गरीबी एवं बेरोजगारी
गरीबी के प्रकार, गरीबी रेखा, प्रमुख समितियाँ और बेरोजगारी की अवधारणाएँ
गरीबी एवं बेरोजगारी
गरीबी और बेरोजगारी भारत की प्रमुख सामाजिक-आर्थिक समस्याओं में शामिल हैं। गरीबी का संबंध केवल कम आय से नहीं, बल्कि भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन जैसी आवश्यक सुविधाओं की कमी से भी है। इसी प्रकार बेरोजगारी केवल काम न मिलने की स्थिति नहीं है; इसमें अल्परोजगार, प्रच्छन्न बेरोजगारी और मौसमी बेरोजगारी जैसी स्थितियाँ भी शामिल होती हैं।
गरीबी
Poverty
गरीबी वह स्थिति है जब किसी व्यक्ति या परिवार के पास इतनी आय अथवा संसाधन उपलब्ध नहीं होते कि वह भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से पूरा कर सके।
गरीबी को समझने के लिए मुख्य रूप से सापेक्षिक गरीबी और निरपेक्ष गरीबी की अवधारणाओं का प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त वर्तमान समय में गरीबी को शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर जैसे अनेक आयामों के आधार पर भी मापा जाता है, जिसे बहुआयामी गरीबी कहा जाता है।
सापेक्षिक गरीबी
Relative Poverty
सापेक्षिक गरीबी में किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति की तुलना उसी समाज के दूसरे व्यक्तियों या परिवारों से की जाती है। अर्थात व्यक्ति अपनी न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है, फिर भी उसकी आय समाज के सामान्य या उच्च आय वाले वर्ग की तुलना में बहुत कम हो सकती है।
इसका सीधा संबंध आर्थिक असमानता से है। किसी देश या क्षेत्र में विभिन्न वर्गों की आय और संपत्ति के बीच बड़ा अंतर होने पर सापेक्षिक गरीबी अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।
इस अवधारणा से यह समझने में सहायता मिलती है कि समाज में आय और संपत्ति का वितरण कितना समान या असमान है।
गिनी गुणांक और लॉरेन्ज वक्र
गिनी गुणांक आय या संपत्ति की असमानता को मापने का प्रमुख सूचक है। सामान्यतः इसका मान 0 से 1 के बीच व्यक्त किया जाता है। 0 पूर्ण समानता और 1 पूर्ण असमानता की स्थिति को दर्शाता है। इसे कभी-कभी 0 से 100 के पैमाने पर भी व्यक्त किया जाता है।
लॉरेन्ज वक्र एक ग्राफीय प्रस्तुति है, जिसके माध्यम से आय या संपत्ति के वितरण में असमानता दिखाई जाती है। पूर्ण समानता की रेखा से लॉरेन्ज वक्र जितना अधिक दूर होगा, असमानता उतनी अधिक होगी।
निरपेक्ष गरीबी
Absolute Poverty
निरपेक्ष गरीबी वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी जीवन की आवश्यक जरूरतों को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं कर पाता।
इसे सामान्यतः किसी निर्धारित न्यूनतम आय या उपभोग-व्यय स्तर के आधार पर मापा जाता है। इस न्यूनतम सीमा से नीचे रहने वाले लोगों को गरीब माना जाता है।
भारत में परंपरागत मौद्रिक गरीबी के आकलन में मुख्य रूप से उपभोग व्यय का उपयोग किया गया है। गरीबी रेखा यह निर्धारित करने का प्रयास करती है कि न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कितने उपभोग व्यय की आवश्यकता है।
वर्तमान समय में नीति आयोग बहुआयामी गरीबी सूचकांक भी प्रकाशित करता है, जबकि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय घरेलू उपभोग व्यय सहित अनेक महत्वपूर्ण सर्वेक्षण और सांख्यिकीय आँकड़े उपलब्ध कराता है।
बहुआयामी गरीबी
बहुआयामी गरीबी केवल आय को नहीं देखती, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़ी वंचनाओं को भी ध्यान में रखती है। इसलिए मौद्रिक गरीबी और बहुआयामी गरीबी दो अलग लेकिन एक-दूसरे से संबंधित अवधारणाएँ हैं।
गरीबी के प्रमुख कारण
Causes of Poverty
बेरोजगारी और अल्परोजगार: पर्याप्त और नियमित रोजगार न मिलने से आय कम रहती है और परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति कठिन हो जाती है।
शिक्षा की कमी: शिक्षा और कौशल की कमी व्यक्ति के लिए बेहतर रोजगार तथा अधिक आय के अवसर सीमित कर देती है।
तीव्र जनसंख्या वृद्धि: विशेषकर सीमित संसाधनों और रोजगार अवसरों वाली अर्थव्यवस्था में तेज जनसंख्या वृद्धि संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकती है। केवल जनसंख्या वृद्धि को गरीबी का अकेला कारण मानना उचित नहीं है।
भूमि और संसाधनों का असमान वितरण: उत्पादन के साधनों और संपत्ति का अत्यधिक असमान वितरण गरीब वर्ग की आर्थिक प्रगति को बाधित कर सकता है।
सामाजिक भेदभाव और जातिगत असमानता: सामाजिक भेदभाव शिक्षा, रोजगार, भूमि तथा आर्थिक अवसरों तक पहुँच को सीमित कर गरीबी को बनाए रख सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और खराब पोषण: बीमारी और कुपोषण व्यक्ति की कार्यक्षमता घटाते हैं तथा स्वास्थ्य पर होने वाला अधिक खर्च परिवार को आर्थिक संकट में डाल सकता है।
इसके अतिरिक्त कम उत्पादकता, कौशल की कमी, ऋणग्रस्तता, क्षेत्रीय असमानता, प्राकृतिक आपदाएँ और आर्थिक अवसरों की कमी भी गरीबी को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत में गरीबी उन्मूलन के प्रयास
Poverty Alleviation
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ग्रामीण परिवारों को मांग के आधार पर एक वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 100 दिनों के अकुशल शारीरिक श्रम वाले रोजगार की कानूनी गारंटी प्रदान करता है।
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य पात्र परिवारों को आवास उपलब्ध कराने में सहायता करना है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से पात्र परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ रसोई ईंधन के रूप में एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
प्रधानमंत्री जन-धन योजना का उद्देश्य बैंकिंग सुविधाओं और वित्तीय समावेशन का विस्तार करना है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अंतर्गत पात्र जनसंख्या को खाद्यान्न उपलब्ध कराने की कानूनी व्यवस्था की गई है।
गरीबी रेखा
Poverty Line
गरीबी रेखा एक निर्धारित न्यूनतम सीमा है जिसका उपयोग यह पहचानने के लिए किया जाता है कि कौन-से व्यक्ति या परिवार न्यूनतम जीवन-स्तर के लिए आवश्यक संसाधनों अथवा उपभोग से वंचित हैं।
इसे आय के आधार पर भी समझाया जा सकता है, लेकिन भारत में आधिकारिक गरीबी आकलन की परंपरा में उपभोग व्यय का विशेष महत्व रहा है।
कैलोरी आधारित गरीबी निर्धारण
Calorie Based Approach
1962 के कार्यसमूह ने गरीबी के न्यूनतम उपभोग स्तर को निर्धारित करने के शुरुआती प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौर की गरीबी-रेखा संबंधी पद्धतियों में न्यूनतम पोषण आवश्यकता को विशेष महत्व दिया गया।
पुरानी परीक्षा पुस्तकों में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लगभग 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का मानक प्रमुख रूप से दिया जाता है। शहरी कैलोरी मानकों को लेकर अलग-अलग प्रारंभिक पद्धतियों और वर्षों के संदर्भों को एक साथ मिलाने से भ्रम हो सकता है।
1973-74 को आधार बनाकर विकसित प्रसिद्ध योजना आयोग पद्धति में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लगभग 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए लगभग 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से संबंधित उपभोग स्तर का प्रयोग किया गया।
परीक्षा में ध्यान रखें
2400 कैलोरी — ग्रामीण क्षेत्र और 2100 कैलोरी — शहरी क्षेत्र पुरानी भारतीय गरीबी-रेखा पद्धति से जुड़ी सबसे प्रचलित परीक्षा जोड़ी है। 1962 और 1973-74 की पद्धतियों के आँकड़ों को एक ही मानक समझकर न मिलाएँ।
सुरेश तेंदुलकर समिति
Tendulkar Committee
सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति का गठन 2005 में किया गया था और इसकी रिपोर्ट 2009 में प्रस्तुत हुई। इसलिए इसे केवल “2008 की समिति” कहना उचित नहीं है।
समिति ने गरीबी निर्धारण को केवल निश्चित कैलोरी मानक से बाँधने के स्थान पर उपभोग व्यय की व्यापक पद्धति अपनाई तथा स्वास्थ्य और शिक्षा पर निजी व्यय जैसी वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से समाहित किया।
गरीबी रेखाएँ राज्यों तथा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के मूल्य स्तरों के अनुसार अलग हो सकती थीं।
तेंदुलकर पद्धति के अनुसार 2004-05 में भारत की कुल गरीबी दर लगभग 37.2% थी। ग्रामीण गरीबी लगभग 41.8% और शहरी गरीबी लगभग 25.7% थी।
योजना आयोग के तेंदुलकर पद्धति पर आधारित 2009-10 के अनुमान में राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा लगभग ₹672.8 प्रति व्यक्ति प्रति माह ग्रामीण क्षेत्रों में और ₹859.6 प्रति व्यक्ति प्रति माह शहरी क्षेत्रों में थी। राज्यों के लिए वास्तविक गरीबी रेखाएँ मूल्य स्तर के अनुसार अलग थीं।
महत्वपूर्ण तथ्य
तेंदुलकर समिति — गठन 2005 — रिपोर्ट 2009 — कैलोरी आधारित कठोर मानक से हटकर व्यापक उपभोग-व्यय दृष्टिकोण।
रंगराजन समिति
Rangarajan Committee
तेंदुलकर पद्धति और गरीबी रेखा को लेकर हुई आलोचनाओं के बाद सी. रंगराजन की अध्यक्षता में 2012 में विशेषज्ञ समूह गठित किया गया। इसने अपनी रिपोर्ट 2014 में प्रस्तुत की।
समिति ने भोजन के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा, कपड़े, आवास से संबंधित व्यय तथा अन्य आवश्यक गैर-खाद्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए गरीबी रेखा का नया आकलन प्रस्तुत किया। पेयजल और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी व्यापक जीवन-स्तर की समझ में महत्वपूर्ण हैं।
रंगराजन समिति ने 2011-12 के लिए ग्रामीण गरीबी रेखा लगभग ₹972 प्रति व्यक्ति प्रति माह और शहरी गरीबी रेखा लगभग ₹1407 प्रति व्यक्ति प्रति माह निर्धारित की।
समिति के अनुसार 2011-12 में भारत की लगभग 29.5% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे थी। ग्रामीण क्षेत्र में यह अनुपात लगभग 30.9% और शहरी क्षेत्र में लगभग 26.4% था।
विश्व बैंक की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा
International Poverty Line
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों की गरीबी की तुलना करने के लिए विश्व बैंक क्रय शक्ति समता के आधार पर अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा निर्धारित करता है। क्रय शक्ति समता विभिन्न देशों में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के अंतर को ध्यान में रखती है।
2022 में लागू पुराना मानक प्रतिदिन 2.15 अमेरिकी डॉलर था और यह 2017 की क्रय शक्ति समता पर आधारित था। इसलिए पुरानी पुस्तकों और प्रश्नों में $2.15 दिखाई दे सकता है।
जून 2025 से विश्व बैंक की नई अंतरराष्ट्रीय अत्यधिक गरीबी रेखा प्रतिदिन 3.00 अमेरिकी डॉलर है और यह 2021 की क्रय शक्ति समता पर आधारित है।
इसका अर्थ सामान्य बाजार विनिमय दर से सीधे डॉलर को रुपये में बदलना नहीं है। क्रय शक्ति समता देशों के बीच वास्तविक क्रय क्षमता की तुलना करने की सांख्यिकीय पद्धति है।
अद्यतन परीक्षा तथ्य
पुराना: $2.15 प्रतिदिन — 2017 क्रय शक्ति समता।
वर्तमान: $3.00 प्रतिदिन — 2021 क्रय शक्ति समता।
2009-10 में गरीबी से संबंधित प्रमुख राज्य
State-wise Poverty
2009-10 के पुराने गरीबी अनुमानों में गरीब व्यक्तियों की कुल संख्या और गरीबी अनुपात दो अलग अवधारणाएँ हैं। अधिक जनसंख्या वाला राज्य गरीबों की कुल संख्या में ऊपर हो सकता है, जबकि किसी छोटे राज्य में गरीबों का प्रतिशत अधिक हो सकता है।
पुराने तेंदुलकर-आधारित 2009-10 आँकड़ों में गरीबों की बड़ी संख्या वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र प्रमुख थे।
गरीबी अनुपात की दृष्टि से बिहार और छत्तीसगढ़ अत्यधिक गरीबी अनुपात वाले राज्यों में थे। पुराने आँकड़ों की राज्य-रैंकिंग स्रोत और प्रयुक्त गरीबी अनुमान के अनुसार सावधानी से पढ़नी चाहिए; मणिपुर को बिना वर्ष और तालिका बताए निश्चित रूप से “तीसरे स्थान” पर लिखना सुरक्षित नहीं है।
याद रखें
गरीबों की संख्या और गरीबी का प्रतिशत एक ही चीज नहीं हैं। परीक्षा में प्रश्न की भाषा अवश्य देखें।
भारत में बहुआयामी गरीबी
Multidimensional Poverty
नीति आयोग का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक गरीबी को केवल आय या उपभोग के आधार पर नहीं मापता। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से संबंधित अनेक संकेतकों को शामिल किया जाता है।
नीति आयोग के अनुसार भारत में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 2015-16 में 24.85% से घटकर 2019-21 में 14.96% हो गया।
नीति आयोग के आकलन के अनुसार 2022-23 में इसके लगभग 11.28% तक गिरने की संभावना व्यक्त की गई और 2013-14 से 2022-23 के बीच लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले।
बेरोजगारी
Unemployment
बेरोजगारी सामान्यतः उस स्थिति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति काम करने में सक्षम और इच्छुक है तथा काम की तलाश या काम के लिए उपलब्ध है, लेकिन उसे उपयुक्त रोजगार नहीं मिलता।
यह किसी अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक समस्या है, क्योंकि इससे आय, उत्पादन और जीवन स्तर प्रभावित होते हैं।
बेरोजगारी मापने की प्रमुख अवधारणाएँ
Measurement of Unemployment
सामान्य स्थिति
सामान्य स्थिति व्यक्ति की अपेक्षाकृत दीर्घकालीन आर्थिक गतिविधि को दर्शाती है। इसमें पिछले 365 दिनों के संदर्भ में व्यक्ति की प्रमुख और सहायक आर्थिक गतिविधियों का आकलन किया जाता है। इसलिए इसे दीर्घकालीन रोजगार-बेरोजगारी की स्थिति समझने के लिए उपयोगी माना जाता है।
वर्तमान साप्ताहिक स्थिति
वर्तमान साप्ताहिक स्थिति में पिछले 7 दिनों की गतिविधियों को देखा जाता है। यदि व्यक्ति ने संदर्भ सप्ताह में किसी दिन कम-से-कम 1 घंटा काम किया हो, तो उसे वर्तमान साप्ताहिक स्थिति में रोजगार प्राप्त व्यक्ति माना जाता है।
यदि उसने सप्ताह में काम नहीं किया, लेकिन वह काम की तलाश में था या काम के लिए उपलब्ध था, तो उसे बेरोजगार माना जा सकता है। इसलिए “एक घंटे काम करने को तैयार था लेकिन अवसर नहीं मिला तो रोजगार प्राप्त माना जाएगा” कहना गलत है।
वर्तमान दैनिक स्थिति
वर्तमान दैनिक स्थिति में पिछले सात दिनों के प्रत्येक दिन की गतिविधि का अलग-अलग आकलन किया जाता है।
यदि किसी दिन व्यक्ति ने 4 घंटे या उससे अधिक काम किया हो, तो उसे उस दिन के लिए पूरे दिन रोजगार प्राप्त माना जाता है। यदि उसने 1 घंटे या उससे अधिक लेकिन 4 घंटे से कम काम किया हो, तो उसे आधे दिन रोजगार प्राप्त माना जाता है।
इस पद्धति से बेरोजगारी के साथ-साथ अल्परोजगार को भी अधिक संवेदनशील ढंग से समझा जा सकता है।
ऐच्छिक और अनैच्छिक बेरोजगारी
Voluntary & Involuntary Unemployment
ऐच्छिक बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति उपलब्ध रोजगार या प्रचलित परिस्थितियों में स्वयं काम नहीं करना चाहता अथवा रोजगार प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता। सामान्य श्रम-बल मापन में ऐसे व्यक्ति को हर स्थिति में बेरोजगार नहीं माना जाता, क्योंकि बेरोजगार की परिभाषा में काम के लिए उपलब्धता और इच्छा महत्वपूर्ण होती है।
अनैच्छिक बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति काम करने के लिए इच्छुक और उपलब्ध है, फिर भी उसे रोजगार नहीं मिलता।
खुली बेरोजगारी ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति के पास कोई काम नहीं है और वह रोजगार चाहता है। इसे अनैच्छिक बेरोजगारी का एक स्पष्ट रूप माना जा सकता है, लेकिन दोनों शब्दों को प्रत्येक संदर्भ में पूर्णतः समानार्थी मानना उचित नहीं है।
संरचनात्मक बेरोजगारी
Structural Unemployment
संरचनात्मक बेरोजगारी तब उत्पन्न होती है जब अर्थव्यवस्था की संरचना में बदलाव और उपलब्ध श्रमिकों के कौशल, स्थान या योग्यता तथा उपलब्ध नौकरियों की आवश्यकताओं के बीच असंगति पैदा हो जाती है।
तकनीकी या औद्योगिक परिवर्तन इसका एक कारण हो सकते हैं, लेकिन संरचनात्मक बेरोजगारी को केवल तकनीकी परिवर्तन तक सीमित नहीं किया जाता। पूँजी की कमी, कौशल-असंगति और अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियाँ भी इसका कारण बन सकती हैं।
विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में संरचनात्मक समस्याएँ बेरोजगारी का महत्वपूर्ण कारण हो सकती हैं।
अल्परोजगार
Underemployment
अल्परोजगार वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति रोजगार में तो होता है, लेकिन उसे उसकी उपलब्ध क्षमता, समय या योग्यता का पूर्ण उपयोग करने वाला पर्याप्त काम नहीं मिलता।
उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति पूरे समय काम करना चाहता है लेकिन उसे केवल कुछ घंटे का काम मिलता है, या अत्यधिक योग्य व्यक्ति ऐसी नौकरी कर रहा है जिसमें उसकी योग्यता और कौशल का बहुत कम उपयोग हो रहा है।
प्रच्छन्न बेरोजगारी
Disguised Unemployment
प्रच्छन्न बेरोजगारी में व्यक्ति देखने में रोजगार प्राप्त होता है, लेकिन उत्पादन में उसका सीमांत योगदान लगभग शून्य होता है। अर्थात कुछ श्रमिकों को काम से हटा देने पर भी कुल उत्पादन में उल्लेखनीय कमी नहीं आती।
उदाहरण के लिए किसी खेत का कार्य यदि 3 या 4 लोग पर्याप्त रूप से कर सकते हैं, लेकिन उसी कार्य में 6 लोग लगे हैं, तो अतिरिक्त श्रमिक प्रच्छन्न बेरोजगारी की स्थिति में हो सकते हैं।
भारत में इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण कृषि और ग्रामीण क्षेत्र है।
ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी
Rural & Urban Unemployment
ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर कृषि में, प्रच्छन्न बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी और अल्परोजगार महत्वपूर्ण रूपों में दिखाई देते हैं।
शहरी क्षेत्रों में खुली बेरोजगारी, शिक्षित बेरोजगारी तथा कौशल-असंगति से जुड़ी संरचनात्मक बेरोजगारी अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकती है।
हालाँकि ये पूर्ण विभाजन नहीं हैं; बेरोजगारी के विभिन्न प्रकार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पाए जा सकते हैं।
शिक्षित बेरोजगारी
Educated Unemployment
शिक्षित बेरोजगारी उस स्थिति को कहा जाता है जिसमें शिक्षित व्यक्ति रोजगार चाहता है और काम के लिए उपलब्ध है, लेकिन उसे रोजगार नहीं मिलता।
यदि व्यक्ति को रोजगार तो मिला है लेकिन वह उसकी योग्यता या कौशल से बहुत नीचे है, तो यह स्थिति अल्परोजगार या कौशल-असंगति से भी संबंधित हो सकती है। इसलिए दोनों अवधारणाओं में अंतर समझना आवश्यक है।
मौसमी बेरोजगारी
Seasonal Unemployment
मौसमी बेरोजगारी उस स्थिति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति को वर्ष के केवल कुछ विशेष महीनों या मौसम में काम मिलता है और शेष अवधि में रोजगार नहीं मिलता।
यह विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में दिखाई देती है, क्योंकि बुवाई और कटाई के समय श्रम की मांग बढ़ती है जबकि कृषि कार्यों के बीच की अवधि में काम कम हो सकता है।
पर्यटन, चीनी उद्योग और कुछ अन्य मौसमी गतिविधियों में भी इस प्रकार की बेरोजगारी दिखाई दे सकती है।
तकनीकी बेरोजगारी
Technological Unemployment
तकनीकी बेरोजगारी तब उत्पन्न हो सकती है जब नई मशीनों, स्वचालन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता अथवा नई उत्पादन तकनीकों के कारण कुछ प्रकार के मानवीय श्रम की मांग कम हो जाती है।
तकनीकी परिवर्तन कुछ पुरानी नौकरियाँ समाप्त कर सकता है, लेकिन साथ ही नई प्रकृति की नौकरियाँ भी उत्पन्न कर सकता है। यदि श्रमिकों के पुराने कौशल और नई नौकरियों की आवश्यकताओं में अंतर हो जाए तो यह संरचनात्मक बेरोजगारी से भी जुड़ सकती है।
महत्वपूर्ण अंतर
Important Differences
| अवधारणा | मुख्य अर्थ | सरल उदाहरण |
|---|---|---|
| खुली बेरोजगारी | काम चाहिए लेकिन कोई रोजगार नहीं | नौकरी खोज रहा व्यक्ति |
| अल्परोजगार | काम है, लेकिन क्षमता या समय का पूरा उपयोग नहीं | पूर्णकालिक काम चाहने वाले को कुछ घंटे काम |
| प्रच्छन्न बेरोजगारी | काम में लगे होने पर भी उत्पादन में अतिरिक्त योगदान नगण्य | खेत में आवश्यकता से अधिक श्रमिक |
| मौसमी बेरोजगारी | वर्ष के कुछ समय ही रोजगार | कृषि मजदूर |
| संरचनात्मक बेरोजगारी | कौशल और रोजगार की संरचना में असंगति | नई नौकरियों के लिए आवश्यक कौशल का अभाव |
| तकनीकी बेरोजगारी | नई तकनीक से कुछ श्रम की मांग घटना | स्वचालन से पुराना कार्य समाप्त होना |
त्वरित पुनरावृत्ति
Quick Revision
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
गरीबी के दो प्रमुख रूप — सापेक्षिक गरीबी और निरपेक्ष गरीबी।
गिनी गुणांक — आय/संपत्ति की असमानता का मापक; 0 पूर्ण समानता और 1 पूर्ण असमानता।
लॉरेन्ज वक्र — आय या संपत्ति वितरण की असमानता का ग्राफीय प्रदर्शन।
पुरानी भारतीय गरीबी पद्धति से जुड़ा प्रमुख कैलोरी मानक — ग्रामीण 2400 और शहरी 2100 कैलोरी प्रतिदिन।
तेंदुलकर समिति — गठन 2005; रिपोर्ट 2009।
रंगराजन समिति — गठन 2012; रिपोर्ट 2014; 2011-12 गरीबी रेखा ग्रामीण ₹972 और शहरी ₹1407 प्रति व्यक्ति प्रति माह।
विश्व बैंक की वर्तमान अंतरराष्ट्रीय अत्यधिक गरीबी रेखा — $3.00 प्रतिदिन, 2021 क्रय शक्ति समता के आधार पर।
पुरानी विश्व बैंक गरीबी रेखा — $2.15 प्रतिदिन, 2017 क्रय शक्ति समता; जून 2025 में इसे बदला गया।
प्रच्छन्न बेरोजगारी — अतिरिक्त श्रमिक को हटाने पर भी उत्पादन में उल्लेखनीय कमी नहीं।
मौसमी बेरोजगारी — वर्ष के केवल कुछ समय रोजगार; कृषि में प्रमुख।
अल्परोजगार — व्यक्ति की क्षमता या उपलब्ध समय का पूर्ण उपयोग न होना।
संरचनात्मक बेरोजगारी — उपलब्ध कौशल और रोजगार की आवश्यकताओं में असंगति।
तकनीकी बेरोजगारी — तकनीकी परिवर्तन या स्वचालन के कारण कुछ प्रकार के रोजगार की मांग घटना।