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भारतीय पूंजी बाजार
INDIAN CAPITAL MARKET

भारतीय पूंजी बाजार

प्राथमिक बाजार, द्वितीयक बाजार, प्रतिभूतियाँ, स्टॉक एक्सचेंज और सेबी

पूंजी बाजार क्या है?

भारतीय पूंजी बाजार वह वित्तीय बाजार है जहाँ मुख्यतः मध्यम और लंबी अवधि के लिए धन जुटाने तथा निवेश करने से संबंधित प्रतिभूतियों का निर्गमन और लेन-देन होता है। इसमें शेयर, बॉण्ड, डिबेंचर तथा अन्य पूंजी बाजार प्रतिभूतियाँ शामिल हो सकती हैं।

यह बाजार कंपनियों, सरकार और अन्य पात्र संस्थाओं को पूंजी जुटाने का अवसर देता है तथा निवेशकों को अपनी बचत को प्रतिभूतियों में निवेश करने का माध्यम प्रदान करता है।

भारतीय प्रतिभूति बाजार को समझने के लिए इसके दो सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं—प्राथमिक बाजार और द्वितीयक बाजार। प्राथमिक बाजार में नई प्रतिभूतियाँ जारी की जाती हैं, जबकि द्वितीयक बाजार में पहले से जारी प्रतिभूतियों का निवेशकों के बीच लेन-देन होता है।

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पूंजी बाजार का महत्व

बचत को निवेश और उत्पादन से जोड़ना

पूंजी बाजार अर्थव्यवस्था में बचतकर्ताओं और पूंजी की आवश्यकता वाली संस्थाओं के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करता है।

कंपनियाँ इस बाजार के माध्यम से कारखाने स्थापित करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नई तकनीक अपनाने, अधिग्रहण करने और अन्य दीर्घकालीन व्यावसायिक आवश्यकताओं के लिए धन जुटा सकती हैं।

निवेशकों को शेयर, बॉण्ड और अन्य प्रतिभूतियों में निवेश के माध्यम से पूंजी वृद्धि, ब्याज अथवा लाभांश जैसे संभावित प्रतिफल प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

पूंजी बाजार उद्योग, आधारभूत संरचना और व्यापार विस्तार के लिए संसाधन जुटाकर देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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प्राथमिक बाजार

नई प्रतिभूतियों का निर्गमन

प्राथमिक बाजार वह बाजार है जहाँ कंपनियाँ अथवा अन्य पात्र जारीकर्ता निवेशकों को नई प्रतिभूतियाँ जारी करते हैं।

यह जरूरी नहीं कि कंपनी प्राथमिक बाजार में केवल “पहली बार” ही शेयर जारी करे। किसी कंपनी का पहली बार सार्वजनिक रूप से शेयर जारी करना आरंभिक सार्वजनिक निर्गम कहलाता है, लेकिन पहले से सूचीबद्ध कंपनी भी नए शेयर जारी कर सकती है।

इसलिए प्राथमिक बाजार का सही अर्थ है—नई प्रतिभूतियों का निर्गमन, चाहे जारीकर्ता पहली बार बाजार में आया हो या पहले से सूचीबद्ध हो।

SEBI के निवेशक शिक्षा पोर्टल के अनुसार प्राथमिक बाजार में नए शेयरों के साथ कॉरपोरेट बॉण्ड और सरकारी बॉण्ड जैसी नई प्रतिभूतियाँ भी निवेशकों को जारी की जा सकती हैं।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

प्राथमिक बाजार = केवल पहली बार शेयर जारी करना नहीं। पहली बार सार्वजनिक निर्गम उसका एक प्रकार है; मूल विशेषता नई प्रतिभूतियों का जारी होना है।

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आरंभिक और अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम

नई पूंजी जुटाने के प्रमुख तरीके

जब कोई कंपनी पहली बार आम जनता को अपने शेयर जारी करती है, उसे आरंभिक सार्वजनिक निर्गम कहा जाता है। इसके बाद कंपनी के शेयर पात्र स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हो सकते हैं।

यदि पहले से सूचीबद्ध कंपनी बाद में जनता को अतिरिक्त नए शेयर जारी करती है, तो इसे अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम कहा जाता है।

कंपनियाँ अधिकार निर्गम, निजी नियोजन और अन्य अनुमत तरीकों से भी पूंजी जुटा सकती हैं।

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द्वितीयक बाजार

पहले से जारी प्रतिभूतियों का व्यापार

द्वितीयक बाजार वह बाजार है जहाँ पहले से जारी और उपलब्ध प्रतिभूतियों का निवेशकों के बीच क्रय-विक्रय होता है।

यहाँ सामान्यतः निवेशक प्रतिभूति जारी करने वाली कंपनी से सीधे खरीदने के बजाय किसी अन्य निवेशक से प्रतिभूति खरीदता है अथवा उसे बेचता है।

SEBI के अनुसार शेयर बाजार और स्टॉक एक्सचेंज द्वितीयक बाजार के महत्वपूर्ण भाग हैं। द्वितीयक बाजार प्रतिभूतियों को तरलता प्रदान करता है, क्योंकि निवेशक अपनी प्रतिभूतियों को खरीद या बेच सकते हैं।

स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से मांग और आपूर्ति के आधार पर प्रतिभूतियों का बाजार मूल्य निर्धारित होने में सहायता मिलती है, जिसे मूल्य खोज कहा जाता है।

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प्राथमिक और द्वितीयक बाजार में अंतर

नई प्रतिभूति बनाम पुरानी प्रतिभूति

आधार प्राथमिक बाजार द्वितीयक बाजार
प्रतिभूति नई प्रतिभूतियाँ जारी होती हैं पहले से जारी प्रतिभूतियों का व्यापार होता है
मुख्य पक्ष जारीकर्ता संस्था और निवेशक मुख्यतः निवेशकों के बीच लेन-देन
मुख्य उद्देश्य नई पूंजी जुटाना तरलता और व्यापार उपलब्ध कराना
उदाहरण आरंभिक सार्वजनिक निर्गम, अनुवर्ती निर्गम, नए बॉण्ड स्टॉक एक्सचेंज पर शेयर या अन्य सूचीबद्ध प्रतिभूति की खरीद-बिक्री
पैसा किसे मिलता है? नई प्रतिभूति जारी करने वाली संस्था को सामान्य खरीद-बिक्री में प्रतिभूति बेचने वाले निवेशक को
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पूंजी बाजार की प्रमुख प्रतिभूतियाँ

शेयर, बॉण्ड और डिबेंचर

शेयर

कंपनी के स्वामित्व में हिस्सेदारी

बॉण्ड

ऋण आधारित प्रतिभूति

डिबेंचर

कंपनी द्वारा पूंजी जुटाने का ऋण साधन

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शेयर

कंपनी में स्वामित्व का हिस्सा

शेयर कंपनी की पूंजी में स्वामित्व का एक हिस्सा दर्शाता है। शेयर खरीदने वाला व्यक्ति उस कंपनी का शेयरधारक बनता है।

इक्विटी शेयरधारक को कंपनी के लाभ की स्थिति में लाभांश प्राप्त हो सकता है और शेयर के बाजार मूल्य में वृद्धि से पूंजीगत लाभ भी हो सकता है।

लेकिन शेयरों पर प्रतिफल निश्चित नहीं होता और शेयर का मूल्य घट भी सकता है। इसलिए शेयर निवेश में जोखिम होता है।

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बॉण्ड और डिबेंचर

ऋण के माध्यम से पूंजी जुटाना

बॉण्ड एक ऋण प्रतिभूति है। इसे जारी करने वाली संस्था निवेशक से धन उधार लेती है और निर्धारित शर्तों के अनुसार ब्याज तथा मूलधन चुकाने का वादा करती है।

सरकार, सार्वजनिक संस्थाएँ और कंपनियाँ विभिन्न प्रकार के बॉण्ड जारी कर सकती हैं।

डिबेंचर सामान्यतः कंपनियों द्वारा जारी किया जाने वाला ऋण साधन है। इसके धारक कंपनी के मालिक नहीं, बल्कि ऋणदाता होते हैं।

शेयर और ऋण प्रतिभूतियों में सबसे सरल अंतर यह है कि शेयर स्वामित्व दर्शाता है, जबकि बॉण्ड या डिबेंचर ऋण संबंध दर्शाता है।

🎯 याद रखें

शेयर = स्वामित्व   |   बॉण्ड/डिबेंचर = ऋण

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स्टॉक एक्सचेंज

संगठित प्रतिभूति व्यापार का मंच

स्टॉक एक्सचेंज निवेशकों को सूचीबद्ध प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री के लिए संगठित इलेक्ट्रॉनिक मंच प्रदान करते हैं।

स्टॉक एक्सचेंज बाजार में तरलता, पारदर्शिता और मूल्य खोज को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत के दो सबसे प्रसिद्ध स्टॉक एक्सचेंज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज हैं।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्टॉक एक्सचेंज स्वयं पूरे पूंजी बाजार के नियामक नहीं होते। वे बाजार की आधारभूत संस्थाएँ हैं और लागू कानूनों तथा SEBI के नियामकीय ढाँचे के अंतर्गत काम करते हैं।

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सेबी

भारतीय प्रतिभूति बाजार का प्रमुख नियामक

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड—सेबी भारत के प्रतिभूति बाजार का प्रमुख नियामक है। इसका उद्देश्य प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले निवेशकों के हितों की रक्षा करना, प्रतिभूति बाजार के विकास को बढ़ावा देना और बाजार को विनियमित करना है।

सेबी का गठन सबसे पहले 12 अप्रैल 1988 को भारत सरकार के प्रस्ताव द्वारा गैर-वैधानिक संस्था के रूप में किया गया था।

1992 में सेबी को वैधानिक दर्जा मिला। सेबी अधिनियम, 1992 ने इसे कानूनी और नियामकीय शक्तियाँ प्रदान कीं।

इसलिए परीक्षा में “SEBI की स्थापना 1988” और “वैधानिक दर्जा 1992” दोनों तथ्य अलग-अलग याद रखना चाहिए।

🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण

SEBI — 1988 में गठन — 1992 में वैधानिक दर्जा

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सेबी के प्रमुख कार्य

निवेशक संरक्षण, विकास और विनियमन

निवेशक संरक्षण: प्रतिभूति बाजार में निवेशकों के हितों की रक्षा करना।

प्रतिभूति बाजार का विनियमन: स्टॉक एक्सचेंज, बाजार मध्यस्थों और प्रतिभूति बाजार से संबंधित विभिन्न गतिविधियों को लागू कानूनों और नियमों के अनुसार नियंत्रित करना।

बाजार विकास: भारतीय प्रतिभूति बाजार को अधिक पारदर्शी, कुशल और विकसित बनाने के लिए उपाय करना।

अनुचित व्यवहार पर नियंत्रण: धोखाधड़ी, बाजार में हेरफेर और अंदरूनी व्यापार जैसी प्रतिबंधित गतिविधियों के विरुद्ध नियामकीय कार्रवाई करना।

प्रकटीकरण और पारदर्शिता: सूचीबद्ध कंपनियों और प्रतिभूति जारीकर्ताओं के लिए निर्धारित प्रकटीकरण नियमों का पालन सुनिश्चित करना।

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डिमैट खाता और डिपॉजिटरी

प्रतिभूतियों का इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप

आधुनिक भारतीय प्रतिभूति बाजार में शेयर और कई अन्य प्रतिभूतियाँ मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक या डिमैट रूप में रखी जाती हैं।

डिपॉजिटरी ऐसी बाजार आधारभूत संस्था है जो प्रतिभूतियों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखने और उनके सुरक्षित हस्तांतरण की व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारत में प्रमुख डिपॉजिटरी नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड और सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड हैं।

निवेशक सीधे डिपॉजिटरी से सामान्य खुदरा सेवा नहीं लेता, बल्कि अधिकतर डिपॉजिटरी प्रतिभागी के माध्यम से डिमैट खाता संचालित करता है।

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ब्रोकर की भूमिका

निवेशक और स्टॉक एक्सचेंज के बीच मध्यस्थ

स्टॉक ब्रोकर निवेशकों को स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से प्रतिभूतियाँ खरीदने और बेचने की सुविधा प्रदान करता है।

निवेशक सामान्यतः किसी पंजीकृत ब्रोकर के माध्यम से ट्रेडिंग खाता खोलकर शेयरों और अन्य पात्र प्रतिभूतियों में लेन-देन करता है।

ब्रोकर को लागू SEBI नियमों और स्टॉक एक्सचेंज के नियमों का पालन करना होता है।

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पूंजी बाजार और मुद्रा बाजार में अंतर

लंबी अवधि बनाम अल्पकालीन धन

आधार पूंजी बाजार मुद्रा बाजार
मुख्य अवधि मुख्यतः मध्यम और लंबी अवधि मुख्यतः एक वर्ष तक की अल्पकालीन धनराशि
मुख्य साधन शेयर, बॉण्ड, डिबेंचर आदि ट्रेजरी बिल, वाणिज्यिक पत्र, जमा प्रमाणपत्र आदि
मुख्य उद्देश्य दीर्घकालीन पूंजी जुटाना अल्पकालीन तरलता और कार्यशील धन की आवश्यकता पूरी करना
प्रमुख नियामकीय भूमिका प्रतिभूति बाजार में SEBI की केंद्रीय भूमिका मुद्रा बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक की प्रमुख भूमिका
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पूंजी बाजार की आर्थिक भूमिका

उद्योग और आधारभूत संरचना को संसाधन

पूंजी निर्माण: घरेलू बचत को उत्पादक निवेश में बदलने में सहायता करता है।

उद्योगों को वित्त: कंपनियों को लंबे समय की व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने का माध्यम देता है।

आधारभूत संरचना: बॉण्ड और अन्य प्रतिभूतियों के माध्यम से सड़क, ऊर्जा, परिवहन और अन्य बड़े निवेश क्षेत्रों के लिए पूंजी जुटाई जा सकती है।

तरलता: द्वितीयक बाजार निवेशकों को अपनी प्रतिभूतियों को बेचने और दूसरे निवेश में जाने की सुविधा देता है।

मूल्य खोज: बाजार में खरीदारों और विक्रेताओं की मांग-आपूर्ति के माध्यम से प्रतिभूतियों के बाजार मूल्य का निर्धारण होता है।

निवेश के अवसर: अलग-अलग जोखिम और प्रतिफल वाले वित्तीय साधनों में निवेश का अवसर मिलता है।

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महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

परीक्षा में गलती से बचने के लिए

पूंजी बाजार: मुख्यतः मध्यम और लंबी अवधि की पूंजी से जुड़ा बाजार है; इसे केवल शेयर बाजार न समझें।

प्राथमिक बाजार: केवल पहली बार शेयर जारी करने का बाजार नहीं है। इसमें सभी प्रकार की नई प्रतिभूतियों का निर्गमन शामिल हो सकता है।

आरंभिक सार्वजनिक निर्गम: कंपनी द्वारा पहली बार जनता को शेयर जारी करना।

द्वितीयक बाजार: पहले से जारी प्रतिभूतियों का निवेशकों के बीच लेन-देन।

शेयर: कंपनी में स्वामित्व का हिस्सा।

बॉण्ड और डिबेंचर: ऋण आधारित साधन।

स्टॉक एक्सचेंज: प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री का संगठित मंच है; यह पूरे प्रतिभूति बाजार का मुख्य नियामक नहीं है।

SEBI: 1988 में गैर-वैधानिक संस्था के रूप में गठित और 1992 में वैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।

SEBI का मुख्य उद्देश्य: निवेशक हितों की रक्षा, प्रतिभूति बाजार का विकास और विनियमन।

पूंजी बाजार और मुद्रा बाजार अलग हैं: पूंजी बाजार मुख्यतः दीर्घकालीन संसाधनों से और मुद्रा बाजार अल्पकालीन धन से जुड़ा है।

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त्वरित पुनरावृत्ति

पूंजी बाजार को एक क्रम में याद करें

⚡ आसान क्रम

नई प्रतिभूति — प्राथमिक बाजार पुरानी प्रतिभूति — द्वितीयक बाजार व्यापार — स्टॉक एक्सचेंज नियमन — SEBI

शेयर = स्वामित्व

बॉण्ड/डिबेंचर = ऋण

प्राथमिक बाजार = नई प्रतिभूति

द्वितीयक बाजार = पहले से जारी प्रतिभूति

SEBI = 1988 गठन, 1992 वैधानिक दर्जा

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

भारतीय पूंजी बाजार मुख्यतः मध्यम और लंबी अवधि की पूंजी जुटाने तथा निवेश करने से संबंधित वित्तीय बाजार है।

इसके प्रमुख वित्तीय साधनों में शेयर, बॉण्ड और डिबेंचर शामिल हैं।

पूंजी बाजार के दो महत्वपूर्ण भाग — प्राथमिक बाजार और द्वितीयक बाजार

प्राथमिक बाजार में नई प्रतिभूतियाँ जारी की जाती हैं।

आरंभिक सार्वजनिक निर्गम किसी कंपनी द्वारा पहली बार जनता को शेयर जारी करने की प्रक्रिया है।

द्वितीयक बाजार में पहले से जारी प्रतिभूतियों की निवेशकों के बीच खरीद-बिक्री होती है।

स्टॉक एक्सचेंज द्वितीयक बाजार में संगठित व्यापार, तरलता और मूल्य खोज का महत्वपूर्ण मंच है।

शेयर स्वामित्व दर्शाता है, जबकि बॉण्ड और डिबेंचर ऋण दर्शाते हैं।

SEBI का गठन 12 अप्रैल 1988 को गैर-वैधानिक संस्था के रूप में हुआ।

1992 में SEBI को वैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।

SEBI का उद्देश्य निवेशकों के हितों की रक्षा, प्रतिभूति बाजार का विकास और उसका विनियमन करना है।

भारत के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज शामिल हैं।

पूंजी बाजार और मुद्रा बाजार अलग हैं—पूंजी बाजार मुख्यतः लंबी अवधि और मुद्रा बाजार मुख्यतः एक वर्ष तक के अल्पकालीन धन से संबंधित है।

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