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मगध राज्य का उत्कर्ष
प्राचीन भारतीय इतिहास

मगध राज्य का उत्कर्ष

बृहद्रथ परंपरा से नंद वंश और मौर्य साम्राज्य के उदय तक

मगध का शक्तिशाली राज्य के रूप में उदय

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मगध, कोशल, वत्स और अवन्ति उत्तर भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ थीं। इनकी आपसी प्रतिस्पर्धा में अंततः मगध सबसे शक्तिशाली राज्य बनकर उभरा।

मगध के उत्कर्ष में उसकी उपजाऊ भूमि, लौह-अयस्क, हाथियों की उपलब्धता, नदी-मार्ग, सुरक्षित राजधानियाँ और योग्य शासकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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मगध की प्रारंभिक परंपरा

बृहद्रथ और जरासंध

पुराणों और महाभारत की परंपरा में बृहद्रथ को मगध के प्राचीन शासक-वंश का संस्थापक माना गया है।

महाभारत की परंपरा में जरासंध बृहद्रथ का पुत्र और मगध का शक्तिशाली राजा बताया गया है।

बृहद्रथ और जरासंध से संबंधित विवरण मुख्यतः महाकाव्य और पुराणिक परंपरा से प्राप्त होते हैं। मगध का स्पष्ट ऐतिहासिक राजनीतिक क्रम हर्यक वंश के शासक बिम्बिसार से अधिक स्पष्ट होता है।

मगध की प्राचीन राजधानी गिरिव्रज या राजगृह थी। यह पाँच पहाड़ियों से घिरी होने के कारण प्राकृतिक रूप से सुरक्षित थी।

02

हर्यक वंश

मगध साम्राज्य के विस्तार की शुरुआत

मगध के प्रारंभिक ऐतिहासिक राजवंशों में हर्यक वंश अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इस वंश का प्रथम प्रमुख ऐतिहासिक शासक बिम्बिसार था। सामान्य परीक्षा-पुस्तकों में उसे हर्यक वंश का संस्थापक भी कहा जाता है।

बिम्बिसार ने विजय, वैवाहिक संबंध और शक्तिशाली राज्यों से मैत्री — तीनों नीतियों का प्रयोग करके मगध की शक्ति बढ़ाई।

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बिम्बिसार

लगभग 544–492 ईसा पूर्व

परंपरागत कालक्रम के अनुसार बिम्बिसार ने लगभग 544 से 492 ईसा पूर्व तक, लगभग 52 वर्ष शासन किया।

बिम्बिसार के समय मगध की राजधानी राजगृह थी। राजगृह या गिरिव्रज बिम्बिसार से पहले भी विद्यमान था; बिम्बिसार ने इसे अपनी राजधानी के रूप में विकसित और मजबूत किया।

बिम्बिसार मगध के विस्तार का वास्तविक आधार तैयार करने वाले प्रमुख शासकों में था।

परीक्षा में

बिम्बिसार — हर्यक वंश — राजगृह — लगभग 52 वर्ष शासन।

04

अंग की विजय

ब्रह्मदत्त की पराजय

बिम्बिसार ने अंग के शासक ब्रह्मदत्त को पराजित किया और अंग महाजनपद को मगध में मिला लिया।

अंग की राजधानी चम्पा एक समृद्ध व्यापारिक नगर थी। अंग की विजय से मगध को पूर्वी भारत के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण मिला।

यह विजय मगध के साम्राज्यवादी विस्तार की प्रारंभिक महत्वपूर्ण सफलताओं में थी।

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बिम्बिसार की वैवाहिक नीति

विवाह द्वारा राजनीतिक शक्ति

बिम्बिसार ने वैवाहिक संबंधों का उपयोग राजनीतिक शक्ति और मैत्री बढ़ाने के लिए किया।

उसने कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला से विवाह किया। इस विवाह में काशी का एक राजस्व-संपन्न क्षेत्र दहेज के रूप में मिला।

उसने वैशाली के लिच्छवि प्रमुख चेटक से संबंधित राजकुमारी चेल्लना से विवाह किया। यह विवरण विशेष रूप से जैन परंपरा में मिलता है।

बिम्बिसार की एक अन्य पत्नी क्षेमा मद्र देश की राजकुमारी थी। मद्र का क्षेत्र पंजाब से संबंधित था।

एक साथ याद करें

महाकोशला — कोशल।

चेल्लना — लिच्छवि / वैशाली।

क्षेमा — मद्र देश।

06

बिम्बिसार और धर्म

बुद्ध और महावीर का समकालीन

बिम्बिसार गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी दोनों का समकालीन था।

बौद्ध ग्रंथों में उसे बुद्ध और बौद्ध संघ का महत्वपूर्ण संरक्षक बताया गया है। उसने राजगृह के निकट वेणुवन बुद्ध और संघ को प्रदान किया था।

जैन परंपरा भी बिम्बिसार को महावीर और जैन धर्म से निकट संबंध रखने वाला शासक मानती है।

इस कारण बिम्बिसार को केवल एक धर्म का अनन्य अनुयायी बताने की अपेक्षा उसे बुद्ध और महावीर दोनों का समकालीन तथा धार्मिक परंपराओं का संरक्षक मानना अधिक उचित है।

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राजवैद्य जीवक

बिम्बिसार के दरबार का प्रसिद्ध चिकित्सक

जीवक कोमारभच्च बिम्बिसार के दरबार का प्रसिद्ध राजवैद्य था।

बौद्ध साहित्य में जीवक का संबंध गौतम बुद्ध की चिकित्सा से भी मिलता है।

अवन्ति के राजा प्रद्योत के बीमार पड़ने पर जीवक को उसके उपचार के लिए भेजे जाने का विवरण भी परंपरा में मिलता है।

जीवक प्राचीन भारत के प्रसिद्ध चिकित्सकों में गिना जाता है।

08

अजातशत्रु का राज्यारोहण

कुणिक

बिम्बिसार के बाद उसका पुत्र अजातशत्रु मगध का शासक बना। उसका एक नाम या उपनाम कुणिक भी मिलता है।

परंपरागत कालक्रम में उसका राज्यारोहण लगभग 492 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है।

बौद्ध स्रोतों में अजातशत्रु द्वारा अपने पिता बिम्बिसार को बंदी बनाने और उसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी होने की कथा मिलती है। जैन और बौद्ध परंपराओं में घटनाओं के विवरण में कुछ अंतर है।

अजातशत्रु का शासन लगभग 492–460 ईसा पूर्व के आसपास रखा जाता है। इसलिए उसके लिए 52 वर्ष का शासनकाल सही नहीं है।

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अजातशत्रु और धर्म

बौद्ध एवं जैन दोनों परंपराओं में उल्लेख

अजातशत्रु का उल्लेख बौद्ध और जैन दोनों साहित्यिक परंपराओं में मिलता है।

जैन ग्रंथ उसे महावीर से संबंधित शासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि बौद्ध ग्रंथों में वह बुद्ध से संवाद करने वाला और बाद में बौद्ध संघ का संरक्षक बताया गया है।

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद राजगृह में आयोजित प्रथम बौद्ध संगीति को अजातशत्रु का राजकीय संरक्षण प्राप्त था।

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अजातशत्रु और कोशल

काशी के लिए संघर्ष

बिम्बिसार की मृत्यु के बाद कोशल नरेश प्रसेनजित और अजातशत्रु के बीच काशी को लेकर संघर्ष हुआ।

अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और काशी मगध के नियंत्रण में बनी रही।

इससे मगध की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति और बढ़ी।

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वज्जि संघ पर विजय

वर्षकार की भूमिका

अजातशत्रु का सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष वज्जि संघ से हुआ।

वज्जि संघ का प्रमुख केंद्र वैशाली था और लिच्छवि इसकी प्रमुख शक्ति थे।

अजातशत्रु के प्रमुख मंत्री वर्षकार ने वज्जियों के बीच फूट पैदा करने की नीति अपनाई।

लंबे संघर्ष के बाद अजातशत्रु ने वज्जि संघ को पराजित किया और मगध की उत्तरी सीमा का विस्तार किया।

परंपरा में यह युद्ध लगभग 16 वर्ष तक चलने वाला बताया गया है।

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अजातशत्रु के युद्धास्त्र

महाशिलाकंटक और रथमुषल

बौद्ध और जैन परंपराओं में अजातशत्रु द्वारा युद्ध में विशेष प्रकार के अस्त्रों के उपयोग का उल्लेख मिलता है।

महाशिलाकंटक को बड़े पत्थर फेंकने वाला युद्ध-यंत्र और रथमुषल को हथियारों से युक्त रथ के रूप में वर्णित किया गया है।

इन युद्ध-यंत्रों का उल्लेख विशेष रूप से वज्जि के विरुद्ध संघर्ष से जोड़ा जाता है।

परीक्षा बिंदु

अजातशत्रु — महाशिलाकंटक और रथमुषल।

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पाटलिग्राम का महत्व

भविष्य के पाटलिपुत्र की शुरुआत

अजातशत्रु के समय उसके मंत्रियों सुनीध और वर्षकार ने वज्जियों के विरुद्ध सुरक्षा के लिए पाटलिग्राम में किलेबंदी कराई।

यह स्थान गंगा और सोन नदी-प्रणाली के निकट होने के कारण सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

यही पाटलिग्राम आगे चलकर पाटलिपुत्र के रूप में विकसित हुआ।

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उदायिन

पाटलिपुत्र का विकास

अजातशत्रु के बाद उदायिन या उदयभद्र मगध का प्रमुख शासक बना।

कुछ परंपराओं में अजातशत्रु की मृत्यु को उसके पुत्र से जोड़ा गया है, पर उपलब्ध परंपराओं में इस विषय में एकरूपता नहीं है।

उदायिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य पाटलिपुत्र को प्रमुख राजनीतिक केंद्र के रूप में विकसित करना था।

उसने गंगा और सोन के संगम क्षेत्र के निकट पाटलिपुत्र में किले और राजधानी के विकास को बढ़ावा दिया।

जैन परंपरा उदायिन को जैन धर्म से निकट संबंध रखने वाला शासक मानती है।

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हर्यक वंश का अंत

नागदशक

उदायिन के बाद हर्यक वंश में कई दुर्बल शासक हुए।

परंपरागत राजसूचियों में अनुरुद्ध, मुंड और नागदशक जैसे शासकों का उल्लेख मिलता है।

नागदशक को सामान्यतः हर्यक वंश का अंतिम शासक माना जाता है।

उसके शासन के विरुद्ध असंतोष के बाद शिशुनाग सत्ता में आया और एक नए राजवंश की स्थापना हुई।

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शिशुनाग वंश

हर्यक वंश के बाद

हर्यक वंश के बाद शिशुनाग वंश का उदय हुआ। इस वंश का संस्थापक शिशुनाग था।

बौद्ध परंपरा के अनुसार शिशुनाग पूर्व में राजा का अधिकारी या अमात्य था और जनता के समर्थन से सत्ता में आया।

उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता अवन्ति को मगध में मिलाना थी।

अवन्ति की विजय के बाद मगध का एक बड़ा पश्चिमी प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो गया।

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शिशुनाग की राजधानी

राजगृह और वैशाली

शिशुनाग की राजधानी के विषय में विभिन्न परंपराएँ मिलती हैं। उसका संबंध राजगृह और वैशाली दोनों से मिलता है।

कुछ परंपराएँ बताती हैं कि उसने वैशाली को एक महत्वपूर्ण राजकीय केंद्र बनाया।

इसके बाद उसके उत्तराधिकारी कालाशोक के समय पाटलिपुत्र मगध की प्रमुख राजधानी के रूप में स्थापित हुआ।

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कालाशोक

द्वितीय बौद्ध संगीति

शिशुनाग के बाद उसका पुत्र कालाशोक मगध का शासक बना।

उसके समय वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति आयोजित हुई।

इस संगीति में बौद्ध संघ के विनय संबंधी विवादों पर चर्चा हुई।

कालाशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र का राजनीतिक महत्व और बढ़ा।

एक साथ याद करें

कालाशोक → वैशाली → द्वितीय बौद्ध संगीति।

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शिशुनाग वंश का अंत

महानंदिन

शिशुनाग वंश के अंतिम चरण के शासकों की सूची विभिन्न पुराणिक और बौद्ध स्रोतों में एक जैसी नहीं है।

पुराणिक परंपरा में महानंदिन को शिशुनाग वंश का अंतिम शासक माना जाता है।

नंदिवर्धन नाम भी इस वंश की कुछ राजसूचियों में मिलता है, लेकिन उसे अंतिम शासक बताना सभी स्रोतों से मेल नहीं खाता।

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नंद वंश

महापद्म नंद

शिशुनाग वंश के बाद नंद वंश सत्ता में आया।

इस वंश का संस्थापक और सबसे प्रसिद्ध प्रारंभिक शासक महापद्म नंद था।

पुराणों में उसे सर्वक्षत्रान्तक अर्थात अनेक क्षत्रिय राजवंशों का विनाश करने वाला कहा गया है।

महापद्म नंद ने मगध साम्राज्य की सीमा का व्यापक विस्तार किया। उसका प्रभाव कलिंग तक पहुँचा।

नंदों के पास विशाल सेना और अपार धन-संपत्ति थी। उनकी आर्थिक शक्ति का आधार व्यापक राज्य, कृषि और कर-व्यवस्था थी।

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धनानंद

नंद वंश का अंतिम शासक

धनानंद नंद वंश का अंतिम शासक था।

वह सिकंदर के भारत अभियान का समकालीन था। सिकंदर 326 ईसा पूर्व में उत्तर-पश्चिम भारत तक पहुँचा था।

यूनानी विवरणों में गंगा घाटी के नंद शासक की विशाल सेना और संपत्ति की चर्चा मिलती है।

नंद शासन भारी करों और विशाल राजकोष के लिए प्रसिद्ध था। बाद की परंपराओं में धनानंद की अलोकप्रियता का भी उल्लेख मिलता है।

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नंद वंश का पतन और मौर्य वंश का उदय

चंद्रगुप्त मौर्य

चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के अंतिम भाग में चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद शासन को समाप्त किया।

भारतीय परंपरा में चाणक्य या कौटिल्य को चंद्रगुप्त की सफलता का प्रमुख मार्गदर्शक माना जाता है।

धनानंद को हटाने के बाद चंद्रगुप्त ने लगभग 322/321 ईसा पूर्व में मगध में मौर्य वंश की स्थापना की।

यहीं से मगध की शक्ति एक महाजनपद और क्षेत्रीय साम्राज्य से बढ़कर भारतीय इतिहास के प्रथम विशाल साम्राज्यों में से एक मौर्य साम्राज्य के रूप में विकसित हुई।

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मगध के उत्कर्ष के प्रमुख कारण

भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति

मगध की भूमि अत्यंत उपजाऊ थी। गंगा और उसकी सहायक नदियों के मैदानों में कृषि से बड़ा अधिशेष प्राप्त होता था।

दक्षिण बिहार और आसपास के क्षेत्रों में लौह-अयस्क उपलब्ध था, जिससे कृषि उपकरण और हथियार बनाने में लाभ मिला।

मगध के जंगलों से हाथी उपलब्ध होते थे, जिनका सेना में व्यापक उपयोग किया गया।

गंगा, सोन और अन्य नदियाँ संचार, व्यापार और सैनिक आवागमन के लिए उपयोगी थीं।

प्रारंभिक राजधानी राजगृह पाँच पहाड़ियों से घिरी हुई थी, जिससे उसे प्राकृतिक सुरक्षा प्राप्त थी।

बाद की राजधानी पाटलिपुत्र महत्वपूर्ण नदी-मार्गों के संगम के निकट स्थित थी, जिससे उसका सामरिक और व्यापारिक महत्व बढ़ गया।

बिम्बिसार और अजातशत्रु जैसे महत्वाकांक्षी शासकों ने विजय, वैवाहिक संबंध और कूटनीति का कुशल उपयोग किया।

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मगध के प्रमुख वंशों का क्रम

त्वरित तालिका

वंश प्रमुख शासक मुख्य उपलब्धि
बृहद्रथ परंपरा बृहद्रथ, जरासंध महाकाव्य एवं पुराणिक परंपरा
हर्यक वंश बिम्बिसार अंग विजय, वैवाहिक नीति
हर्यक वंश अजातशत्रु कोशल एवं वज्जि संघर्ष, मगध विस्तार
हर्यक वंश उदायिन पाटलिपुत्र का प्रमुख राजधानी-केंद्र के रूप में विकास
हर्यक वंश नागदशक अंतिम शासक
शिशुनाग वंश शिशुनाग अवन्ति विजय
शिशुनाग वंश कालाशोक द्वितीय बौद्ध संगीति
शिशुनाग वंश महानंदिन पुराणिक परंपरा में अंतिम शासक
नंद वंश महापद्म नंद विशाल साम्राज्य का विस्तार
नंद वंश धनानंद अंतिम नंद; सिकंदर का समकालीन
मौर्य वंश चंद्रगुप्त मौर्य नंद सत्ता का अंत और मौर्य साम्राज्य की स्थापना

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

बृहद्रथ और जरासंध — मगध की महाकाव्य-पुराणिक परंपरा।

मगध की प्राचीन राजधानी — गिरिव्रज / राजगृह।

हर्यक वंश का प्रथम प्रमुख ऐतिहासिक शासक — बिम्बिसार।

बिम्बिसार — लगभग 544–492 ईसा पूर्व — लगभग 52 वर्ष शासन।

अंग का शासक ब्रह्मदत्त — बिम्बिसार ने पराजित किया।

अंग की राजधानी — चम्पा।

बिम्बिसार — बुद्ध और महावीर दोनों का समकालीन।

राजवैद्य जीवक — बिम्बिसार के दरबार से संबंधित।

महाकोशला — कोशल; चेल्लना — वैशाली; क्षेमा — मद्र।

अजातशत्रु का उपनाम — कुणिक।

अजातशत्रु — लगभग 492–460 ईसा पूर्व।

वज्जि विजय में मंत्री वर्षकार की महत्वपूर्ण भूमिका।

अजातशत्रु — महाशिलाकंटक और रथमुषल।

प्रथम बौद्ध संगीति — राजगृह — अजातशत्रु का संरक्षण।

पाटलिग्राम की किलेबंदी — सुनीध और वर्षकार।

उदायिन — पाटलिपुत्र को प्रमुख राजधानी के रूप में विकसित करने वाला।

हर्यक वंश का अंतिम शासक — नागदशक।

शिशुनाग — शिशुनाग वंश का संस्थापक।

शिशुनाग की प्रमुख उपलब्धि — अवन्ति को मगध में मिलाना।

कालाशोक — द्वितीय बौद्ध संगीति — वैशाली।

पुराणिक परंपरा में शिशुनाग वंश का अंतिम शासक — महानंदिन।

नंद वंश का संस्थापक — महापद्म नंद।

नंद वंश का अंतिम शासक — धनानंद।

धनानंद — सिकंदर का समकालीन।

चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद शासन का अंत किया।

लगभग 322/321 ईसा पूर्व — मौर्य साम्राज्य की स्थापना।

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