जलियांवाला बाग हत्याकांड
(1919)
जलियांवाला बाग हत्याकांड
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुई गोलीबारी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की सबसे दुखद और निर्णायक घटनाओं में से एक थी। रॉलेट एक्ट के विरोध, पंजाब में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति तथा डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी से अमृतसर में पहले से ही भारी तनाव था।
बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे। ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर अपने सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा और भीड़ को तितर-बितर होने के लिए पर्याप्त अवसर दिए बिना गोली चलाने का आदेश दे दिया।
हत्याकांड की पृष्ठभूमि
1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट लागू किया। भारतीयों ने इसे नागरिक स्वतंत्रता को समाप्त करने वाला दमनकारी कानून माना और देशभर में इसका विरोध शुरू हुआ।
पंजाब में रॉलेट एक्ट के विरुद्ध आंदोलन विशेष रूप से तीव्र था। अमृतसर में डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे।
10 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश प्रशासन ने किचलू और सत्यपाल को गिरफ्तार कर अमृतसर से बाहर भेज दिया। उनकी गिरफ्तारी से जनता में तीव्र आक्रोश फैल गया।
अमृतसर की स्थिति तेजी से तनावपूर्ण हो गई और ब्रिटिश प्रशासन ने सार्वजनिक सभाओं तथा जुलूसों पर प्रतिबंध लगाने जैसे कठोर कदम उठाए।
महत्वपूर्ण क्रम
रॉलेट एक्ट → किचलू एवं सत्यपाल का विरोध → 10 अप्रैल को गिरफ्तारी → अमृतसर में तनाव → 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग हत्याकांड।
13 अप्रैल 1919 की सभा
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था। अमृतसर के जलियांवाला बाग में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए।
सभा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य रॉलेट एक्ट तथा डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी का विरोध करना था। इसके अतिरिक्त बैसाखी के कारण भी आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग अमृतसर आए हुए थे।
जलियांवाला बाग चारों ओर से मकानों और दीवारों से घिरा हुआ स्थान था तथा वहाँ से बाहर निकलने के रास्ते बहुत सीमित और संकरे थे।
सभा में पुरुषों के साथ महिलाएँ और बच्चे भी उपस्थित थे तथा बड़ी संख्या में लोग निहत्थे थे।
माइकल ओ’डायर और जनरल डायर में अंतर
जलियांवाला बाग हत्याकांड पढ़ते समय सर माइकल ओ’डायर और ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के बीच अंतर याद रखना बहुत आवश्यक है।
हत्याकांड के समय सर माइकल ओ’डायर पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था और पंजाब में ब्रिटिश प्रशासन की कठोर नीति से उसका महत्वपूर्ण संबंध था।
दूसरी ओर ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर वह सैन्य अधिकारी था जिसने जलियांवाला बाग में उपस्थित सैनिकों को भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया।
परीक्षा में सबसे महत्वपूर्ण अंतर
माइकल ओ’डायर → पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर
रेजिनाल्ड डायर → जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आदेश देने वाला सैन्य अधिकारी
जनरल डायर का गोली चलाने का आदेश
ब्रिगेडियर जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग पहुँचा और सैनिकों को प्रवेश मार्ग के निकट तैनात कर दिया।
उसने भीड़ को सुरक्षित रूप से तितर-बितर होने का पर्याप्त अवसर दिए बिना सैनिकों को निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया।
सैनिकों ने उन स्थानों की ओर भी गोलियाँ चलाईं जहाँ भीड़ सबसे अधिक घनी थी और जहाँ से लोग बचकर निकलने का प्रयास कर रहे थे।
बाग से बाहर निकलने के रास्ते सीमित होने के कारण भगदड़ मच गई। अनेक लोगों ने गोलियों से बचने के लिए बाग में स्थित कुएँ में छलांग लगा दी।
इस प्रकार 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में निहत्थी भीड़ पर की गई गोलीबारी भारतीय इतिहास के सबसे भीषण औपनिवेशिक अत्याचारों में से एक बन गई।
कितने लोग मारे गए?
जलियांवाला बाग हत्याकांड में मारे गए लोगों की वास्तविक संख्या को लेकर विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग आँकड़े मिलते हैं।
ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आँकड़े के अनुसार 379 लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 1200 लोग घायल हुए।
भारतीय पक्ष तथा स्वतंत्र अनुमानों में मृतकों की संख्या आधिकारिक संख्या से कहीं अधिक मानी गई। कई विवरणों में मृतकों की संख्या लगभग 1000 या उससे अधिक बताई गई है।
इसलिए परीक्षा में यदि प्रश्न “ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आँकड़े” के बारे में हो तो उत्तर 379 मृतक रखना अधिक उपयुक्त है।
भ्रम से बचें
“जलियांवाला बाग में निश्चित रूप से 1000 लोग मारे गए” लिखने के बजाय यह याद रखें कि ब्रिटिश सरकार ने 379 मृत्यु स्वीकार की थी, जबकि भारतीय एवं अन्य अनुमानों में वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक मानी गई।
रवीन्द्रनाथ टैगोर का विरोध
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने पूरे भारत को झकझोर दिया। इस घटना के विरोध में महान कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई अपनी नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी।
टैगोर को ब्रिटिश सरकार ने 1915 में नाइटहुड प्रदान किया था। जलियांवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में हुए दमन के विरोध में उन्होंने 1919 में इसे त्याग दिया।
उनका यह कदम ब्रिटिश शासन के विरुद्ध नैतिक और बौद्धिक प्रतिरोध का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
परीक्षा के लिए
जलियांवाला बाग हत्याकांड → रवीन्द्रनाथ टैगोर → नाइटहुड की उपाधि वापस।
सर शंकरन नायर का त्यागपत्र
जलियांवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी कार्रवाइयों का विरोध करते हुए सर सी. शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से त्यागपत्र दे दिया।
वे उस समय वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के भारतीय सदस्य थे। उनका त्यागपत्र ब्रिटिश सरकार की पंजाब नीति के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विरोध था।
बाद में पंजाब की घटनाओं से संबंधित उनके आरोपों को लेकर पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर ने उनके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा भी किया।
नाम ध्यान रखें
सही नाम सर सी. शंकरन नायर है। इसे “शंकर नायक” नहीं लिखना है।
हंटर आयोग
जलियांवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में हुई घटनाओं की जाँच के लिए ब्रिटिश सरकार ने हंटर समिति का गठन किया।
इस समिति का आधिकारिक नाम अव्यवस्था जाँच समिति था और इसके अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर थे। इसी कारण इसे सामान्यतः हंटर समिति या हंटर आयोग कहा जाता है।
समिति में कुल आठ सदस्य थे, जिनमें पाँच अंग्रेज और तीन भारतीय सदस्य शामिल थे।
भारतीय सदस्यों ने जनरल डायर की कार्रवाई के संबंध में अंग्रेज सदस्यों की तुलना में अधिक कठोर दृष्टिकोण अपनाया और समिति में मतभेद सामने आए।
हंटर समिति ने माना कि जनरल डायर द्वारा बिना पर्याप्त चेतावनी गोली चलाना और आवश्यकता से अधिक समय तक गोलीबारी जारी रखना अनुचित था।
बहुत महत्वपूर्ण
हंटर आयोग → जलियांवाला बाग एवं पंजाब की घटनाओं की जाँच → कुल 8 सदस्य → 5 अंग्रेज + 3 भारतीय।
कांग्रेस की जाँच समिति
ब्रिटिश सरकार के हंटर आयोग के अतिरिक्त भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी पंजाब की घटनाओं की जाँच के लिए अपनी समिति गठित की।
इस जाँच से महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, सी. आर. दास, अब्बास तैयबजी और एम. आर. जयकर जैसे प्रमुख नेता जुड़े थे।
कांग्रेस की जाँच ने पंजाब में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा किए गए अत्याचारों और जलियांवाला बाग में अत्यधिक बल प्रयोग की कठोर आलोचना की।
ध्यान रखें
जलियांवाला बाग की जाँच के संदर्भ में केवल हंटर आयोग ही नहीं, बल्कि कांग्रेस की अपनी जाँच समिति भी परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
जनरल डायर के विरुद्ध कार्रवाई
हंटर समिति की जाँच के बाद जनरल डायर की कार्रवाई की आलोचना हुई। अंततः उसे भारत में उसकी सैन्य जिम्मेदारियों से हटाया गया और आगे महत्वपूर्ण सैन्य पद मिलने की संभावनाएँ समाप्त हो गईं।
इसके बावजूद ब्रिटेन में साम्राज्यवाद के समर्थक कुछ वर्गों ने डायर का समर्थन किया, जिससे भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और अधिक बढ़ा।
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारतीयों के उस विश्वास को गहरी चोट पहुँचाई कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत न्यायपूर्ण सुधारों के माध्यम से उनके अधिकार सुरक्षित किए जा सकते हैं।
ऊधम सिंह और माइकल ओ’डायर
जलियांवाला बाग हत्याकांड का भारतीय क्रांतिकारियों पर गहरा प्रभाव पड़ा। ऊधम सिंह ने इस घटना का बदला लेने का संकल्प लिया।
13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओ’डायर की गोली मारकर हत्या कर दी।
ऊधम सिंह को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया और 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में फाँसी दे दी गई।
बहुत महत्वपूर्ण अंतर
ऊधम सिंह ने जनरल रेजिनाल्ड डायर की हत्या नहीं की थी। उन्होंने 1940 में माइकल ओ’डायर की हत्या की थी।
राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला। ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीयों का अविश्वास तेजी से बढ़ा।
इस घटना ने भारतीय राष्ट्रवाद को और अधिक व्यापक तथा तीव्र बनाया और बड़ी संख्या में ऐसे भारतीय भी ब्रिटिश शासन के विरोध में आए जो पहले संवैधानिक सुधारों से परिवर्तन की आशा रखते थे।
महात्मा गांधी भी पंजाब की घटनाओं और ब्रिटिश सरकार की नीतियों से अत्यंत निराश हुए। आगे चलकर यही वातावरण असहयोग आंदोलन के उदय की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना।
जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दमन का सबसे प्रमुख प्रतीक बन गया।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| 10 अप्रैल 1919 | डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी |
| 13 अप्रैल 1919 | अमृतसर के जलियांवाला बाग में हत्याकांड |
| 1919 | रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा नाइटहुड की उपाधि वापस |
| 1919 | सर सी. शंकरन नायर द्वारा वायसराय की कार्यकारिणी से त्यागपत्र |
| 1919 | पंजाब की घटनाओं की जाँच के लिए हंटर समिति का गठन |
| 13 मार्च 1940 | ऊधम सिंह द्वारा लंदन में माइकल ओ’डायर की हत्या |
| 31 जुलाई 1940 | ऊधम सिंह को फाँसी |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
जलियांवाला बाग हत्याकांड → 13 अप्रैल 1919 → अमृतसर।
13 अप्रैल → बैसाखी का दिन।
सभा रॉलेट एक्ट तथा सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध से संबंधित थी।
माइकल ओ’डायर → पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर।
रेजिनाल्ड डायर → गोली चलाने का आदेश देने वाला सैन्य अधिकारी।
ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आँकड़े के अनुसार 379 लोग मारे गए; भारतीय एवं अन्य अनुमानों में संख्या अधिक मानी गई।
रवीन्द्रनाथ टैगोर → नाइटहुड की उपाधि वापस।
सर सी. शंकरन नायर → वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से त्यागपत्र।
हंटर आयोग → 5 अंग्रेज + 3 भारतीय = कुल 8 सदस्य।
ऊधम सिंह → 1940 में माइकल ओ’डायर की हत्या।
ऊधम सिंह ने रेजिनाल्ड डायर की हत्या नहीं की थी।
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए।
सभा में रॉलेट एक्ट और सैफुद्दीन किचलू तथा डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी का विरोध किया जा रहा था।
उस समय सर माइकल ओ’डायर पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था।
ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने जलियांवाला बाग में सैनिकों को निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया।
बाग चारों ओर से घिरा था और बाहर निकलने के रास्ते सीमित थे। गोलीबारी के कारण भारी जनहानि हुई और कई लोग जान बचाने के लिए कुएँ में कूद गए।
ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आँकड़े में 379 लोगों की मृत्यु स्वीकार की गई, जबकि भारतीय और अन्य अनुमानों में वास्तविक मृतक संख्या इससे काफी अधिक मानी गई।
हत्याकांड के विरोध में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी।
सर सी. शंकरन नायर ने पंजाब में हुए अत्याचारों के विरोध में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से त्यागपत्र दे दिया।
ब्रिटिश सरकार ने घटना की जाँच के लिए हंटर समिति गठित की, जिसमें कुल आठ सदस्य—पाँच अंग्रेज और तीन भारतीय—थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी पंजाब की घटनाओं की जाँच के लिए अपनी अलग समिति गठित की।
13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह ने लंदन में माइकल ओ’डायर की हत्या की और 31 जुलाई 1940 को उन्हें फाँसी दे दी गई।
पूरे अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण अंतर है — माइकल ओ’डायर प्रशासनिक अधिकारी था, जबकि रेजिनाल्ड डायर ने जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आदेश दिया था।
मुख्य क्रम याद रखें — रॉलेट एक्ट → किचलू-सत्यपाल की गिरफ्तारी → 13 अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग हत्याकांड → टैगोर द्वारा नाइटहुड वापसी → शंकरन नायर का त्यागपत्र → हंटर आयोग → 1940 में ऊधम सिंह द्वारा माइकल ओ’डायर की हत्या।