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पंचायती राज एवं नगरपालिकाएँ
PANCHAYATI RAJ & MUNICIPALITIES

पंचायती राज एवं नगरपालिकाएँ

73वाँ एवं 74वाँ संविधान संशोधन, स्थानीय स्वशासन, राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग

स्थानीय स्वशासन

लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की व्यवस्था में शासन और विकास संबंधी निर्णयों को स्थानीय स्तर तक पहुँचाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों और शहरी क्षेत्रों में नगरपालिकाओं की व्यवस्था की गई है।

73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने पंचायतों को संवैधानिक आधार प्रदान किया, जबकि 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने नगरपालिकाओं को संवैधानिक आधार प्रदान किया।

इन संशोधनों के बाद भारत की शासन-व्यवस्था में केंद्र और राज्य के साथ स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं को भी संवैधानिक महत्व प्राप्त हुआ।

01

पंचायती राज का संवैधानिक प्रावधान

73वाँ संविधान संशोधन

पंचायतों से संबंधित प्रावधान संविधान के भाग 9 में दिए गए हैं।

भाग 9 में अनुच्छेद 243 से 243-O तक पंचायतों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान हैं।

पंचायतों को संवैधानिक मान्यता 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा प्रदान की गई।

यह संशोधन 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ।

इसी कारण प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण

73वाँ संशोधन → पंचायत → भाग 9 → अनुच्छेद 243 से 243-O → 24 अप्रैल 1993।

02

ग्राम सभा

पंचायती राज की आधारभूत संस्था

ग्राम सभा स्थानीय लोकतंत्र की मूल संस्था है।

ग्राम स्तर पर पंचायत क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्तियों से ग्राम सभा बनती है।

राज्य विधानमंडल कानून द्वारा ग्राम सभा को ग्राम स्तर पर आवश्यक शक्तियाँ और कार्य प्रदान कर सकता है।

ग्राम सभा को ग्राम पंचायत से अलग समझना चाहिए—ग्राम सभा में संबंधित क्षेत्र के सभी पंजीकृत मतदाता शामिल होते हैं, जबकि ग्राम पंचायत निर्वाचित स्थानीय निकाय है।

03

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था

ग्राम से जिला तक

पहला स्तर — ग्राम पंचायत — ग्राम स्तर।

दूसरा स्तर — पंचायत समिति / मध्यवर्ती पंचायत — प्रखंड या मध्यवर्ती स्तर।

तीसरा स्तर — जिला परिषद — जिला स्तर।

20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में संविधान सामान्यतः तीन स्तरों की पंचायत व्यवस्था की कल्पना करता है।

जिस राज्य की जनसंख्या 20 लाख से अधिक नहीं है, वहाँ मध्यवर्ती स्तर की पंचायत स्थापित करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है।

🎯 क्रम

ग्राम पंचायत → पंचायत समिति → जिला परिषद।

04

बलवंत राय मेहता समिति

लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण

पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था की प्रमुख सिफारिश बलवंत राय मेहता समिति ने की थी।

समिति ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लिए ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की व्यवस्था पर बल दिया।

इस व्यवस्था में पंचायत समिति को मध्य स्तर की महत्वपूर्ण संस्था माना गया।

05

भारत में पंचायती राज का प्रारंभ

नागौर, राजस्थान — 1959

भारत में पंचायती राज व्यवस्था का पहला औपचारिक शुभारंभ 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में हुआ।

इसके बाद अन्य राज्यों ने भी पंचायती राज व्यवस्था को अपनाना शुरू किया।

🎯 परीक्षा तथ्य

भारत में प्रथम पंचायती राज — नागौर, राजस्थान — 2 अक्टूबर 1959।

06

अशोक मेहता समिति

द्विस्तरीय मॉडल

अशोक मेहता समिति ने पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए द्विस्तरीय संरचना की सिफारिश की।

इस मॉडल में जिला स्तर पर जिला परिषद और उसके नीचे मंडल पंचायत की कल्पना की गई थी।

समिति ने जिला स्तर को विकेंद्रीकरण की महत्वपूर्ण इकाई मानने पर जोर दिया।

07

एल. एम. सिंघवी समिति

संवैधानिक मान्यता की सिफारिश

एल. एम. सिंघवी समिति ने पंचायतों को मजबूत बनाने तथा उन्हें संवैधानिक मान्यता प्रदान करने पर बल दिया।

समिति ने ग्राम सभा को ग्रामीण स्थानीय शासन की आधारभूत संस्था के रूप में मजबूत करने की भी सिफारिश की।

🎯 याद रखें

एल. एम. सिंघवी समिति → पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता।

08

पंचायतों का कार्यकाल

अनुच्छेद 243-E

प्रत्येक पंचायत का सामान्य कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष होता है।

कानून के अनुसार पंचायत को कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग किया जा सकता है।

यदि पंचायत कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग हो जाए तो सामान्यतः छह महीने के भीतर नई पंचायत के लिए चुनाव पूरा किया जाना चाहिए।

यदि शेष कार्यकाल छह महीने से कम हो तो संविधान में इसके लिए अपवाद दिया गया है।

यदि पंचायत अपने पूरे पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर रही हो तो नई पंचायत का चुनाव कार्यकाल समाप्त होने से पहले पूरा होना चाहिए।

09

पंचायतों में आरक्षण

अनुच्छेद 243-D

पंचायतों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार सीटों के आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान है।

पंचायतों में महिलाओं के लिए कुल सीटों का कम से कम एक-तिहाई आरक्षित करना संवैधानिक रूप से आवश्यक है।

इस एक-तिहाई आरक्षण में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं।

पंचायतों के अध्यक्ष पदों में भी महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान है।

राज्य विधानमंडल पंचायतों में पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है।

📗 33% या 50%?

संविधान की न्यूनतम व्यवस्था — कम से कम 1/3।
कई राज्यों ने अपने कानूनों द्वारा महिलाओं का आरक्षण 50% तक बढ़ाया है।

10

पंचायत चुनाव कौन कराता है?

राज्य निर्वाचन आयोग

पंचायत चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होता है।

राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल करता है।

इसलिए यह कहना कि “पंचायत चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार करती है” संवैधानिक रूप से सही भाषा नहीं है।

⚠️ बड़ा सुधार

पंचायत चुनाव → राज्य निर्वाचन आयोग।
लोकसभा/विधानसभा चुनाव → भारत निर्वाचन आयोग।

11

पंचायत सदस्यों का निर्वाचन

प्रत्यक्ष चुनाव

पंचायत के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें सामान्यतः प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरी जाती हैं।

इसलिए पंचायत समिति या मध्यवर्ती पंचायत की निर्वाचित सीटों के सदस्य भी संविधान और संबंधित राज्य कानून के अनुसार प्रत्यक्ष चुनाव से चुने जा सकते हैं।

लेकिन पंचायतों के अध्यक्षों के चुनाव की पद्धति स्तर और राज्य कानून के अनुसार अलग हो सकती है।

मध्यवर्ती और जिला स्तर के अध्यक्ष सामान्यतः निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से चुने जाते हैं।

12

ग्यारहवीं अनुसूची

पंचायतों से संबंधित 29 विषय

73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई।

इस अनुसूची में पंचायतों से संबंधित कुल 29 विषय दिए गए हैं।

इनमें कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई, पशुपालन, मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी, लघु उद्योग, ग्रामीण आवास, पेयजल, सड़क, ग्रामीण विद्युतीकरण, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे विषय शामिल हैं।

राज्य विधानमंडल कानून द्वारा पंचायतों को इन विषयों से संबंधित योजनाएँ और कार्य सौंप सकता है।

⚠️ “29 विषय पर कानून बनाने की शक्ति” नहीं

ग्यारहवीं अनुसूची में विषयों का उल्लेख होने मात्र से पंचायत संसद या विधानसभा जैसी स्वतंत्र विधायिका नहीं बन जाती। वास्तविक शक्तियाँ राज्य कानून द्वारा हस्तांतरित की जाती हैं।

13

पंचायतों के वित्तीय स्रोत

कर, शुल्क और अनुदान

राज्य विधानमंडल कानून द्वारा पंचायतों को कुछ कर, शुल्क, पथकर और फीस लगाने, एकत्र करने और उपयोग करने की शक्ति दे सकता है।

राज्य सरकार द्वारा वसूले गए कुछ करों और शुल्कों का हिस्सा पंचायतों को सौंपा जा सकता है।

राज्य की संचित निधि से पंचायतों को अनुदान दिया जा सकता है।

केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से भी पंचायतों को वित्तीय सहायता मिल सकती है।

14

राज्य वित्त आयोग

अनुच्छेद 243-I

राज्यपाल प्रत्येक पाँचवें वर्ष राज्य वित्त आयोग का गठन करता है।

राज्य वित्त आयोग पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है।

यह राज्य और पंचायतों के बीच करों, शुल्कों और अन्य राजस्व के वितरण से संबंधित सिद्धांतों पर राज्यपाल को सिफारिश करता है।

यह पंचायतों को दिए जाने वाले अनुदानों तथा उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत करने के उपायों पर भी सुझाव दे सकता है।

🎯 अनुच्छेद

243-I — राज्य वित्त आयोग।

15

पंचायती राज का मुख्य उद्देश्य

लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण

पंचायती राज का प्रमुख उद्देश्य शासन की शक्तियों और विकास प्रक्रिया को ग्रामीण जनता के निकट ले जाना है।

यह ग्रामवासियों को स्थानीय विकास योजना, निर्णय और प्रशासन में भागीदारी का अवसर प्रदान करता है।

इसलिए पंचायती राज को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की महत्वपूर्ण व्यवस्था माना जाता है।

16

गुजरात की पंचायत व्यवस्था

नाम अलग, आधार समान

गुजरात में ग्रामीण स्थानीय शासन की त्रिस्तरीय संरचना में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, मध्यवर्ती स्तर पर तालुका पंचायत और जिला स्तर पर जिला पंचायत की व्यवस्था है।

विभिन्न राज्यों में मध्यवर्ती स्तर की संस्था का नाम पंचायत समिति, क्षेत्र पंचायत, तालुका पंचायत आदि अलग-अलग हो सकता है।

गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान सहित अनेक राज्यों के कानून स्थानीय निकायों को निर्धारित सीमा में कर एवं शुल्क लगाने की शक्तियाँ प्रदान करते हैं।

17

भाग 9 कहाँ लागू नहीं होता?

अनुच्छेद 243-M

संविधान के भाग 9 के सामान्य पंचायत प्रावधान नागालैंड, मेघालय और मिजोरम राज्यों पर लागू नहीं होते।

मणिपुर के उन पहाड़ी क्षेत्रों पर भी सामान्य भाग 9 लागू नहीं होता जहाँ कानून के अंतर्गत जिला परिषदें विद्यमान हैं।

भाग 9 के सामान्य प्रावधान पाँचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों और छठी अनुसूची के जनजातीय क्षेत्रों पर स्वतः उसी रूप में लागू नहीं होते।

पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में पंचायत व्यवस्था को विशेष संशोधनों के साथ लागू करने के लिए संसद ने पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 बनाया।

⚠️ “तीनों राज्यों में कोई स्थानीय परिषद ही नहीं” गलत

नागालैंड, मेघालय और मिजोरम में 73वें संशोधन वाली सामान्य पंचायत व्यवस्था लागू न होने का अर्थ यह नहीं कि वहाँ कोई स्थानीय स्वशासन संस्था नहीं है। इन क्षेत्रों में पारंपरिक एवं जनजातीय परिषदों की अलग व्यवस्थाएँ कार्य करती हैं।

18

अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत

1996 का विशेष अधिनियम

अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत व्यवस्था लागू करने के लिए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 बनाया गया।

यह अधिनियम स्थानीय परंपराओं, सामुदायिक संसाधनों और जनजातीय समुदायों की विशेष स्थिति को ध्यान में रखते हुए ग्राम सभा को महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्रदान करता है।

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को स्थानीय परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

19

अरुणाचल प्रदेश और अनुसूचित जाति आरक्षण

तथ्य को संदर्भ सहित समझें

अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जनजाति जनसंख्या का अनुपात बहुत अधिक है और अनुसूचित जाति की जनसंख्या से संबंधित स्थिति अन्य राज्यों से भिन्न है।

इसी कारण प्रतियोगी परीक्षा पुस्तकों में वहाँ पंचायतों में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण न होने का तथ्य मिलता है।

इसे किसी सामान्य संवैधानिक अपवाद के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की जनसांख्यिकीय और लागू विधिक व्यवस्था के संदर्भ में समझना चाहिए।

20

केरल का स्थानीय स्वशासन न्यायाधिकरण

अपील और पुनरीक्षण

केरल में स्थानीय स्वशासन संस्थाओं से संबंधित निर्धारित निर्णयों के विरुद्ध अपील और पुनरीक्षण सुनने के लिए स्थानीय स्वशासन संस्थाओं हेतु न्यायाधिकरण की व्यवस्था है।

यह व्यवस्था केरल पंचायत राज अधिनियम और केरल नगरपालिका अधिनियम के अंतर्गत कार्य करती है।

इसलिए केरल में पंचायत और नगरपालिका मामलों से संबंधित एक पृथक स्थानीय स्वशासन न्यायाधिकरण का तथ्य सही है।

21

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम

बीपीएल तक सीमित नहीं

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी व्यवस्था ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा बढ़ाने के लिए बनाई गई है।

इसके तहत ऐसे प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के गारंटीकृत मजदूरी रोजगार का अधिकार उपलब्ध कराने का उद्देश्य है, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक कार्य करने के इच्छुक हों।

यह अधिकार केवल बीपीएल परिवारों तक सीमित नहीं है।

इसलिए “केवल बीपीएल परिवार का वयस्क सदस्य पात्र है” लिखना गलत है।

⚠️ बड़ा सुधार

बीपीएल होना अनिवार्य शर्त नहीं।
मुख्य आधार — ग्रामीण परिवार + वयस्क सदस्य + अकुशल शारीरिक कार्य करने की इच्छा।

22

मनरेगा और ग्राम पंचायत

योजना और क्रियान्वयन में भूमिका

ग्राम पंचायत मनरेगा के स्थानीय क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ग्राम पंचायत स्थानीय स्तर पर कार्यों की पहचान, योजना निर्माण, रोजगार की माँग के पंजीकरण और अनुमोदित कार्यों के क्रियान्वयन जैसी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाती है।

ग्राम सभा स्थानीय योजनाओं और कार्यों की प्राथमिकता निर्धारित करने तथा सामाजिक लेखा-परीक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

लेकिन यह कहना कि मनरेगा की पूरी योजना, संपादन और क्रियान्वयन की सारी जिम्मेदारी केवल ग्राम पंचायत की है, अत्यधिक व्यापक होगा; इसमें ग्राम सभा, कार्यक्रम अधिकारी, जिला कार्यक्रम समन्वयक और अन्य सरकारी संस्थाओं की भी भूमिकाएँ हैं।

23

नगरपालिकाओं का संवैधानिक आधार

74वाँ संविधान संशोधन

शहरी स्थानीय स्वशासन से संबंधित संवैधानिक प्रावधान संविधान के भाग 9-क में दिए गए हैं।

इनका विस्तार अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक है।

नगरपालिकाओं को संवैधानिक आधार 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा दिया गया।

यह व्यवस्था 1 जून 1993 से प्रभावी हुई।

🎯 क्रम

74वाँ संशोधन → नगरपालिका → भाग 9-क → 243-P से 243-ZG → 1 जून 1993।

24

नगरपालिकाओं के तीन प्रकार

अनुच्छेद 243-Q

नगर पंचायत — ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्र में संक्रमण कर रहे क्षेत्र के लिए।

नगरपालिका परिषद — छोटे या मध्यम नगरीय क्षेत्र के लिए।

नगर निगम — बड़े नगरीय क्षेत्र के लिए।

इनका निर्धारण केवल “छोटा शहर, मध्यम शहर, बड़ा शहर” कह देने से नहीं बल्कि जनसंख्या, घनत्व, स्थानीय राजस्व, गैर-कृषि रोजगार और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर राज्यपाल की अधिसूचना से किया जाता है।

25

नगरपालिकाओं का कार्यकाल

5 वर्ष

प्रत्येक नगरपालिका का सामान्य कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष होता है।

यदि नगरपालिका को पाँच वर्ष से पहले भंग कर दिया जाए तो सामान्यतः छह महीने के भीतर चुनाव कराया जाना चाहिए।

यदि शेष कार्यकाल छह महीने से कम हो तो संविधान में अपवाद उपलब्ध है।

26

नगरपालिकाओं में आरक्षण

SC, ST और महिलाएँ

नगरपालिकाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जनसंख्या के अनुपात में सीटों के आरक्षण की व्यवस्था है।

नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए कुल सीटों में से कम से कम एक-तिहाई सीटें आरक्षित होती हैं।

इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल होती हैं।

राज्य विधानमंडल पिछड़े वर्गों के लिए भी नगरपालिका में आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है।

27

बारहवीं अनुसूची

नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषय

74वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई।

इसमें नगरपालिकाओं से संबंधित कुल 18 विषय हैं।

इनमें नगरीय योजना, भूमि उपयोग और भवन निर्माण का विनियमन, सड़कें, जलापूर्ति, लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता, अग्निशमन सेवा, नगरीय वानिकी, झुग्गी सुधार, नगरीय गरीबी उन्मूलन और सार्वजनिक सुविधाएँ आदि शामिल हैं।

राज्य विधानमंडल कानून द्वारा नगरपालिकाओं को इन विषयों पर आवश्यक शक्तियाँ और उत्तरदायित्व प्रदान कर सकता है।

⚠️ सही भाषा

“नगरपालिका को 18 विषयों पर स्वतंत्र कानून बनाने की शक्ति मिल गई” कहना सही नहीं है। संविधान राज्य विधानमंडल को इन कार्यों के संबंध में स्थानीय निकायों को अधिकार देने की व्यवस्था करता है।

28

नगरपालिकाओं के वित्तीय स्रोत

स्थानीय कर और अनुदान

राज्य कानून के अनुसार नगरपालिकाओं को संपत्ति कर, जल शुल्क, उपयोगकर्ता शुल्क और अन्य स्थानीय कर एवं फीस लगाने की शक्तियाँ दी जा सकती हैं।

राज्य सरकार और केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं तथा वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर अनुदान भी प्राप्त हो सकते हैं।

मनोरंजन कर और विज्ञापन कर को सभी राज्यों में वर्तमान समान एवं स्वतंत्र नगरपालिका कर मानना उचित नहीं है, क्योंकि जीएसटी और राज्य कानूनों में बदलाव के बाद इनकी व्यवस्था अलग-अलग हो सकती है।

29

राज्य वित्त आयोग और नगरपालिका

243-Y

पंचायतों के लिए गठित राज्य वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करता है।

अनुच्छेद 243-Y नगरपालिकाओं के संबंध में राज्य वित्त आयोग की भूमिका प्रदान करता है।

राज्य वित्त आयोग राज्य और स्थानीय निकायों के बीच वित्तीय संसाधनों के बँटवारे से संबंधित सिफारिशें देता है।

30

राज्य निर्वाचन आयोग और नगरपालिकाएँ

स्थानीय चुनाव

नगरपालिका चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण भी राज्य निर्वाचन आयोग करता है।

इस प्रकार पंचायत और नगरपालिका दोनों स्थानीय निकायों के चुनावों में राज्य निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका है।

🎯 सूत्र

पंचायत चुनाव + नगरपालिका चुनाव = राज्य निर्वाचन आयोग।

31

जिला योजना समिति

ग्रामीण और शहरी योजनाओं का समन्वय

संविधान में जिला स्तर पर पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार योजनाओं को समेकित करने के लिए जिला योजना समिति की व्यवस्था की गई है।

यह समिति पूरे जिले के लिए विकास योजना का प्रारूप तैयार करती है।

यह स्थानीय ग्रामीण और शहरी योजना के बीच समन्वय का महत्वपूर्ण संवैधानिक माध्यम है।

32

महानगरीय योजना समिति

महानगरीय क्षेत्र की विकास योजना

महानगरीय क्षेत्रों के लिए संविधान महानगरीय योजना समिति की व्यवस्था करता है।

इसका प्रमुख कार्य महानगरीय क्षेत्र के लिए समग्र विकास योजना का प्रारूप तैयार करना है।

33

पंचायत और नगरपालिका में अंतर

एक नज़र में

आधार पंचायत नगरपालिका
क्षेत्र ग्रामीण नगरीय
संशोधन 73वाँ 74वाँ
भाग भाग 9 भाग 9-क
अनुच्छेद 243 से 243-O 243-P से 243-ZG
प्रभावी 24 अप्रैल 1993 1 जून 1993
अनुसूची 11वीं 12वीं
विषय 29 18
कार्यकाल 5 वर्ष 5 वर्ष
महिला आरक्षण न्यूनतम 1/3 न्यूनतम 1/3
चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग राज्य निर्वाचन आयोग
34

महत्वपूर्ण अनुच्छेद

पंचायत और नगरपालिका

अनुच्छेद विषय
243-Aग्राम सभा।
243-Bपंचायतों का गठन।
243-Cपंचायतों की संरचना।
243-Dपंचायतों में आरक्षण।
243-Eपंचायतों की अवधि।
243-Gपंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व।
243-Hपंचायतों को कर लगाने की शक्ति देने और निधियों से संबंधित व्यवस्था।
243-Iराज्य वित्त आयोग।
243-Kपंचायत चुनाव एवं राज्य निर्वाचन आयोग।
243-Mकुछ क्षेत्रों पर भाग 9 लागू न होना।
243-Oपंचायत चुनावी मामलों में न्यायालयीय हस्तक्षेप पर सीमा।
243-Qनगरपालिकाओं का गठन।
243-Rनगरपालिकाओं की संरचना।
243-Tनगरपालिकाओं में आरक्षण।
243-Uनगरपालिकाओं की अवधि।
243-Wनगरपालिकाओं की शक्तियाँ और उत्तरदायित्व।
243-Xनगरपालिकाओं के कर और निधियाँ।
243-Yनगरपालिकाओं के संबंध में वित्त आयोग।
243-ZAनगरपालिका चुनाव।
243-ZDजिला योजना समिति।
243-ZEमहानगरीय योजना समिति।
35

महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

परीक्षा में गलती से बचें

गलत: पंचायत चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार करती है।
सही: पंचायत चुनाव का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग करता है।

अधूरा: महिलाओं के लिए पंचायतों में ठीक 33 प्रतिशत ही आरक्षण है।
सही: संविधान कम से कम एक-तिहाई आरक्षण देता है; कई राज्यों में यह 50 प्रतिशत है।

गलत: पंचायत को 11वीं अनुसूची के सभी 29 विषयों पर स्वतः कानून बनाने की शक्ति है।
सही: राज्य विधानमंडल कानून द्वारा पंचायत को आवश्यक शक्तियाँ और कार्य सौंपता है।

गलत: नगरपालिका को 12वीं अनुसूची के 18 विषयों पर स्वतः विधायी शक्ति है।
सही: राज्य विधानमंडल नगरपालिकाओं को कानून द्वारा आवश्यक अधिकार और उत्तरदायित्व प्रदान करता है।

गलत: मनरेगा केवल बीपीएल परिवारों के लिए है।
सही: ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य, जो अकुशल शारीरिक कार्य करना चाहते हों, पात्र हो सकते हैं; बीपीएल होना अनिवार्य नहीं।

अधूरा: मनरेगा की पूरी योजना और क्रियान्वयन केवल ग्राम पंचायत करती है।
सही: ग्राम पंचायत की प्रमुख भूमिका है, लेकिन ग्राम सभा और अन्य प्रशासनिक स्तर भी प्रक्रिया में शामिल हैं।

गलत: नागालैंड, मेघालय और मिजोरम में कोई स्थानीय शासन नहीं है।
सही: भाग 9 की सामान्य पंचायत व्यवस्था वहाँ लागू नहीं होती; पारंपरिक और जनजातीय स्थानीय शासन की अलग व्यवस्थाएँ हैं।

अधूरा: पंचायत भंग होने पर हर स्थिति में छह महीने में चुनाव अनिवार्य है।
सही: सामान्यतः छह महीने में चुनाव होता है; यदि शेष कार्यकाल छह महीने से कम हो तो संवैधानिक अपवाद है।

अधूरा: नगर पंचायत केवल छोटे शहर के लिए होती है।
सही: नगर पंचायत मुख्यतः ग्रामीण से नगरीय क्षेत्र में संक्रमण कर रहे क्षेत्र के लिए है।

अधूरा: मनोरंजन और विज्ञापन कर हर नगरपालिका का स्थायी वर्तमान कर है।
सही: वर्तमान कराधान राज्य कानून और जीएसटी के बाद की व्यवस्था पर निर्भर करता है।

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

73वाँ संविधान संशोधन — पंचायत — 1992।

प्रभावी — 24 अप्रैल 1993।

भाग 9 — अनुच्छेद 243 से 243-O।

राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस — 24 अप्रैल।

पंचायती राज — लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण।

त्रिस्तरीय व्यवस्था — ग्राम पंचायत → पंचायत समिति → जिला परिषद।

बलवंत राय मेहता समिति — त्रिस्तरीय पंचायती राज।

अशोक मेहता समिति — द्विस्तरीय व्यवस्था।

एल. एम. सिंघवी समिति — संवैधानिक मान्यता।

भारत में प्रथम पंचायती राज — नागौर, राजस्थान — 2 अक्टूबर 1959।

पंचायत कार्यकाल — 5 वर्ष।

भंग होने पर सामान्यतः चुनाव — 6 महीने के भीतर।

महिला आरक्षण — कम से कम 1/3।

SC/ST आरक्षण — जनसंख्या के अनुपात में।

OBC आरक्षण — राज्य विधानमंडल व्यवस्था कर सकता है।

पंचायत चुनाव — राज्य निर्वाचन आयोग।

11वीं अनुसूची — पंचायत — 29 विषय।

243-I — राज्य वित्त आयोग।

243-K — पंचायत चुनाव।

243-M — पंचायत प्रावधानों के अपवाद।

नागालैंड, मेघालय और मिजोरम पर भाग 9 सामान्य रूप से लागू नहीं।

अनुसूचित क्षेत्र — विशेष पंचायत विस्तार अधिनियम, 1996।

मनरेगा — बीपीएल तक सीमित नहीं।

मनरेगा — ग्रामीण परिवार के इच्छुक वयस्क सदस्यों को अकुशल शारीरिक कार्य के लिए 100 दिनों तक रोजगार की वैधानिक गारंटी।

74वाँ संविधान संशोधन — नगरपालिका — 1992।

प्रभावी — 1 जून 1993।

भाग 9-क — अनुच्छेद 243-P से 243-ZG।

नगर पंचायत — संक्रमणशील नगरीय क्षेत्र।

नगरपालिका परिषद — छोटा नगरीय क्षेत्र।

नगर निगम — बड़ा नगरीय क्षेत्र।

नगरपालिका कार्यकाल — 5 वर्ष।

नगरपालिका महिला आरक्षण — कम से कम 1/3।

12वीं अनुसूची — नगरपालिकाएँ — 18 विषय।

नगरपालिका चुनाव — राज्य निर्वाचन आयोग।

243-ZD — जिला योजना समिति।

243-ZE — महानगरीय योजना समिति।

केरल — स्थानीय स्वशासन संस्थाओं से संबंधित अपील/पुनरीक्षण के लिए पृथक न्यायाधिकरण की व्यवस्था।

सबसे छोटा क्रम — 73वाँ → पंचायत → 24 अप्रैल → 11वीं अनुसूची 29 → 74वाँ → नगरपालिका → 1 जून → 12वीं अनुसूची 18।

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