ्य + फसल विविधीकरण + आधुनिक अनुसंधान को साथ लेकर चलने पर अधिक जोर है।
इसका उद्देश्य केवल गेहूँ और चावल का उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि दालों, तिलहनों, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन और अन्य कृषि गतिविधियों की उत्पादकता भी बढ़ाना है।
जैव-उर्वरकों का प्रयोग
मृदा स्वास्थ्य और टिकाऊ पोषण
द्वितीय हरित क्रांति और टिकाऊ कृषि की अवधारणा में रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने तथा जैव-उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है।
जैव-उर्वरकों में उपयोगी सूक्ष्मजीव होते हैं जो पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने या उनकी उपलब्धता बढ़ाने में सहायता करते हैं।
हालांकि जैव-उर्वरकों को प्रत्येक परिस्थिति में रासायनिक उर्वरकों का पूर्ण विकल्प मानना उचित नहीं है। अधिक सुरक्षित दृष्टिकोण संतुलित एवं एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन है, जिसमें जैविक, जैव-उर्वरक और आवश्यक रासायनिक पोषकों का वैज्ञानिक संतुलन रखा जाता है।
⚠️ सुधार
“रासायनिक उर्वरक पूरी तरह हटाकर जैव-उर्वरक” की बजाय रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करके संतुलित एवं जैविक विकल्पों का अधिक उपयोग लिखना अधिक सही है।
जैव-कीटनाशक और समेकित कीट प्रबंधन
रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता में कमी
द्वितीय हरित क्रांति की टिकाऊ कृषि रणनीति में रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने और जैव-कीटनाशकों को बढ़ावा देने पर जोर है।
जैव-कीटनाशक प्राकृतिक जीवों या जैविक स्रोतों पर आधारित होते हैं और अनेक परिस्थितियों में हानिकारक कीटों को नियंत्रित करने में सहायता करते हैं।
इसके साथ समेकित कीट प्रबंधन अपनाना अधिक महत्वपूर्ण है, जिसमें जैविक, कृषि-वैज्ञानिक, यांत्रिक और आवश्यकता पड़ने पर सीमित रासायनिक उपायों का संयुक्त उपयोग किया जाता है।
इसका उद्देश्य फसल संरक्षण के साथ पर्यावरण और लाभकारी जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव को कम करना है।
जल संरक्षण
हर बूंद से अधिक उत्पादन
द्वितीय हरित क्रांति की अवधारणा में जल संरक्षण और जल की उपयोग दक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र विकास, सूक्ष्म सिंचाई, ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर और खेत स्तर पर बेहतर जल प्रबंधन से कम पानी में अधिक उत्पादन प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
भूजल के अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में जल बचाने वाली तकनीकों और कम जल वाली फसलों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
संतुलित एवं उपयुक्त फसल प्रतिरूप
फसल विविधीकरण
द्वितीय हरित क्रांति में संतुलित और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसल प्रतिरूप अपनाने पर जोर दिया जाता है।
हर क्षेत्र में केवल गेहूँ और धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना उचित नहीं है। मिट्टी, वर्षा, जल उपलब्धता और स्थानीय जलवायु के अनुसार फसल का चुनाव किया जाना चाहिए।
फसल विविधीकरण के अंतर्गत दालें, तिलहन, मोटे अनाज, फल, सब्जियाँ, मसाले और अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों को उपयुक्त क्षेत्रों में बढ़ावा दिया जा सकता है।
इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करने, किसानों की आय के स्रोत बढ़ाने और पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।
द्वितीय हरित क्रांति के अन्य आधार
अनुसंधान, तकनीक और समावेशी विकास
द्वितीय हरित क्रांति केवल जैव-उर्वरक, जैव-कीटनाशक और जल संरक्षण तक सीमित नहीं है।
इसमें उच्च गुणवत्ता वाले बीज, जलवायु-सहिष्णु किस्में, जैव प्रौद्योगिकी, जीनोम आधारित अनुसंधान, कृषि प्रसार और डिजिटल तकनीक की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
मृदा स्वास्थ्य सुधारना, वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ाना और पूर्वी तथा अन्य अपेक्षाकृत कम उत्पादक क्षेत्रों में कृषि विकास तेज करना भी महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं।
कृषि बाजार, भंडारण, शीत शृंखला, प्रसंस्करण, सस्ता ऋण और किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुँचाना भी कृषि की अगली उत्पादकता वृद्धि के लिए आवश्यक है।
द्वितीय हरित क्रांति की व्यापक भावना है कि उत्पादन बढ़े, किसान की आय बढ़े और मिट्टी, जल तथा पर्यावरण भी सुरक्षित रहें।
हरित क्रांति — एक नजर में
त्वरित तुलना
| बिंदु | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|
| भारत में प्रमुख शुरुआत | 1960 के दशक का मध्य; 1966-67 के बाद तीव्र विस्तार |
| भारत में प्रमुख वैज्ञानिक | डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन |
| विश्व स्तर पर जनक | डॉ. नॉर्मन बोरलॉग |
| हरित क्रांति शब्द | विलियम एस. गॉड, 1968 |
| प्रारंभिक प्रमुख क्षेत्र | पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश |
| सबसे अधिक प्रारंभिक प्रभाव | गेहूँ |
| मुख्य तकनीकी आधार | उच्च उपज वाली किस्में, उर्वरक, सिंचाई, मशीनें |
| मुख्य परिणाम | खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि और आत्मनिर्भरता |
| मुख्य समस्या | क्षेत्रीय असमानता एवं पर्यावरणीय दबाव |
| द्वितीय हरित क्रांति | उत्पादकता के साथ टिकाऊ और संसाधन-कुशल कृषि |
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
भारत में हरित क्रांति का निर्णायक विस्तार 1966-67 के बाद हुआ।
इसका प्रारंभिक प्रमुख क्षेत्र पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश था।
भारत में हरित क्रांति के जनक — डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन।
विश्व में हरित क्रांति के जनक — डॉ. नॉर्मन बोरलॉग।
नॉर्मन बोरलॉग को 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
“हरित क्रांति” शब्द — विलियम एस. गॉड, 1968।
हरित क्रांति का मुख्य तकनीकी आधार उच्च उपज वाली किस्मों के बीज थे।
हरित क्रांति का सबसे बड़ा प्रारंभिक प्रभाव गेहूँ पर पड़ा; बाद में चावल में भी उत्पादन वृद्धि हुई।
प्रमुख घटक — उच्च उपज वाली किस्में + उर्वरक + कीटनाशक + सिंचाई + यंत्रीकरण + ऋण + सरकारी सहायता + अनुसंधान।
हरित क्रांति ने भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता बढ़ाई और खाद्यान्न आयात पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके साथ क्षेत्रीय असमानता, छोटे-बड़े किसानों के बीच अंतर, भूजल दोहन, मिट्टी पर दबाव और रासायनिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी सामने आईं।
द्वितीय हरित क्रांति किसी एक तकनीक का नाम नहीं, बल्कि अधिक उत्पादक, टिकाऊ और समावेशी कृषि की व्यापक अवधारणा है।
इसमें जैव-उर्वरक, जैव-कीटनाशक, समेकित कीट प्रबंधन, जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और संतुलित फसल प्रतिरूप महत्वपूर्ण हैं।
द्वितीय हरित क्रांति में फसल विविधीकरण, कृषि अनुसंधान, नई किस्में, आधुनिक तकनीक, कृषि प्रसार, बाजार और ग्रामीण आधारभूत संरचना भी महत्वपूर्ण हैं।
पहली हरित क्रांति → उत्पादन वृद्धि | द्वितीय हरित क्रांति → उत्पादन + संसाधन संरक्षण + टिकाऊ कृषि।