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महमूद गजनी एवं मुहम्मद गोरी
TURKISH INVASIONS OF INDIA

महमूद गजनी एवं मुहम्मद गोरी

भारत पर तुर्क आक्रमण — गजनवी अभियानों से ग़ुरी विजय और दिल्ली सल्तनत की पृष्ठभूमि तक

भारत पर तुर्क आक्रमण

मध्यकालीन भारत के इतिहास में महमूद गजनी और मुहम्मद गोरी दोनों का विशेष महत्व है। महमूद गजनी के अभियान मुख्यतः धन-संपदा, सैन्य प्रतिष्ठा और गजनवी शक्ति के विस्तार से जुड़े थे तथा पंजाब के कुछ भाग गजनवी नियंत्रण में आए। इसके लगभग डेढ़ शताब्दी बाद मुहम्मद गोरी की विजयों ने उत्तर भारत में अधिक स्थायी तुर्क राजनीतिक सत्ता की नींव तैयार की, जिसे उसके सेनापतियों ने आगे बढ़ाया।

A

महमूद गजनी

Mahmud of Ghazni

01

जन्म, पिता और राजगद्दी

Early Life & Accession

महमूद गजनी के पिता का नाम सुबुक्तगीन (सबुक्तगीन) था। सुबुक्तगीन एक तुर्क मूल का सैनिक शासक था, जिसने गजनी में अपनी सत्ता मजबूत की और हिंदूशाही राज्य के साथ संघर्ष किया।

महमूद का जन्म सामान्यतः 971 ई. माना जाता है। पिता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष में अपने भाई इस्माइल को पराजित करके वह 998 ई. में गजनी की राजगद्दी पर बैठा। उसका शासन 1030 ई. तक चला।

02

भारत पर आक्रमण

Indian Campaigns

महमूद ने लगभग 1000 ई. से भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा की ओर अपने अभियान शुरू किए। 1000 ई. के अभियान को सामान्य परीक्षा पुस्तकों में उसका भारत की ओर पहला आक्रमण माना जाता है। अगले वर्ष उसका हिंदूशाही शासक जयपाल से निर्णायक संघर्ष हुआ।

भारतीय परीक्षा-परंपरा और NIOS में महमूद गजनी द्वारा 1000 से 1026 ई. के बीच भारत पर 17 आक्रमण किए जाने का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग इतिहासकार अभियानों की गणना में अंतर कर सकते हैं, लेकिन SSC/Railway जैसे सामान्य परीक्षाओं के लिए 17 आक्रमण महत्वपूर्ण तथ्य है।

उसके भारतीय अभियानों का प्रमुख उद्देश्य यहाँ की प्रसिद्ध धन-संपदा प्राप्त करके गजनी के खजाने और मध्य एशिया में अपनी सैन्य-राजनीतिक शक्ति को मजबूत करना था। उसने पंजाब के कुछ भागों को अपने नियंत्रण में भी लिया, इसलिए उसके सभी अभियानों को केवल क्षणिक लूट कहना भी अधूरा होगा।

🎯 Exam Point

महमूद गजनी — भारत पर परंपरागत रूप से 17 आक्रमण — 1000 से 1026 ई.।

03

जयपाल की पराजय

Battle with Jayapala

1001 ई. में महमूद गजनी ने हिंदूशाही शासक जयपाल को पेशावर के निकट हुए युद्ध में पराजित किया। जयपाल का राज्य उत्तर-पश्चिमी भारत और अफगानिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों तक फैला हुआ था।

जयपाल के बाद उसका पुत्र आनंदपाल हिंदूशाही शासक बना और उसने भी महमूद का प्रतिरोध किया। महमूद के लगातार अभियानों के परिणामस्वरूप पंजाब क्षेत्र में गजनवी प्रभाव बढ़ता गया और अंततः पंजाब का बड़ा भाग गजनवियों के नियंत्रण में आ गया।

04

मंदिरों और समृद्ध नगरों पर अभियान

Raids on Wealthy Centres

महमूद ने अपने अभियानों के दौरान नगरकोट, थानेसर, मथुरा और कन्नौज जैसे समृद्ध नगरों तथा धार्मिक केंद्रों पर आक्रमण किए और वहाँ से बड़ी मात्रा में धन-संपदा प्राप्त की। NIOS के अनुसार 1014–1019 ई. के बीच इन अभियानों से उसने अपने खजाने को समृद्ध किया।

मध्यकालीन फारसी स्रोत महमूद को इस्लाम का योद्धा और मूर्तियों को नष्ट करने वाला विजेता प्रस्तुत करते हैं। उसने कई मंदिरों और मूर्तियों को नष्ट किया तथा उनकी संपत्ति लूटी। साथ ही उसके अभियानों के पीछे आर्थिक और साम्राज्यवादी हित भी अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इसलिए उसके आक्रमणों को समझते समय धार्मिक प्रतिष्ठा, युद्धकालीन मंदिर-विनाश, धन-संपदा और राजनीतिक शक्ति—इन सभी पक्षों को साथ देखना चाहिए।

05

सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण

Somnath Campaign — 1025 CE

महमूद गजनी का सबसे प्रसिद्ध भारतीय अभियान 1025 ई. में गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित सोमनाथ मंदिर के विरुद्ध था। सोमनाथ एक समृद्ध और प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र था। महमूद ने लंबी दूरी तय करके वहाँ आक्रमण किया, प्रतिरोध को पराजित किया और मंदिर की संपत्ति लूटकर गजनी लौट गया।

NIOS के इतिहास पाठ में इस संघर्ष में 50,000 से अधिक रक्षकों के मारे जाने का विवरण दिया गया है। यह संख्या मध्यकालीन विवरणों पर आधारित परंपरागत कथन के रूप में पढ़ी जानी चाहिए; इतनी बड़ी casualty संख्या को आधुनिक स्वतंत्र अभिलेखीय गणना की तरह निश्चित नहीं माना जा सकता। परीक्षा में स्रोत-आधारित प्रश्न हो तो NIOS में दी गई संख्या याद रखी जा सकती है।

सोमनाथ अभियान के समय गुजरात में चालुक्य/सोलंकी शासक भीम प्रथम का शासन था। NIOS के अनुसार महमूद लगभग दो सप्ताह बाद सोमनाथ से निकल गया, जब उसे भीम प्रथम द्वारा सामना करने की तैयारी की सूचना मिली।

📗 परीक्षा-सुरक्षित तथ्य

1025 ई. — महमूद गजनी — सोमनाथ मंदिर — सौराष्ट्र, गुजरात।

06

अंतिम भारतीय अभियान

Campaign against the Jats

सोमनाथ से लौटते समय महमूद की सेना को सिंध क्षेत्र में जाटों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। इसके बाद महमूद ने उनके विरुद्ध एक दंडात्मक अभियान चलाया। सामान्य परीक्षा-परंपरा में इसे 1027 ई. में जाटों के विरुद्ध महमूद का अंतिम भारतीय आक्रमण कहा जाता है।

अभियानों की वर्ष-गणना में स्रोतों के अनुसार 1026–1027 ई. का अंतर मिल सकता है। इसलिए परीक्षा के लिए अंतिम अभियान — जाटों के विरुद्ध, लगभग 1027 ई. याद रखना उपयोगी है।

07

‘सुल्तान’ की उपाधि

Title of Sultan

महमूद गजनी के साथ ‘सुल्तान’ की उपाधि विशेष रूप से जुड़ी हुई है। NIOS के अनुसार महमूद वह पहला शासक था जिसे उसके समकालीनों ने सुल्तान के रूप में संबोधित किया। बाद में यह उपाधि तुर्क शासकों में व्यापक रूप से प्रचलित हुई।

इसलिए सामान्य परीक्षा में ‘सुल्तान की उपाधि से संबोधित किया जाने वाला पहला शासक — महमूद गजनी’ उत्तर स्वीकार किया जाता है।

🎯 High Yield

महमूद गजनी — ‘सुल्तान’ की उपाधि से संबोधित होने वाला प्रारंभिक/पहला प्रसिद्ध शासक।

08

अलबरूनी

Al-Biruni

अलबरूनी (अबू रैहान अल-बिरूनी) मध्यकाल का महान विद्वान था। महमूद द्वारा ख्वारिज्म पर अधिकार किए जाने के बाद अलबरूनी गजनवी सत्ता के संपर्क में आया और बाद में भारत पहुँचा। उसने भारतीय समाज, धर्म, दर्शन, गणित, खगोल विज्ञान, भूगोल और संस्कृत ग्रंथों का गहन अध्ययन किया।

उसकी प्रसिद्ध कृति ‘किताब-उल-हिन्द’ है, जिसका विस्तृत नाम तहकीक मा लिल-हिन्द के रूप में जाना जाता है। यह 11वीं शताब्दी के भारत को समझने का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है।

अलबरूनी ने संस्कृत सीखी और भारतीय ज्ञान-परंपराओं का अध्ययन किया। इसलिए वह केवल महमूद के अभियानों का वर्णन करने वाला लेखक नहीं, बल्कि भारत का व्यवस्थित अध्ययन करने वाला महत्वपूर्ण विद्वान था।

09

फिरदौसी और शाहनामा

Firdawsi & Shahnameh

महान फारसी कवि फिरदौसी की प्रसिद्ध रचना ‘शाहनामा’ है। शाहनामा फारसी साहित्य का महान महाकाव्य है, जिसमें प्राचीन ईरान के राजाओं, वीरों और परंपराओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।

फिरदौसी का महमूद गजनी के दरबार और संरक्षण से संबंध प्रसिद्ध है, लेकिन “फिरदौसी महमूद गजनी के साथ भारत आया था” सही तथ्य नहीं है। उसके भारत आने का विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता।

इसी प्रकार अलबरूनी और फिरदौसी दोनों महमूद के साथ भारत आए थे—यह कथन सही नहीं है। अलबरूनी भारत आया और उसने भारत का अध्ययन किया; फिरदौसी को भारत-यात्रा से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

⚠️ भ्रम से बचें

फिरदौसी — शाहनामा | अलबरूनी — किताब-उल-हिन्द। दोनों को महमूद के साथ भारत आया हुआ न लिखें।

10

दरबार के विद्वान और साहित्य

Scholars & Literature

विद्वानसंबंध/कृतियाद रखने योग्य तथ्य
अलबरूनीकिताब-उल-हिन्दभारत के धर्म, समाज और ज्ञान-परंपराओं का अध्ययन
फिरदौसीशाहनामामहान फारसी महाकाव्य; महमूद से संरक्षण-संबंध की प्रसिद्ध परंपरा
फर्रुखी सिस्तानीफारसी कविगजनवी दरबार से संबंधित प्रमुख कवि

अलबरूनी, फिरदौसी तथा फर्रुखी/फरूखी को गजनवी काल के प्रमुख विद्वानों और साहित्यकारों में गिना जाता है। लेकिन इन तीनों का महमूद के साथ संबंध एक जैसा नहीं था; इसलिए केवल “तीनों हमेशा महमूद के दरबार में रहते थे” जैसी एक समान पंक्ति से इन्हें याद करना उचित नहीं है।

11

महमूद के आक्रमणों का प्रभाव

Impact of the Invasions

महमूद के आक्रमणों से उत्तर-पश्चिमी भारत की राजनीतिक और सैन्य कमजोरियाँ उजागर हुईं। उसके अभियानों से अनेक नगरों और धार्मिक केंद्रों को भारी क्षति पहुँची तथा बड़ी मात्रा में धन गजनी ले जाया गया।

महमूद भारत के अधिकांश भाग में स्थायी शासन स्थापित करने के उद्देश्य से नहीं आया था, लेकिन पंजाब के कुछ हिस्सों पर गजनवी नियंत्रण स्थापित हो गया। इससे उत्तर-पश्चिम भारत में तुर्क शक्ति को स्थायी आधार मिला और बाद के तुर्क आक्रमणों के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल हुईं।

12

मृत्यु

Death of Mahmud

लगभग तीन दशकों तक शासन करने के बाद महमूद गजनी की मृत्यु 1030 ई. में गजनी में हुई। उसके समय गजनवी साम्राज्य मध्य एशिया, अफगानिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारतीय क्षेत्रों की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति बन चुका था।

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प्रमुख तथ्य — एक नज़र में

Facts at a Glance

तथ्यजानकारी
जन्म971 ई.
पितासुबुक्तगीन
राजगद्दी998 ई.
भारतीय अभियानों की प्रचलित संख्या17
जयपाल की पराजय1001 ई.
सोमनाथ अभियान1025 ई., सौराष्ट्र (गुजरात)
अंतिम भारतीय अभियानजाटों के विरुद्ध, लगभग 1027 ई.
प्रमुख उपाधिसुल्तान
अलबरूनीकिताब-उल-हिन्द
फिरदौसीशाहनामा
मृत्यु1030 ई.
14

Quick Revision

SSC / Railway Rapid Recall

⚡ त्वरित रिविजन

सुबुक्तगीन—पिता998—राजगद्दी17 अभियान1001—जयपाल1025—सोमनाथ1027—जाटअलबरूनी—किताब-उल-हिन्दफिरदौसी—शाहनामा1030—मृत्यु
B

मुहम्मद गोरी

Muhammad of Ghor

15

भारत की ओर पहला अभियान — मुल्तान

First Indian Campaign — 1175 CE

मुहम्मद गोरी ने भारत की ओर अपना पहला महत्वपूर्ण अभियान 1175 ई. में मुल्तान के विरुद्ध किया। उस समय मुल्तान में इस्माइली प्रभाव वाली सत्ता थी। मुल्तान पर अधिकार करने के बाद उसने उत्तर-पश्चिमी भारतीय क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया।

इसके बाद उसने उच्छ की ओर भी अपना प्रभाव बढ़ाया। पंजाब और सिंध के मार्गों पर नियंत्रण उसके आगे के भारतीय अभियानों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।

📗 परीक्षा-सुरक्षित तथ्य

1175 ई. — मुहम्मद गोरी का भारत की ओर पहला प्रमुख अभियान — मुल्तान।

16

गुजरात अभियान और पराजय

Gujarat Campaign — 1178 CE

1178 ई. में मुहम्मद गोरी ने गुजरात की ओर अभियान किया। सामान्य GK में इसे पाटन/अन्हिलवाड़ा पर उसका दूसरा प्रमुख भारतीय अभियान कहा जाता है। गुजरात में उस समय चालुक्य (सोलंकी) वंश के मूलराज द्वितीय का शासन माना जाता है।

मुहम्मद गोरी की सेना को गुजरात की चालुक्य सेना ने कसारहड़ा/कायादरा के युद्ध में पराजित किया। यह उसकी प्रारंभिक भारतीय अभियानों की महत्वपूर्ण पराजयों में से एक थी।

“पाटन के शासक भीम द्वितीय ने 1178 ई. में गोरी को हराया” पुरानी GK पुस्तकों में प्रचलित है, लेकिन chronology के अनुसार 1178 ई. में शासक के रूप में मूलराज द्वितीय का नाम अधिक उपयुक्त है। उसकी माता नायकीदेवी को भी इस प्रतिरोध से जोड़ा जाता है। भीम द्वितीय का शासन इसके तुरंत बाद आरंभ हुआ।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

1178 ई. की गुजरात विजय-प्रतिरोध को सीधे “भीम-II ने गोरी को हराया” लिखना भ्रम पैदा कर सकता है। मानक chronology में मूलराज II तथा नायकीदेवी का संबंध इस विजय से जोड़ा जाता है।

17

पंजाब में ग़ुरी विस्तार

Expansion into Punjab

गुजरात में पराजय के बाद मुहम्मद गोरी ने अपनी रणनीति बदली और पंजाब की ओर से उत्तर भारत में प्रवेश पर ध्यान दिया। उसने क्रमशः पेशावर और सियालकोट जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया।

1186 ई. में उसने लाहौर पर अधिकार करके अंतिम गजनवी शासक खुसरो मलिक को पराजित किया। इसके साथ पंजाब में गजनवी सत्ता समाप्त हुई और ग़ुरी शक्ति को उत्तर भारत में आगे बढ़ने के लिए मजबूत आधार मिला।

18

तराइन का प्रथम युद्ध

First Battle of Tarain — 1191 CE

1191 ई. में मुहम्मद गोरी और अजमेर-दिल्ली क्षेत्र के शक्तिशाली चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय के बीच तराइन का प्रथम युद्ध हुआ। तराइन को वर्तमान हरियाणा के तरावड़ी क्षेत्र से पहचाना जाता है।

इस युद्ध में मुहम्मद गोरी को पराजय का सामना करना पड़ा। वह घायल हुआ और युद्धक्षेत्र से पीछे हटकर अपने राज्य की ओर लौट गया।

🎯 Exam Point

तराइन प्रथम — 1191 ई. — पृथ्वीराज चौहान की विजय।

19

तराइन का द्वितीय युद्ध

Second Battle of Tarain — 1192 CE

प्रथम पराजय के बाद मुहम्मद गोरी ने अपनी सेना को पुनर्गठित किया और अगले वर्ष भारत लौटा। 1192 ई. में पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ।

इस बार मुहम्मद गोरी ने निर्णायक विजय प्राप्त की और पृथ्वीराज चौहान पराजित हुआ। इस विजय ने उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति को बदल दिया और दिल्ली-अजमेर क्षेत्र में ग़ुरी प्रभाव के विस्तार का मार्ग खोल दिया।

तराइन के द्वितीय युद्ध को उत्तर भारत में तुर्क सत्ता की स्थापना की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ माना जाता है।

🎯 High Yield

1191 — पृथ्वीराज की विजय | 1192 — मुहम्मद गोरी की विजय।

20

कुतुबुद्दीन ऐबक की भूमिका

Role of Qutb al-Din Aibak

मुहम्मद गोरी ने भारत में जीते गए क्षेत्रों के प्रशासन और आगे के सैन्य विस्तार की जिम्मेदारी अपने विश्वस्त तुर्क सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंपी। ऐबक ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में ग़ुरी सत्ता को मजबूत किया तथा अनेक आगे के अभियानों का नेतृत्व किया।

मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और उसे दिल्ली सल्तनत के गुलाम/ममलूक वंश का संस्थापक माना जाता है।

21

चंदावर का युद्ध

Battle of Chandawar — 1194 CE

1194 ई. में मुहम्मद गोरी और कन्नौज के गाहड़वाल शासक जयचंद्र (जयचन्द) के बीच चंदावर का युद्ध हुआ। चंदावर को सामान्यतः आधुनिक उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद-इटावा क्षेत्र के निकट माना जाता है।

इस युद्ध में मुहम्मद गोरी की विजय हुई और जयचंद्र मारा गया। इस विजय से गंगा-यमुना दोआब में ग़ुरी शक्ति के विस्तार को बड़ी सहायता मिली।

📗 परीक्षा-सुरक्षित तथ्य

चंदावर — 1194 ई. — मुहम्मद गोरी बनाम जयचंद्र — गोरी की विजय।

22

क्या 1193 ई. में दिल्ली गोरी की राजधानी बनी?

Delhi and the Ghurid Administration

“मुहम्मद गोरी ने 1193 ई. में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया” सही तथ्य नहीं है। मुहम्मद गोरी की सत्ता का मूल केंद्र भारत में दिल्ली नहीं था; उसकी प्रमुख सत्ता ग़ुर और गजनी से जुड़ी थी।

तराइन की विजय के बाद दिल्ली ग़ुरी नियंत्रण में आई और कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे भारत में ग़ुरी शासन के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सैन्य केंद्र के रूप में विकसित किया। बाद में दिल्ली सल्तनत के शासकों के समय दिल्ली एक प्रमुख राजधानी बनी।

इसलिए 1193 ई. में मुहम्मद गोरी द्वारा दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने वाला कथन याद नहीं करना चाहिए।

❌ Common Error

मुहम्मद गोरी की राजधानी = दिल्ली नहीं। दिल्ली उसके भारतीय क्षेत्रों का महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र बनी, जहाँ ऐबक की भूमिका प्रमुख थी।

23

गोरी और पृथ्वीराज से जुड़ी परंपराएँ

History and Later Traditions

पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी से संबंधित अनेक लोकप्रिय कथाएँ बाद के साहित्य में मिलती हैं। विशेष रूप से पृथ्वीराज रासो में दोनों से जुड़ी वीरगाथाएँ प्रसिद्ध हुईं।

लेकिन रासो के वर्तमान रूप की रचना और विस्तार बाद की शताब्दियों में हुआ। इसलिए उसमें वर्णित प्रत्येक घटना को समकालीन ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाता। परीक्षा के लिए सबसे सुरक्षित तथ्य हैं—1191 में तराइन प्रथम में पृथ्वीराज की विजय और 1192 में तराइन द्वितीय में गोरी की विजय।

24

मुहम्मद गोरी की मृत्यु

Death — 1206 CE

1206 ई. में मुहम्मद गोरी की हत्या हुई। वह भारत से गजनी की ओर लौटते समय धमयक (धामियक), सिंधु नदी के निकट मारा गया। उसकी हत्या करने वालों की पहचान के विषय में स्रोतों में भिन्न विवरण मिलते हैं; कुछ स्रोत खोखरों और कुछ इस्माइली तत्वों का उल्लेख करते हैं।

मुहम्मद गोरी की कोई जीवित संतान नहीं थी। उसके विशाल क्षेत्रों पर उसके तुर्क दास-सेनापतियों और अन्य उत्तराधिकारियों ने अलग-अलग सत्ता स्थापित की। भारत में कुतुबुद्दीन ऐबक इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण था।

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महमूद गजनी और मुहम्मद गोरी में अंतर

Do Not Confuse

आधारमहमूद गजनीमुहम्मद गोरी
काल11वीं शताब्दी12वीं शताब्दी
भारत की ओर प्रमुख शुरुआतलगभग 1000 ई.1175 ई., मुल्तान
प्रमुख भारतीय प्रतिद्वंद्वीजयपाल, आनंदपाल आदिपृथ्वीराज चौहान, जयचंद्र
प्रसिद्ध अभियान/युद्धसोमनाथ, 1025 ई.तराइन 1191/1192; चंदावर 1194
भारत में प्रभावलूट के अभियान + पंजाब में गजनवी नियंत्रणउत्तर भारत में स्थायी तुर्क सत्ता की राजनीतिक नींव
मृत्यु1030 ई.1206 ई.
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प्रमुख तथ्य — एक नज़र में

Facts at a Glance

वर्षघटनापरिणाम
1175मुल्तान अभियानभारत की ओर पहला प्रमुख अभियान
1178गुजरात अभियानचालुक्यों से पराजय
1186लाहौर विजयपंजाब में गजनवी सत्ता का अंत
1191तराइन प्रथमपृथ्वीराज चौहान की विजय
1192तराइन द्वितीयमुहम्मद गोरी की निर्णायक विजय
1194चंदावरजयचंद्र पर गोरी की विजय
1206मुहम्मद गोरी की हत्याभारत में ऐबक की स्वतंत्र सत्ता का मार्ग
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Quick Revision

SSC / Railway Rapid Recall

⚡ त्वरित रिविजन

1175—मुल्तान1178—गुजरात में पराजय1186—लाहौर1191—तराइन I हार1192—तराइन II जीत1194—चंदावर जीत1206—हत्या

⚡ दोनों शासक — Final Revision

महमूद गजनी — पिता सुबुक्तगीन; 998 ई. में राजगद्दी; भारत पर परंपरागत रूप से 17 अभियान; 1001 ई. में जयपाल की पराजय; 1025 ई. में सोमनाथ अभियान; लगभग 1027 ई. में जाटों के विरुद्ध अंतिम भारतीय अभियान; मृत्यु 1030 ई.

अलबरूनी — किताब-उल-हिन्द तथा फिरदौसी — शाहनामा। फिरदौसी को महमूद के साथ भारत आया हुआ नहीं मानना चाहिए।

मुहम्मद गोरी — 1175 ई. मुल्तान; 1178 ई. गुजरात में पराजय; 1186 ई. लाहौर; 1191 ई. तराइन प्रथम में पराजय; 1192 ई. तराइन द्वितीय में विजय; 1194 ई. चंदावर में जयचंद्र पर विजय; हत्या 1206 ई.

1193 ई. में दिल्ली को मुहम्मद गोरी की राजधानी बनाया गया—यह सही तथ्य नहीं है। दिल्ली उसके भारतीय क्षेत्रों का महत्वपूर्ण ग़ुरी केंद्र बनी और कुतुबुद्दीन ऐबक ने वहाँ सत्ता मजबूत की।

मुख्य अंतर याद रखें — महमूद गजनी के अभियान मुख्यतः आक्रमण, धन-संपदा और गजनवी शक्ति से जुड़े थे; मुहम्मद गोरी की विजयों ने उत्तर भारत में स्थायी तुर्क शासन और आगे दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार की।

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