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प्रस्तावना (उद्देशिका)
PREAMBLE OF THE INDIAN CONSTITUTION

प्रस्तावना (उद्देशिका)

संविधान का दर्शन, राज्य का स्वरूप तथा न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श

प्रस्तावना का महत्व

भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान के मूल दर्शन, उद्देश्यों और भारतीय राज्य की प्रकृति का संक्षिप्त परिचय देती है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि संविधान की शक्ति का मूल स्रोत भारत की जनता है तथा भारतीय राज्य का लक्ष्य सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समता प्रदान करते हुए बंधुता की भावना विकसित करना है।

01

भारतीय संविधान की प्रस्तावना

Original Preamble

हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को—

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय;

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता;

प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए;

तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

📗 मूल भावना

प्रस्तावना के प्रारंभिक शब्द “हम, भारत के लोग” यह स्पष्ट करते हैं कि संविधान की अंतिम वैधता और सत्ता का स्रोत भारत की जनता है।

02

उद्देश्य प्रस्ताव और प्रस्तावना

Objectives Resolution

13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया था।

संविधान सभा ने इस उद्देश्य प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया। आगे चलकर यही प्रस्ताव भारतीय संविधान की प्रस्तावना के प्रमुख वैचारिक आधारों में से एक बना।

भारतीय संविधान को संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया, जबकि संविधान के अधिकांश प्रावधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुए।

🎯 तिथियाँ याद रखें

उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत — 13 दिसंबर 1946
उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकृत — 22 जनवरी 1947
संविधान अंगीकृत — 26 नवंबर 1949
संविधान लागू — 26 जनवरी 1950

03

“हम, भारत के लोग” का अर्थ

Source of Authority

“हम, भारत के लोग” से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान की शक्ति और वैधता का अंतिम स्रोत भारत की जनता है।

भारतीय संविधान किसी राजा, विदेशी सत्ता अथवा किसी बाहरी संस्था द्वारा भारत को दिया गया संविधान नहीं है। संविधान सभा ने भारत की जनता की ओर से इसे अंगीकृत किया।

प्रस्तावना के अंतिम शब्द “अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं” इसी विचार को व्यक्त करते हैं कि भारत के लोगों ने संविधान स्वयं को प्रदान किया है।

04

सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न

Sovereign

प्रस्तावना में प्रयुक्त सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न या संप्रभु शब्द का अर्थ है कि भारत अपने आंतरिक और बाह्य मामलों में स्वतंत्र तथा सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता वाला राज्य है।

आंतरिक संप्रभुता का अर्थ है कि भारत की राजनीतिक सीमाओं के भीतर राज्य की सत्ता सर्वोच्च है।

बाह्य संप्रभुता का अर्थ है कि भारत किसी विदेशी राज्य अथवा बाहरी शक्ति की प्रभुता स्वीकार नहीं करता तथा अपनी विदेश नीति और राष्ट्रीय निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने में सक्षम है।

संप्रभुता राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक तत्व माना जाता है।

भारत का राष्ट्रमंडल का सदस्य होना उसकी संप्रभुता को समाप्त नहीं करता, क्योंकि भारत की यह सदस्यता स्वैच्छिक है।

📗 सरल अर्थ

भारत के अंदर भारत की सत्ता सर्वोच्च है और बाहर से भारत किसी अन्य देश के अधीन नहीं है।

05

समाजवादी

Socialist

समाजवादी शब्द मूल प्रस्तावना में नहीं था। इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में सम्मिलित किया गया।

भारतीय संविधान में समाजवादी शब्द का अर्थ यह नहीं है कि भारत किसी कठोर साम्यवादी व्यवस्था को अपनाता है। भारत लोकतांत्रिक माध्यमों से सामाजिक और आर्थिक न्याय के लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

भारतीय समाजवाद का उद्देश्य आर्थिक असमानता कम करना, कमजोर वर्गों की सहायता करना, सामाजिक न्याय बढ़ाना तथा ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें विकास का लाभ समाज के अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे।

इस कारण भारतीय समाजवाद को सामान्यतः लोकतांत्रिक समाजवाद की भावना से समझा जाता है।

समाजवादी विचार भारत को एक जनकल्याणकारी राज्य की दिशा देता है, जिसमें सरकार केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित न रहकर नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक कल्याण की भी जिम्मेदारी निभाती है।

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पंथनिरपेक्ष

Secular

पंथनिरपेक्ष शब्द भी 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया।

भारत के संदर्भ में पंथनिरपेक्षता का अर्थ है कि भारतीय राज्य का अपना कोई आधिकारिक धर्म या पंथ नहीं है।

राज्य किसी एक धर्म को अपना राजधर्म नहीं मानता तथा सभी धर्मों के प्रति संवैधानिक रूप से निष्पक्ष व्यवहार करने की व्यवस्था अपनाता है।

भारतीय नागरिकों को संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर अपने धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

यद्यपि “पंथनिरपेक्ष” शब्द 1976 में प्रस्तावना में जोड़ा गया, धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की पंथनिरपेक्ष प्रकृति से संबंधित अनेक संवैधानिक प्रावधान मूल संविधान में पहले से मौजूद थे।

🎯 परीक्षा-सुरक्षित तथ्य

भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है। पंथनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति संवैधानिक निष्पक्षता है।

07

लोकतंत्रात्मक

Democratic

भारत को लोकतंत्रात्मक राज्य घोषित करने का अर्थ है कि शासन की अंतिम शक्ति जनता में निहित है।

भारत में नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और इन्हीं निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन संचालित किया जाता है।

भारत में प्रतिनिधिक संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था है।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय लोकतंत्र का प्रमुख आधार है, जिसके अंतर्गत निर्धारित आयु प्राप्त नागरिकों को बिना धर्म, जाति, लिंग, संपत्ति आदि के भेद के मतदान का अधिकार प्राप्त है।

08

गणराज्य

Republic

भारत एक गणराज्य है। इसका मुख्य अर्थ यह है कि भारत में राष्ट्राध्यक्ष का पद वंशानुगत नहीं है।

भारत का राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष होता है और उसका निर्वाचन संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है।

इस प्रकार गणराज्य का अर्थ केवल लोकतंत्र नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक व्यवस्था भी है जिसमें राज्य का सर्वोच्च संवैधानिक पद किसी वंश के आधार पर स्वतः प्राप्त नहीं होता।

📗 याद रखें

गणराज्य = वंशानुगत राष्ट्राध्यक्ष का अभाव + निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष।

09

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय

Justice

प्रस्तावना भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित करती है।

सामाजिक न्याय का अर्थ ऐसी सामाजिक व्यवस्था विकसित करना है जिसमें जाति, धर्म, लिंग, जन्म या सामाजिक स्थिति के आधार पर अन्याय और भेदभाव को कम किया जाए तथा सभी व्यक्तियों की गरिमा का सम्मान हो।

आर्थिक न्याय का अर्थ ऐसी आर्थिक व्यवस्था की स्थापना करना है जिसमें अत्यधिक आर्थिक विषमता, शोषण और अवसरों में असमानता को कम करने का प्रयास किया जाए।

राजनीतिक न्याय का अर्थ नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने और सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध कराना है।

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की धारणा पर आधुनिक समाजवादी चिंतन का प्रभाव माना जाता है। परीक्षा-साहित्य में इसे 1917 की रूसी क्रांति से उभरे सामाजिक-आर्थिक न्याय संबंधी विचारों से भी जोड़ा जाता है, लेकिन इसे किसी एक घटना से सीधे शब्दशः ग्रहण किया गया प्रावधान नहीं समझना चाहिए।

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विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता

Liberty

प्रस्तावना नागरिकों के लिए विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण संवैधानिक आदर्श के रूप में स्वीकार करती है।

विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्ति को अपने विचार बनाने तथा संवैधानिक सीमाओं के भीतर उन्हें व्यक्त करने की स्वतंत्रता से संबंधित है।

विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़ी है।

इन आदर्शों का विस्तृत संवैधानिक संरक्षण मौलिक अधिकारों के विभिन्न प्रावधानों में दिखाई देता है।

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प्रतिष्ठा और अवसर की समता

Equality

प्रस्तावना सभी नागरिकों के लिए प्रतिष्ठा और अवसर की समता स्थापित करने की बात करती है।

प्रतिष्ठा की समता का आशय यह है कि राज्य और समाज में प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और मानवीय गरिमा को समान महत्व दिया जाए।

अवसर की समता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों को आगे बढ़ने और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के लिए समान अवसर प्राप्त हों।

संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समता के अधिकार से संबंधित प्रमुख प्रावधान दिए गए हैं।

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बंधुता, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्रीय एकता

Fraternity

बंधुता का अर्थ नागरिकों के बीच भाईचारे, परस्पर सम्मान, सहयोग और राष्ट्रीय एकात्मता की भावना विकसित करना है।

प्रस्तावना में बंधुता का उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करना बताया गया है।

व्यक्ति की गरिमा का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्ण जीवन और मानवीय प्रतिष्ठा के योग्य माना जाए।

राष्ट्र की एकता और अखण्डता का उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय एकजुटता, क्षेत्रीय अखण्डता तथा सामाजिक एकता को मजबूत करना है।

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42वाँ संविधान संशोधन और प्रस्तावना

42nd Constitutional Amendment

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में अब तक एक बार औपचारिक संशोधन किया गया है।

42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखण्डता शब्द सम्मिलित किए गए।

मूल प्रस्तावना में भारत को “सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य” कहा गया था। संशोधन के बाद इसे “सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य” कर दिया गया।

इसी संशोधन द्वारा “राष्ट्र की एकता” को बदलकर “राष्ट्र की एकता और अखण्डता” किया गया।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण

42वाँ संशोधन, 1976 → समाजवादी + पंथनिरपेक्ष + अखण्डता।

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बेरुबारी संघ मामला, 1960

Berubari Union Case

बेरुबारी संघ मामला, 1960 प्रस्तावना की संवैधानिक स्थिति से संबंधित एक महत्वपूर्ण निर्णय था।

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह विचार व्यक्त किया कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है।

हालाँकि न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान निर्माताओं की मंशा और संविधान के उद्देश्य समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी माना।

बाद में केशवानंद भारती मामले में इस दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ और प्रस्तावना को संविधान का भाग माना गया।

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गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य

Golaknath Case

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967 संविधान संशोधन और मौलिक अधिकारों से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामला था।

इस निर्णय के संदर्भ में न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्लाह द्वारा प्रस्तावना के महत्व पर विशेष बल दिया गया और इसे संविधान के मूल दर्शन तथा भावना को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।

परीक्षाओं में कभी-कभी इसे प्रस्तावना को “संविधान की आत्मा” कहे जाने वाले कथन से जोड़ा जाता है। इस कथन को डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रसिद्ध कथन से अलग रखना चाहिए।

⚠️ भ्रम न करें

अनुच्छेद 32 को डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था। इसे प्रस्तावना से संबंधित कथन के साथ न मिलाएँ।

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केशवानंद भारती मामला, 1973

Kesavananda Bharati Case

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 भारतीय संवैधानिक इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है।

उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में माना कि प्रस्तावना संविधान का भाग है।

न्यायालय ने यह भी माना कि संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद प्रस्तावना में संशोधन कर सकती है।

लेकिन संसद की संविधान संशोधन शक्ति असीमित नहीं है। संसद ऐसा संशोधन नहीं कर सकती जो संविधान की मूल संरचना को नष्ट कर दे।

इसी मामले से संविधान की मूल संरचना सिद्धांत को स्पष्ट संवैधानिक मान्यता मिली।

📗 एक पंक्ति में

प्रस्तावना संविधान का भाग है और उसमें संशोधन हो सकता है, लेकिन संविधान की मूल संरचना नष्ट नहीं की जा सकती।

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एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ

S. R. Bommai Case

एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994 भारतीय संविधान की पंथनिरपेक्ष प्रकृति से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है।

उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय में पंथनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत माना।

इस निर्णय ने प्रस्तावना में व्यक्त पंथनिरपेक्षता तथा अन्य मूल संवैधानिक मूल्यों के महत्व को भी दृढ़ किया।

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प्रस्तावना और अनुच्छेद 32

Article 32

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान के अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।

अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।

इसलिए परीक्षा में यदि प्रश्न पूछा जाए कि “संविधान का हृदय और आत्मा किसे कहा गया है?” तो उत्तर होगा — अनुच्छेद 32, संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

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के. एम. मुंशी और प्रस्तावना

K. M. Munshi

संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों में से एक के. एम. मुंशी ने प्रस्तावना को संविधान की “राजनीतिक जन्मपत्री” की संज्ञा दी मानी जाती है।

यह कथन प्रस्तावना की उस भूमिका को दर्शाता है जिसमें भारत के राजनीतिक चरित्र और संवैधानिक उद्देश्यों का संक्षिप्त रूप से उल्लेख मिलता है।

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प्रस्तावना और मौलिक अधिकार

Preamble & Fundamental Rights

प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता; विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता तथा व्यक्ति की गरिमा जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक आदर्श दिए गए हैं।

इन आदर्शों को सीधे “प्रस्तावना में दिए गए मौलिक अधिकार” कहना उचित नहीं है, क्योंकि प्रस्तावना स्वयं मौलिक अधिकारों की सूची नहीं है।

मौलिक अधिकार संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 से 35 तक दिए गए हैं।

अनुच्छेद 14 से 18 समता के अधिकार से संबंधित हैं, लेकिन मौलिक अधिकारों वाला पूरा संवैधानिक भाग केवल अनुच्छेद 14 से प्रारंभ नहीं होता। अनुच्छेद 12 और 13 भी भाग III के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान हैं।

प्रस्तावना के आदर्शों और मौलिक अधिकारों के बीच गहरा संबंध है। उदाहरण के लिए स्वतंत्रता और समता के व्यापक आदर्शों को विभिन्न मौलिक अधिकारों के माध्यम से व्यावहारिक संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होता है।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

गलत: मौलिक अधिकार केवल अनुच्छेद 14 से 35 में हैं।
सही: मौलिक अधिकारों का भाग अनुच्छेद 12 से 35 तक है।

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लोक कल्याण और प्रस्तावना

Welfare State

“लोक कल्याण” शब्द भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त नहीं हुआ है।

लोक-कल्याणकारी राज्य की भावना संविधान के अनेक प्रावधानों में, विशेष रूप से राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में दिखाई देती है।

अनुच्छेद 38 राज्य को ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए प्रयास करने का निर्देश देता है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे तथा लोक-कल्याण को बढ़ावा मिले।

इसलिए प्रस्तावना में दिए गए न्याय के आदर्श और नीति-निर्देशक तत्वों में व्यक्त लोक-कल्याणकारी राज्य की भावना एक-दूसरे से संबंधित हैं, लेकिन दोनों को एक ही संवैधानिक प्रावधान नहीं समझना चाहिए।

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संप्रभुता और सार्वभौमिकता में अंतर

Sovereignty & Universality

शब्द अर्थ
संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता तथा बाहरी प्रभुत्व से स्वतंत्रता।
सार्वभौमिकता किसी सिद्धांत, मानवीय अधिकार या मूल्य का सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होने का विचार।

“सभी व्यक्ति पूर्णतः और समान रूप से मानव हैं” जैसी धारणा मानव समानता और मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता से संबंधित है।

इसे प्रस्तावना के “सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न” शब्द का अर्थ नहीं समझना चाहिए, क्योंकि वह शब्द भारत की राजनीतिक संप्रभुता से संबंधित है।

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प्रस्तावना के चार प्रमुख आदर्श

Core Ideals

आदर्श प्रस्तावना में स्वरूप
न्याय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय
स्वतंत्रता विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता
समता प्रतिष्ठा और अवसर की समता
बंधुता व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता

🧠 याद रखने का क्रम

न्याय स्वतंत्रता समता बंधुता
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भारत के राज्य का संवैधानिक स्वरूप

Nature of Indian State

🧠 प्रस्तावना में भारत

सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य

प्रस्तावना भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित करती है।

इनमें समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़े गए थे।

हालाँकि इन शब्दों को बाद में प्रस्तावना में जोड़ा गया, इनके अनुरूप अनेक संवैधानिक मूल्यों और व्यवस्थाओं का स्वरूप मूल संविधान में पहले से मौजूद था।

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प्रमुख न्यायिक निर्णय — एक नज़र में

Important Supreme Court Cases

मामला वर्ष मुख्य तथ्य
बेरुबारी संघ मामला 1960 प्रस्तावना को संविधान का भाग नहीं माना गया।
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 मौलिक अधिकार और संविधान संशोधन से संबंधित महत्वपूर्ण मामला; प्रस्तावना के महत्व पर भी बल।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 प्रस्तावना संविधान का भाग; संशोधन संभव, लेकिन मूल संरचना नष्ट नहीं की जा सकती।
एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ 1994 पंथनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत माना गया।
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महत्वपूर्ण भ्रम और उनके सही तथ्य

Common Mistakes & Corrections

गलत: प्रस्तावना में दिए गए न्याय, स्वतंत्रता और समता स्वयं मौलिक अधिकार हैं।
सही: ये प्रस्तावना के संवैधानिक आदर्श हैं; मौलिक अधिकार भाग III, अनुच्छेद 12 से 35 में दिए गए हैं।

गलत: मौलिक अधिकार अनुच्छेद 14 से 35 तक ही हैं।
सही: संविधान का मौलिक अधिकारों वाला भाग अनुच्छेद 12 से 35 तक है।

गलत: पंथनिरपेक्षता का अर्थ राज्य का धर्म-विरोधी होना है।
सही: भारत का कोई आधिकारिक राजकीय धर्म नहीं है और राज्य सभी धर्मों के प्रति संवैधानिक निष्पक्षता रखता है।

गलत: समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द मूल प्रस्तावना में थे।
सही: दोनों शब्द 42वें संविधान संशोधन, 1976 से जोड़े गए।

गलत: बेरुबारी मामले ने प्रस्तावना को संविधान का भाग माना।
सही: बेरुबारी, 1960 में इसे भाग नहीं माना गया; केशवानंद भारती, 1973 में इसे संविधान का भाग माना गया।

गलत: प्रस्तावना में संशोधन नहीं किया जा सकता।
सही: अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन संभव है, लेकिन मूल संरचना का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

गलत: “संविधान का हृदय और आत्मा” प्रस्तावना को कहा गया है।
सही: डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।

गलत: “लोक कल्याण” प्रस्तावना में लिखा है।
सही: यह प्रस्तावना का शब्द नहीं है; लोक-कल्याणकारी राज्य की भावना विशेष रूप से नीति-निर्देशक तत्वों में दिखाई देती है।

भ्रम: सार्वभौमिकता और संप्रभुता एक ही हैं।
सही: संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता है, जबकि सार्वभौमिकता किसी सिद्धांत या अधिकार के सभी पर लागू होने की भावना को व्यक्त कर सकती है।

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महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य

High Yield Facts

13 दिसंबर 1946 — जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

22 जनवरी 1947 — संविधान सभा ने उद्देश्य प्रस्ताव स्वीकार किया।

26 नवंबर 1949 — संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया।

26 जनवरी 1950 — संविधान के अधिकांश प्रावधान लागू हुए।

बेरुबारी संघ मामला, 1960 — प्रस्तावना को संविधान का भाग नहीं माना गया।

गोलकनाथ मामला, 1967 — संविधान संशोधन और मौलिक अधिकारों से संबंधित महत्वपूर्ण मामला।

केशवानंद भारती मामला, 1973 — प्रस्तावना संविधान का भाग है तथा मूल संरचना सिद्धांत स्थापित हुआ।

42वाँ संविधान संशोधन, 1976 — समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखण्डता शब्द जोड़े गए।

एस. आर. बोम्मई मामला, 1994 — पंथनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत माना गया।

अनुच्छेद 32 — डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार संविधान का “हृदय और आत्मा”।

के. एम. मुंशी — प्रस्तावना को “राजनीतिक जन्मपत्री” की संज्ञा दिए जाने से संबंधित प्रसिद्ध परीक्षा तथ्य।

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त्वरित पुनरावृत्ति

Quick Revision

⚡ एक नज़र में

हम, भारत के लोग सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य
न्याय स्वतंत्रता समता बंधुता

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

प्रस्तावना की शक्ति का स्रोत — भारत की जनता।

उद्देश्य प्रस्ताव — जवाहरलाल नेहरू; प्रस्तुत 13 दिसंबर 1946; स्वीकृत 22 जनवरी 1947।

संविधान अंगीकृत — 26 नवंबर 1949; लागू — 26 जनवरी 1950।

भारत का स्वरूप — सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य।

न्याय — सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक।

स्वतंत्रता — विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की।

समता — प्रतिष्ठा और अवसर की।

बंधुता — व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली।

गणराज्य — राष्ट्राध्यक्ष का पद वंशानुगत नहीं होता।

पंथनिरपेक्ष — भारत का कोई आधिकारिक राजकीय धर्म नहीं है।

संप्रभु — आंतरिक रूप से सर्वोच्च तथा बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्र।

42वाँ संविधान संशोधन, 1976 — समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखण्डता शब्द जोड़े गए।

बेरुबारी संघ मामला, 1960 — प्रस्तावना को संविधान का भाग नहीं माना गया।

केशवानंद भारती मामला, 1973 — प्रस्तावना संविधान का भाग; संशोधन संभव, पर मूल संरचना नष्ट नहीं की जा सकती।

एस. आर. बोम्मई मामला, 1994 — पंथनिरपेक्षता के संवैधानिक और मूल संरचनात्मक महत्व की पुष्टि।

अनुच्छेद 32 — डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार संविधान का “हृदय और आत्मा”।

मौलिक अधिकार — संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 से 35 तक।

लोक कल्याण — प्रस्तावना का शब्द नहीं; लोक-कल्याणकारी राज्य की भावना विशेष रूप से नीति-निर्देशक तत्वों में दिखाई देती है।

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