भारत में समाचार-पत्रों का विकास
भारत में समाचार-पत्रों का प्रारंभ
भारत में प्रकाशित होने वाला पहला मुद्रित समाचार-पत्र बंगाल गजट था। इसका प्रकाशन जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 ई. में कलकत्ता से प्रारंभ किया। इसे हिक्की का बंगाल गजट अथवा कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर भी कहा जाता था।
यह अंग्रेजी भाषा का समाचार-पत्र था और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों तथा तत्कालीन प्रशासन की आलोचना के लिए प्रसिद्ध हुआ।
परीक्षा के लिए
भारत का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र — हिक्की का बंगाल गजट, 1780 ई.
संस्थापक/संपादक — जेम्स ऑगस्टस हिक्की
राजा राममोहन राय और पत्रकारिता
राजा राममोहन राय ने भारतीय पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कारण उन्हें भारतीय पत्रकारिता के प्रमुख अग्रदूतों में गिना जाता है।
उन्होंने बंगाली भाषा में संवाद कौमुदी तथा फारसी भाषा में मिरात-उल-अखबार का प्रकाशन किया।
मिरात-उल-अखबार का प्रकाशन 1822 ई. में प्रारंभ हुआ। यह भारत के प्रारंभिक महत्वपूर्ण फारसी समाचार-पत्रों में से एक था।
1823 ई. के प्रेस प्रतिबंधों का राजा राममोहन राय ने विरोध किया। प्रेस की स्वतंत्रता के समर्थन में उनका संघर्ष भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
समाचार चंद्रिका का प्रकाशन भवानीचरण बंद्योपाध्याय ने किया था। इसलिए इसे राजा राममोहन राय द्वारा प्रकाशित समाचार-पत्र नहीं लिखना चाहिए। यह रूढ़िवादी हिंदू विचारों का प्रतिनिधित्व करता था और कई सामाजिक सुधारों के प्रश्न पर राजा राममोहन राय का विरोध करता था।
भारतीय भाषाओं के प्रारंभिक समाचार-पत्र
दिग्दर्शन 1818 ई. में सेरामपुर मिशन से प्रकाशित एक बंगाली मासिक पत्रिका थी। इसी काल में समाचार दर्पण का प्रकाशन भी सेरामपुर मिशन द्वारा प्रारंभ किया गया, जिसे बंगाली भाषा के आरंभिक समाचार-पत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
जाम-ए-जहाँनुमा का प्रकाशन 1822 ई. में कलकत्ता से प्रारंभ हुआ। इसे भारत के प्रारंभिक उर्दू समाचार-पत्रों में गिना जाता है।
मुंबई समाचार का प्रकाशन 1822 ई. में फरदूनजी मरजबान ने प्रारंभ किया। यह गुजराती पत्रकारिता के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण समाचार-पत्र है।
हिंदी का पहला समाचार-पत्र उदन्त मार्तण्ड था। इसका प्रकाशन 30 मई 1826 को जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से प्रारंभ किया था।
अतः उदन्त मार्तण्ड को कानपुर से प्रकाशित लिखना सही नहीं है। जुगल किशोर शुक्ल मूलतः कानपुर क्षेत्र से संबंधित थे, लेकिन समाचार-पत्र का प्रकाशन कलकत्ता से हुआ था।
अति महत्वपूर्ण
प्रथम हिंदी समाचार-पत्र — उदन्त मार्तण्ड
संपादक — जुगल किशोर शुक्ल
प्रकाशन — 30 मई 1826, कलकत्ता
राष्ट्रीय आंदोलन और प्रमुख समाचार-पत्र
राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में समाचार-पत्रों ने राजनीतिक चेतना फैलाने, ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने तथा राष्ट्रवादी विचारों को जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कृष्णदास पाल का संबंध प्रसिद्ध समाचार-पत्र हिंदू पैट्रियट से था। वे इसके प्रमुख संपादकों में रहे और भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। प्रतियोगी परीक्षा साहित्य में उन्हें “भारतीय पत्रकारिता का राजकुमार” भी कहा जाता है।
बाल गंगाधर तिलक ने 1881 ई. में केसरी और मराठा समाचार-पत्र प्रारंभ किए। केसरी मराठी भाषा में तथा मराठा अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होता था।
इन समाचार-पत्रों के माध्यम से तिलक ने राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया और ब्रिटिश शासन की नीतियों की तीखी आलोचना की।
मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में सक्रिय थे। उनसे संबंधित उपनाम एवं साहित्यिक दावों को प्रतियोगी परीक्षा में स्रोत के अनुसार देखना चाहिए; “मरकंद” नाम से कविता लिखने का दावा मानक इतिहास स्रोतों में सर्वमान्य तथ्य नहीं माना जाता।
प्रेस पर ब्रिटिश प्रतिबंध
ब्रिटिश शासन ने समय-समय पर भारतीय समाचार-पत्रों को नियंत्रित करने के लिए अनेक कानून बनाए। जैसे-जैसे भारतीय प्रेस राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय हुआ, ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर निगरानी और प्रतिबंध बढ़ाए।
लॉर्ड वेलेजली ने 1799 ई. में प्रेस पर नियंत्रण संबंधी नियम लागू किए। इसका प्रमुख उद्देश्य युद्धकालीन परिस्थितियों में समाचार-पत्रों और प्रकाशनों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना था।
प्रकाशकों के लिए मुद्रक, संपादक तथा स्वामी से संबंधित विवरण देना आवश्यक किया गया और प्रकाशन से पहले सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था की गई।
लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1818 ई. में पूर्व-सेंसरशिप संबंधी कठोर व्यवस्था को समाप्त कर अपेक्षाकृत उदार प्रेस नीति अपनाई। इसलिए इसे 1858 ई. में समाप्त किया गया लिखना सही नहीं है।
कार्यवाहक गवर्नर जनरल जॉन एडम के समय 1823 ई. में लाइसेंसिंग रेगुलेशन लागू किया गया।
इसके अनुसार मुद्रक और प्रकाशक के लिए प्रेस स्थापित करने तथा समाचार-पत्र प्रकाशित करने से पहले सरकार से लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक था।
राजा राममोहन राय ने इन प्रतिबंधों का विरोध किया और विरोधस्वरूप अपने फारसी समाचार-पत्र मिरात-उल-अखबार का प्रकाशन बंद कर दिया।
चार्ल्स मेटकॉफ ने 1835 ई. में प्रेस पर लगे कई प्रतिबंधों को हटाते हुए उदार प्रेस कानून लागू किया।
इस उदार नीति के कारण चार्ल्स मेटकॉफ को “भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता” कहा जाता है।
वायसराय लॉर्ड लिटन के शासनकाल में 1878 ई. में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू किया गया।
इसका उद्देश्य मुख्यतः भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों की ब्रिटिश-विरोधी आलोचना को नियंत्रित करना था। अंग्रेजी भाषा के समाचार-पत्र इसके दायरे से बाहर थे।
इसके अंतर्गत मजिस्ट्रेट को भारतीय भाषा के समाचार-पत्रों से जमानत माँगने और नियमों का उल्लंघन होने पर उसे जब्त करने जैसी शक्तियाँ प्राप्त थीं।
इसकी दमनकारी प्रकृति के कारण इसे “गैगिंग एक्ट” भी कहा जाता है।
लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को समाप्त कर दिया।
क्रांतिकारी गतिविधियों के बढ़ते प्रभाव के बीच समाचार-पत्र अधिनियम 1908 लागू किया गया।
इसके तहत हिंसा अथवा हत्या के लिए उकसाने वाली सामग्री प्रकाशित करने वाले समाचार-पत्रों के विरुद्ध कार्रवाई तथा प्रेस की संपत्ति जब्त करने की शक्ति सरकार को दी गई।
भारतीय प्रेस अधिनियम 1910 ने सरकार को समाचार-पत्रों और प्रेस से जमानत माँगने तथा आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित होने पर जमानत जब्त करने की व्यापक शक्ति प्रदान की।
इस कानून का राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन और बढ़ती राष्ट्रवादी गतिविधियों के बीच प्रेस को नियंत्रित करने के लिए भारतीय प्रेस (आपातकालीन शक्तियाँ) अधिनियम लागू किया गया।
इसने सरकार को राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी सामग्री के प्रकाशन के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने की शक्तियाँ प्रदान कीं और इसमें 1910 के प्रेस कानून जैसी कई नियंत्रणकारी व्यवस्थाओं को पुनः प्रभावी बनाया गया।
क्रम याद रखें
1799 वेलेजली → 1823 जॉन एडम → 1835 मेटकॉफ → 1878 लिटन → 1908 समाचार-पत्र अधिनियम → 1910 भारतीय प्रेस अधिनियम → 1931 आपातकालीन प्रेस कानून।
राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी प्रमुख उपाधियाँ
| उपाधि / संबोधन | संबंधित व्यक्ति | प्रचलित संबंध |
|---|---|---|
| महात्मा | महात्मा गांधी | रवीन्द्रनाथ टैगोर से संबद्ध प्रचलित उल्लेख |
| अर्धनंगा फकीर | महात्मा गांधी | विंस्टन चर्चिल |
| एक व्यक्ति की सीमा सेना | महात्मा गांधी | माउंटबेटन से संबद्ध प्रसिद्ध कथन |
| राष्ट्रपिता | महात्मा गांधी | सुभाष चंद्र बोस द्वारा संबोधन का प्रसिद्ध उदाहरण |
| नेताजी | सुभाष चंद्र बोस | यह उपाधि पहले से प्रचलन में थी; इसे केवल एडोल्फ हिटलर द्वारा दिया गया कहना ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित नहीं है |
| गुरुदेव | रवीन्द्रनाथ टैगोर | महात्मा गांधी से संबद्ध प्रसिद्ध संबोधन |
| सरदार | वल्लभभाई पटेल | बारडोली सत्याग्रह के बाद लोकप्रिय संबोधन |
| कायदे-आजम | मुहम्मद अली जिन्ना | जिन्ना के लिए प्रचलित उपाधि; इसे गांधी द्वारा दी गई उपाधि मानना निश्चित नहीं है |
| देशनायक | सुभाष चंद्र बोस | रवीन्द्रनाथ टैगोर से संबद्ध |
| देशरत्न | डॉ. राजेंद्र प्रसाद | उनके लिए प्रचलित सम्मानसूचक संबोधन |
विशेष ध्यान
ऐतिहासिक व्यक्तियों की कई प्रसिद्ध उपाधियों के “दाता” को लेकर सामान्य ज्ञान पुस्तकों में अलग-अलग दावे मिलते हैं। इसलिए जहाँ दाता ऐतिहासिक रूप से निश्चित नहीं है, वहाँ केवल परीक्षा में प्रचलित दावे को पूर्ण ऐतिहासिक तथ्य की तरह याद करना उचित नहीं है।
ब्रिटिश शासन की भू-राजस्व नीतियाँ
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से अधिकतम भू-राजस्व प्राप्त करने के उद्देश्य से अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग भू-राजस्व व्यवस्थाएँ लागू की गईं। इनमें स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी व्यवस्था और महालवाड़ी व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण थीं।
स्थायी बंदोबस्त को 1793 ई. में गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस ने लागू किया। इसके निर्माण में जॉन शोर की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
यह मुख्यतः बंगाल, बिहार और उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों में लागू किया गया।
इस व्यवस्था में जमींदारों को भूमि-राजस्व एकत्र करने की महत्वपूर्ण भूमिका दी गई और सरकार द्वारा उनसे लिया जाने वाला भू-राजस्व स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया।
इस व्यवस्था ने जमींदारों के अधिकारों को मजबूत किया, जबकि वास्तविक कृषकों की स्थिति कई क्षेत्रों में कमजोर हुई। इसलिए “किसानों के सभी भूमि संबंधी अधिकार समाप्त कर दिए गए” लिखने के बजाय जमींदारों को भू-राजस्व व्यवस्था में प्रमुख स्वामित्व-सदृश अधिकार मिलने की बात अधिक सटीक है।
याद रखें
स्थायी बंदोबस्त → 1793 → लॉर्ड कॉर्नवालिस → जमींदार से समझौता।
रैयतवाड़ी व्यवस्था के विकास का संबंध मुख्यतः कैप्टन अलेक्जेंडर रीड और थॉमस मुनरो से था।
यह व्यवस्था मुख्य रूप से मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी के क्षेत्रों में लागू की गई।
इस व्यवस्था में सरकार का भू-राजस्व संबंध सीधे रैयत अर्थात किसान से स्थापित किया गया। किसान को भूमि का कब्जेदार/स्वामी माना गया, बशर्ते वह निर्धारित भू-राजस्व का भुगतान करता रहे।
इसमें स्थायी बंदोबस्त की तरह जमींदार को सरकार और किसान के बीच मुख्य मध्यस्थ नहीं बनाया गया था।
याद रखें
रैयतवाड़ी → थॉमस मुनरो एवं अलेक्जेंडर रीड → किसान से सीधा समझौता → मद्रास एवं बंबई।
महालवाड़ी व्यवस्था की प्रारंभिक रूपरेखा होल्ट मैकेंजी ने 1822 ई. में प्रस्तुत की। आगे चलकर रॉबर्ट मार्टिन्स बर्ड ने इसमें महत्वपूर्ण सुधार किए।
इस व्यवस्था में भू-राजस्व निर्धारण की इकाई व्यक्तिगत किसान के बजाय महाल अर्थात गाँव अथवा गाँवों का समूह था।
गाँव या महाल के भू-स्वामियों की सामूहिक जिम्मेदारी के आधार पर राजस्व निर्धारित किया जाता था।
यह व्यवस्था मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी प्रांत, मध्य भारत के कुछ क्षेत्र और पंजाब आदि में लागू हुई।
महालवाड़ी व्यवस्था को दक्कन की प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्था कहना उचित नहीं है; दक्कन और दक्षिण भारत के बड़े हिस्सों में रैयतवाड़ी व्यवस्था अधिक महत्वपूर्ण थी।
याद रखें
महालवाड़ी → होल्ट मैकेंजी → गाँव/महाल से राजस्व समझौता → उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में प्रमुख।
तीनों भू-राजस्व व्यवस्थाओं में अंतर
| व्यवस्था | प्रमुख व्यक्ति | राजस्व समझौता | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| स्थायी बंदोबस्त | लॉर्ड कॉर्नवालिस | जमींदार से | बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के क्षेत्र |
| रैयतवाड़ी | थॉमस मुनरो एवं अलेक्जेंडर रीड | किसान से सीधे | मद्रास एवं बंबई |
| महालवाड़ी | होल्ट मैकेंजी | गाँव या महाल से | उत्तर-पश्चिमी प्रांत एवं पंजाब आदि |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
1780 — जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट प्रकाशित किया।
राजा राममोहन राय — संवाद कौमुदी और मिरात-उल-अखबार से संबंधित।
1822 — जाम-ए-जहाँनुमा तथा मुंबई समाचार का प्रकाशन प्रारंभ।
1826 — जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से उदन्त मार्तण्ड प्रकाशित किया।
1835 — चार्ल्स मेटकॉफ की उदार प्रेस नीति; उन्हें भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता कहा जाता है।
1878 — लॉर्ड लिटन का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट।
1882 — लॉर्ड रिपन ने वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट समाप्त किया।
1881 — तिलक ने मराठी में केसरी और अंग्रेजी में मराठा का प्रकाशन प्रारंभ किया।
1908 — समाचार-पत्र अधिनियम।
1910 — भारतीय प्रेस अधिनियम।
1931 — भारतीय प्रेस आपातकालीन शक्तियाँ अधिनियम।
स्थायी बंदोबस्त — जमींदार से समझौता।
रैयतवाड़ी — किसान से सीधा समझौता।
महालवाड़ी — गाँव अथवा महाल से समझौता।