महात्मा गांधी
(1869–1948)
महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
मोहनदास करमचंद गांधी बीसवीं शताब्दी के भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में थे। सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह को राजनीतिक संघर्ष के प्रमुख साधन बनाकर उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया।
भारत आने के बाद उनके प्रारंभिक तीन प्रमुख आंदोलनों—चंपारण सत्याग्रह, अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन और खेड़ा सत्याग्रह—ने भारतीय राजनीति में उनकी नेतृत्व क्षमता स्थापित की।
जन्म एवं परिवार
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 ई. को गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित पोरबंदर में हुआ था।
उनके पिता करमचंद गांधी थे, जिन्हें कबा गांधी के नाम से भी जाना जाता था। वे पोरबंदर सहित विभिन्न रियासतों में दीवान के पद पर रहे।
उनकी माता का नाम पुतलीबाई था। गांधीजी के व्यक्तित्व पर उनकी माता की धार्मिकता, उपवास और आत्मसंयम का गहरा प्रभाव पड़ा।
कस्तूरबा गांधी से विवाह
1883 ई. में मोहनदास गांधी का विवाह कस्तूरबा माखनजी से हुआ, जो आगे कस्तूरबा गांधी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
गांधीजी और कस्तूरबा के चार पुत्र हुए—हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास गांधी।
कस्तूरबा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका और भारत दोनों में गांधीजी के अनेक सामाजिक तथा राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया।
इंग्लैंड में कानून की शिक्षा
4 सितंबर 1888 ई. को गांधीजी कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड रवाना हुए और अक्टूबर 1888 में लंदन पहुँचे।
उन्होंने लंदन में विधि का अध्ययन किया और 10 जून 1891 को बार में बुलाए गए।
इसके बाद जून 1891 में वे भारत के लिए रवाना हुए और भारत लौटकर वकालत प्रारंभ करने का प्रयास किया।
इसलिए गांधीजी के इंग्लैंड प्रवास की सही अवधि सामान्यतः 1888 से 1891 मानी जाती है, न कि 1889 से 1891।
परीक्षा के लिए
गांधीजी → इंग्लैंड में कानून की शिक्षा → 1888–1891।
दक्षिण अफ्रीका की यात्रा
भारत में वकालत में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका में भारतीय व्यापारी दादा अब्दुल्ला की फर्म से एक मुकदमे में कानूनी सहायता देने का प्रस्ताव मिला।
अप्रैल 1893 ई. में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हुए।
वहाँ उन्हें भारतीयों के विरुद्ध नस्लीय भेदभाव का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। रेल यात्रा के दौरान उन्हें प्रथम श्रेणी का वैध टिकट होने के बावजूद पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर डिब्बे से उतार दिया गया।
दक्षिण अफ्रीका के इन अनुभवों ने गांधीजी के राजनीतिक और सामाजिक विचारों के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई।
भ्रम से बचें
दक्षिण अफ्रीका जाने का वर्ष 1893 है, 1892 नहीं।
दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी ने वहाँ रहने वाले भारतीयों को संगठित किया और उनके नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
1894 ई. में उन्होंने नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की।
दक्षिण अफ्रीका में ही गांधीजी ने अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध की अपनी पद्धति को विकसित किया, जिसे आगे सत्याग्रह कहा गया।
दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने लगभग दो दशकों तक भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
भारत वापसी — 9 जनवरी 1915
दक्षिण अफ्रीका में लंबे संघर्ष के बाद गांधीजी 9 जनवरी 1915 ई. को बंबई पहुँचे और भारत लौट आए।
इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में भारत में 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है।
भारत आने के बाद गांधीजी ने तुरंत किसी बड़े राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया। अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर उन्होंने पहले भारत की परिस्थितियों को समझने के लिए देश का भ्रमण किया।
याद रखें
9 जनवरी 1915 → गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे।
गोपालकृष्ण गोखले — राजनीतिक गुरु
गोपालकृष्ण गोखले को गांधीजी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।
दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष के दौरान भी गांधीजी का गोखले से संपर्क था। भारत लौटने के बाद गोखले ने उन्हें भारतीय राजनीति में जल्दबाजी से प्रवेश करने के बजाय देश की वास्तविक परिस्थितियों को समझने की सलाह दी।
गांधीजी ने इस सलाह का पालन करते हुए भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की और किसानों, मजदूरों तथा सामान्य जनता की समस्याओं को समझा।
परीक्षा के लिए
महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु — गोपालकृष्ण गोखले।
रवींद्रनाथ टैगोर और गांधीजी
भारत लौटने के बाद गांधीजी का शांतिनिकेतन और रवींद्रनाथ टैगोर से निकट संबंध विकसित हुआ।
गांधीजी 1915 में शांतिनिकेतन गए और टैगोर से उनकी महत्वपूर्ण मुलाकातें हुईं।
रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधीजी के लिए “महात्मा” संबोधन का व्यापक रूप से प्रयोग किया और इस संबोधन को लोकप्रिय बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
लेकिन यह लिखना कि 1915 में शांतिनिकेतन में टैगोर ने ही पहली बार गांधीजी को “महात्मा” की उपाधि दी, ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह निश्चित नहीं है, क्योंकि गांधी के लिए यह संबोधन इससे पहले भी प्रयोग में आ चुका था।
गांधीजी रवींद्रनाथ टैगोर को आदरपूर्वक “गुरुदेव” कहते थे।
कैसर-ए-हिंद पदक
ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका में उनके मानवीय और चिकित्सा-सहायता संबंधी कार्यों के लिए कैसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक प्रदान किया था।
यह कोई राजसी “उपाधि” नहीं बल्कि पदक था।
1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ करते समय गांधीजी ने यह पदक ब्रिटिश सरकार को वापस कर दिया।
भ्रम से बचें
कैसर-ए-हिंद → उपाधि नहीं, स्वर्ण पदक।
हिंद स्वराज
गांधीजी ने 1909 ई. में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज लिखी।
इस पुस्तक में उन्होंने स्वराज की अवधारणा, आधुनिक सभ्यता, औद्योगीकरण, हिंसा, राजनीतिक स्वतंत्रता और नैतिक आत्मशासन पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
गांधीजी के लिए स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेजों को भारत से हटाना नहीं था, बल्कि व्यक्ति और समाज में आत्मसंयम, आत्मनिर्भरता और नैतिक स्वशासन स्थापित करना भी था।
हिंद स्वराज मूल रूप से गुजराती में लिखी गई थी।
गांधीजी के प्रमुख समाचार-पत्र
गांधीजी ने अपने राजनीतिक और सामाजिक विचारों के प्रचार के लिए पत्रकारिता का व्यापक उपयोग किया।
दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने इंडियन ओपिनियन नामक पत्र से महत्वपूर्ण रूप से जुड़कर वहाँ भारतीयों की समस्याओं को उठाया।
भारत में उन्होंने नवजीवन के गुजराती संस्करण और यंग इंडिया के अंग्रेजी संस्करण का संपादन किया।
1933 ई. में उन्होंने अस्पृश्यता के विरोध और सामाजिक सुधार के उद्देश्य से हरिजन पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया।
परीक्षा के लिए
नवजीवन — गुजराती।
यंग इंडिया — अंग्रेजी।
हरिजन — 1933 से।
गांधीजी की आत्मकथा
गांधीजी की प्रसिद्ध आत्मकथा का गुजराती नाम “सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा” के अर्थ से संबंधित है।
इसका अंग्रेजी रूप “द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इस आत्मकथा में गांधीजी ने अपने जीवन, व्यक्तिगत कमजोरियों, नैतिक प्रयोगों, सत्य, ब्रह्मचर्य, आहार, धर्म और राजनीतिक चिंतन के विकास का वर्णन किया।
कोचरब से साबरमती आश्रम
भारत लौटने के बाद गांधीजी ने 25 मई 1915 ई. को अहमदाबाद के कोचरब में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की।
बाद में इस आश्रम को 17 जून 1917 ई. को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित कर दिया गया।
यही आश्रम आगे साबरमती आश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुआ और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की अनेक महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र बना।
1930 के ऐतिहासिक दांडी मार्च की शुरुआत भी इसी साबरमती आश्रम से हुई।
याद रखें
1915 → कोचरब सत्याग्रह आश्रम।
1917 → साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरण।
भारत में गांधीजी के प्रथम तीन आंदोलन
| आंदोलन | वर्ष | मुख्य प्रश्न |
|---|---|---|
| चंपारण सत्याग्रह | 1917 | नील की खेती और किसानों की समस्याएँ |
| अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन | 1918 | मजदूरी और बोनस का विवाद |
| खेड़ा सत्याग्रह | 1918 | फसल खराब होने के बावजूद भूमि-राजस्व की वसूली |
चंपारण सत्याग्रह — 1917
चंपारण सत्याग्रह 1917 ई. में बिहार के चंपारण जिले में हुआ और इसे भारत में गांधीजी का प्रथम प्रमुख सत्याग्रह माना जाता है।
चंपारण के किसानों को यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा तीनकठिया प्रथा के अंतर्गत अपनी भूमि के एक निश्चित हिस्से में नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था।
चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी से उनकी समस्याओं की जाँच करने के लिए चंपारण आने का आग्रह किया।
गांधीजी चंपारण पहुँचे और किसानों की शिकायतों तथा बागान मालिकों की व्यवस्था की जाँच प्रारंभ की।
ब्रिटिश प्रशासन ने गांधीजी को क्षेत्र छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने आदेश का शांतिपूर्ण ढंग से उल्लंघन किया और दंड स्वीकार करने की तत्परता दिखाई।
अंततः सरकार को जाँच समिति बनानी पड़ी जिसमें गांधीजी भी सदस्य बने और किसानों को महत्वपूर्ण राहत मिली।
अत्यंत महत्वपूर्ण
चंपारण सत्याग्रह → 1917 → बिहार → तीनकठिया प्रथा → राजकुमार शुक्ल → भारत में गांधीजी का प्रथम प्रमुख सत्याग्रह।
चंपारण में गांधीजी के सहयोगी
चंपारण आंदोलन में गांधीजी को अनेक स्थानीय और राष्ट्रीय नेताओं का सहयोग मिला।
इनमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, मजहरुल हक, जे. बी. कृपलानी और महादेव देसाई जैसे व्यक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
गांधीजी ने चंपारण में केवल नील किसानों की आर्थिक समस्या नहीं उठाई, बल्कि शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक सुधारों पर भी ध्यान दिया।
अहमदाबाद मिल मजदूर हड़ताल — 1918
1918 ई. में अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों और मिल मालिकों के बीच मजदूरी से संबंधित विवाद उत्पन्न हुआ।
प्लेग के दौरान मजदूरों को अतिरिक्त भत्ता दिया गया था। महामारी का प्रभाव कम होने के बाद मिल मालिक इसे समाप्त करना चाहते थे, जबकि महँगाई के कारण मजदूर अधिक मजदूरी की मांग कर रहे थे।
गांधीजी ने मजदूरों का पक्ष लिया और उन्हें अहिंसक तथा अनुशासित हड़ताल के लिए प्रेरित किया।
आंदोलन के दौरान गांधीजी ने मजदूरों की मांग के समर्थन में उपवास भी किया।
अंततः विवाद मध्यस्थता से सुलझा और मजदूरों को मजदूरी में वृद्धि मिली।
परीक्षा के लिए
अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन → 1918 → मजदूर बनाम मिल मालिक → गांधीजी का उपवास।
खेड़ा सत्याग्रह — 1918
खेड़ा सत्याग्रह 1918 ई. में गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों की भूमि-राजस्व संबंधी समस्या को लेकर हुआ।
फसल खराब होने और किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद ब्रिटिश सरकार भूमि-राजस्व वसूल करना चाहती थी।
किसानों की मांग थी कि खराब फसल की स्थिति में राजस्व वसूली स्थगित की जाए।
गांधीजी ने किसानों से कहा कि जो किसान वास्तव में कर देने में असमर्थ हैं वे शांतिपूर्ण ढंग से राजस्व भुगतान न करें और दमन का अहिंसक तरीके से सामना करें।
इस आंदोलन में वल्लभभाई पटेल सहित कई स्थानीय नेताओं ने गांधीजी का महत्वपूर्ण सहयोग किया।
अंततः सरकार ने गरीब और असमर्थ किसानों के प्रति नरमी बरती और राजस्व वसूली के प्रश्न पर आंशिक राहत प्रदान की।
याद रखें
खेड़ा सत्याग्रह → 1918 → गुजरात → फसल खराब → भूमि-राजस्व में राहत → गांधीजी एवं वल्लभभाई पटेल।
तीनों प्रारंभिक आंदोलनों का अंतर
| आंदोलन | वर्ग | मुख्य समस्या | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| चंपारण | किसान | नील की जबरन खेती | भारत में गांधीजी का प्रथम प्रमुख सत्याग्रह |
| अहमदाबाद | मिल मजदूर | मजदूरी विवाद | गांधीजी का उपवास |
| खेड़ा | किसान | भूमि-राजस्व | वल्लभभाई पटेल का महत्वपूर्ण सहयोग |
सत्याग्रह की अवधारणा
गांधीजी के राजनीतिक संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सत्याग्रह था।
सत्याग्रह का आधार सत्य और अहिंसा था। इसका उद्देश्य विरोधी को हिंसा या भय से पराजित करना नहीं बल्कि नैतिक बल और आत्मबल के माध्यम से अन्याय का प्रतिरोध करना था।
सत्याग्रही को स्वयं कष्ट सहने के लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन विरोधी के प्रति घृणा या हिंसा नहीं करनी चाहिए।
दक्षिण अफ्रीका में विकसित सत्याग्रह की इस पद्धति को गांधीजी ने भारत में किसानों, मजदूरों और आगे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक रूप से प्रयोग किया।
गांधीजी की हत्या
भारत की स्वतंत्रता के बाद देश विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के गंभीर दौर से गुजर रहा था। गांधीजी हिंदू-मुस्लिम शांति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के प्रयासों में लगे रहे।
30 जनवरी 1948 ई. को नई दिल्ली के बिड़ला भवन में शाम की प्रार्थना सभा की ओर जाते समय नाथूराम विनायक गोडसे ने गांधीजी को गोली मार दी।
गांधीजी की मृत्यु के बाद 30 जनवरी को भारत में उनके बलिदान की स्मृति में शहीद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
परीक्षा के लिए
30 जनवरी 1948 → बिड़ला भवन, नई दिल्ली → नाथूराम गोडसे द्वारा गांधीजी की हत्या।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
| वर्ष / तिथि | घटना |
|---|---|
| 2 अक्टूबर 1869 | पोरबंदर में गांधीजी का जन्म |
| 1883 | कस्तूरबा गांधी से विवाह |
| 1888 | कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड रवाना |
| 1891 | कानून की शिक्षा पूर्ण कर भारत लौटे |
| 1893 | दादा अब्दुल्ला की फर्म के मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए |
| 1894 | नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना |
| 1909 | हिंद स्वराज की रचना |
| 9 जनवरी 1915 | दक्षिण अफ्रीका से भारत वापसी |
| 25 मई 1915 | कोचरब में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना |
| 1917 | चंपारण सत्याग्रह |
| 17 जून 1917 | आश्रम को साबरमती स्थानांतरित किया गया |
| 1918 | अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन |
| 1918 | खेड़ा सत्याग्रह |
| 1933 | हरिजन पत्र का प्रकाशन प्रारंभ |
| 30 जनवरी 1948 | नई दिल्ली में गांधीजी की हत्या |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
गांधीजी का जन्म → 2 अक्टूबर 1869 → पोरबंदर।
पिता → करमचंद गांधी; माता → पुतलीबाई।
विवाह → 1883 → कस्तूरबा गांधी।
चार पुत्रों का क्रम — हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास।
गांधीजी कानून की पढ़ाई के लिए 1888 में इंग्लैंड गए थे, 1889 में नहीं।
वे 1893 में दक्षिण अफ्रीका गए थे, 1892 में नहीं।
दक्षिण अफ्रीका जाने का कारण दादा अब्दुल्ला की फर्म से संबंधित कानूनी मुकदमा था।
9 जनवरी 1915 → गांधीजी भारत लौटे।
गोपालकृष्ण गोखले → गांधीजी के राजनीतिक गुरु।
रवींद्रनाथ टैगोर ने “महात्मा” संबोधन को लोकप्रिय बनाया, लेकिन उन्हें 1915 में पहली बार यह उपाधि देने का दावा निश्चित ऐतिहासिक तथ्य की तरह नहीं लिखना चाहिए।
कैसर-ए-हिंद → उपाधि नहीं, स्वर्ण पदक।
हिंद स्वराज → 1909।
नवजीवन → गुजराती; यंग इंडिया → अंग्रेजी; हरिजन → 1933।
कोचरब आश्रम → 1915; साबरमती स्थानांतरण → 1917।
चंपारण → 1917 → भारत में गांधीजी का प्रथम प्रमुख सत्याग्रह।
अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन → 1918।
खेड़ा सत्याग्रह → 1918।
30 जनवरी 1948 → नाथूराम गोडसे द्वारा गांधीजी की हत्या।
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ था।
उनके पिता करमचंद गांधी और माता पुतलीबाई थीं।
1883 में उनका विवाह कस्तूरबा गांधी से हुआ।
उनके चार पुत्र हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास थे।
1888 से 1891 तक गांधीजी इंग्लैंड में कानून की शिक्षा से जुड़े रहे।
1893 में वे दादा अब्दुल्ला की फर्म के मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए।
दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने नस्लीय भेदभाव का सामना किया और भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष प्रारंभ किया।
1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की।
दक्षिण अफ्रीका में ही सत्याग्रह की पद्धति का विकास हुआ।
1909 में गांधीजी ने हिंद स्वराज लिखा।
9 जनवरी 1915 को गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे।
गोपालकृष्ण गोखले गांधीजी के राजनीतिक गुरु थे।
रवींद्रनाथ टैगोर और गांधीजी के बीच गहरा पारस्परिक सम्मान था; गांधीजी टैगोर को गुरुदेव कहते थे।
गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका की मानवीय सेवाओं के लिए कैसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था, जिसे उन्होंने बाद में लौटा दिया।
25 मई 1915 को गांधीजी ने कोचरब में सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया।
17 जून 1917 को आश्रम साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित हुआ और आगे साबरमती आश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
चंपारण सत्याग्रह 1917 में नील किसानों की तीनकठिया व्यवस्था के विरुद्ध हुआ और इसे भारत में गांधीजी का प्रथम प्रमुख सत्याग्रह माना जाता है।
राजकुमार शुक्ल गांधीजी को चंपारण लाने से जुड़े प्रमुख किसान थे।
1918 का अहमदाबाद आंदोलन कपड़ा मिल मजदूरों की मजदूरी से संबंधित था और इसमें गांधीजी ने उपवास किया।
1918 का खेड़ा सत्याग्रह खराब फसल के बावजूद भूमि-राजस्व वसूली के विरुद्ध हुआ और इसमें वल्लभभाई पटेल ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
गांधीजी ने नवजीवन, यंग इंडिया और हरिजन जैसे पत्रों के माध्यम से अपने राजनीतिक और सामाजिक विचारों का प्रचार किया।
उनकी प्रसिद्ध आत्मकथा द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ है।
30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा की ओर जाते समय नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी।
परीक्षा के लिए मुख्य क्रम है — 1869 जन्म → 1883 विवाह → 1888 इंग्लैंड → 1893 दक्षिण अफ्रीका → 1909 हिंद स्वराज → 1915 भारत वापसी → 1917 चंपारण → 1918 अहमदाबाद → 1918 खेड़ा → 1948 गांधीजी की हत्या।