नागरिकता
संवैधानिक प्रावधान, नागरिकता अधिनियम, नागरिकता की प्राप्ति और समाप्ति
नागरिकता का महत्व
लोकतंत्रात्मक राज्य-व्यवस्था में नागरिकता किसी व्यक्ति को राज्य की पूर्ण राजनीतिक सदस्यता प्रदान करती है। नागरिकता के साथ व्यक्ति को अनेक अधिकार, कर्तव्य, दायित्व और राजनीतिक विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। भारतीय संविधान में कुछ अधिकार केवल नागरिकों को दिए गए हैं, जबकि कुछ अधिकार नागरिकों और विदेशियों दोनों को प्राप्त हो सकते हैं।
भारतीय संविधान में नागरिकता से संबंधित मूल प्रावधान भाग II के अनुच्छेद 5 से 11 तक दिए गए हैं। संविधान लागू होने के बाद नागरिकता के अर्जन और समाप्ति से संबंधित विस्तृत व्यवस्था नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा की गई।
नागरिकता का अर्थ
Meaning of Citizenship
नागरिकता किसी व्यक्ति और राज्य के बीच स्थापित वह कानूनी एवं राजनीतिक संबंध है जिसके आधार पर व्यक्ति राज्य का पूर्ण सदस्य माना जाता है।
नागरिकता व्यक्ति को अधिकार और राजनीतिक विशेषाधिकार प्रदान करती है, साथ ही उसके ऊपर कुछ कर्तव्य और दायित्व भी डालती है।
भारतीय संविधान में कुछ संवैधानिक अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित हैं। विदेशियों को भारत में कई कानूनी एवं मौलिक अधिकार मिल सकते हैं, लेकिन उन्हें सभी राजनीतिक और नागरिक-विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होते।
नागरिकता से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
Constitutional Provisions
| अनुच्छेद | मुख्य विषय |
|---|---|
| अनुच्छेद 5 | संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता |
| अनुच्छेद 6 | पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता |
| अनुच्छेद 7 | भारत से पाकिस्तान गए व्यक्तियों की नागरिकता |
| अनुच्छेद 8 | विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों की नागरिकता |
| अनुच्छेद 9 | स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता प्राप्त करने का प्रभाव |
| अनुच्छेद 10 | नागरिकता के अधिकारों की निरंतरता |
| अनुच्छेद 11 | नागरिकता पर कानून बनाने की संसद की शक्ति |
🎯 परीक्षा तथ्य
भारतीय संविधान का भाग II = अनुच्छेद 5 से 11 = नागरिकता।
केवल नागरिकों को प्राप्त प्रमुख अधिकार
Rights Available Only to Citizens
भारतीय संविधान के कुछ मौलिक अधिकार विशेष रूप से केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं। इनमें मुख्य रूप से अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 16, अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 29 के अंतर्गत प्राप्त अधिकार शामिल हैं।
अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर नागरिकों के विरुद्ध भेदभाव के निषेध से संबंधित है।
अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता से संबंधित है।
अनुच्छेद 19 नागरिकों को विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है।
अनुच्छेद 29 नागरिकों के वर्गों के सांस्कृतिक हितों के संरक्षण से संबंधित प्रावधान करता है।
⚠️ ध्यान रखें
सभी मौलिक अधिकार केवल नागरिकों तक सीमित नहीं हैं। संविधान के कई अधिकार भारत में उपस्थित गैर-नागरिकों को भी प्राप्त हो सकते हैं।
केवल भारतीय नागरिकों के लिए प्रमुख पद
Constitutional Offices
भारतीय संविधान के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण पदों के लिए भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।
इनमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद शामिल हैं।
भारत का महान्यायवादी बनने के लिए व्यक्ति में उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता होनी चाहिए, जबकि राज्य का महाधिवक्ता बनने के लिए उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता आवश्यक है। इसलिए इन पदों के लिए भी भारतीय नागरिकता आवश्यक होती है।
संसद और राज्य विधानमंडलों की सदस्यता के लिए भी भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।
मतदान का अधिकार
Right to Vote
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव में मतदाता के रूप में पंजीकरण का अधिकार भारतीय नागरिकों से संबंधित राजनीतिक अधिकार है।
विदेशी व्यक्ति भारत के सामान्य चुनावों में भारतीय मतदाता के रूप में मतदान नहीं कर सकता।
मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। यह संविधान तथा चुनाव संबंधी कानूनों से प्राप्त वैधानिक एवं संवैधानिक अधिकार है।
अनुच्छेद 5 — संविधान प्रारंभ होने पर नागरिकता
Citizenship at Commencement
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय अनुच्छेद 5 के अंतर्गत नागरिकता के लिए व्यक्ति का भारत के राज्य क्षेत्र में अधिवास होना आवश्यक था।
इसके साथ वह व्यक्ति भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा हो; या उसके माता-पिता में से कोई भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा हो; या संविधान लागू होने से ठीक पहले कम-से-कम 5 वर्षों तक भारत में सामान्यतः निवास करता रहा हो।
इसलिए केवल भारत में जन्म या निवास पर्याप्त नहीं था; भारत में अधिवास की शर्त भी महत्वपूर्ण थी।
अनुच्छेद 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्ति
Migration from Pakistan to India
अनुच्छेद 6 पाकिस्तान से भारत आने वाले कुछ व्यक्तियों की नागरिकता से संबंधित था।
इसके लिए आवश्यक था कि वह व्यक्ति स्वयं, उसके माता-पिता या उसके दादा-दादी में से कोई व्यक्ति भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में जन्मा हो।
यदि वह व्यक्ति 19 जुलाई 1948 से पहले भारत आया था, तो उसके लिए प्रव्रजन की तारीख से भारत में सामान्यतः निवास करना आवश्यक था।
यदि वह व्यक्ति 19 जुलाई 1948 या उसके बाद भारत आया, तो उसे सक्षम अधिकारी के समक्ष भारतीय नागरिक के रूप में पंजीकरण कराना आवश्यक था। पंजीकरण के आवेदन से पहले कम-से-कम 6 महीने भारत में निवास की शर्त भी थी।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
19 जुलाई 1948 के बाद भारत आने वाले व्यक्ति के लिए केवल 6 महीने रहना पर्याप्त नहीं था; पंजीकरण भी आवश्यक था।
अनुच्छेद 7 — भारत से पाकिस्तान गए व्यक्ति
Migration to Pakistan
अनुच्छेद 7 के अनुसार जो व्यक्ति 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान प्रव्रजन कर गया, उसे सामान्यतः भारतीय नागरिक नहीं माना गया।
लेकिन यदि ऐसा व्यक्ति बाद में पुनर्वास या स्थायी वापसी के परमिट के आधार पर भारत लौट आया, तो उसकी नागरिकता की स्थिति अनुच्छेद 6 के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित की जा सकती थी।
अनुच्छेद 8 — विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्ति
Persons of Indian Origin Abroad
अनुच्छेद 8 विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों की नागरिकता से संबंधित है।
यदि व्यक्ति स्वयं अथवा उसके माता-पिता या दादा-दादी में से कोई व्यक्ति भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में जन्मा था, तो निर्धारित शर्तों के अंतर्गत वह भारतीय राजनयिक या वाणिज्य-दूत प्रतिनिधि के समक्ष पंजीकरण द्वारा भारतीय नागरिक बन सकता था।
अनुच्छेद 9 — विदेशी नागरिकता
Foreign Citizenship
अनुच्छेद 9 के अनुसार अनुच्छेद 5, 6 या 8 के आधार पर नागरिकता का दावा करने वाला व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं रहेगा यदि उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से प्राप्त कर ली हो।
भारत सामान्य भारतीय नागरिकता के साथ किसी दूसरे देश की पूर्ण संप्रभु नागरिकता को समानांतर भारतीय नागरिकता के रूप में मान्यता नहीं देता।
अनुच्छेद 10 और 11
Continuance & Parliamentary Power
अनुच्छेद 10 संविधान के नागरिकता संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत नागरिक बने व्यक्तियों की नागरिकता की निरंतरता से संबंधित है। यह संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन है।
अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अर्जन, समाप्ति और उससे संबंधित अन्य विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है।
इसी शक्ति के आधार पर संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया।
नागरिकता अधिनियम, 1955
Citizenship Act, 1955
नागरिकता अधिनियम, 1955 भारतीय नागरिकता के अर्जन और समाप्ति की विस्तृत वैधानिक व्यवस्था प्रदान करता है।
इस अधिनियम के अंतर्गत नागरिकता पाँच प्रमुख तरीकों से प्राप्त की जा सकती है—जन्म से, वंश से, पंजीकरण द्वारा, देशीयकरण द्वारा और किसी क्षेत्र के भारत में सम्मिलन द्वारा।
🧠 याद रखने का क्रम
जन्म से नागरिकता
Citizenship by Birth
| जन्म की अवधि | मुख्य नियम |
|---|---|
| 26 जनवरी 1950 से 30 जून 1987 | भारत में जन्मा व्यक्ति सामान्यतः जन्म से भारतीय नागरिक माना जाता है। |
| 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 | माता-पिता में से कम-से-कम एक का जन्म के समय भारतीय नागरिक होना आवश्यक। |
| 3 दिसंबर 2004 से | दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों, या एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो। |
🎯 महत्वपूर्ण तिथियाँ
1 जुलाई 1987 और 3 दिसंबर 2004 जन्म से नागरिकता के नियमों के महत्वपूर्ण कट-ऑफ हैं।
जन्म से नागरिकता के अपवाद
Exceptions
भारत में जन्म लेने का सामान्य नियम प्रत्येक परिस्थिति में स्वतः नागरिकता नहीं देता।
यदि जन्म के समय माता या पिता को भारत में विदेशी राजनयिक के रूप में कानूनी प्रतिरक्षा प्राप्त हो और वह भारतीय नागरिक न हो, तो सामान्य जन्म-सिद्धांत लागू नहीं होता।
इसी प्रकार यदि माता या पिता शत्रु विदेशी हो और जन्म शत्रु के कब्जे वाले क्षेत्र में हुआ हो, तो भी जन्म से नागरिकता नहीं मिलती।
वंश से नागरिकता
Citizenship by Descent
भारत के बाहर जन्मे व्यक्ति को निर्धारित परिस्थितियों में उसके भारतीय माता-पिता के आधार पर नागरिकता प्राप्त हो सकती है। इसे वंश से नागरिकता कहा जाता है।
26 जनवरी 1950 से 9 दिसंबर 1992 तक विदेश में जन्मे व्यक्ति के लिए पिता का जन्म के समय भारतीय नागरिक होना प्रमुख आधार था।
10 दिसंबर 1992 से विदेश में जन्मे बच्चे के लिए माता या पिता में से कोई एक जन्म के समय भारतीय नागरिक हो सकता है।
3 दिसंबर 2004 के बाद विदेश में जन्मे बच्चों के लिए भारतीय वाणिज्य-दूतावास में जन्म के पंजीकरण सहित निर्धारित वैधानिक शर्तें भी लागू होती हैं।
पंजीकरण द्वारा नागरिकता
Citizenship by Registration
नागरिकता अधिनियम कुछ निर्धारित श्रेणियों के व्यक्तियों को पंजीकरण द्वारा भारतीय नागरिक बनने की अनुमति देता है।
उदाहरण के रूप में भारत में सामान्यतः 7 वर्ष निवास करने वाला भारतीय मूल का पात्र व्यक्ति निर्धारित शर्तें पूरी करने पर पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकता है।
किसी भारतीय नागरिक से विवाह कर लेने मात्र से विदेशी व्यक्ति स्वतः भारतीय नागरिक नहीं बन जाता। उसे कानून में निर्धारित निवास और पंजीकरण संबंधी शर्तें पूरी करनी होती हैं।
भारतीय नागरिकों के नाबालिग बच्चों, पूर्व भारतीय नागरिकों तथा कुछ पात्र विदेशी भारतीय कार्डधारकों के लिए भी पंजीकरण की अलग-अलग श्रेणियाँ उपलब्ध हैं।
देशीयकरण द्वारा नागरिकता
Citizenship by Naturalization
किसी पात्र विदेशी व्यक्ति को निर्धारित वैधानिक शर्तें पूरी करने पर देशीयकरण प्रमाणपत्र देकर भारतीय नागरिक बनाया जा सकता है।
इसे केवल “12 वर्ष लगातार भारत में रहना” कहकर याद करना पूर्ण रूप से सही नहीं है। कानून में आवेदन से ठीक पहले की अवधि और उससे पूर्व के वर्षों में कुल निवास की अलग-अलग शर्तें निर्धारित हैं।
विशेष परिस्थितियों में केंद्र सरकार विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य, विश्व शांति या मानव प्रगति में विशिष्ट सेवा देने वाले व्यक्ति के लिए कुछ शर्तों में छूट दे सकती है।
⚠️ भ्रम न करें
देशीयकरण = केवल लगातार 12 वर्ष निवास कहना अधूरा है। निर्धारित अवधि की गणना कानून की अनुसूची के अनुसार होती है।
क्षेत्र के समावेशन द्वारा नागरिकता
Incorporation of Territory
यदि कोई नया क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है, तो केंद्र सरकार आदेश द्वारा यह निर्धारित कर सकती है कि उस क्षेत्र से संबंधित किन व्यक्तियों को भारतीय नागरिक माना जाएगा।
इसे क्षेत्र के भारत में सम्मिलन द्वारा नागरिकता कहा जाता है।
नागरिकता की समाप्ति
Loss of Citizenship
| तरीका | मुख्य अर्थ |
|---|---|
| त्याग | नागरिक द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से स्वेच्छा से नागरिकता छोड़ना। |
| समाप्ति | स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त करने के कारण भारतीय नागरिकता समाप्त होना। |
| वंचित किया जाना | केंद्र सरकार द्वारा कानून में निर्धारित विशेष आधारों पर नागरिकता छीनना। |
नागरिकता का त्याग
Renunciation
पूर्ण आयु और क्षमता वाला भारतीय नागरिक कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपनी भारतीय नागरिकता का स्वेच्छा से त्याग कर सकता है।
नागरिकता का त्याग और किसी विदेशी देश की नागरिकता प्राप्त करने के कारण नागरिकता की समाप्ति अलग-अलग वैधानिक स्थितियाँ हैं।
विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर समाप्ति
Termination
यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण करता है, तो नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो सकती है।
इसलिए भारतीय नागरिकता के साथ किसी अन्य देश की पूर्ण नागरिकता को सामान्यतः समानांतर रूप से बनाए रखने की व्यवस्था भारत में नहीं है।
नागरिकता से वंचित करना
Deprivation
केंद्र सरकार कानून में निर्धारित विशेष परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता से वंचित कर सकती है।
इसके प्रमुख आधारों में धोखाधड़ी या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर नागरिकता प्राप्त करना, संविधान के प्रति निष्ठाहीनता, युद्ध के समय शत्रु की सहायता, कुछ परिस्थितियों में गंभीर कारावास तथा कानून में निर्धारित अन्य कारण शामिल हो सकते हैं।
यह प्रावधान विशेष रूप से पंजीकरण और देशीयकरण जैसी विधियों से नागरिकता प्राप्त करने वालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
सात वर्ष विदेश रहने का नियम
Seven-Year Rule
यह कहना सही नहीं है कि कोई भी भारतीय नागरिक लगातार 7 वर्षों तक विदेश में रहने से स्वतः भारतीय नागरिकता खो देता है।
सात वर्ष विदेश में सामान्यतः निवास का प्रावधान नागरिकता से वंचित किए जाने के एक विशेष वैधानिक आधार से संबंधित है और यह हर भारतीय नागरिक पर स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं है।
कानून में विदेश में विद्यार्थी होने, भारत सरकार या संबंधित अंतरराष्ट्रीय संगठन की सेवा तथा भारतीय वाणिज्य-दूतावास में नागरिकता बनाए रखने की इच्छा दर्ज कराने जैसी परिस्थितियों के लिए भी अपवाद मौजूद हैं।
❌ सामान्य गलती
गलत: 7 वर्ष विदेश रहे तो हर भारतीय की नागरिकता स्वतः समाप्त।
सही: यह एक विशेष वैधानिक आधार है, स्वतः सभी नागरिकों पर लागू होने वाला नियम नहीं।
1986 का नागरिकता संशोधन
1986 Amendment
1986 के संशोधन ने जन्म से नागरिकता के नियमों को अधिक सीमित किया।
इसके परिणामस्वरूप 1 जुलाई 1987 से भारत में जन्म लेना अकेले नागरिकता के लिए पर्याप्त नहीं रहा। माता-पिता में से कम-से-कम एक का भारतीय नागरिक होना आवश्यक किया गया।
1992 का नागरिकता संशोधन
1992 Amendment
1992 के संशोधन ने वंश से नागरिकता के नियम में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।
10 दिसंबर 1992 से विदेश में जन्मे बच्चे के लिए केवल पिता ही नहीं, बल्कि माता या पिता में से कोई एक जन्म के समय भारतीय नागरिक हो सकता है।
2003 का नागरिकता संशोधन
2003 Amendment
2003 के संशोधन ने नागरिकता कानून में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। इसमें अवैध प्रवासी की अवधारणा को नागरिकता अर्जन के विभिन्न प्रावधानों से जोड़ा गया।
जन्म से नागरिकता के नियम को भी बदला गया, जिसके परिणामस्वरूप 3 दिसंबर 2004 से माता-पिता की नागरिकता और अवैध प्रवासी की स्थिति महत्वपूर्ण हो गई।
इसी संशोधन से नागरिक पंजीकरण से संबंधित धारा 14A जोड़ी गई, जो भारतीय नागरिकों के अनिवार्य पंजीकरण और भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के लिए वैधानिक आधार प्रदान करती है।
⚠️ सही समझ
यह कहना कि “2003 में पूरे भारत में एनआरसी लागू हो गया” उचित नहीं है। अधिक सही तथ्य है कि 2003 के संशोधन ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और नागरिक पंजीकरण के लिए वैधानिक आधार प्रदान किया।
नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019
Citizenship Amendment Act, 2019
नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भारत आए कुछ निर्दिष्ट समुदायों के व्यक्तियों के लिए विशेष नागरिकता प्रावधान किया।
इन समुदायों में हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शामिल हैं।
यह व्यवस्था उन पात्र व्यक्तियों से संबंधित है जो 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत में प्रवेश कर चुके थे और जिन्हें संबंधित कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत अवैध प्रवासी की परिभाषा से छूट प्राप्त है।
इसलिए इसे केवल यह कहना कि “इन देशों से आए सभी शरणार्थियों को नागरिकता दी जाती है” सही नहीं है। पात्रता निर्धारित समुदाय, देश, प्रवेश-तिथि और अन्य कानूनी शर्तों पर निर्भर करती है।
इस अधिनियम के क्रियान्वयन से संबंधित नागरिकता संशोधन नियम, 2024 को 11 मार्च 2024 को अधिसूचित किया गया।
नागरिकता संशोधन अधिनियम के क्षेत्रीय अपवाद
Regional Exceptions
नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 की विशेष व्यवस्था संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों में लागू नहीं होती।
इसी प्रकार अधिसूचित आंतरिक रेखा परमिट वाले क्षेत्रों में भी यह विशेष व्यवस्था लागू नहीं होती।
भारत में एकल नागरिकता
Single Citizenship
भारत में पूरे देश के लिए एकल नागरिकता की व्यवस्था है। राज्यों की अपनी अलग संवैधानिक नागरिकता नहीं है।
बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र या किसी अन्य राज्य का निवासी अलग-अलग राज्य नागरिकता नहीं रखता; वह भारतीय नागरिक होता है।
भारतीय संविधान में एकल नागरिकता की व्यवस्था को सामान्यतः ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था से प्रभावित विशेषता माना जाता है।
एकल नागरिकता का उद्देश्य देश की राजनीतिक एकता और नागरिकों के बीच राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करना है।
क्या सभी राज्यों में सभी अधिकार बिल्कुल समान हैं?
Citizenship & State-Based Rules
भारत में नागरिकता एक ही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक राज्य में हर विषय पर सभी नियम पूर्णतः समान ही होंगे।
संविधान और कानून कुछ मामलों में निवास, अधिवास, अनुसूचित क्षेत्र, जनजातीय क्षेत्र, स्थानीय संरक्षण या विशेष संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर सीमित भिन्न व्यवस्था की अनुमति दे सकते हैं।
इसलिए परीक्षा के लिए सुरक्षित तथ्य है—भारत में राज्य की अलग नागरिकता नहीं है; केवल भारतीय नागरिकता है।
दोहरी नागरिकता
Dual Citizenship
भारत सामान्य रूप से पूर्ण दोहरी नागरिकता की व्यवस्था स्वीकार नहीं करता।
अमेरिका, फ्रांस और स्विट्जरलैंड सहित कई देशों के कानून कुछ परिस्थितियों में एक व्यक्ति के पास एक से अधिक राष्ट्रीयताएँ रखने की अनुमति दे सकते हैं।
लेकिन भारत में विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड को पूर्ण दोहरी नागरिकता नहीं समझना चाहिए।
लक्ष्मीमल सिंघवी समिति
L. M. Singhvi Committee
डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी की अध्यक्षता वाली भारतीय प्रवासी संबंधी उच्चस्तरीय समिति ने विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से संबंधित नीतियों पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
इस समिति की सिफारिशों ने आगे चलकर भारतीय मूल के पात्र विदेशी लोगों को विशेष प्रवासी दर्जा प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसी पृष्ठभूमि में आगे विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड संबंधी व्यवस्था विकसित हुई, लेकिन इसे भारत की पूर्ण दोहरी नागरिकता नहीं माना जाता।
भारतीय मूल का व्यक्ति और विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड
PIO & OCI
पुरानी व्यवस्था में भारतीय मूल का व्यक्ति कार्ड नामक श्रेणी प्रचलित थी। आपके मूल बिंदु में इसे “PLO” लिखा गया था, जबकि सही संक्षिप्त नाम PIO था।
बाद में भारतीय मूल का व्यक्ति कार्ड योजना को विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड व्यवस्था में मिला दिया गया।
आज सामान्य परीक्षा-संदर्भ में OCI व्यवस्था अधिक महत्वपूर्ण है।
विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड दोहरी नागरिकता नहीं है
OCI is Not Dual Citizenship
OCI कार्डधारक पूर्ण भारतीय नागरिक नहीं होता।
उसे सामान्य भारतीय नागरिक की तरह सभी राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते। वह लोकसभा या राज्य विधानसभा चुनाव में भारतीय नागरिक के रूप में मतदान नहीं कर सकता।
वह केवल भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित संवैधानिक पदों और राजनीतिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकता।
इसलिए परीक्षा में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है—OCI = दोहरी नागरिकता नहीं।
कृषि भूमि और विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड
Agricultural Property
विदेशी भारतीय नागरिक कार्डधारकों पर भारत में कृषि भूमि, फार्म हाउस और प्लांटेशन संपत्ति के अधिग्रहण से संबंधित विशेष प्रतिबंध लागू होते हैं।
इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि OCI कार्डधारक सामान्य भारतीय नागरिक की तरह कृषि भूमि खरीदने का स्वतः अधिकार नहीं रखता।
इसे यह कहकर व्यापक नहीं करना चाहिए कि भारतीय मूल का हर विदेशी व्यक्ति भारत में किसी भी प्रकार की संपत्ति नहीं खरीद सकता। अलग-अलग प्रकार की संपत्तियों के लिए अलग नियम लागू होते हैं।
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
Common Mistakes & Corrections
गलत: केवल भारतीय नागरिकों को ही सभी मौलिक अधिकार मिलते हैं।
सही: कुछ मौलिक अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं, जबकि कुछ अधिकार गैर-नागरिकों को भी प्राप्त हो सकते हैं।
अधूरा: अनुच्छेद 6 के अंतर्गत 19 जुलाई 1948 के बाद आने वाला व्यक्ति छह महीने रहकर नागरिक बन जाता था।
सही: उसके लिए निर्धारित निवास के साथ सक्षम अधिकारी के समक्ष पंजीकरण भी आवश्यक था।
गलत: भारत से पाकिस्तान जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी भी स्थिति में दोबारा भारतीय नागरिक नहीं बन सकता था।
सही: पुनर्वास या स्थायी वापसी के परमिट से लौटने वाले व्यक्तियों के लिए अपवाद था।
गलत: देशीयकरण के लिए केवल लगातार 12 वर्ष भारत में रहना आवश्यक है।
सही: निवास की गणना कानून में निर्धारित अलग-अलग अवधियों और शर्तों के अनुसार होती है।
गलत: कोई भी भारतीय 7 वर्ष विदेश में रहे तो नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
सही: यह सभी भारतीयों पर स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं है।
अति-सरलीकरण: 2003 में पूरे भारत में एनआरसी लागू हो गया।
सही: 2003 के संशोधन ने नागरिक पंजीकरण और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के लिए वैधानिक आधार प्रदान किया।
गलत: OCI भारत की दोहरी नागरिकता है।
सही: OCI कार्डधारक पूर्ण भारतीय नागरिक नहीं होता और उसे सभी राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते।
गलत: PLO भारतीय मूल के व्यक्ति कार्ड का संक्षिप्त नाम है।
सही: पुरानी व्यवस्था का सही संक्षिप्त नाम PIO था।
नागरिकता अधिनियम के प्रमुख संशोधन
Major Amendments
| वर्ष | मुख्य परिवर्तन |
|---|---|
| 1986 | जन्म से नागरिकता के लिए माता-पिता की नागरिकता को महत्वपूर्ण बनाया गया। |
| 1992 | वंश से नागरिकता में माता या पिता में से किसी एक की भारतीय नागरिकता को मान्यता। |
| 2003 | अवैध प्रवासी संबंधी प्रावधान, जन्म से नागरिकता में परिवर्तन और नागरिक पंजीकरण/राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का वैधानिक आधार। |
| 2019 | अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के निर्दिष्ट छह समुदायों के पात्र व्यक्तियों के लिए विशेष नागरिकता व्यवस्था। |
त्वरित पुनरावृत्ति
Quick Revision
⚡ याद रखने का क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
नागरिकता — व्यक्ति को राज्य की पूर्ण राजनीतिक सदस्यता प्रदान करती है।
संविधान में नागरिकता — भाग II, अनुच्छेद 5 से 11।
अनुच्छेद 5 — संविधान प्रारंभ होने पर नागरिकता।
अनुच्छेद 6 — पाकिस्तान से भारत आए व्यक्ति।
अनुच्छेद 7 — भारत से पाकिस्तान गए व्यक्ति।
अनुच्छेद 8 — विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्ति।
अनुच्छेद 9 — स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता प्राप्त करने का प्रभाव।
अनुच्छेद 11 — नागरिकता पर कानून बनाने की संसद की शक्ति।
नागरिकता अधिनियम — 1955।
नागरिकता प्राप्ति के पाँच तरीके — जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण और क्षेत्र के समावेशन द्वारा।
जन्म से नागरिकता की महत्वपूर्ण तिथियाँ — 1 जुलाई 1987 और 3 दिसंबर 2004।
वंश से नागरिकता की महत्वपूर्ण तिथि — 10 दिसंबर 1992।
नागरिकता समाप्ति के तीन तरीके — त्याग, समाप्ति और वंचित किया जाना।
1986 संशोधन — जन्म से नागरिकता के नियम कड़े हुए।
1992 संशोधन — माता या पिता में से किसी एक की नागरिकता के आधार पर वंश से नागरिकता का विस्तार।
2003 संशोधन — अवैध प्रवासी संबंधी प्रावधान तथा नागरिक पंजीकरण और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के लिए वैधानिक आधार।
2019 संशोधन — पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए निर्दिष्ट छह समुदायों के पात्र व्यक्तियों के लिए विशेष नागरिकता व्यवस्था।
कट-ऑफ तिथि — 31 दिसंबर 2014।
नागरिकता संशोधन नियम — 11 मार्च 2024 को अधिसूचित।
भारत — एकल नागरिकता वाला देश।
एकल नागरिकता का प्रभाव — राज्यों की अलग संवैधानिक नागरिकता नहीं होती।
लक्ष्मीमल सिंघवी समिति — प्रवासी भारतीयों और विशेष प्रवासी दर्जे से संबंधित महत्वपूर्ण समिति।
PIO — पुरानी भारतीय मूल का व्यक्ति कार्ड व्यवस्था; बाद में OCI में विलय।
OCI — पूर्ण दोहरी नागरिकता नहीं है।
OCI कार्डधारक — सामान्य भारतीय नागरिक की तरह राजनीतिक और मतदान अधिकार प्राप्त नहीं करता।
कृषि भूमि — OCI कार्डधारकों पर कृषि भूमि, फार्म हाउस और प्लांटेशन संपत्ति के अधिग्रहण से संबंधित प्रतिबंध लागू होते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण सुधार — 7 वर्ष विदेश रहने से प्रत्येक भारतीय की नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं होती।