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भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
QUIT INDIA MOVEMENT 1942

भारत छोड़ो आंदोलन

1942 — करो या मरो, अगस्त क्रांति और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतिम महान जन-आंदोलन

अगस्त क्रांति — स्वतंत्रता की निर्णायक पुकार

भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे व्यापक और निर्णायक जन-आंदोलनों में से एक था। द्वितीय विश्व युद्ध, क्रिप्स मिशन की असफलता और ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को वास्तविक सत्ता हस्तांतरित करने से इनकार करने के बाद कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति की मांग की। अगस्त 1942 में गांधीजी के “करो या मरो” के आह्वान ने इस आंदोलन को देशव्यापी जनविद्रोह का रूप दे दिया।

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भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि

द्वितीय विश्व युद्ध और क्रिप्स मिशन की असफलता

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल कर दिया था। कांग्रेस लगातार यह मांग कर रही थी कि भारत को वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता और सत्ता हस्तांतरण का स्पष्ट आश्वासन दिया जाए।

मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। क्रिप्स मिशन द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव कांग्रेस की तत्काल सत्ता हस्तांतरण और वास्तविक स्वतंत्रता की मांगों को पूरा नहीं करते थे, इसलिए वार्ता असफल हो गई।

क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधीजी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत में ब्रिटिश शासन का बने रहना देश और उसकी सुरक्षा दोनों के लिए उचित नहीं है। उन्होंने अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग को राष्ट्रीय आंदोलन का अगला लक्ष्य बनाया।

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14 जुलाई 1942 — वर्धा प्रस्ताव

भारत छोड़ो आंदोलन की औपचारिक पृष्ठभूमि

14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद थे।

इस बैठक में ब्रिटिश शासन से भारत छोड़ने की मांग से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार किया गया। कांग्रेस कार्यसमिति ने स्पष्ट किया कि भारत में ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत होना चाहिए।

यह वर्धा प्रस्ताव बाद में बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सामने रखा गया और उसी से अगस्त 1942 के ऐतिहासिक भारत छोड़ो प्रस्ताव का मार्ग प्रशस्त हुआ। गांधी हेरिटेज पोर्टल भी 14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा ब्रिटिशों की तत्काल वापसी की मांग वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने की घटना दर्ज करता है।

🎯 तिथि याद रखें

14 जुलाई 1942 — वर्धा — कांग्रेस कार्यसमिति — भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति की मांग।

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7–8 अगस्त 1942 — बंबई अधिवेशन

ग्वालिया टैंक मैदान की ऐतिहासिक बैठक

7 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ऐतिहासिक बैठक शुरू हुई। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष होने के कारण इसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की।

आज ग्वालिया टैंक मैदान को अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है। यह स्थान भारत छोड़ो आंदोलन की ऐतिहासिक घोषणा से जुड़ा हुआ है।

जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में भारत छोड़ो प्रस्ताव प्रस्तुत किया और 8 अगस्त 1942 को इसे स्वीकार कर लिया गया। नेहरू पोर्टल भी नेहरू द्वारा प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाने और 8 अगस्त को उसके पारित होने की पुष्टि करता है।

भारत छोड़ो प्रस्ताव का मूल राजनीतिक विचार और अभियान गांधीजी के नेतृत्व से निकला था। “भारत छोड़ो प्रस्ताव का प्रारूप मौलाना आजाद ने अकेले बनाया था” ऐसा निर्विवाद रूप से स्थापित तथ्य नहीं है। परीक्षा के लिए अधिक महत्वपूर्ण तथ्य है कि मौलाना आजाद कांग्रेस अध्यक्ष थे, जबकि अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में प्रस्ताव जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्तुत किया

📌 भ्रम से बचें

मौलाना अबुल कलाम आजाद — कांग्रेस अध्यक्ष

जवाहरलाल नेहरू — अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में भारत छोड़ो प्रस्ताव प्रस्तुत किया

8 अगस्त 1942 — प्रस्ताव स्वीकार

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“करो या मरो”

गांधीजी का ऐतिहासिक आह्वान

8 अगस्त 1942 को गांधीजी ने ग्वालिया टैंक मैदान में अपने ऐतिहासिक संबोधन में भारतीय जनता को “करो या मरो” का संदेश दिया। इसका अर्थ था कि भारतीय जनता पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ अहिंसक संघर्ष करे।

गांधीजी ने जनता से कहा कि स्वतंत्रता को अपना अंतिम लक्ष्य मानकर संघर्ष किया जाए और अब ब्रिटिश शासन को जारी रखने की अनुमति न दी जाए।

भारत छोड़ो आंदोलन के साथ “करो या मरो” का नारा गांधीजी के नाम से सबसे अधिक जुड़ा हुआ है। गांधी हेरिटेज पोर्टल भी 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव की स्वीकृति और गांधीजी द्वारा “करो या मरो” का आह्वान दर्ज करता है।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण जोड़ी

भारत छोड़ो आंदोलन — महात्मा गांधी — “करो या मरो”।

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9 अगस्त 1942 — नेताओं की गिरफ्तारी

आंदोलन शुरू होने से पहले नेतृत्व को बंदी बनाने का प्रयास

8 अगस्त की रात प्रस्ताव स्वीकार होने के कुछ ही घंटों बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस नेतृत्व को बंदी बनाने की कार्रवाई शुरू कर दी। 9 अगस्त 1942 की सुबह गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

सरकार का उद्देश्य आंदोलन को संगठित रूप लेने से पहले उसके शीर्ष नेतृत्व को जनता से अलग करना था। कांग्रेस को प्रतिबंधित किया गया और अनेक कार्यालयों तथा नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई हुई।

लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी से आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। इसके विपरीत देश के विभिन्न भागों में जनता स्वतः सड़कों पर उतर आई और आंदोलन ने कई स्थानों पर स्वतःस्फूर्त जनविद्रोह का रूप ले लिया।

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गांधीजी और अन्य नेताओं का कारावास

किस नेता को कहाँ रखा गया?

गांधीजी को गिरफ्तार करने के बाद पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद किया गया। उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी, सचिव महादेव देसाई, डॉ. सुशीला नायर तथा अन्य सहयोगी भी वहाँ रखे गए। सरोजिनी नायडू भी बाद में आगा खान पैलेस में उनके साथ रहीं।

जवाहरलाल नेहरू को 9 अगस्त 1942 से अहमदनगर किला कारागार में रखा गया। इसलिए उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के समय सीधे अल्मोड़ा जेल भेजा गया था, यह सही नहीं है। नेहरू मार्च 1945 तक अहमदनगर किले में रहे; बाद में बरेली और अंततः जून 1945 में कुछ दिनों के लिए अल्मोड़ा जेल ले जाए गए।

मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल और कांग्रेस कार्यसमिति के कई अन्य प्रमुख नेताओं को भी अहमदनगर किले में बंद रखा गया। मौलाना आजाद को “बांकुड़ा जेल” में रखे जाने वाला तथ्य इस संदर्भ में सही नहीं है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पटना में गिरफ्तार कर बांकीपुर केंद्रीय कारागार में रखा गया। बिहार में वे भारत छोड़ो आंदोलन से पहले ही कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में थे।

जयप्रकाश नारायण हजारीबाग केंद्रीय जेल में बंद थे। उन्होंने अपने साथियों के साथ 9 नवंबर 1942 को हजारीबाग जेल से साहसिक पलायन किया और भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

🧠 जेलों का क्रम याद रखें

गांधीजी — आगा खान पैलेस नेहरू — अहमदनगर किला मौलाना आजाद — अहमदनगर किला राजेंद्र प्रसाद — बांकीपुर जेल जयप्रकाश नारायण — हजारीबाग जेल
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अरुणा आसफ अली और 9 अगस्त

ग्वालिया टैंक मैदान पर तिरंगा

शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद बंबई में आंदोलन की गतिविधियाँ जारी रहीं। अरुणा आसफ अली ने 9 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराया और आंदोलन के प्रतीकात्मक नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस घटना के कारण अरुणा आसफ अली का नाम भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख महिला नेताओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वे गिरफ्तारी से बचकर भूमिगत भी रहीं और आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाती रहीं।

🎯 महत्वपूर्ण तथ्य

9 अगस्त 1942 — ग्वालिया टैंक मैदान — अरुणा आसफ अली द्वारा ध्वजारोहण।

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उषा मेहता और गुप्त कांग्रेस रेडियो

भूमिगत आंदोलन की आवाज

भारत छोड़ो आंदोलन में उषा मेहता की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी। उन्होंने अपने साथियों के साथ ब्रिटिश सेंसरशिप को चुनौती देने के लिए एक गुप्त रेडियो स्टेशन स्थापित करने की योजना बनाई।

14 अगस्त 1942 को उषा मेहता और उनके सहयोगियों ने गुप्त कांग्रेस रेडियो की शुरुआत की दिशा में काम आरंभ किया और 27 अगस्त 1942 से इसका नियमित गुप्त प्रसारण शुरू हुआ। इसलिए 14 अगस्त को ही पहला नियमित प्रसारण हुआ था, ऐसा कहना पूरी तरह सटीक नहीं है।

इस रेडियो को सामान्यतः कांग्रेस रेडियो या गुप्त कांग्रेस रेडियो कहा गया। यह ब्रिटिश सरकार द्वारा दबाई जा रही खबरों, आंदोलन की गतिविधियों और राष्ट्रीय नेताओं के संदेशों को जनता तक पहुँचाता था।

रेडियो स्टेशन का स्थान बार-बार बदला जाता था ताकि ब्रिटिश पुलिस उसका पता न लगा सके। अंततः नवंबर 1942 में पुलिस ने इसका पता लगा लिया और उषा मेहता सहित इसके प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया।

📌 तिथि का अंतर

14 अगस्त 1942 — गुप्त कांग्रेस रेडियो की स्थापना की गतिविधि शुरू

27 अगस्त 1942 — नियमित प्रसारण शुरू

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आंदोलन का भूमिगत नेतृत्व

शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद संघर्ष

गांधीजी, नेहरू, पटेल और आजाद जैसे प्रमुख नेताओं के बंदी हो जाने के बाद आंदोलन का नेतृत्व कई स्थानों पर स्थानीय और भूमिगत कार्यकर्ताओं ने संभाला।

जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी और उषा मेहता जैसे नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भूमिगत गतिविधियों, संदेशों, रेडियो प्रसारण और संगठन के माध्यम से आंदोलन को जीवित रखा।

जयप्रकाश नारायण हजारीबाग जेल से निकलने के बाद भूमिगत आंदोलन में सक्रिय हुए और बाद में नेपाल क्षेत्र में आजाद दस्ता के संगठन से भी जुड़े।

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समानांतर सरकारें

कुछ क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन का स्थानीय नियंत्रण अस्थायी रूप से कमजोर पड़ गया और आंदोलनकारियों ने समानांतर सरकारें स्थापित कीं।

उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में कुछ समय के लिए समानांतर शासन स्थापित हुआ। इसी कारण चित्तू पांडे भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण नाम हैं।

बंगाल के तामलुक क्षेत्र में तम्रलिप्त जातीय सरकार स्थापित हुई, जो अन्य अनेक स्थानीय समानांतर व्यवस्थाओं की तुलना में अधिक समय तक सक्रिय रही।

महाराष्ट्र के सतारा क्षेत्र में भी बाद में प्रति सरकार के नाम से समानांतर शासन विकसित हुआ, जिससे नाना पाटिल का नाम प्रमुख रूप से जुड़ा है।

🎯 प्रमुख समानांतर सरकारें

बलिया — चित्तू पांडे

तामलुक — तम्रलिप्त जातीय सरकार

सतारा — प्रति सरकार — नाना पाटिल

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सरकारी दमन

जन-आंदोलन को दबाने की कठोर नीति

भारत छोड़ो आंदोलन के फैलते ही ब्रिटिश सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ, लाठीचार्ज, गोलीबारी और अन्य दमनकारी उपाय अपनाए। कांग्रेस और उससे जुड़े संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया।

कई स्थानों पर जनता ने रेलवे लाइनें, तार और संचार व्यवस्थाएँ बाधित कीं तथा पुलिस थानों और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। आंदोलन के कई क्षेत्रों में गांधीजी की घोषित अहिंसक नीति से अलग हिंसक घटनाएँ भी हुईं।

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस और सैन्य बल का व्यापक उपयोग किया। इसके बावजूद कई महीनों तक विभिन्न क्षेत्रों में भूमिगत और स्थानीय प्रतिरोध जारी रहा।

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महादेव देसाई और कस्तूरबा गांधी

आगा खान पैलेस में दो बड़ी व्यक्तिगत क्षतियाँ

गांधीजी के लंबे समय से सचिव और अत्यंत निकट सहयोगी महादेव देसाई का 15 अगस्त 1942 को आगा खान पैलेस में नजरबंदी के दौरान निधन हो गया।

गांधीजी की पत्नी कस्तूरबा गांधी भी उनके साथ आगा खान पैलेस में नजरबंद थीं। उनका 22 फरवरी 1944 को वहीं निधन हो गया।

इन दोनों घटनाओं ने गांधीजी को व्यक्तिगत रूप से गहरा आघात पहुँचाया। गांधीजी स्वयं 6 मई 1944 तक आगा खान पैलेस में बंद रहे और बाद में स्वास्थ्य संबंधी कारणों से रिहा किए गए।

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गांधीजी का 21 दिन का उपवास

10 फरवरी 1943 से 2 मार्च 1943

10 फरवरी 1943 को गांधीजी ने आगा खान पैलेस में 21 दिन का उपवास प्रारंभ किया। यह उपवास 2 मार्च 1943 तक चला।

ब्रिटिश सरकार भारत छोड़ो आंदोलन के बाद हुई हिंसक घटनाओं की जिम्मेदारी कांग्रेस और गांधीजी पर डाल रही थी। गांधीजी ने इस आरोप का विरोध किया और बिना मुकदमे लंबे समय तक बंद रखे जाने तथा सरकारी आरोपों के विरुद्ध अपना नैतिक प्रतिरोध व्यक्त किया।

उपवास के दौरान गांधीजी का स्वास्थ्य अत्यंत गंभीर हो गया था और उनके जीवन को लेकर देश और विदेश में चिंता बढ़ गई थी।

🎯 याद रखें

10 फरवरी 1943 — गांधीजी का 21 दिवसीय उपवास — आगा खान पैलेस।

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लुई फिशर और गांधीजी

भारत छोड़ो आंदोलन से ठीक पहले का महत्वपूर्ण संपर्क

अमेरिकी पत्रकार और लेखक लुई फिशर का गांधीजी से निकट संपर्क था और उन्होंने गांधीजी के विचारों तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर विस्तार से लिखा।

लुई फिशर ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने से पहले सेवाग्राम में गांधीजी से लंबी बातचीत की थी। इसलिए यह कहना कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे जेल में गांधीजी के साथ थे, सही नहीं है।

उनकी गांधीजी से हुई बातचीत ने विश्व के सामने गांधीजी के राजनीतिक विचारों और भारत की स्वतंत्रता की मांग को समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की मांग

राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर राजनीतिक घटनाक्रम

भारत छोड़ो आंदोलन के समय भारतीय राजनीति में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के रास्ते अलग-अलग हो चुके थे। मुस्लिम लीग ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया और अपनी पाकिस्तान संबंधी राजनीतिक मांग को आगे बढ़ाती रही।

23 मार्च की तिथि मुस्लिम लीग द्वारा 1940 में लाहौर में पारित पाकिस्तान प्रस्ताव से जुड़ी थी और बाद के वर्षों में इस तिथि को पाकिस्तान प्रस्ताव की स्मृति में मनाया जाने लगा। 23 मार्च 1943 को भी मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को प्रमुखता देने के लिए इस दिवस का आयोजन किया।

यह घटना भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा नहीं थी, बल्कि उसी समय चल रहे एक अलग राजनीतिक घटनाक्रम को दर्शाती है।

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भारत छोड़ो आंदोलन का महत्त्व

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतिम विशाल जन-उभार

भारत छोड़ो आंदोलन को ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन द्वारा तत्काल दबा दिया, लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव अत्यंत गहरा था। इस आंदोलन ने स्पष्ट कर दिया कि भारत में ब्रिटिश शासन को लंबे समय तक भारतीय जनता की सहमति के बिना बनाए रखना संभव नहीं होगा।

इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी जनता ने स्वयं आंदोलन को आगे बढ़ाया। विद्यार्थियों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

भारत छोड़ो आंदोलन के बाद भारतीय स्वतंत्रता का प्रश्न अब केवल संवैधानिक सुधारों तक सीमित नहीं रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार पर भारत में सत्ता हस्तांतरण के लिए दबाव और तेजी से बढ़ा।

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महत्वपूर्ण घटनाक्रम

जुलाई 1942 से मई 1944 तक

तिथि घटना मुख्य तथ्य
14 जुलाई 1942 वर्धा प्रस्ताव कांग्रेस कार्यसमिति ने ब्रिटिश शासन की समाप्ति की मांग वाले प्रस्ताव को स्वीकार किया।
7 अगस्त 1942 अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक ग्वालिया टैंक मैदान, बंबई में बैठक प्रारंभ।
8 अगस्त 1942 भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार गांधीजी ने “करो या मरो” का आह्वान किया।
9 अगस्त 1942 कांग्रेस नेतृत्व गिरफ्तार गांधीजी, नेहरू, पटेल, आजाद सहित प्रमुख नेता गिरफ्तार।
9 अगस्त 1942 अरुणा आसफ अली ग्वालिया टैंक मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
14 अगस्त 1942 गुप्त कांग्रेस रेडियो की तैयारी उषा मेहता और सहयोगियों ने भूमिगत रेडियो स्थापित करने का कार्य प्रारंभ किया।
15 अगस्त 1942 महादेव देसाई का निधन आगा खान पैलेस में निधन।
27 अगस्त 1942 कांग्रेस रेडियो नियमित गुप्त प्रसारण प्रारंभ।
9 नवंबर 1942 हजारीबाग जेल से पलायन जयप्रकाश नारायण और उनके साथी जेल से निकले।
10 फरवरी 1943 गांधीजी का उपवास 21 दिवसीय उपवास प्रारंभ।
22 फरवरी 1944 कस्तूरबा गांधी का निधन आगा खान पैलेस में निधन।
6 मई 1944 गांधीजी रिहा स्वास्थ्य कारणों से बिना शर्त रिहाई।
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क्रम से याद करें

क्रिप्स मिशन से अगस्त क्रांति तक

🧠 त्वरित क्रम

क्रिप्स मिशन असफल 14 जुलाई — वर्धा प्रस्ताव 7 अगस्त — बंबई बैठक 8 अगस्त — भारत छोड़ो प्रस्ताव करो या मरो 9 अगस्त — नेता गिरफ्तार भूमिगत आंदोलन समानांतर सरकारें

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति की मांग वाला प्रस्ताव स्वीकार किया।

7 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक प्रारंभ हुई। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद थे।

जवाहरलाल नेहरू ने भारत छोड़ो प्रस्ताव प्रस्तुत किया और 8 अगस्त 1942 को इसे स्वीकार किया गया।

8 अगस्त 1942 को गांधीजी ने “करो या मरो” का ऐतिहासिक आह्वान किया।

9 अगस्त 1942 की सुबह गांधीजी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद सहित प्रमुख कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

गांधीजी को आगा खान पैलेस, पुणे में नजरबंद रखा गया।

जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सरदार पटेल सहित कई कांग्रेस कार्यसमिति सदस्यों को अहमदनगर किला कारागार में रखा गया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद — बांकीपुर जेल; जयप्रकाश नारायण — हजारीबाग जेल।

अरुणा आसफ अली ने 9 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराया।

उषा मेहता ने अपने साथियों के साथ गुप्त कांग्रेस रेडियो संगठित किया; इसकी तैयारी 14 अगस्त से शुरू हुई और नियमित प्रसारण 27 अगस्त 1942 से हुआ।

जयप्रकाश नारायण और उनके साथी 9 नवंबर 1942 को हजारीबाग जेल से निकल गए और भूमिगत आंदोलन में सक्रिय हुए।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बलिया, तामलुक और सतारा जैसे क्षेत्रों में समानांतर शासन की व्यवस्थाएँ उभरीं।

गांधीजी ने 10 फरवरी 1943 को आगा खान पैलेस में 21 दिन का उपवास शुरू किया।

महादेव देसाई का 15 अगस्त 1942 और कस्तूरबा गांधी का 22 फरवरी 1944 को आगा खान पैलेस में निधन हुआ।

अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने 1942 में आंदोलन शुरू होने से पहले गांधीजी से सेवाग्राम में मुलाकात और लंबी बातचीत की थी; वे भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधीजी के साथ जेल में नहीं थे।

23 मार्च 1943 को मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग से संबंधित दिवस मनाया गया; यह भारत छोड़ो आंदोलन से अलग समानांतर राजनीतिक घटनाक्रम था।

भारत छोड़ो आंदोलन = अगस्त क्रांति = 1942 = गांधीजी = करो या मरो।

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