उच्च न्यायालय
संवैधानिक प्रावधान, अधिकारिता, रिट, न्यायाधीश एवं ऐतिहासिक विकास
उच्च न्यायालय का परिचय
उच्च न्यायालय किसी राज्य की न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च न्यायालय होता है। यह अपने अधिकार क्षेत्र में अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनता है तथा संविधान और विभिन्न कानूनों द्वारा प्रदान की गई मूल, अपीलीय, रिट एवं पर्यवेक्षण संबंधी शक्तियों का प्रयोग करता है।
भारतीय संविधान के भाग-6 के अध्याय-5 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं।
उच्च न्यायालय की संवैधानिक व्यवस्था
अनुच्छेद 214 और साझा उच्च न्यायालय
संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत के प्रत्येक केंद्रशासित प्रदेश का अपना अलग उच्च न्यायालय होना अनिवार्य है। कुछ केंद्रशासित प्रदेश किसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
संविधान का अनुच्छेद 231 संसद को दो या दो से अधिक राज्यों अथवा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय स्थापित करने की अनुमति देता है।
भारत में वर्तमान में 25 उच्च न्यायालय हैं। इसलिए उच्च न्यायालयों की संख्या राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की कुल संख्या के बराबर नहीं है।
🎯 परीक्षा में याद रखें
अनुच्छेद 214 — राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 231 — दो या अधिक राज्यों/राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के लिए साझा उच्च न्यायालय
उच्च न्यायालय की संरचना
मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश
संविधान के अनुच्छेद 216 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा आवश्यक समझे जाने वाले अन्य न्यायाधीश होते हैं।
इस प्रकार प्रत्येक उच्च न्यायालय का अपना मुख्य न्यायाधीश होता है। न्यायाधीशों की संख्या सभी उच्च न्यायालयों में समान नहीं होती।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इससे संबंधित मुख्य प्रावधान अनुच्छेद 217 में दिया गया है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति
अनुच्छेद 217
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श का संवैधानिक प्रावधान है।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
न्यायाधीश बनने की योग्यता
मुख्य संवैधानिक योग्यताएँ
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना आवश्यक है।
उसने भारत के क्षेत्र में कम-से-कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण किया हो; अथवा
वह एक या अधिक उच्च न्यायालयों में लगातार कम-से-कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो।
📗 याद रखने का सूत्र
भारत का नागरिक + 10 वर्ष न्यायिक पद अथवा 10 वर्ष उच्च न्यायालय का अधिवक्ता
उच्च न्यायालय की शक्तियाँ और अधिकारिता
मूल, रिट, अपीलीय एवं पर्यवेक्षण संबंधी अधिकार
उच्च न्यायालय की अधिकारिता को सामान्यतः मूल अधिकारिता, रिट अधिकारिता, अपीलीय अधिकारिता और पर्यवेक्षण संबंधी अधिकारिता के रूप में समझा जाता है।
सभी उच्च न्यायालयों की प्रत्येक प्रकार की मूल अधिकारिता बिल्कुल समान नहीं होती। इसका स्वरूप संविधान, संसद और राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों तथा कुछ उच्च न्यायालयों की ऐतिहासिक चार्टर-आधारित शक्तियों से निर्धारित हो सकता है।
मूल अधिकारिता
जिन मामलों में सीधे उच्च न्यायालय जाया जा सकता है
मूल अधिकारिता का अर्थ ऐसी अधिकारिता से है जिसमें मामला निचली अदालत से अपील के रूप में आने के बजाय सीधे उच्च न्यायालय में प्रारंभ किया जा सकता है।
उच्च न्यायालयों की मूल अधिकारिता का स्वरूप सभी राज्यों में समान नहीं है। कुछ मामलों में कानून सीधे उच्च न्यायालय को अधिकार प्रदान करता है।
संसद या राज्य विधानमंडल के चुनाव से संबंधित चुनाव याचिकाओं की सुनवाई निर्धारित कानून के अनुसार उच्च न्यायालय द्वारा की जाती है।
मौलिक अधिकारों सहित विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका भी सीधे उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है।
विवाह और पारिवारिक विवाद सामान्यतः निर्धारित पारिवारिक या अधीनस्थ न्यायालयों में प्रारंभ हो सकते हैं; इसलिए प्रत्येक विवाह संबंधी मामले को उच्च न्यायालय की सामान्य मूल अधिकारिता कहना सही नहीं है।
उच्च न्यायालय आवश्यक परिस्थितियों में कानून के अनुसार अधीनस्थ न्यायालयों से मामलों को अपने पास स्थानांतरित करने की शक्ति भी रख सकता है।
⚠️ महत्वपूर्ण स्पष्टता
राज्य विधानसभा, विवाह और मौलिक अधिकार से जुड़े सभी मामले सीधे उच्च न्यायालय की मूल अधिकारिता में आते हैं — ऐसा सामान्य कथन सही नहीं है। अधिकारिता संबंधित संविधान और कानून के अनुसार निर्धारित होती है।
रिट अधिकारिता
अनुच्छेद 226
संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
इसी कारण उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का दायरा कई मामलों में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता से व्यापक माना जाता है, क्योंकि अनुच्छेद 32 मुख्यतः मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन से जुड़ा है।
🎯 बहुत महत्वपूर्ण
सर्वोच्च न्यायालय — अनुच्छेद 32
उच्च न्यायालय — अनुच्छेद 226
उच्च न्यायालय द्वारा जारी पाँच रिट
संवैधानिक उपचार
| रिट | सरल अर्थ |
|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण | किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया हो तो उसे न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश। |
| परमादेश | किसी सार्वजनिक अधिकारी या संस्था को उसका वैधानिक कर्तव्य पूरा करने का आदेश। |
| प्रतिषेध | उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को उसकी अधिकार-सीमा से बाहर कार्यवाही करने से रोकना। |
| उत्प्रेषण | अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण के आदेश/कार्यवाही को उच्च न्यायालय द्वारा जाँच के लिए मंगाना और उचित स्थिति में उसे निरस्त करना। |
| अधिकार-पृच्छा | किसी व्यक्ति से यह पूछना कि वह किसी सार्वजनिक पद पर किस अधिकार से बैठा है। |
📗 पाँच रिट
बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा
अपीलीय अधिकारिता
अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों पर अपील
उच्च न्यायालय में अपीलीय अधिकारिता होती है। इसके अंतर्गत वह निर्धारित कानूनों के अनुसार जिला न्यायालयों और अन्य अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुन सकता है।
उच्च न्यायालय दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार के मामलों में कानून द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में अपील सुन सकता है।
हर आदेश के विरुद्ध स्वतः उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार नहीं होता; अपील का अधिकार संबंधित कानून द्वारा प्रदान किया जाता है।
अधीनस्थ न्यायालयों पर पर्यवेक्षण
अनुच्छेद 227
संविधान के अनुच्छेद 227 के अनुसार उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण या पर्यवेक्षण की शक्ति प्राप्त है।
इस शक्ति का उद्देश्य अधीनस्थ न्यायिक व्यवस्था के कार्यों पर संवैधानिक निगरानी बनाए रखना है।
अभिलेख न्यायालय
अनुच्छेद 215
संविधान के अनुच्छेद 215 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होता है।
इसके निर्णय और अभिलेख स्थायी प्रमाणिक महत्व रखते हैं तथा उच्च न्यायालय को अपने अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है।
🎯 सीधा प्रश्न
उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय किस अनुच्छेद में कहा गया है? — अनुच्छेद 215
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण
अनुच्छेद 222
संविधान के अनुच्छेद 222 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण दूसरे उच्च न्यायालय में कर सकता है।
ऐसा स्थानांतरण भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद किया जाता है।
उच्च न्यायालय की स्थापना का इतिहास
1861 के अधिनियम से 1862 के उच्च न्यायालयों तक
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक उच्च न्यायालयों की स्थापना का महत्वपूर्ण आधार भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 था।
इस अधिनियम ने ब्रिटिश सम्राट को कलकत्ता, मद्रास और बंबई में उच्च न्यायालय स्थापित करने के लिए अधिकार प्रदान किया।
इसके बाद 1862 में कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालय स्थापित हुए।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 1 जुलाई 1862 को कार्य करना शुरू किया और इसे भारत का सबसे पुराना उच्च न्यायालय माना जाता है।
इसके बाद बंबई उच्च न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय भी 1862 में स्थापित हुए।
⚠️ इतिहास का महत्वपूर्ण सुधार
“भारत में उच्च न्यायालय की स्थापना 1858 में लॉ कमीशन की सिफारिश पर हुई” लिखना सही नहीं है। परीक्षा-सुरक्षित तथ्य है — भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 और उसके बाद 1862 में कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास उच्च न्यायालयों की स्थापना।
प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद
एक नज़र में महत्वपूर्ण अनुच्छेद
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 214 | राज्यों के लिए उच्च न्यायालय |
| 215 | उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा |
| 216 | उच्च न्यायालय की संरचना |
| 217 | न्यायाधीशों की नियुक्ति और पद की शर्तें |
| 222 | एक उच्च न्यायालय से दूसरे में न्यायाधीश का स्थानांतरण |
| 224 | अतिरिक्त एवं कार्यकारी न्यायाधीश |
| 226 | रिट जारी करने की शक्ति |
| 227 | अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण |
| 229 | उच्च न्यायालय के अधिकारी एवं कर्मचारी |
| 230 | केंद्रशासित प्रदेशों तक उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार |
| 231 | दो या अधिक राज्यों के लिए साझा उच्च न्यायालय |
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की रिट शक्ति
महत्वपूर्ण अंतर
| आधार | उच्च न्यायालय | सर्वोच्च न्यायालय |
|---|---|---|
| अनुच्छेद | 226 | 32 |
| मौलिक अधिकार | रिट जारी कर सकता है | रिट जारी कर सकता है |
| अन्य विधिक अधिकार | रिट जारी कर सकता है | अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मुख्यतः मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए |
| अधिकारिता का स्वरूप | मौलिक अधिकार + अन्य विधिक उद्देश्य | मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन का संवैधानिक उपचार |
अक्सर होने वाली गलतियाँ
भ्रम दूर करने वाले तथ्य
गलत: प्रत्येक राज्य और प्रत्येक केंद्रशासित प्रदेश का अपना
अलग उच्च न्यायालय होता है।
सही: अनुच्छेद 214 प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय की
व्यवस्था करता है; साझा उच्च न्यायालय भी हो सकता है।
गलत शब्द: वृत्ति अधिकार क्षेत्र।
सही शब्द: रिट अधिकारिता।
उच्च न्यायालय की रिट शक्ति अनुच्छेद 226 में है।
अति-सामान्य कथन: विवाह, राज्य विधानसभा और मौलिक अधिकार
से जुड़े सभी मामले सीधे उच्च न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
सही: मूल अधिकारिता मामले और संबंधित कानून पर निर्भर करती है;
रिट याचिका अनुच्छेद 226 के अंतर्गत सीधे उच्च न्यायालय में लाई जा सकती है।
गलत: उच्च न्यायालयों की स्थापना 1858 में हुई।
सही: भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 के आधार पर
कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालय 1862 में स्थापित हुए।
याद रखें: भारत में वर्तमान उच्च न्यायालयों की संख्या 25 है।
⚡ अंतिम रिविजन बिंदु
अनुच्छेद 214 — प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय।
अनुच्छेद 215 — उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय है।
अनुच्छेद 216 — मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से उच्च न्यायालय की संरचना।
अनुच्छेद 217 — उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पद की शर्तें।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति — राष्ट्रपति।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति आयु — 62 वर्ष।
अनुच्छेद 222 — उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण।
अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट शक्ति।
पाँच रिट — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा।
अनुच्छेद 227 — अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण।
अनुच्छेद 231 — दो या अधिक राज्यों/राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश के लिए साझा उच्च न्यायालय।
भारत में वर्तमान उच्च न्यायालय — 25।
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम — 1861।
कलकत्ता उच्च न्यायालय — 1 जुलाई 1862 — भारत का सबसे पुराना उच्च न्यायालय।
कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालय — 1862।
उच्च न्यायालय — अनुच्छेद 226; सर्वोच्च न्यायालय — अनुच्छेद 32।