गुप्तोत्तर एवं प्रमुख भारतीय राजवंश
वाकाटक और हर्ष से लेकर दक्षिण, पूर्व तथा उत्तर भारत के क्षेत्रीय राज्यों तक
गुप्त साम्राज्य के बाद भारत
गुप्त साम्राज्य के कमजोर होने के बाद भारत में अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। कुछ राजवंश गुप्तों के समकालीन थे, जबकि कई राजवंश गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद शक्तिशाली बने।
इन राजवंशों को समझने के लिए उन्हें काल और भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार पढ़ना अधिक उपयोगी है, क्योंकि दक्षिण, पूर्व, उत्तर और मध्य भारत में कई राजवंश एक ही समय शासन कर रहे थे।
भाग 1 — गुप्तकालीन एवं गुप्तोत्तर राजवंश
वाकाटक और पुष्यभूति/वर्धन वंश
वाकाटक राजवंश
विदर्भ और दक्कन
विंध्यशक्ति को वाकाटक वंश का संस्थापक माना जाता है। उसका उदय तीसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य में हुआ। वाकाटक सत्ता का विकास सातवाहन साम्राज्य के पतन के बाद विदर्भ क्षेत्र में हुआ।
विंध्यशक्ति का उत्तराधिकारी प्रवरसेन प्रथम हुआ। उसका शासन सामान्यतः तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध से चौथी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक रखा जाता है।
प्रवरसेन प्रथम वाकाटक वंश का पहला अत्यंत शक्तिशाली शासक था। उसने कई वैदिक यज्ञ किए और सम्राट की उपाधि धारण की।
प्रवरसेन प्रथम के बाद वाकाटक राज्य मुख्यतः दो शाखाओं में विभाजित हुआ — नंदिवर्धन-प्रवरपुर शाखा और वत्सगुल्म शाखा।
गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था।
रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के बाद प्रभावती गुप्ता ने अपने अल्पवयस्क पुत्रों की ओर से कुछ समय तक संरक्षिका के रूप में शासन किया। इससे गुप्त और वाकाटक राजवंशों के बीच राजनीतिक संबंध मजबूत हुए।
हरिषेण वत्सगुल्म शाखा का अंतिम महान शासक था। उसके समय अजंता की अनेक प्रसिद्ध गुफाओं और चित्रों को संरक्षण मिला।
हरिषेण को पूरे वाकाटक राजवंश का निश्चित अंतिम शासक नहीं, बल्कि वत्सगुल्म शाखा का अंतिम महान ज्ञात शासक माना जाता है।
वैदर्भी रीति संस्कृत काव्य की प्रसिद्ध साहित्यिक शैली थी। विदर्भ की साहित्यिक संस्कृति और वाकाटक संरक्षण ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पुष्यभूति या वर्धन वंश
थानेश्वर से कन्नौज
पुष्यभूति वंश का प्रारंभिक राजनीतिक केंद्र थानेश्वर था, जो वर्तमान हरियाणा में कुरुक्षेत्र के निकट स्थित है।
बाणभट्ट की परंपरा में पुष्यभूति को इस वंश का आदिपुरुष माना गया है।
प्रभाकरवर्धन इस वंश का प्रथम अत्यंत प्रभावशाली स्वतंत्र शासक था। उसने परमभट्टारक और महाराजाधिराज जैसी उच्च राजकीय उपाधियाँ धारण कीं।
प्रभाकरवर्धन की पत्नी यशोमती थी। उनके दो पुत्र राज्यवर्धन और हर्षवर्धन तथा एक पुत्री राज्यश्री थी।
राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि शासक ग्रहवर्मन से हुआ था।
बंगाल का राजा शशांक हर्ष का प्रमुख समकालीन और प्रतिद्वंद्वी था। वह शैव धर्म का अनुयायी था। बौद्ध साहित्य में शशांक को बोधगया के बोधिवृक्ष को क्षति पहुँचाने से भी जोड़ा गया है।
हर्षवर्धन 606 ईस्वी में सत्ता में आया। उसे शिलादित्य भी कहा गया और उसने परमभट्टारक जैसी उपाधियाँ धारण कीं।
हर्ष ने बाद में कन्नौज को अपने साम्राज्य का प्रमुख राजनीतिक केंद्र बनाया। कन्नौज पर उसका अधिकार मौखरि राजपरिवार और राज्यश्री से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद स्थापित हुआ।
हर्ष प्रारंभ में शिव और सूर्य की उपासना से जुड़ा था। बाद में उसने विशेष रूप से महायान बौद्ध धर्म को व्यापक संरक्षण दिया।
हर्ष का बौद्ध धर्म से संबंध ह्वेनसांग से मिलने के बाद अचानक शुरू नहीं हुआ था। ह्वेनसांग ने हर्ष के धार्मिक संरक्षण और विशाल कन्नौज तथा प्रयाग सभाओं का वर्णन किया है।
बाणभट्ट हर्ष का प्रसिद्ध दरबारी साहित्यकार था। उसने हर्षचरित और कादंबरी की रचना की।
हर्ष से नागानंद, रत्नावली और प्रियदर्शिका नामक नाटकों का भी संबंध माना जाता है।
हर्षचरित में प्रशासनिक पदों और क्षेत्रीय अधिकारियों से संबंधित विभिन्न शब्द मिलते हैं। लोकपाल शब्द भी उच्च प्रशासनिक पदाधिकारी के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
हर्ष को पुरानी पुस्तकों में कभी-कभी “भारत का अंतिम हिंदू सम्राट” कहा गया है, लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से सही सार्वभौमिक उपाधि नहीं है। हर्ष के बाद भी अनेक शक्तिशाली हिंदू शासकों और साम्राज्यों का उदय हुआ।
भाग 2 — दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश
कदंब, गंग, पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चोल, यादव और काकतीय
कदंब वंश
बनवासी
मयूरशर्मा ने चौथी शताब्दी ईस्वी में कदंब वंश की स्थापना की।
इस वंश की राजधानी बनवासी थी।
कदंब कर्नाटक के प्रारंभिक स्थानीय राजवंशों में थे, जिन्होंने दक्षिण भारत में स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्य स्थापित किया।
पश्चिमी गंग वंश
कुवलाल से तलकाड
आपके नोट में दिए गए कुवलाल, तलकाड और माधव प्रथम वाले तथ्य पश्चिमी गंग वंश से संबंधित हैं।
पश्चिमी गंग वंश का संस्थापक कोंगणिवर्मन माधव माना जाता है।
इनकी प्रारंभिक राजधानी कुवलाल या कोलार थी, जिसके बाद तलकाड प्रमुख राजधानी बना।
गंग शासक माधव प्रथम को दत्तकसूत्र पर टीका लिखने की साहित्यिक परंपरा से जोड़ा जाता है।
वज्रहस्त पंचम पश्चिमी गंग वंश का संस्थापक नहीं था। वह कलिंग के पूर्वी गंग वंश का शासक था।
श्रवणबेलगोला की प्रसिद्ध विशाल गोम्मटेश्वर बाहुबली प्रतिमा पश्चिमी गंग मंत्री चामुंडराय द्वारा लगभग 981 ईस्वी में स्थापित कराई गई।
पल्लव वंश
कांची और मामल्लपुरम
पल्लव राजवंश सिंहविष्णु से पहले भी विद्यमान था। सिंहविष्णु छठी शताब्दी के उत्तरार्ध में पल्लव सत्ता का पुनरुत्थान करने वाला पहला महान साम्राज्यवादी शासक था।
पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम थी। सिंहविष्णु वैष्णव धर्म से संबंधित था।
किरातार्जुनीय के प्रसिद्ध संस्कृत कवि भारवि को परंपरा सिंहविष्णु के दरबार से जोड़ती है।
नरसिंहवर्मन प्रथम पल्लवों का महान शासक था। उसने चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर वातापी पर अधिकार किया।
नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापीकोंड और महामल्ल की उपाधियाँ धारण कीं।
महामल्ल उपाधि के कारण मामल्लपुरम या महाबलीपुरम का नाम उससे जुड़ा है।
मामल्लपुरम के प्रसिद्ध एकाश्म मंदिर रथ कहलाते हैं। सबसे प्रसिद्ध समूह पंच रथ है।
इनमें द्रौपदी रथ सबसे छोटा है, लेकिन यह अलंकरण-विहीन नहीं है। इस पर दुर्गा सहित धार्मिक आकृतियाँ अंकित हैं।
पल्लव अभिलेखों में अनेक राजकीय बिरुद मिलते हैं। लोकादित्य, एकमल्ल, रणंजय, अत्यन्तकाम, उग्रदण्ड और गुणभाजन जैसे नाम पल्लव शासकीय परंपरा में मिलते हैं, लेकिन इन सभी को केवल परमेश्वरवर्मन प्रथम की निश्चित उपाधियाँ मानना उचित नहीं है।
नरसिंहवर्मन द्वितीय को राजसिंह कहा जाता था। उसने आगमप्रिय और शंकरभक्त जैसी उपाधियाँ भी धारण कीं।
कांची का प्रसिद्ध कैलासनाथ मंदिर नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह के शासनकाल में बनाया गया।
वैकुंठ पेरुमाल मंदिर उत्तरवर्ती पल्लव शासक नंदिवर्मन द्वितीय से संबंधित है। मुक्तेश्वर मंदिर भी उत्तरवर्ती पल्लव काल का है।
वातापी के चालुक्य
बादामी चालुक्य
चालुक्यों के प्रारंभिक पूर्वजों में जयसिंह का उल्लेख मिलता है, लेकिन स्वतंत्र बादामी चालुक्य सत्ता का वास्तविक संस्थापक सामान्यतः पुलकेशिन प्रथम माना जाता है।
चालुक्यों की राजधानी वातापी, वर्तमान बादामी थी।
पुलकेशिन प्रथम ने वातापी को किलेबंद और विकसित राजधानी बनाया। इसलिए वातापी के निर्माण का पूरा श्रेय कीर्तिवर्मन प्रथम को देना सही नहीं है।
इस वंश का महानतम शासक पुलकेशिन द्वितीय था।
पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा क्षेत्र में हर्षवर्धन की दक्षिण की ओर बढ़ती शक्ति को रोका।
उसने परमेश्वर सहित कई उपाधियाँ धारण कीं और दक्षिणापथ की प्रमुख शक्ति बना।
ऐहोल का प्रसिद्ध मेगुती जैन मंदिर पुलकेशिन द्वितीय के शासनकाल में बना।
उसके दरबारी कवि रविकीर्ति ने 634 ईस्वी के आसपास प्रसिद्ध ऐहोल प्रशस्ति लिखी।
बादामी चालुक्य वंश का अंतिम शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय था।
राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग ने चालुक्य सत्ता को पराजित कर दक्कन में राष्ट्रकूट साम्राज्य स्थापित किया।
राष्ट्रकूट वंश
दंतिदुर्ग से कृष्ण तृतीय
दंतिदुर्ग ने आठवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना की।
मान्यखेट राष्ट्रकूटों की प्रसिद्ध राजधानी थी, लेकिन इसे विशेष रूप से अमोघवर्ष प्रथम के समय प्रमुख राजधानी के रूप में विकसित किया गया।
एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने कराया।
ध्रुव या ध्रुव धारावर्ष राष्ट्रकूटों का वह प्रमुख शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार के लिए चल रहे पाल-प्रतिहार-राष्ट्रकूट त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया।
कृष्ण तृतीय राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान साम्राज्यवादी शासक माना जाता है।
उसके दरबार में प्रसिद्ध कन्नड़ कवि पोन्न को संरक्षण मिला। पोन्न ने शांतिपुराण की रचना की।
17वीं शताब्दी के फ्रांसीसी यात्री जाँ द थेवेनो ने एलोरा का वर्णन अपने यात्रा-वृत्तांत में किया। एलोरा का ज्ञान इससे बहुत पुराना था, इसलिए इसे एलोरा का सर्वप्रथम उल्लेख नहीं कहा जाता।
वेंगी के चालुक्य
पूर्वी चालुक्य
वेंगी के चालुक्य या पूर्वी चालुक्य वंश की स्थापना कुब्ज विष्णुवर्धन ने की।
वह बादामी चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय का भाई था।
इनका प्रमुख क्षेत्र वेंगी था, जो वर्तमान आंध्र प्रदेश में स्थित था।
इस वंश का शक्तिशाली शासक विजयादित्य तृतीय था। उसका प्रसिद्ध सेनापति पंडरंग था।
चोल वंश
तंजावुर से गंगैकोंडचोलपुरम्
प्राचीन चोलों का उल्लेख संगम साहित्य में मिलता है, लेकिन मध्यकालीन साम्राज्यवादी चोल वंश का संस्थापक विजयालय माना जाता है।
विजयालय ने नौवीं शताब्दी में तंजावुर पर अधिकार किया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
विजयालय ने निशुंभसूदनी देवी मंदिर का निर्माण कराया। उसके साथ नरकेसरी जैसे बिरुद भी जोड़े जाते हैं।
आदित्य प्रथम ने पल्लव शक्ति को पराजित कर चोल राज्य की स्वतंत्रता और विस्तार को मजबूत किया। उससे कोदण्डराम उपाधि का संबंध मिलता है।
चोल शासकों में राजकेसरी और परकेसरी बिरुदों का क्रमिक प्रयोग एक वंशीय परंपरा थी।
राजेंद्र द्वितीय और वीरराजेंद्र के अभिलेखों में भी इन राजकीय बिरुदों का प्रयोग मिलता है।
राजराज प्रथम चोल साम्राज्य का महान शासक था। उसने तंजावुर का प्रसिद्ध बृहदीश्वर मंदिर बनवाया।
उसका उत्तराधिकारी राजेंद्र प्रथम चोल साम्राज्य को और विस्तार देकर गंगैकोंडचोलपुरम् को नई राजधानी बनाया।
चोलों की ग्राम-स्वशासन व्यवस्था, मंदिर अर्थव्यवस्था, सिंचाई व्यवस्था और समुद्री व्यापार अत्यंत विकसित थे।
चोल वंश का अंतिम शासक सामान्यतः राजेंद्र तृतीय माना जाता है।
कल्याणी के चालुक्य
पश्चिमी चालुक्य
तैलप द्वितीय ने 10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राष्ट्रकूट सत्ता को समाप्त कर कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य वंश की स्थापना की।
प्रारंभ में उनका राजनीतिक केंद्र मान्यखेट क्षेत्र में था।
सोमेश्वर प्रथम ने कल्याणी, वर्तमान बसवकल्याण, को प्रमुख राजधानी बनाया।
इस वंश का महानतम शासक विक्रमादित्य षष्ठ था।
विक्रमादित्य षष्ठ ने अपने राज्यारोहण से चालुक्य-विक्रम संवत प्रारंभ किया।
प्रसिद्ध विधिवेत्ता विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा की रचना की। यह याज्ञवल्क्य स्मृति की प्रसिद्ध टीका है।
कश्मीरी कवि बिल्हण ने विक्रमांकदेवचरित लिखा, जिसमें विक्रमादित्य षष्ठ के जीवन और उपलब्धियों का वर्णन है।
देवगिरि के यादव
सेउना यादव
यादव या सेउना वंश भिल्लम पंचम से पहले भी अस्तित्व में था। भिल्लम पंचम ने 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वतंत्र यादव राज्य स्थापित किया।
उसने देवगिरि को राजधानी बनाया।
इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक सिंहण द्वितीय था।
रामचंद्र के समय अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 ईस्वी में देवगिरि पर आक्रमण किया।
बाद में मलिक काफूर के अभियान के बाद रामचंद्र ने दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार की।
रामचंद्र यादव वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक नहीं था। उसके बाद शंकरदेव और हरपालदेव ने भी दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध प्रतिरोध किया।
काकतीय वंश
हनमकोंडा और वारंगल
काकतीयों के प्रारंभिक सामंत शासकों में बेटा प्रथम का नाम मिलता है।
स्वतंत्र काकतीय राज्य का मजबूत विकास प्रोल द्वितीय और रुद्रदेव के समय हुआ।
इनकी प्रारंभिक राजधानी हनमकोंडा थी और बाद में वारंगल राजधानी बनी।
इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक गणपति देव था।
उसके बाद रुद्रमादेवी ने शासन किया। वह मध्यकालीन भारत की प्रसिद्ध महिला शासकों में थी।
प्रतापरुद्र द्वितीय काकतीय वंश का अंतिम प्रमुख शासक था। 1323 ईस्वी में वारंगल दिल्ली सल्तनत के अधिकार में आ गया।
भाग 3 — पूर्वी भारत के राजवंश
पाल, सेन और कामरूप
पाल वंश
बंगाल और बिहार
आठवीं शताब्दी में बंगाल में राजनीतिक अव्यवस्था समाप्त करने के लिए स्थानीय प्रमुखों ने गोपाल को राजा चुना। इसी से पाल वंश की स्थापना हुई।
पालों की सत्ता मुख्यतः बंगाल और बिहार में थी।
अलग-अलग समय में पाटलिपुत्र, मुंगेर और अन्य नगर राजनीतिक केंद्र रहे। इसलिए पूरे पाल वंश की एकमात्र राजधानी मुंगेर नहीं थी।
तिब्बती परंपरा ओदंतपुरी महाविहार की स्थापना गोपाल से जोड़ती है।
बाद के पाल शासकों, विशेषकर देवपाल ने भी बौद्ध महाविहारों को व्यापक संरक्षण दिया। इसलिए ओदंतपुरी के संदर्भ में गोपाल को संस्थापक और बाद के पाल शासकों को संरक्षक के रूप में समझना उचित है।
पाल वंश का महान शासक धर्मपाल था।
धर्मपाल ने प्रसिद्ध विक्रमशिला महाविहार की स्थापना की।
उसका कन्नौज के लिए गुर्जर-प्रतिहार और राष्ट्रकूटों से संघर्ष हुआ। इसे त्रिपक्षीय संघर्ष कहा जाता है।
धर्मपाल ने सोमपुर महाविहार को भी संरक्षण दिया।
देवपाल ने पाल साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाया और बौद्ध संस्थाओं को संरक्षण दिया।
पाल काल में संस्कृत और बौद्ध साहित्य का महत्वपूर्ण विकास हुआ। गौड़ी रीति बंगाल से संबंधित संस्कृत साहित्यिक शैली के रूप में प्रसिद्ध हुई, लेकिन इसे केवल पाल शासकों द्वारा निर्मित शैली नहीं माना जाता।
सेन वंश
बंगाल की उत्तरवर्ती शक्ति
सामंतसेन को सेन वंश का आदिपुरुष माना जाता है।
उसके बाद हेमंतसेन हुआ और विजयसेन ने एक शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।
सेन शासकों के प्रमुख राजनीतिक केंद्रों में विक्रमपुर और नदिया या नवद्वीप शामिल थे।
लखनौती और नदिया अलग-अलग नगर थे। दोनों को एक ही स्थान नहीं माना जाता।
विजयसेन ने देवपाड़ा में प्रद्युम्नेश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
उसकी प्रसिद्ध देवपाड़ा प्रशस्ति कवि उमापतिधर द्वारा लिखी गई।
बल्लालसेन ने दानसागर की रचना की। उसने अद्भुतसागर का आरंभ किया, जिसे बाद में लक्ष्मणसेन ने पूरा कराया।
सेन राजवंश को भारत का पहला ऐसा राजवंश मानना जिसने हिंदी में अभिलेख लिखवाया, प्रमाणित तथ्य नहीं है। इनके प्रमुख अभिलेख संस्कृत में हैं।
लक्ष्मणसेन के शासनकाल में लगभग 1204–1205 ईस्वी में बख्तियार खिलजी ने नदिया पर आक्रमण किया।
लक्ष्मणसेन इसके बाद भी पूर्वी बंगाल में कुछ समय शासन करता रहा। इसलिए उसे पूरे बंगाल का अंतिम हिंदू शासक कहना सही नहीं है।
कामरूप का वर्मन वंश
प्राग्ज्योतिषपुर
चौथी शताब्दी ईस्वी के मध्य में कामरूप में वर्मन वंश का उदय हुआ।
इस वंश का संस्थापक पुष्यवर्मन था।
इसकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर थी, जिसकी पहचान वर्तमान गुवाहाटी क्षेत्र से की जाती है।
वर्मन वंश का प्रसिद्ध शासक भास्करवर्मन था, जो हर्षवर्धन का मित्र और समकालीन था।
वर्मन वंश के बाद कामरूप में म्लेच्छ वंश और फिर कामरूप का स्थानीय पाल वंश सत्ता में आया।
यह पाल वंश बंगाल के पाल साम्राज्य से अलग था। इसलिए कामरूप को बंगाल के पाल साम्राज्य का सामान्य अंग नहीं माना जाता।
भाग 4 — कश्मीर के प्रमुख राजवंश
कार्कोट → उत्पल → लोहार
कश्मीर के राजवंश
राजतरंगिणी की ऐतिहासिक परंपरा
दुर्लभवर्धन ने सातवीं शताब्दी में कश्मीर में कार्कोट वंश की स्थापना की।
कार्कोट वंश का सबसे शक्तिशाली शासक ललितादित्य मुक्तापीड था।
उसने अनेक सैन्य अभियान किए और कश्मीर में कला तथा स्थापत्य को व्यापक संरक्षण दिया।
कश्मीर का प्रसिद्ध मार्तंड सूर्य मंदिर ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा बनवाया गया।
कार्कोट वंश के बाद कश्मीर में उत्पल वंश का शासन स्थापित हुआ।
उत्पल वंश का संस्थापक अवंतिवर्मन था।
अवंतिवर्मन के प्रसिद्ध अभियंता सुय्य ने झेलम नदी और सिंचाई व्यवस्था में व्यापक सुधार किए।
उसने नहरें बनवाईं और बाढ़ नियंत्रण तथा कृषि भूमि के विस्तार के लिए कार्य किया।
उत्पल वंश के बाद कश्मीर में लोहार वंश का शासन स्थापित हुआ।
संग्रामराज लोहार वंश का प्रारंभिक प्रमुख शासक था।
जयसिंह लोहार वंश का अंतिम शासक नहीं था।
कल्हण की राजतरंगिणी का मूल ऐतिहासिक विवरण जयसिंह के शासनकाल तक पहुँचकर समाप्त होता है, लेकिन लोहार सत्ता उसके बाद भी कुछ समय जारी रही।
भाग 5 — उत्तर एवं मध्य भारत के प्रमुख राजवंश
प्रतिहार, गहड़वाल, परमार, चौहान, चंदेल, सोलंकी, कलचुरी और मेवाड़
गुर्जर-प्रतिहार वंश
कन्नौज की शक्ति
गुर्जर-प्रतिहारों की विभिन्न शाखाएँ थीं। साम्राज्यवादी गुर्जर-प्रतिहार शक्ति का प्रारंभिक संस्थापक नागभट्ट प्रथम माना जाता है।
उसने आठवीं शताब्दी में पश्चिमी भारत में अरब आक्रमणों का सफल प्रतिरोध किया।
प्रतिहारों की सत्ता बाद में कन्नौज तक फैली।
कन्नौज पर प्रभुत्व के लिए प्रतिहारों का पाल और राष्ट्रकूटों से लंबा संघर्ष हुआ, जिसे त्रिपक्षीय संघर्ष कहा जाता है।
इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक मिहिर भोज या भोज प्रथम था।
मिहिर भोज ने आदिवराह उपाधि धारण की और कन्नौज को प्रमुख राजधानी बनाया।
प्रतिहार सत्ता के अंतिम चरण में यशपाल जैसे दुर्बल शासकों का उल्लेख मिलता है।
11वीं शताब्दी तक विशाल प्रतिहार साम्राज्य अनेक छोटी क्षेत्रीय शक्तियों में टूट गया।
दिल्ली क्षेत्र के तोमर नरेश अनंगपाल द्वितीय ने 11वीं शताब्दी में लालकोट का निर्माण अथवा विस्तार किया।
दिल्ली क्षेत्र उससे पहले भी आबाद था, इसलिए दिल्ली नगर की पूरी स्थापना केवल अनंगपाल के नाम पर रखना सही नहीं है।
गहड़वाल राजवंश
कन्नौज और वाराणसी
चंद्रदेव ने 11वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गहड़वाल वंश की स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
इसके प्रमुख राजनीतिक केंद्र कन्नौज और वाराणसी थे।
गहड़वालों को सीधे राठौर राजवंश कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।
इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक गोविंदचंद्र था।
पृथ्वीराज चौहान और जयचंद्र की पुत्री संयोगिता के स्वयंवर और अपहरण की कथा मुख्यतः बाद के पृथ्वीराज रासो और लोकपरंपरा से प्रसिद्ध है। इसे प्रमाणित समकालीन ऐतिहासिक घटना नहीं माना जाता।
जयचंद्र को 1194 ईस्वी में चंदावर के युद्ध में मुहम्मद गौरी ने पराजित किया। जयचंद्र युद्ध में मारा गया।
जयचंद्र के बाद हरिश्चंद्र का भी उल्लेख मिलता है। इसलिए जयचंद्र को गहड़वाल वंश का बिल्कुल अंतिम शासक कहना सही नहीं है।
परमार वंश
धारा और राजा भोज
मालवा के परमार वंश का प्रारंभिक संस्थापक उपेंद्र या कृष्णराज माना जाता है।
इसकी प्रमुख राजधानी धारा नगरी, वर्तमान धार, थी। उज्जैन भी परमार राज्य का महत्वपूर्ण नगर था।
इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक राजा भोज था।
राजा भोज युद्ध-कौशल के साथ साहित्य, वास्तुकला, विज्ञान और शिक्षा के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।
धार में भोज से जुड़ी विद्या-परंपरा को बाद में भोजशाला कहा गया। इसे परंपरा सरस्वती उपासना और संस्कृत अध्ययन से जोड़ती है।
चित्तौड़ का त्रिभुवन नारायण मंदिर राजा भोज से संबंधित निर्माण परंपरा से जुड़ा है।
भोजपुर नगर तथा वहाँ का विशाल अधूरा भोजेश्वर शिव मंदिर राजा भोज से संबंधित हैं।
चाहमान या चौहान वंश
शाकंभरी से अजमेर
चाहमानों की शाकंभरी शाखा की परंपरा में वासुदेव को प्रारंभिक संस्थापक माना जाता है।
इनकी प्रारंभिक राजधानी शाकंभरी, वर्तमान सांभर, थी। अहिच्छत्र इनकी प्रारंभिक राजधानी नहीं थी।
अजयराज द्वितीय ने अजयमेरु, वर्तमान अजमेर, नगर को विकसित किया और उसे राजधानी बनाया।
विग्रहराज चतुर्थ या बीसलदेव चौहान वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में था।
उसने दिल्ली क्षेत्र तक चौहान शक्ति का विस्तार किया और साहित्य तथा शिक्षा को संरक्षण दिया।
पृथ्वीराज तृतीय अजमेर-दिल्ली शाखा का अंतिम महान स्वतंत्र चौहान शासक था। उसके बाद भी चौहानों की अन्य शाखाएँ, विशेषकर रणथंभौर, बनी रहीं।
चंदबरदाई को परंपरा पृथ्वीराज तृतीय का राजकवि मानती है। पृथ्वीराज रासो उससे संबंधित प्रसिद्ध रचना है, लेकिन वर्तमान रासो का पाठ बाद की कई साहित्यिक परतों में विकसित हुआ।
रणथंभौर के जैन धार्मिक स्थलों को चौहान शासकों से संरक्षण मिला। पृथ्वीराज तृतीय से जैन मंदिर के शिखर अथवा कलश संबंधी दान की परंपरा भी मिलती है, लेकिन इसे उसके प्रमुख प्रमाणित निर्माणों में नहीं रखा जाता।
तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ईस्वी में हुआ। इसमें पृथ्वीराज तृतीय ने मुहम्मद गौरी को पराजित किया।
तराइन का द्वितीय युद्ध 1192 ईस्वी में हुआ। इसमें मुहम्मद गौरी विजयी हुआ और पृथ्वीराज तृतीय पराजित हुआ।
चंदेल वंश
खजुराहो और कालिंजर
नन्नुक चंदेल वंश का प्रारंभिक संस्थापक माना जाता है।
खजुराहो चंदेलों का प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र था, जबकि कालिंजर उनका अत्यंत महत्वपूर्ण दुर्ग और राजनीतिक केंद्र था।
इसलिए खजुराहो और कालिंजर को सरल रूप में “पहली और दूसरी राजधानी” कहना आवश्यक नहीं है; दोनों की अलग-अलग राजनीतिक और धार्मिक भूमिकाएँ थीं।
यशोवर्मन चंदेल वंश का पहला महान स्वतंत्र शासक था।
उसने खजुराहो के प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कराया।
धंग ने चंदेल शक्ति को और बढ़ाया। खजुराहो का प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर उसके शासनकाल का निर्माण है।
धंग से वैद्यनाथ मंदिर की परंपरा भी जुड़ी है।
खजुराहो का प्रसिद्ध कंदरिया महादेव मंदिर धंग के बजाय सामान्यतः विद्याधर के समय, 11वीं शताब्दी के प्रारंभ में, निर्मित माना जाता है।
परंपरा के अनुसार वृद्धावस्था में धंग ने प्रयाग में गंगा-यमुना संगम पर धार्मिक अनुष्ठान करते हुए जीवन का अंत किया।
परमर्दिदेव या परमाल 12वीं शताब्दी का प्रसिद्ध चंदेल शासक था। वह पृथ्वीराज चौहान का समकालीन था।
परमर्दिदेव चंदेल वंश का अंतिम शासक नहीं था। चंदेल शासक उसके बाद भी कई पीढ़ियों तक बुंदेलखंड के कुछ भागों में शासन करते रहे।
सोलंकी या गुजरात के चालुक्य
अन्हिलवाड़-पाटण
गुजरात के चालुक्य या सोलंकी वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था।
इनकी राजधानी अन्हिलवाड़-पाटण थी।
मूलराज प्रथम का संबंध मुख्यतः शैव धर्म से माना जाता है। सोलंकी शासकों ने विभिन्न धार्मिक परंपराओं को संरक्षण दिया।
जयसिंह सिद्धराज सोलंकी वंश का महान शक्तिशाली शासक था।
उसके बाद कुमारपाल भी अत्यंत महत्वपूर्ण शासक हुआ। उसका जैन आचार्य हेमचंद्र से निकट संबंध था।
भीम द्वितीय दीर्घकाल तक शासन करने वाला महत्वपूर्ण सोलंकी शासक था, लेकिन वह इस वंश का अंतिम शासक नहीं था।
उसके बाद भी चालुक्य शासक हुए और 13वीं शताब्दी में वाघेला वंश ने गुजरात में सत्ता प्राप्त की।
कलचुरी-चेदी वंश
त्रिपुरी के कलचुरी
त्रिपुरी के साम्राज्यवादी कलचुरी वंश का प्रारंभिक संस्थापक कोक्कल प्रथम माना जाता है।
इसकी राजधानी त्रिपुरी थी, जिसकी पहचान वर्तमान जबलपुर के निकट तेवर से की जाती है।
इस वंश का शक्तिशाली शासक गांगेयदेव था।
उसने उत्तर और पूर्व की दिशा में अपने राज्य का विस्तार किया।
उसका पुत्र कर्णदेव कलचुरी वंश के महान शासकों में था।
उसने कलिंग की दिशा में अभियान किया और त्रिकलिंगाधिपति जैसी उपाधि धारण की।
मेवाड़ का गुहिल-सिसोदिया वंश
चित्तौड़
मेवाड़ के सिसोदिया शासक व्यापक गुहिल या गुहिलोत वंश की एक शाखा थे।
सिसोदिया शासक स्वयं को सूर्यवंशी मानते थे।
चित्तौड़ लंबे समय तक मेवाड़ का प्रमुख दुर्ग और राजधानी रहा।
14वीं शताब्दी में राणा हम्मीर ने चित्तौड़ में सिसोदिया सत्ता को पुनः स्थापित किया।
राणा कुंभा 15वीं शताब्दी में मेवाड़ का महान शासक हुआ।
अपनी विजयों की स्मृति में राणा कुंभा ने चित्तौड़गढ़ में प्रसिद्ध विजय स्तंभ का निर्माण कराया।
विजय स्तंभ का निर्माण 15वीं शताब्दी के मध्य में हुआ और यह मेवाड़ की सैन्य तथा स्थापत्य उपलब्धियों का महत्वपूर्ण स्मारक है।
भाग 6 — प्रमुख राजवंशों का कालक्रम
एक नज़र में पूरा क्रम
| राजवंश | लगभग प्रमुख काल | मुख्य केंद्र |
|---|---|---|
| वाकाटक | तीसरी–पाँचवीं शताब्दी | विदर्भ |
| कदंब | चौथी–छठी शताब्दी | बनवासी |
| पश्चिमी गंग | चौथी–दसवीं शताब्दी | कुवलाल, तलकाड |
| पल्लव | छठी–नौवीं शताब्दी | कांचीपुरम |
| पुष्यभूति/वर्धन | छठी–सातवीं शताब्दी | थानेश्वर, कन्नौज |
| बादामी चालुक्य | छठी–आठवीं शताब्दी | वातापी |
| पूर्वी चालुक्य | सातवीं–बारहवीं शताब्दी | वेंगी |
| कार्कोट | सातवीं–नौवीं शताब्दी | कश्मीर |
| पाल | आठवीं–बारहवीं शताब्दी | बंगाल-बिहार |
| गुर्जर-प्रतिहार | आठवीं–ग्यारहवीं शताब्दी | कन्नौज |
| राष्ट्रकूट | आठवीं–दसवीं शताब्दी | मान्यखेट |
| चोल | नौवीं–तेरहवीं शताब्दी | तंजावुर |
| परमार | नौवीं–चौदहवीं शताब्दी | धारा |
| चंदेल | नौवीं–चौदहवीं शताब्दी | खजुराहो, कालिंजर |
| कल्याणी चालुक्य | दसवीं–बारहवीं शताब्दी | कल्याणी |
| सोलंकी | दसवीं–तेरहवीं शताब्दी | अन्हिलवाड़-पाटण |
| गहड़वाल | ग्यारहवीं–तेरहवीं शताब्दी | कन्नौज, वाराणसी |
| सेन | ग्यारहवीं–तेरहवीं शताब्दी | विक्रमपुर, नदिया |
| देवगिरि यादव | बारहवीं–चौदहवीं शताब्दी | देवगिरि |
| काकतीय | बारहवीं–चौदहवीं शताब्दी | वारंगल |
| सिसोदिया | चौदहवीं शताब्दी से आगे | चित्तौड़ |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
वाकाटक — विंध्यशक्ति — प्रवरसेन प्रथम।
वाकाटक शाखाएँ — नंदिवर्धन-प्रवरपुर और वत्सगुल्म।
हरिषेण — वत्सगुल्म शाखा का अंतिम महान शासक — अजंता।
वर्धन वंश — थानेश्वर — प्रभाकरवर्धन — हर्षवर्धन।
हर्ष — 606 ईस्वी — कन्नौज।
बाणभट्ट — हर्षचरित और कादंबरी।
ह्वेनसांग — हर्ष के शासनकाल में भारत आया।
कदंब — मयूरशर्मा — बनवासी।
पश्चिमी गंग — कोंगणिवर्मन माधव — कुवलाल → तलकाड।
पल्लव — कांचीपुरम।
नरसिंहवर्मन प्रथम — महामल्ल और वातापीकोंड।
मामल्लपुरम — प्रसिद्ध पंच रथ।
कैलासनाथ मंदिर, कांची — नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह।
बादामी चालुक्य — स्वतंत्र सत्ता का संस्थापक पुलकेशिन प्रथम।
पुलकेशिन द्वितीय — हर्ष की दक्षिणी प्रगति रोकी।
ऐहोल प्रशस्ति — रविकीर्ति।
राष्ट्रकूट — दंतिदुर्ग।
एलोरा कैलाश मंदिर — कृष्ण प्रथम।
ध्रुव धारावर्ष — त्रिपक्षीय संघर्ष।
पूर्वी चालुक्य — कुब्ज विष्णुवर्धन — वेंगी।
चोल — विजयालय — तंजावुर।
बृहदीश्वर मंदिर — राजराज प्रथम।
गंगैकोंडचोलपुरम् — राजेंद्र प्रथम।
अंतिम चोल शासक — राजेंद्र तृतीय।
कल्याणी चालुक्य — तैलप द्वितीय।
विक्रमादित्य षष्ठ — सबसे प्रसिद्ध पश्चिमी चालुक्य शासक।
मिताक्षरा — विज्ञानेश्वर।
विक्रमांकदेवचरित — बिल्हण।
देवगिरि यादव — स्वतंत्र सत्ता भिल्लम पंचम — महान शासक सिंहण द्वितीय।
काकतीय — हनमकोंडा → वारंगल — गणपति देव — रुद्रमादेवी — प्रतापरुद्र द्वितीय।
पाल — गोपाल — धर्मपाल — देवपाल।
विक्रमशिला — धर्मपाल।
सेन — सामंतसेन — महान स्वतंत्र शासक विजयसेन।
दानसागर — बल्लालसेन; अद्भुतसागर — बल्लालसेन से आरंभ, लक्ष्मणसेन ने पूर्ण किया।
कामरूप वर्मन — पुष्यवर्मन — प्रसिद्ध शासक भास्करवर्मन।
कार्कोट — दुर्लभवर्धन — ललितादित्य मुक्तापीड।
मार्तंड सूर्य मंदिर — ललितादित्य।
उत्पल — अवंतिवर्मन — अभियंता सुय्य।
राजतरंगिणी का मूल विवरण — जयसिंह के शासनकाल तक।
गुर्जर-प्रतिहार — नागभट्ट प्रथम — मिहिर भोज — कन्नौज।
पाल + प्रतिहार + राष्ट्रकूट = कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष।
गहड़वाल — चंद्रदेव — गोविंदचंद्र।
चंदावर युद्ध — 1194 — जयचंद्र बनाम मुहम्मद गौरी।
परमार — उपेंद्र/कृष्णराज — राजधानी धारा — महान शासक भोज।
चौहान — शाकंभरी → अजमेर।
विग्रहराज चतुर्थ — प्रमुख चौहान शासक।
पृथ्वीराज तृतीय — तराइन प्रथम 1191 विजय; तराइन द्वितीय 1192 पराजय।
चंदेल — नन्नुक — यशोवर्मन — धंग — विद्याधर।
लक्ष्मण मंदिर — यशोवर्मन।
विश्वनाथ मंदिर — धंग।
कंदरिया महादेव मंदिर — विद्याधर काल।
सोलंकी — मूलराज प्रथम — अन्हिलवाड़-पाटण।
जयसिंह सिद्धराज और कुमारपाल — प्रमुख सोलंकी शासक।
त्रिपुरी कलचुरी — कोक्कल प्रथम — गांगेयदेव — कर्णदेव।
सिसोदिया — गुहिल वंश की शाखा — मेवाड़।
राणा कुंभा — चित्तौड़ का विजय स्तंभ।