भूकम्प
उत्पत्ति, भूकंपीय तरंगें, मापन, विश्व वितरण और सुनामी
भूकम्प क्या है?
भूकम्प पृथ्वी की सतह या भूपटल में उत्पन्न होने वाला अचानक कंपन है। यह कंपन पृथ्वी के भीतर संचित ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से उत्पन्न भूकंपीय तरंगों के कारण होता है।
अधिकांश भूकम्प पृथ्वी की विवर्तनिक प्लेटों की गति, चट्टानों के टूटने तथा भ्रंशों के सहारे अचानक होने वाले विस्थापन से उत्पन्न होते हैं। कुछ भूकम्प ज्वालामुखीय गतिविधि, भूस्खलन, भू-संतुलन में परिवर्तन तथा मानव गतिविधियों के कारण भी हो सकते हैं।
भूकम्प की उत्पत्ति
Origin of Earthquake
पृथ्वी की चट्टानों पर लगातार दबाव और तनाव कार्य करता रहता है। चट्टानों में एक सीमा तक लचीलापन होता है, इसलिए वे कुछ समय तक इस तनाव को सहन करती रहती हैं।
जब चट्टानों पर कार्य करने वाला तनाव उनकी सहन-क्षमता से अधिक हो जाता है, तो वे अचानक टूट जाती हैं या भ्रंश के सहारे खिसक जाती हैं। इस समय संचित ऊर्जा अचानक मुक्त होती है और भूकंपीय तरंगों के रूप में चारों ओर फैलती है।
इस प्रकार भूकम्प को भूपटल के अचानक कंपन के रूप में समझा जाता है, जो मुख्यतः चट्टानों में संचित प्रत्यास्थ ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से उत्पन्न होता है।
📗 महत्वपूर्ण तथ्य
अधिकांश बड़े भूकम्पों का मुख्य संबंध प्लेट विवर्तनिकी तथा भ्रंशों के सहारे चट्टानों के अचानक विस्थापन से होता है।
भूकम्प की प्रमुख शब्दावली
Important Terms
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भूकम्प मूल | पृथ्वी के भीतर वह स्थान जहाँ चट्टानों के टूटने या खिसकने के कारण सबसे पहले भूकम्पीय ऊर्जा मुक्त होती है। इसे उद्गम केन्द्र भी कहा जाता है। |
| अधिकेन्द्र | पृथ्वी की सतह पर वह स्थान जो भूकम्प मूल के ठीक ऊपर स्थित होता है। सामान्यतः इसके आसपास भूकम्प का प्रभाव अधिक दिखाई दे सकता है। |
| समभूकम्पीय रेखा | मानचित्र पर समान भूकम्पीय तीव्रता या समान प्रभाव वाले स्थानों को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा। |
| भूकम्पमापी | भूकंपीय तरंगों का पता लगाने और उन्हें दर्ज करने वाला यंत्र। |
| भूकम्प विज्ञान | भूकम्प, भूकंपीय तरंगों तथा पृथ्वी के भीतर उनके प्रसार का वैज्ञानिक अध्ययन। |
🎯 परीक्षा बिंदु
भूकम्प मूल पृथ्वी के अंदर होता है, जबकि अधिकेन्द्र पृथ्वी की सतह पर उसके ठीक ऊपर स्थित होता है।
भूकम्प के कारण
Causes of Earthquake
भूकम्प के कारणों को व्यापक रूप से प्राकृतिक तथा मानव-जनित कारणों में बाँटा जा सकता है।
ज्वालामुखीय क्रिया: ज्वालामुखी के भीतर मैग्मा तथा गैसों की गति से आसपास की चट्टानों में दबाव उत्पन्न हो सकता है, जिससे स्थानीय भूकम्प पैदा होते हैं।
भूपटल भ्रंश: पृथ्वी की चट्टानों में वलन, तनाव तथा भ्रंशन के कारण अचानक विस्थापन होने से भूकम्प उत्पन्न हो सकता है। बड़े विवर्तनिक भूकम्पों का यह प्रमुख कारण है।
आंतरिक गैसों का फैलाव: पृथ्वी के भीतर गैसों तथा मैग्मा से संबंधित दबाव में परिवर्तन स्थानीय कंपन उत्पन्न कर सकता है, विशेषकर ज्वालामुखीय क्षेत्रों में।
भू-संतुलन में अव्यवस्था: अपरदन, निक्षेपण, हिम के भार में परिवर्तन अथवा अन्य कारणों से भू-संतुलन में बदलाव आने पर चट्टानों में तनाव उत्पन्न हो सकता है।
भूपटल में सिकुड़न: पुराने भौगोलिक सिद्धांतों में पृथ्वी के ठंडा होने और सिकुड़ने को भूकम्प का प्रमुख कारण माना गया था। आधुनिक विज्ञान में बड़े भूकम्पों की मुख्य व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी से की जाती है।
प्लेट विवर्तनिकी: पृथ्वी की स्थलमंडलीय प्लेटें लगातार गति करती रहती हैं। प्लेटों के आपस में टकराने, अलग होने या एक-दूसरे के समानांतर खिसकने से चट्टानों में तनाव जमा होता है और अचानक मुक्त होकर भूकम्प उत्पन्न करता है।
मानव-जनित कारक: बड़े बाँधों में जलाशय का भार, खनन, भूमिगत विस्फोट, तेल एवं गैस निष्कर्षण तथा कुछ क्षेत्रों में द्रव को भूमिगत चट्टानों में प्रविष्ट कराने जैसी गतिविधियाँ प्रेरित भूकम्पीयता उत्पन्न कर सकती हैं।
भूकंपीय तरंगें
Seismic Waves
भूकम्प के दौरान पृथ्वी के भीतर मुक्त हुई ऊर्जा तरंगों के रूप में विभिन्न दिशाओं में फैलती है। इन्हें भूकंपीय तरंगें कहा जाता है।
भूकंपीय तरंगों को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है—आंतरिक तरंगें और सतही तरंगें।
आंतरिक भूकंपीय तरंगें
Body Waves
आंतरिक भूकंपीय तरंगें पृथ्वी के अंदर से होकर यात्रा करती हैं। ये मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं—प्राथमिक तरंगें और द्वितीयक तरंगें।
प्राथमिक तरंगें
P-Waves
प्राथमिक तरंगें सभी भूकंपीय तरंगों में सबसे तेज गति से चलने वाली आंतरिक तरंगें हैं। इसी कारण भूकम्पमापी पर ये सबसे पहले दर्ज होती हैं।
ये ठोस, तरल और गैस तीनों प्रकार के माध्यमों से गुजर सकती हैं।
इन तरंगों में माध्यम के कणों का दोलन तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर होता है।
इस कारण इन्हें अनुदैर्ध्य अथवा संपीडन तरंगें भी कहा जाता है।
द्वितीयक तरंगें
S-Waves
द्वितीयक तरंगें प्राथमिक तरंगों की तुलना में धीमी गति से चलती हैं और भूकम्पमापी पर प्राथमिक तरंगों के बाद दर्ज होती हैं।
ये केवल ठोस माध्यम से गुजर सकती हैं। तरल तथा गैसीय माध्यम से इनका संचरण नहीं होता।
इनमें कणों का दोलन तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत होता है।
इन्हें अनुप्रस्थ अथवा कतरनी तरंगें भी कहा जाता है।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
द्वितीयक तरंगों का पृथ्वी के बाह्य क्रोड से न गुजर पाना इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण है कि बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है।
प्राथमिक और द्वितीयक तरंगों में अंतर
P-Waves and S-Waves
| आधार | प्राथमिक तरंग | द्वितीयक तरंग |
|---|---|---|
| गति | सबसे तेज | प्राथमिक तरंग से धीमी |
| माध्यम | ठोस, तरल और गैस | केवल ठोस |
| कणों की गति | तरंग की दिशा के समानांतर | तरंग की दिशा के लंबवत |
| प्रकृति | अनुदैर्ध्य | अनुप्रस्थ |
| भूकम्पमापी पर आगमन | सबसे पहले | प्राथमिक तरंग के बाद |
सतही भूकंपीय तरंगें
Surface Waves
सतही भूकंपीय तरंगें पृथ्वी की सतह तथा उसके निकट के भागों में फैलती हैं।
ये सामान्यतः आंतरिक तरंगों की तुलना में धीमी होती हैं, लेकिन इनका आयाम बड़ा हो सकता है और यही कारण है कि भूकम्प के दौरान भवनों तथा अन्य संरचनाओं को भारी क्षति पहुँचाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
सतही तरंगों के दो प्रमुख प्रकार हैं—लव तरंगें और रेले तरंगें।
लव तरंगें
Love Waves
लव तरंगें पृथ्वी की सतह के समानांतर क्षैतिज दिशा में कणों को दाएँ-बाएँ गति कराती हैं।
इनमें मुख्य गति क्षैतिज होती है और ऊर्ध्वाधर विस्थापन बहुत कम या नहीं होता।
ये ठोस सतही परतों में संचरित होती हैं।
इनका वेग सामान्यतः द्वितीयक तरंगों से कम, लेकिन रेले तरंगों से अधिक हो सकता है।
क्षैतिज झटकों के कारण ये भवनों तथा आधारभूत संरचनाओं को गंभीर क्षति पहुँचा सकती हैं।
रेले तरंगें
Rayleigh Waves
रेले तरंगों में पृथ्वी की सतह के कण दीर्घवृत्तीय गति करते हैं।
इनकी गति समुद्री या जल तरंगों जैसी दिखाई देती है और इनमें क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर दोनों प्रकार की गति का प्रभाव पाया जाता है।
ये सामान्यतः प्रमुख भूकंपीय तरंगों में सबसे धीमी मानी जाती हैं।
इनसे पृथ्वी की सतह में ऊपर-नीचे तथा आगे-पीछे जैसी लहरदार गति उत्पन्न हो सकती है, जिससे संरचनाओं को भारी क्षति पहुँच सकती है।
भूकम्प का मापन
Measurement of Earthquake
भूकम्प को समझने के लिए दो अलग अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हैं—परिमाण और तीव्रता।
परिमाण भूकम्प के स्रोत से मुक्त हुई ऊर्जा और दर्ज भूकंपीय तरंगों से संबंधित होता है, जबकि तीव्रता किसी विशेष स्थान पर अनुभव किए गए कंपन और उससे हुई क्षति के प्रभाव को व्यक्त करती है।
रिक्टर पैमाना
Richter Scale
रिक्टर पैमाना भूकम्प के परिमाण को व्यक्त करने के लिए विकसित किया गया था। इसे 1935 में अमेरिकी भूकम्प विज्ञानी चार्ल्स एफ. रिक्टर ने विकसित किया।
यह एक लघुगणकीय पैमाना है। परिमाण में एक इकाई की वृद्धि होने पर भूकंपीय तरंगों का दर्ज आयाम लगभग 10 गुना बढ़ जाता है।
इसी एक इकाई की वृद्धि के साथ मुक्त ऊर्जा लगभग 31.6 गुना बढ़ जाती है।
इसलिए रिक्टर पैमाने पर 7 परिमाण का भूकम्प केवल 6 परिमाण से थोड़ा अधिक नहीं, बल्कि ऊर्जा की दृष्टि से बहुत अधिक शक्तिशाली होता है।
आज बड़े भूकम्पों के परिमाण के निर्धारण में आधुनिक आघूर्ण परिमाण पैमाने का व्यापक उपयोग किया जाता है।
🎯 याद रखें
परिमाण में 1 अंक वृद्धि = तरंग आयाम लगभग 10 गुना + ऊर्जा लगभग 31.6 गुना।
मरकेली पैमाना
Mercalli Scale
मरकेली पैमाना भूकम्प की तीव्रता अर्थात किसी विशेष स्थान पर महसूस किए गए प्रभाव तथा क्षति का आकलन करता है।
इसके आधुनिक रूप को संशोधित मरकेली तीव्रता पैमाना कहा जाता है।
इसमें तीव्रता को सामान्यतः I से XII तक रोमन अंकों में व्यक्त किया जाता है।
कम स्तर पर कंपन केवल कुछ लोगों द्वारा महसूस किया जा सकता है, जबकि उच्च स्तर पर भवनों तथा अन्य संरचनाओं को गंभीर क्षति हो सकती है।
मरकेली आधारित तीव्रता मापन आज भी भूकम्प से हुए स्थानीय प्रभावों को समझने और ऐतिहासिक भूकम्पों के अध्ययन में उपयोगी है।
परिमाण और तीव्रता में अंतर
Magnitude and Intensity
| आधार | परिमाण | तीव्रता |
|---|---|---|
| अर्थ | भूकम्प के आकार तथा मुक्त ऊर्जा से संबंधित | किसी स्थान पर महसूस किए गए प्रभाव और क्षति से संबंधित |
| स्थान के अनुसार परिवर्तन | एक भूकम्प के लिए मूल परिमाण एक निर्धारित मान के रूप में व्यक्त किया जाता है | अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकती है |
| प्रमुख पैमाना | रिक्टर अथवा आधुनिक आघूर्ण परिमाण | संशोधित मरकेली |
विश्व में भूकम्प का वितरण
Global Distribution
विश्व में भूकम्पों का वितरण समान नहीं है। अधिकांश भूकम्प विवर्तनिक प्लेटों की सीमाओं के आसपास केंद्रित पाए जाते हैं।
परंपरागत भौगोलिक अध्ययन में विश्व के भूकम्पीय क्षेत्रों को मुख्यतः तीन प्रमुख पेटियों में बाँटा जाता है—प्रशांत महासागरीय पेटी, मध्य-महाद्वीपीय पेटी तथा मध्य-अटलांटिक पेटी।
प्रशांत महासागरीय तटीय पेटी
Pacific Circum-Pacific Belt
प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित विस्तृत भूकम्पीय एवं ज्वालामुखीय क्षेत्र को सामान्यतः प्रशांत अग्नि वलय कहा जाता है।
विश्व के बहुत बड़े भाग के सक्रिय भूकम्प इसी क्षेत्र में आते हैं। पारंपरिक भूगोल पुस्तकों में लगभग दो-तिहाई भूकम्प इस पेटी से संबंधित बताए जाते हैं।
इस क्षेत्र में अनेक स्थानों पर अभिसारी प्लेट सीमाएँ तथा उपसरण क्षेत्र पाए जाते हैं, इसलिए यहाँ शक्तिशाली भूकम्प और ज्वालामुखीय गतिविधियाँ सामान्य हैं।
यह पेटी अलास्का और उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी भाग से होते हुए दक्षिण अमेरिका के चिली तक तथा दूसरी ओर क्यूराइल द्वीप, जापान, मेरियाना क्षेत्र, फिलीपींस, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड तक विस्तृत है।
कैलिफोर्निया भी प्रशांत प्लेट से संबंधित सक्रिय विवर्तनिक क्षेत्र में स्थित है, हालांकि वहाँ का प्रमुख सैन एंड्रियास भ्रंश एक रूपांतरित प्लेट सीमा का उदाहरण है।
🎯 परीक्षा बिंदु
प्रशांत अग्नि वलय विश्व का सबसे प्रमुख भूकम्पीय तथा ज्वालामुखीय क्षेत्र है।
मध्य-महाद्वीपीय भूकम्प पेटी
Alpine-Himalayan Belt
मध्य-महाद्वीपीय भूकम्प पेटी को प्रायः आल्पाइन-हिमालयी भूकम्पीय पेटी भी कहा जाता है।
परंपरागत भूगोल पुस्तकों में विश्व के लगभग 21 प्रतिशत भूकम्पों को इस पेटी से संबंधित बताया गया है।
यह क्षेत्र भूमध्यसागर के आसपास से प्रारंभ होकर पिरेनीज, आल्प्स, काकेशस, पश्चिम एशिया और हिमालय से होते हुए दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला है।
म्यांमार की पहाड़ियाँ तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई द्वीपीय क्षेत्र भी व्यापक रूप से सक्रिय प्लेट सीमा प्रणाली से जुड़े हैं।
भारत का हिमालयी तथा उत्तर-पूर्वी भाग इसी सक्रिय विवर्तनिक व्यवस्था से प्रभावित होता है।
मध्य-अटलांटिक भूकम्प पेटी
Mid-Atlantic Belt
मध्य-अटलांटिक भूकम्पीय पेटी मुख्यतः मध्य-अटलांटिक महासागरीय कटक के साथ फैली हुई है।
यह क्षेत्र एक अपसारी प्लेट सीमा है, जहाँ विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे से दूर होती हैं और नया महासागरीय भूपटल बनता है।
इस क्षेत्र में भूकम्पों का प्रमुख कारण सागरतल प्रसरण तथा प्लेटों का अलग होना है।
इस भूकम्पीय पट्टी का विस्तार उत्तरी अटलांटिक में स्पिट्सबर्गेन क्षेत्र और आइसलैंड से होकर दक्षिणी अटलांटिक तक मध्य-महासागरीय कटक के सहारे पाया जाता है तथा यह बोवेट द्वीप के आसपास के क्षेत्र तक विस्तृत होती है।
आइसलैंड इस दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य-अटलांटिक कटक यहाँ समुद्र तल से ऊपर दिखाई देता है।
भारत में भूकम्पीय संवेदनशीलता
Earthquake Risk in India
भारत का हिमालयी क्षेत्र भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के अभिसरण के कारण अत्यधिक सक्रिय भूकम्पीय क्षेत्र है।
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के कुछ भाग, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम तथा उत्तर-पूर्व भारत के कई क्षेत्र उच्च भूकम्पीय जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं।
अंडमान-निकोबार क्षेत्र भी सक्रिय प्लेट सीमा के निकट स्थित होने के कारण भूकम्प तथा सुनामी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
प्रायद्वीपीय भारत अपेक्षाकृत स्थिर माना जाता है, फिर भी यह पूर्णतः भूकम्प-मुक्त नहीं है। कोयना तथा लातूर जैसे भूकम्प इसके उदाहरण हैं।
सुनामी
Tsunami
सुनामी समुद्र या महासागर में बड़ी मात्रा में जल के अचानक विस्थापन से उत्पन्न लंबी तरंगदैर्ध्य वाली शक्तिशाली समुद्री तरंगों की श्रृंखला है।
समुद्रतल के नीचे आने वाले शक्तिशाली भूकम्प सुनामी के सबसे प्रमुख कारण हैं, विशेषकर तब जब भूकम्प के कारण समुद्रतल में अचानक ऊर्ध्वाधर विस्थापन हो।
इसके अतिरिक्त समुद्र के भीतर या तट के निकट ज्वालामुखीय विस्फोट, विशाल भूस्खलन तथा दुर्लभ परिस्थितियों में उल्कापिंडीय प्रभाव भी सुनामी उत्पन्न कर सकते हैं।
इसलिए प्रत्येक समुद्री भूकम्प सुनामी उत्पन्न नहीं करता। इसके लिए जल के बड़े भाग का पर्याप्त विस्थापन होना आवश्यक है।
सुनामी की गति और तरंगदैर्ध्य
Tsunami Characteristics
गहरे महासागर में सुनामी अत्यंत तेज गति से चल सकती है। इसकी गति जल की गहराई पर निर्भर करती है और गहरे समुद्र में यह लगभग 700 से 800 किलोमीटर प्रति घंटा या कुछ परिस्थितियों में इससे भी अधिक के आसपास हो सकती है।
इसलिए सुनामी की गति को केवल 100–150 किलोमीटर प्रति घंटा मानना सही नहीं है।
गहरे महासागर में सुनामी की तरंगदैर्ध्य बहुत अधिक होती है, जबकि तरंग की ऊँचाई अपेक्षाकृत कम होने के कारण खुले समुद्र में जहाजों को इसका प्रभाव बहुत कम महसूस हो सकता है।
जैसे-जैसे सुनामी तट के निकट उथले पानी में पहुँचती है, उसकी गति घटती है और तरंगदैर्ध्य कम होता जाता है।
ऊर्जा के संकुचित होने के कारण तरंग की ऊँचाई बढ़ सकती है और यही प्रक्रिया तटीय क्षेत्रों में अत्यधिक विनाश का कारण बनती है।
🎯 याद रखें
गहरा समुद्र → बहुत तेज गति + लंबी तरंगदैर्ध्य + कम ऊँचाई
तट के निकट → गति कम + तरंगदैर्ध्य कम + तरंग की ऊँचाई बढ़ सकती है
भूकम्पीय तरंगों का गति क्रम
Wave Speed Order
📗 सामान्य क्रम
सामान्य परीक्षा दृष्टि से प्राथमिक तरंग सबसे तेज तथा प्रमुख भूकंपीय तरंगों में रेले तरंग सबसे धीमी मानी जाती है।
भूकम्प से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
High Yield Facts
| तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| भूकम्प की उत्पत्ति का आंतरिक स्थान | भूकम्प मूल |
| भूकम्प मूल के ठीक ऊपर धरातलीय स्थान | अधिकेन्द्र |
| भूकम्प का अध्ययन | भूकम्प विज्ञान |
| भूकंपीय तरंग दर्ज करने वाला यंत्र | भूकम्पमापी |
| सबसे तेज भूकंपीय तरंग | प्राथमिक तरंग |
| केवल ठोस में चलने वाली आंतरिक तरंग | द्वितीयक तरंग |
| क्षैतिज सतही गति वाली तरंग | लव तरंग |
| दीर्घवृत्तीय सतही गति वाली तरंग | रेले तरंग |
| विश्व की प्रमुख भूकम्पीय पेटी | प्रशांत अग्नि वलय |
| मध्य-अटलांटिक भूकम्प का प्रमुख कारण | सागरतल प्रसरण |
त्वरित पुनरावृत्ति
Quick Revision
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
भूकम्प पृथ्वी के भीतर संचित ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से उत्पन्न कंपन है।
भूकम्प की उत्पत्ति का आंतरिक स्थान भूकम्प मूल और उसके ठीक ऊपर धरातलीय स्थान अधिकेन्द्र कहलाता है।
समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा समभूकम्पीय रेखा कहलाती है।
भूकम्प का वैज्ञानिक अध्ययन भूकम्प विज्ञान कहलाता है।
भूकम्प के प्रमुख प्राकृतिक कारणों में प्लेट विवर्तनिकी, भ्रंश, ज्वालामुखीय गतिविधि और भू-संतुलन में परिवर्तन शामिल हैं।
भूकंपीय तरंगें दो प्रमुख वर्गों में बाँटी जाती हैं—आंतरिक तरंगें और सतही तरंगें।
प्राथमिक तरंगें सबसे तेज होती हैं और ठोस, तरल तथा गैस तीनों माध्यमों से गुजरती हैं।
द्वितीयक तरंगें केवल ठोस माध्यम से गुजरती हैं।
लव तरंग क्षैतिज गति तथा रेले तरंग दीर्घवृत्तीय सतही गति उत्पन्न करती है।
भूकम्प के परिमाण में एक इकाई की वृद्धि पर दर्ज तरंग आयाम लगभग 10 गुना तथा मुक्त ऊर्जा लगभग 31.6 गुना बढ़ती है।
संशोधित मरकेली पैमाना भूकम्प से किसी स्थान पर महसूस किए गए प्रभाव और क्षति की तीव्रता व्यक्त करता है।
विश्व की सबसे प्रमुख भूकम्पीय पेटी प्रशांत अग्नि वलय है।
मध्य-महाद्वीपीय पेटी में आल्प्स, काकेशस और हिमालय जैसे सक्रिय पर्वतीय क्षेत्र शामिल हैं।
मध्य-अटलांटिक क्षेत्र में भूकम्पों का प्रमुख संबंध सागरतल प्रसरण से है।
सुनामी समुद्री जल के बड़े भाग के अचानक विस्थापन से बनने वाली दीर्घ तरंगदैर्ध्य वाली शक्तिशाली तरंगों की श्रृंखला है।
गहरे समुद्र में सुनामी लगभग 700–800 किलोमीटर प्रति घंटा की गति तक चल सकती है, जबकि तट के निकट इसकी गति कम और तरंग की ऊँचाई अधिक हो सकती है।