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कृषि लागत एवं मूल्य आयोग, कृषि विपणन एवं ग्रामीण साख
AGRICULTURAL INSTITUTIONS & RURAL CREDIT

कृषि संस्थाएँ एवं ग्रामीण साख

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग, कृषि विपणन, सहकारी साख, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और नाबार्ड

कृषि संस्थाओं का महत्व

भारत में किसानों को उचित मूल्य, बेहतर विपणन और संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने के लिए अनेक संस्थाओं का विकास किया गया है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग कृषि मूल्य नीति में सलाह देता है, ट्राइफेड और नैफेड विपणन से संबंधित महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं तथा सहकारी साख संस्थाएँ, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और नाबार्ड ग्रामीण वित्तीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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कृषि लागत एवं मूल्य आयोग

1960 के दशक में खाद्यान्न की कीमतों और कृषि मूल्य नीति से संबंधित समस्याओं का अध्ययन करने के बाद एक स्थायी कृषि मूल्य संस्था की आवश्यकता महसूस की गई।

इसके परिणामस्वरूप भारत सरकार ने जनवरी 1965 में कृषि मूल्य आयोग की स्थापना की। आयोग की मूल कार्य-शर्तें 8 जनवरी 1965 के सरकारी संकल्प में निर्धारित की गई थीं। :contentReference[oaicite:0]{index=0}

18 मार्च 1985 को कृषि मूल्य आयोग का नाम बदलकर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग कर दिया गया। :contentReference[oaicite:1]{index=1}

आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में है और यह भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग से संबंधित कार्यालय है। :contentReference[oaicite:2]{index=2}

🎯 याद रखें

1965 — कृषि मूल्य आयोग 1985 — कृषि लागत एवं मूल्य आयोग
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आयोग का प्रमुख कार्य

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य निर्धारित कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश केंद्र सरकार को करना है।

आयोग उत्पादन लागत, मांग और आपूर्ति, बाजार मूल्य, विभिन्न फसलों के बीच मूल्य-संतुलन, घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय कीमतों और किसानों तथा उपभोक्ताओं पर संभावित प्रभाव जैसे कारकों का अध्ययन करता है।

आयोग द्वारा अनुशंसित न्यूनतम समर्थन मूल्य अंतिम मूल्य नहीं होता। अंतिम न्यूनतम समर्थन मूल्य केंद्र सरकार निर्धारित और घोषित करती है। आयोग की सिफारिश सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होती। CACP की आधिकारिक व्यवस्था भी मूल्य को “आयोग द्वारा अनुशंसित और सरकार द्वारा निर्धारित” बताती है। :contentReference[oaicite:3]{index=3}

पुरानी पुस्तकों में आयोग के कार्य को न्यूनतम समर्थन मूल्य, खरीद मूल्य और निर्गमन मूल्य के निर्धारण में सलाह देना बताया जाता है। आधुनिक व्यवस्था में आयोग की मुख्य पहचान न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य संबंधी सिफारिशों से है। निर्गमन मूल्य खाद्य वितरण नीति से संबंधित अलग सरकारी निर्णय है।

⚠️ महत्वपूर्ण अंतर

आयोग मूल्य की सिफारिश करता है, स्वयं न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू नहीं करता।

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कृषि विपणन

कृषि विपणन से आशय कृषि उपज को किसान से उपभोक्ता तक पहुँचाने से जुड़ी गतिविधियों से है। इसमें संग्रह, ग्रेडिंग, भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण और बिक्री जैसी गतिविधियाँ शामिल होती हैं।

कृषि विपणन व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज के लिए बेहतर बाजार, उचित कीमत और बिचौलियों पर कम निर्भरता उपलब्ध कराना है।

भारत में कृषि और जनजातीय उत्पादों के विपणन में नैफेड और ट्राइफेड जैसी संस्थाओं की विशेष भूमिका है।

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ट्राइफेड

भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास महासंघ — ट्राइफेड की स्थापना अगस्त 1987 में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्था के रूप में की गई थी। :contentReference[oaicite:4]{index=4}

वर्तमान में ट्राइफेड जनजातीय कार्य मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करने वाला राष्ट्रीय स्तर का शीर्ष संगठन है। :contentReference[oaicite:5]{index=5}

इसका मुख्य उद्देश्य जनजातीय समुदायों का सामाजिक-आर्थिक विकास करना और उनके उत्पादों के लिए बेहतर विपणन अवसर उपलब्ध कराना है। :contentReference[oaicite:6]{index=6}

ट्राइफेड विशेष रूप से लघु वन उपज और जनजातीय उत्पादों के विपणन, मूल्यवर्धन और बाजार विकास से जुड़ा है। इसका उद्देश्य जनजातीय उत्पादकों को स्थानीय बिचौलियों के शोषण से बचाने और उन्हें बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सहायता करना है। :contentReference[oaicite:7]{index=7}

🎯 परीक्षा तथ्य

ट्राइफेड — 1987 — जनजातीय उत्पाद एवं लघु वन उपज — जनजातीय कार्य मंत्रालय

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नैफेड

राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ — नैफेड की स्थापना 2 अक्टूबर 1958 को की गई थी। यह बहु-राज्य सहकारी संस्था है। :contentReference[oaicite:8]{index=8}

नैफेड का मुख्य उद्देश्य किसानों के लाभ के लिए कृषि उपज के सहकारी विपणन को प्रोत्साहित करना है। :contentReference[oaicite:9]{index=9}

यह कृषि, बागवानी और वन उपज के विपणन, प्रसंस्करण और भंडारण तथा कृषि आदानों और संबंधित व्यापारिक गतिविधियों से भी जुड़ा है। :contentReference[oaicite:10]{index=10}

नैफेड सरकारी मूल्य समर्थन तथा बाजार हस्तक्षेप संबंधी विभिन्न कार्यक्रमों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

🎯 भ्रम से बचें

ट्राइफेड = जनजातीय उत्पाद
नैफेड = कृषि उपज का सहकारी विपणन

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ग्रामीण सहकारी साख व्यवस्था

भारत में कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सहकारी साख व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है।

अल्पकालीन सहकारी साख संरचना सामान्यतः तीन स्तरों पर कार्य करती है— ग्राम स्तर पर प्राथमिक कृषि साख समिति, जिला स्तर पर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और राज्य स्तर पर राज्य सहकारी बैंक। NABARD भी PACS को इस त्रिस्तरीय अल्पकालीन संरचना की जमीनी इकाई बताता है। :contentReference[oaicite:11]{index=11}

🧠 तीन स्तर

ग्राम — प्राथमिक कृषि साख समिति जिला — जिला केंद्रीय सहकारी बैंक राज्य — राज्य सहकारी बैंक
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प्राथमिक कृषि साख समिति

प्राथमिक कृषि साख समिति ग्रामीण अल्पकालीन सहकारी साख संरचना की सबसे निचली और किसान के सबसे निकट स्थित इकाई है।

यह सामान्यतः ग्राम या स्थानीय स्तर पर कार्य करती है और इसके सदस्य मुख्यतः किसान, ग्रामीण कारीगर तथा अन्य स्थानीय सदस्य होते हैं। :contentReference[oaicite:12]{index=12}

इसका प्रमुख कार्य अपने सदस्यों को कृषि और अन्य आवश्यकताओं के लिए ऋण उपलब्ध कराना है।

प्राथमिक कृषि साख समितियाँ सदस्यों से जमा भी स्वीकार कर सकती हैं तथा उच्च सहकारी संस्थाओं से प्राप्त धन के माध्यम से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण देती हैं। :contentReference[oaicite:13]{index=13}

इनके माध्यम से किसानों को खाद, बीज, कीटनाशक और कृषि सामग्री उपलब्ध कराने, भंडारण और कृषि उपज के विपणन जैसी सेवाएँ भी दी जा सकती हैं। :contentReference[oaicite:14]{index=14}

ये ग्रामीण क्षेत्रों में बचत और पारस्परिक सहयोग की भावना को भी प्रोत्साहित करती हैं।

🎯 एक लाइन में

प्राथमिक कृषि साख समिति = ग्राम स्तर + किसान से सीधा संपर्क

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जिला केंद्रीय सहकारी बैंक

जिला केंद्रीय सहकारी बैंक सहकारी साख व्यवस्था के मध्य स्तर पर कार्य करता है।

इसका कार्य क्षेत्र सामान्यतः जिला स्तर का होता है।

यह जिले की प्राथमिक कृषि साख समितियों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराता है और उनके तथा उच्च स्तर की सहकारी बैंकिंग व्यवस्था के बीच कड़ी का काम करता है।

जिला केंद्रीय सहकारी बैंक अपने नियमों और संबंधित राज्य कानूनों के अनुसार किसानों, सहकारी संस्थाओं तथा अन्य पात्र ग्राहकों को बैंकिंग और ऋण सुविधाएँ भी प्रदान कर सकते हैं।

इनकी सदस्यता में मुख्यतः प्राथमिक सहकारी समितियाँ होती हैं; कुछ राज्यों में व्यक्ति अथवा अन्य सहकारी संस्थाएँ भी संबंधित कानूनों के अनुसार सदस्य हो सकती हैं।

⚠️ शब्द-सावधानी

जिला केंद्रीय सहकारी बैंक को केवल “प्राथमिक कृषि साख समितियों को पुनर्वित्त देने वाली संस्था” कहना अधूरा है। यह उन्हें ऋण/वित्त उपलब्ध कराता है; व्यापक पुनर्वित्त व्यवस्था में नाबार्ड की शीर्ष भूमिका होती है।

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राज्य सहकारी बैंक

राज्य सहकारी बैंक राज्य की अल्पकालीन सहकारी साख संरचना का शीर्ष स्तर होता है।

यह राज्य स्तर पर जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और सहकारी साख व्यवस्था को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

राज्य सहकारी बैंक नाबार्ड से प्राप्त पुनर्वित्त और अन्य संसाधनों को सहकारी साख व्यवस्था के निचले स्तरों तक पहुँचाने का माध्यम बन सकता है।

जिला केंद्रीय सहकारी बैंक सामान्यतः राज्य सहकारी बैंक की सदस्य संरचना का महत्वपूर्ण भाग होते हैं।

राज्य सहकारी बैंक सहकारी साख व्यवस्था में समन्वय और शीर्ष बैंकिंग संस्था की भूमिका निभाता है।

⚠️ नियमन में भ्रम न करें

राज्य सहकारी बैंक स्वयं पूरे सहकारी बैंकिंग क्षेत्र का अंतिम नियामक नहीं है। सहकारी बैंकों पर बैंकिंग नियमन, पर्यवेक्षण और सहकारी कानूनों के संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक, नाबार्ड तथा संबंधित राज्य प्राधिकरणों की अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं।

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सहकारी साख का प्रवाह

🧠 आसान क्रम

नाबार्ड राज्य सहकारी बैंक जिला केंद्रीय सहकारी बैंक प्राथमिक कृषि साख समिति किसान

यह क्रम अल्पकालीन सहकारी कृषि साख के सामान्य संस्थागत संबंध को समझने का आसान तरीका है।

व्यवहार में वित्त के स्रोत, प्रत्यक्ष ऋण, राज्य-विशिष्ट संरचना और पुनर्वित्त व्यवस्था के कारण इसमें अंतर हो सकता है।

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किसानों को दीर्घकालीन कृषि ऋण

पारंपरिक सहकारी साख व्यवस्था में किसानों की दीर्घकालीन आवश्यकताओं के लिए भूमि विकास बैंक महत्वपूर्ण संस्थाएँ रहे हैं।

इनका संबंध भूमि सुधार, सिंचाई, कृषि विकास और अन्य दीर्घकालीन कृषि निवेशों के लिए ऋण उपलब्ध कराने से रहा है।

कई स्थानों पर ऐसी संस्थाओं को सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक जैसे नामों से भी जाना जाता है।

लेकिन वर्तमान कृषि वित्त व्यवस्था में यह कहना सही नहीं है कि किसानों को दीर्घकालीन ऋण केवल भूमि विकास बैंक ही देते हैं। वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और अन्य पात्र बैंक भी कृषि उपकरण, सिंचाई, भूमि विकास तथा संबंधित निवेश के लिए मध्यम और दीर्घकालीन ऋण देते हैं। :contentReference[oaicite:15]{index=15}

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क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे और सीमांत किसानों, कृषि मजदूरों, छोटे उद्यमियों और अन्य कमजोर वर्गों को संस्थागत बैंकिंग तथा ऋण सुविधाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई।

इनकी स्थापना 1975 में एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता वाले कार्य समूह की सिफारिशों के आधार पर की गई थी। वित्तीय सेवा विभाग के आधिकारिक विवरण में भी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना को 1975 के नरसिम्हम कार्य समूह की सिफारिशों से जोड़ा गया है। :contentReference[oaicite:16]{index=16}

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की प्रक्रिया 1975 में शुरू हुई और बाद में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 के माध्यम से इन्हें वैधानिक आधार मिला।

भारतीय रिजर्व बैंक के ऐतिहासिक विवरण में सितंबर 1975 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना को ग्रामीण लोगों तक ऋण पहुँचाने की महत्वपूर्ण पहल बताया गया है। :contentReference[oaicite:17]{index=17}

🎯 परीक्षा तथ्य

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक — 1975 — एम. नरसिम्हम कार्य समूह

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नाबार्ड

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक — नाबार्ड भारत की कृषि एवं ग्रामीण विकास वित्त व्यवस्था की प्रमुख शीर्ष विकास वित्तीय संस्था है।

इसकी स्थापना 12 जुलाई 1982 को राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 के आधार पर की गई। भारतीय रिजर्व बैंक के आधिकारिक इतिहास में भी 12 जुलाई 1982 को इसकी स्थापना दर्ज है। :contentReference[oaicite:18]{index=18}

नाबार्ड की स्थापना से पहले कृषि और ग्रामीण ऋण व्यवस्था की समीक्षा के लिए कृषि और ग्रामीण विकास के लिए संस्थागत ऋण व्यवस्था की समीक्षा समिति गठित की गई थी।

इस समिति की अध्यक्षता बी. शिवरामन ने की थी। इसी समिति की सिफारिशों ने नाबार्ड की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।

इसलिए इसे “शिवरमन सिंह समिति” कहना सही नहीं है। सही नाम बी. शिवरामन समिति है।

🎯 सीधा प्रश्न

नाबार्ड — 12 जुलाई 1982 — बी. शिवरामन समिति

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नाबार्ड के प्रमुख कार्य

नाबार्ड का उद्देश्य कृषि, लघु उद्योग, कुटीर एवं ग्राम उद्योग, हस्तशिल्प तथा अन्य ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण और विकासात्मक सहायता की संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करना है। :contentReference[oaicite:19]{index=19}

यह सहकारी बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और अन्य पात्र वित्तीय संस्थाओं को कृषि तथा ग्रामीण विकास के लिए पुनर्वित्त उपलब्ध कराता है।

नाबार्ड ग्रामीण ऋण संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने, ग्रामीण आधारभूत संरचना, वित्तीय समावेशन और विकास कार्यक्रमों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के संबंध में नाबार्ड की निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण संबंधी भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ हैं।

नाबार्ड सामान्यतः किसानों के लिए वाणिज्यिक बैंक जैसी प्रत्यक्ष शाखा-आधारित खुदरा ऋण संस्था नहीं है; इसकी प्रमुख भूमिका ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं और विकास कार्यक्रमों को मजबूत करना है।

⚠️ भ्रम से बचें

नाबार्ड = कृषि एवं ग्रामीण विकास की शीर्ष विकास वित्तीय संस्था; इसे सामान्य किसान को सीधे फसल ऋण देने वाला साधारण बैंक न समझें।

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प्रमुख संस्थाएँ — एक नज़र में

संस्था स्थापना मुख्य कार्य
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग 1965; वर्तमान नाम 1985 न्यूनतम समर्थन मूल्य संबंधी सिफारिश
नैफेड 2 अक्टूबर 1958 कृषि उपज का सहकारी विपणन
ट्राइफेड अगस्त 1987 जनजातीय उत्पादों एवं लघु वन उपज का विपणन
प्राथमिक कृषि साख समिति ग्राम स्तर किसानों को स्थानीय सहकारी साख और सेवाएँ
जिला केंद्रीय सहकारी बैंक जिला स्तर प्राथमिक समितियों को वित्त और बैंकिंग सहायता
राज्य सहकारी बैंक राज्य स्तर राज्य की अल्पकालीन सहकारी साख संरचना का शीर्ष बैंक
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक 1975 ग्रामीण और कमजोर वर्गों को संस्थागत बैंकिंग एवं ऋण
नाबार्ड 12 जुलाई 1982 कृषि एवं ग्रामीण विकास की शीर्ष विकास वित्तीय संस्था
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महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

भ्रम: कृषि लागत एवं मूल्य आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित और लागू करता है।
सही: आयोग मूल्य की सिफारिश करता है; अंतिम निर्णय और घोषणा केंद्र सरकार करती है।

भ्रम: कृषि लागत एवं मूल्य आयोग वर्तमान निर्गमन मूल्य निर्धारित करता है।
सही: आयोग की मुख्य भूमिका कृषि मूल्य नीति और न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश है; खाद्यान्न का निर्गमन मूल्य अलग खाद्य वितरण नीति का विषय है।

भ्रम: नैफेड और ट्राइफेड एक जैसी संस्थाएँ हैं।
सही: नैफेड मुख्यतः कृषि उपज के सहकारी विपणन से जुड़ा है, जबकि ट्राइफेड जनजातीय उत्पादों और लघु वन उपज के बाजार विकास पर केंद्रित है।

भ्रम: जिला केंद्रीय सहकारी बैंक ही अंतिम पुनर्वित्त संस्था है।
सही: वह प्राथमिक समितियों को वित्त उपलब्ध कराता है; राष्ट्रीय स्तर पर कृषि एवं ग्रामीण पुनर्वित्त की शीर्ष भूमिका नाबार्ड की है।

भ्रम: राज्य सहकारी बैंक ही सहकारी बैंकों का पूरा नियमन करता है।
सही: नियमन और पर्यवेक्षण में भारतीय रिजर्व बैंक, नाबार्ड और राज्य स्तर के सहकारी प्राधिकरणों की अलग-अलग भूमिकाएँ हैं।

भ्रम: किसानों को दीर्घकालीन ऋण केवल भूमि विकास बैंक देते हैं।
सही: भूमि विकास बैंक पारंपरिक महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन वाणिज्यिक बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक आदि भी दीर्घकालीन कृषि ऋण देते हैं।

भ्रम: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना “नरसिम्हन समिति” की किसी बाद की बैंकिंग सुधार रिपोर्ट से हुई।
सही: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का संबंध 1975 के एम. नरसिम्हम कार्य समूह से है; इसे 1990 के दशक की नरसिम्हम बैंकिंग सुधार समितियों से न मिलाएँ।

भ्रम: नाबार्ड की स्थापना शिवरमन सिंह समिति की सिफारिश पर हुई।
सही: सही नाम बी. शिवरामन है।

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त्वरित पुनरावृत्ति

⚡ एक नज़र में

1958 — नैफेड 1965 — कृषि मूल्य आयोग 1975 — क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
1982 — नाबार्ड 1985 — कृषि लागत एवं मूल्य आयोग 1987 — ट्राइफेड
ग्राम — प्राथमिक कृषि साख समिति जिला — जिला केंद्रीय सहकारी बैंक राज्य — राज्य सहकारी बैंक

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

कृषि मूल्य आयोग की स्थापना 1965 में हुई और 1985 में इसका नाम कृषि लागत एवं मूल्य आयोग रखा गया। :contentReference[oaicite:20]{index=20}

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करता है; अंतिम मूल्य केंद्र सरकार निर्धारित करती है। :contentReference[oaicite:21]{index=21}

नैफेड — 2 अक्टूबर 1958 — कृषि उपज का सहकारी विपणन। :contentReference[oaicite:22]{index=22}

ट्राइफेड — अगस्त 1987 — जनजातीय उत्पाद और लघु वन उपज। :contentReference[oaicite:23]{index=23}

अल्पकालीन ग्रामीण सहकारी साख का सामान्य क्रम— प्राथमिक कृषि साख समिति → जिला केंद्रीय सहकारी बैंक → राज्य सहकारी बैंक। :contentReference[oaicite:24]{index=24}

प्राथमिक कृषि साख समिति = ग्राम स्तर

जिला केंद्रीय सहकारी बैंक = जिला स्तर

राज्य सहकारी बैंक = राज्य स्तर

भूमि विकास बैंक पारंपरिक रूप से दीर्घकालीन कृषि ऋण से जुड़े हैं, लेकिन वर्तमान में अन्य बैंक भी मध्यम और दीर्घकालीन कृषि ऋण उपलब्ध कराते हैं। :contentReference[oaicite:25]{index=25}

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक — 1975 — एम. नरसिम्हम कार्य समूह। :contentReference[oaicite:26]{index=26}

नाबार्ड — 12 जुलाई 1982। :contentReference[oaicite:27]{index=27}

नाबार्ड की स्थापना की सिफारिश से संबंधित सही नाम बी. शिवरामन समिति है।

नाबार्ड कृषि एवं ग्रामीण विकास की शीर्ष विकास वित्तीय संस्था है और ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं को पुनर्वित्त तथा विकासात्मक सहायता उपलब्ध कराता है।

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